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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:समयसार कलश - कलश 133

From जैनकोष



रागाद्यास्रवरोधतो निजधुरां धृत्वा पर: संवर:

कर्मागामि समस्तमेव भरतो दूरांनिरुंधं स्थित: । प्राग्बद्धं तु तदेव दग्धुमधुना व्याजृंभते निर्जरा ज्ञानज्योतिरपावृतं न हि यतो रागादिभिर्मूर्छति ॥133॥

1051- उपयोग मंच पर निर्जरातत्त्व का प्रवेश-

    जैसे नाटक देखना है तो अपने ज्ञान में आया, इसी तरह तो देखना जानना कहलाता है। तो जैसे बाहर का नाटक अपने उपयोग में जाना इसी तरह अंदर का नाटक अपने उपयोग से जाना जा रहा है, और यह अंदर का नाटक जो चल रहा है उसमें यह पूछा जाय कि नाटक होता है तो किसी आधार पर तो होता है। जमीन हो, चबूतरा हो, मंच हो...। तो यहाँ के नाटक का मंच कौन है? जहाँ कि यह परखा जा रहा है? वह मंच है यही उपयोग जहाँ नाटक हो रहा है, वही पहिचान करने वाला बन रहा है तो इस तरह जीव अजीव, पुण्य पाप कर्मभेष, आस्रव, सम्वर, इन सबकी जानकारी हुई और अब इस उपयोग भूमि पर, मंच पर निर्जरातत्त्व का प्रवेश होता है। अर्थात् निर्जरा के बारे में तथ्य की जानकारी की जानी है। जब इसका मूल ज्ञान में होता है तो यह सब भेष छूट जाया करता है, निर्जरा का प्रवेश कब हुआ? किस बल पर हुआ, वह है सम्वर का बल। वास्तविक निर्जरा तो जिस बल पर सम्वर होता है उसी बल पर चलती है, और वह है एक शुद्ध स्वरूप का आश्रय। इस सम्वर की बात अभी-अभी निकली है। जैसे सम्वर बना कि रागादिक आस्रव का निरोध करके इसने अपनी धुरा धारण की थी, एक अतुल सामर्थ्य है, जिसमें एक उत्कृष्ट सम्वर हुआ, जिसने की आगामी समस्त कर्मों को दूर से ही रोक दिया।

