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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:समयसार कलश - कलश 139

From जैनकोष



एकमेव हि तत्स्वाद्यं विपदामपदं पदम् ।

अपदान्येव भासंते पादान्यन्यानि यत्पुर: ॥139॥

1092- जीव के अपदभाव व पद का वर्णन- इससे पहले यह बतलाया था कि इस जीव के लिए कुछ दशायें तो अपद हैं और कोई दशा पदरूप है, याने जीव की स्वाभाविक बात नहीं हैं कुछ स्थितियाँ ऐसी हैं। और, कुछ स्थितियाँ ऐसी है कि जो जीव की स्वाभाविक बात है। जैसे थोड़ा उदाहरण में लो- गति, इंद्रिय, काय, योग आदिक ये जीव के अपद हैं, जीव के स्वरूप की चीज नहीं, स्वाभाविक स्थितियाँ नहीं, और जैसे केवलज्ञान, अनंत दर्शन,अनंत शक्ति ये जीव के पद हैं मायने सही बातें हैं स्वाभाविक निर्दोष जिसमें यह सदा रहेगा। परमार्थत: तो सहज ज्ञानस्वभाव ही पद है।कोर्इ स्थान होता है पदरूप, और कुछ स्थान होते हैं अपदरूप। अपदरूप की मुख्य पहिचान है कि जो आत्मा के स्वभावरूप से न हो सो अपद, न रहे सो अपद, और जो आत्मा के स्वभावरूप हो सो पद, जो शाश्वत सदा रहे सो पद, ऐसे इस अपद और पद दो प्रकार की दशाओं में से जीव के सही पद में रमने में श्रेय हैं, अपद में रमने में नहीं। रागद्वेष कषाय ये सब अपद कहलाते हैं याने इस जीव के पद लायक नहीं हैं ये विकार, इस जीव के कुल के लायक नहीं है ये ऊधम। 1093- उदाहरणपूर्वक चैतन्य कुल की उन्नति का चिंतन-

    जैसे यहाँ कोई बालक बिगड़ा हुआ दिख जाय तो उसे समझाते हैं कि अरे यह तेरे कुल के लायक बात नहीं है, तेरे कुल में तो बड़े-बड़े पुरुष हुए और बड़े-बड़े श्रेष्ठ आचरण वाले हुए। यह काम तेरे कुल के लायक नहीं है और कोई अच्छा चलता हो तो कहते- हाँ तुम बहुत अच्छे चल रहे, तुम तो अपने कुल की शोभा बढ़ा रहे। तो यहाँ जीव का कुल क्या है? चेतन, जो इस चैतन्य कुल के अनुरूप दशा हो वह तो है कुल की बात, शोभा बढ़ाने की बात, कुल के अनुसार चलने की बात, और जो चैतन्य स्वरूप से विपरीत हो, विपरीत के मायने पूर्ण विपरीत नहीं, पुद्गल आदिक जैसी बात नहीं, वह तो चैतन्यस्वरूप से ही संबंधित है, मगर विकृत अवस्था बने तो, वह कहलाता है अपद याने यह तेरे कुल के लायक बान नहीं है। हे जीव तेरा जो एक पवित्र चैतन्य कुल है, वह सदा रहता है। कुल उसी को कहते हैं जो चले। जैसे कोई बच्चा हुआ, फिर और होंगे, फिर और होंगे तो कहते हैं लोग कि तुम्हारा कुल चल रहा, और तो क्या, कुल चलाने के लिए बच्चा न हो तो किसी को गोद भी ले लेते हैं क्योंकि कुल चलाना है उन्हें। अब देखो- बच्चे जिसके हो गए हैं तो उनका कुल चल रहा, ठीक है, करना पड़ेगी, व्यवस्था है। मगर है नहीं कोई और कुल चलाने की इच्छा है सो गोद लेता है। अब इन दोनों मेंअंतर देखो याने ममता वहाँ भी है, यहाँ भी हो रही, मगर गोद वाली ममता बहुत गहरी हो गई। अरे जब एक अवसर मिल रहा कि हमारा कोई नहीं है तो यह भी तो बड़ी अच्छी बात है, हम स्वतंत्र रहेंगे, स्वाधीन रहेंगे, चिंता में न आयेंगे और अपने परमार्थ कुल में बढ़ते रहेंगे, धर्मसाधना करेंगे ऐसा तो सुंदर अवसर मिलता मगर वहाँ कुल कैसे चलेगा सो दूसरे को लाकर गोद रखा या और कुछ