1052- संवरपूर्वक निर्जरा का महत्त्व- सम्वर मायने आते हुए को रोकना नहीं है, किंतु आना ही नहीं, इसका नाम है सम्वर। कर्मों में कर्मत्व आ रहा हो और उसे रोके, सम्वर की यह बात नहीं है, किंतु कर्मों में, कार्माण वर्गणा में कर्मत्व आया ही नहीं। जिन-जिन प्रकृतियों वाला कर्मत्व नहीं आया उन उनका सम्वर कहलाता है। जब कभी यह बात कही जाती कि आस्रव के निरोध को सम्वर कहते हैं तो इसका अर्थ यह नहीं कि आने को रोकना। आना ही नहीं, तो सम्वर है, कोई ऐसी मुठभेड़ वहाँ नहीं चलती कि कर्म यहाँ आ रहे और रोके जा रहे, इस तरह की मुठभेड़ नहीं है, किंतु उन कार्माणवर्गणाओं में उस-उस प्रकृतिरूप से कर्मत्व आता ही नहीं यह ही अर्थ है दूर से रोक दिया इस शब्द का। कहीं मुठभेड़ करके रोकने की बात नहीं है। तो सम्वर तत्त्व ने रागादिक आस्रव रोके और आगामी कर्म रोके। एक ऐसी प्रतिष्ठा की। तो वह किस बल पर? शुद्ध उपयोग के बल पर। उपयोग ज्ञान के किस स्वभाव से परिणमे कि वहाँ अनर्थ बने और किस स्वभाव से परिणमे कि वहाँ अनर्थ न बने। यह सब एक ज्ञान की कला पर ही सब निर्भर है। मैं आत्मा ज्ञानमात्र हूँ, तो इस ज्ञान की कला पर ही सर्व कुछ निर्भर है। यह ज्ञान जब कर्मस्वभावरूप से परिणमता है तब तो आस्रव होता। जब यह ज्ञान ज्ञानस्वभाव से परिणमता तो आस्रव का निरोध होता। 1053- परिणति की अन्यनिरपेक्षता का तथ्य– यद्यपि आस्रव का निमित्त उदय में आया हुआ प्रत्यय याने उदयागत कर्म है, लेकिन कर्मों में नवीन कर्मों में आने का निमित्तपना आये, उसका निमित्त यह रागभाव है याने उदय में आये कर्म दो बातों के कारणभूत बने, बने निमित्तकारणमात्र। कौनसी वे दो बातें हैं (1) रागादिक भाव आये और (2) नवीन कर्म आये, मगर नवीन कर्मों के आने में द्रव्यप्रत्यय को निमित्त बनने का निमित्त कारण रागभाव है याने प्रकृति के उदय का कार्य ही नवीन कर्म प्रकृति के आस्रव के निमित्तभूत इसी उदयागत द्रव्यप्रत्यय के निमित्त्तत्व का निमित्त कारण बन जाता है। यह सब निमित्त कारण की बात है। उपादान कारण किसे कहते हैं? जिसमें जो परिणाम है सो उसका वह उपादान है। और उपादान दृष्टि से कोई भी पदार्थ किसी दूसरे का करने वाला नहीं है, मगर विकार की स्थिति तब ही बनती है जब अनुकूल निमित्त का सान्निध्य हो और उस समय भी परिणमा तो यह अपनी ही परिणति से। इससे और बड़ा कौनसा उदाहरण होगा जहाँ स्वामी समंतभद्राचार्य ने यह बताया कि अनात्मार्थ बिना रागै: शास्ता शास्ति सतो हितम्। ध्वनन् शिल्पिकरस्पर्शान्मुरज: किमपेक्षते। उदाहरण में कहते हैं कि शिल्पी के हाथ से स्पर्श होने के बाद वे ध्वनि करते हुए मृदंग क्या ध्वनिरूप परिणति में किसी की उपेक्षा कर रहे हैं? निमित्तसन्निधान में उपादान ने अपना प्रभाव उत्पन्न किया। निमित्त सन्निधान बिना उपादान अपना प्रभाव नहीं बना पाता, तिस पर भी उपादान अपने विकाररूप परिणम रहा, मिल रहा सान्निध्य, परिणम रहा उपादान, पर उस परिणति में, मात्र उस क्रियापरिणति में तो किसी को भी अपेक्षा नहीं है। दूसरी बात, इसके साथ चिपककर दो मिलकर एक काम कर दें, ऐसा नहीं है। प्रत्येक पदार्थ अपना एक ही काम कर पाता है। तो जब जीव में राग हुआ, वहाँ अशुद्ध निश्चय से देखें तो केवल वही-वही दिखा, राग हुआ, रागी हुआ, रागपरिणत ही जीव है, पर होता जिस विधि से वह बात बनी हुई है। तो कर्मस्वभाव से ज्ञान के परिणमनों को निमित्त पाकर कर्म का आस्रव हुआ। फिर कर्म का सम्वर कैसे होता? ज्ञान स्वभाव से ज्ञान परिणमें तो सम्वर हो जाता है। तो इस प्रकार सम्वर ने अपना धुराधारण किया और समस्त आगामी कर्मों का निरोध किया। अब इस समय जो पहले बाँधे हुए कर्म हैं उनको जलाने के लिए निर्जरा का उदय होता है, जिससे कि आवृत हुई ज्ञानज्योति याने जिस पर आवरण पड़ा था ऐसी ज्ञानज्योति रागादिक भावों से मूर्छा को प्राप्त नहीं होती। ज्ञानज्योति पर आवरण साक्षात् तो विभाव का है और उस विभाव का निमित्त कारण कर्मविपाक है। तो कर्मविपाक का यह आवरण जब तक है तब तक यह ज्ञानज्योति आवृत है, हुआ वह अपने आपकी एक सामर्थ्य से जैसा जो कुछ बना हुआ है मगर जब ज्ञानज्योति कमजोर है, ज्ञानज्योति जब अपने आपमें स्वरूप को निहारने में असमर्थ है तो यह जीव रागादिक से मूर्छित हो जाता है, रागविभाव में लग जाता है, अपने स्वभाव को भूल जाता है और इस तरह की जन्ममरण की परंपरा बढ़ाता है। 1054- एक परिणाम होने पर भी शक्तिभेद से विभिन्न कार्यों का निमितत्त्व-

    अब यहाँ निर्जरा का प्रवेश हो रहा सम्वर का एक बल पाया, उसी शुद्धोपयोग का जहाँ जितना आंशिक बल है, निर्मलता है, वीतरागता है, जितने अंश में राग नहीं है उतने अंश से सम्वर है। परिणाम यद्यपि एक कालमें एक होता, मगर उस परिणाम की रचना कैसी है कि उसमें कुछ रागभाव है और कुछ राग का अभाव है, ऐसी स्थिति का वह राग है। तो जितने अंश में राग नहीं है उतने अंश में बंधन है। यह राग आग इस जीव को जला रही है, इस आग के बुझाने का उपाय, इस राग को दूर करने का एक ज्ञान का ज्ञानस्वभाव से परिणमन होने की स्थिति में जो एक सम्वरभाव प्रकट होता है वह समतामृत उस राग आग का शमन कर देता है। ऐसी स्थिति कब प्राप्त हो, ऐसी स्थिति अंत: भावना करना चाहिए, जिसके प्रताप से किसी परिस्थिति में कदाचित् भोगोपभोग का एक संयोग भी बना हुआ हो, तो भी भीतर जो स्वभाव का आश्रय है, प्रतीति है उसके बल पर वह दो टूकपना चल ही रहा है, वहाँ निर्जरा चल ही रही है।

1055- सम्यक्ज्ञानप्रकाश में भ्रम का अनवसर- जैसे डंठल से फल टूटकर गिर जाय तो वह फल उस डंठल में चाहे कितना ही जबरदस्ती करके चिपकावे, पर वह उस डंठल में बँध नहीं सकता, इसी प्रकार ये विभाव एक जीव भाव के डंठल में बंधे थे पहिले हमारे भ्रम से और जब अंत: भेदविज्ञान हुआ और ये अलग हुए, ज्ञान में आया कि ये विभाव तो मेरे स्वरूप ही नहीं, मैं तो एक चैतन्यमात्र हूँ, तो ऐसा ज्ञान जग जाने पर क्या फिर वे विभाव इस जीवभाव में बँध जायेंगे? याने यह ज्ञानी फिर क्या यह जान सकेगा कि यह मैं हूं? जब भ्रम खतम हो जाता है तब भ्रम का व्यवहार, भ्रम वाली बात कैसे मन में बने? जैसे दूर से रस्सी को साँप जान लिया, भ्रम हुआ और उस भ्रम में घबड़ा गये, अधीर हो गए, पर कोई उपाय बने, कोई साहस बने, कोई नजदीक पहुंचे और वहाँ समझ बने कि यह तो कोरी रस्सी है, रस्सी को उठाकर देख लिया कि यह रस्सी है, अब वह भ्रम का व्यवहार कैसे बना सकेगा? कैसे यह मान सकेगा कि यह साँप है ! क्या यह मान पाता है?...नहीं। तो इसी प्रकार जब आत्मस्वभाव का अनुभव हुआ चूँकि विभाव का भेदन कर दिया, ठीक सही समझ गए कि ये विभाव आकुलता के लिए हैं, ये विभाव मेरे स्वरूप नहीं, तो अब ये जीव के स्वरूप में कैसे बन जायेंगे? जान लिया सो जान लिया, बस जान लिया इससे अधिक और कोई मतलब न रहे तो उसकी जो अपनी अंतरंग समृद्धि है वह उड़िल उड़िल कर प्रकट हो जाता है। बस जान लिया। 1056- ज्ञाता द्रष्टा रहने में अलौकिक समृद्धिलाभ-

     एक कथानक है कि कोई सेठ आया मुनिराज के पास। तो मुनिराज ने पूछा कहो भाई तुम्हारा देवदर्शन का नियम है कि नहीं? तो सेठ बोला- महाराज हमारे नियम नहीं है देवदर्शन का हमारा घर मंदिर से बहुत दूर पड़ता है, हमसे यह नियम न निभेगा। तो फिर मुनिराज बोले- अच्छा तुम्हारे घर के सामने क्या है?...कुम्हार का घर।...तुमको सबसे पहले अपने घर से कौनसी चीज दिखती?...महाराज जी मुझे खाट से उठते ही सबसे पहले कुम्हार के द्वार पर बँधे हुए झोंटे का चाँद दिखता है।...अच्छा तो उसी का नियम ले लो। उसे देखकर खाना पीना लिया करना।...हाँ महाराज यह नियम तो चल जायगा, इसका मैं नियम लेता हूँ। अब वह सेठ अपना प्रतिदिन नियम निभाता रहा। एक दिन हुआ क्या कि वह कुम्हार अपने झोंटे को और दिनों से एक घंटा पहले ही लेकर खान में चला जाता। सेठ ने देखना चाहा झोंटे का चाँद तो वह दिखा नहीं। पता लगाकर सेठ उस खान की ओरचला। वहाँ उस झोंटे के चाँद को देखा उसी समय घटना घटी कि कुम्हार को मिट्टी खोदते हुए में एक असर्फियों से भरा घड़ा मिल गया। उसने खड़े होकर देखा कि कोई देख तो नहीं रहा। यदि कोई देख लेगा तो सरकार से शिकायत करके छिनवा देगा..., यह सोचकर जब खड़ा हुआ, देखने को तो वह सेठ दिख गया। कुम्हार ने समझ लिया कि सेठ ने असर्फियों से भरा हंडा देख लिया, यह सरकार से शिकायत करके छिनवा देगा, सो सेठजी को आवाज दिया...अरे सेठजी जरा बात तो सुनो..., तो सेठ बोला बस देख लिया।...अरे सुनो तो सही,...बस बस देख लिया। यहाँ ध्यान देना कि सेठ का कहने का प्रयोजन था कि मैंने झोंटे का चाँद देख लिया, पर कुम्हार ने समझा कि असर्फियों का हंडा देख लिया। खैर सेठ तो अपने घर पहुंचा। थोड़ी ही देर में वह कुम्हार आधी असर्फियां लेकर सेठ के घर पहुंचा और लीजिए सेठजी यह असर्फियाँ। इनकी चर्चा किसी से न करना...। वहाँ सेठ ने सोचा देखो झोंटे के चाँद के दर्शन का नियम लेने का यह चमत्कार देखने को मिला, यदि देवदर्शन का नियम लिया जाय तो उसका न जाने कितना बड़ा चमत्कार देखने को मिल जाय सो यह भी नियम लिया यह तो लौकिक बात हैं। यह तो कोई वास्तविक फल की बात नहीं। यदि अंदर में अंतस्तत्त्व को अगर जान लिया और बाह्य वस्तुओं के प्रति केवल इतनी ही बात चले कि बस जान लिया, जो कुछ है पुद्गल, जीव, जो कुछ भी स्वरूप है, बस जान लिया, देख लिया, इतनी ही बात तक रहे कोई और इससे आगे न बढे़, राग और द्वेष की तरंग में न बढे़ तो उस जीव को अपने आपके भीतर की समृद्धि मायने निर्मलता, आनंद, ज्ञानप्रकाश, प्रतिभास, ज्ञान का विलास, ज्ञान के ही सब नाम समझ लीजिए परम समृद्धि का लाभ होगा। आनंदक्या? वही ज्ञानविकास की बात। और शक्ति क्या? अनंत शक्ति, सब की बात उस ज्ञान के वैराग्य के विकास में है, तो यह समृद्धि उसके उत्पन्न होती है। कहीं रागद्वेष की भावना न बसायें और मात्र जाननहार रहें तो यह समृद्धि उसको उत्पन्न होती है।


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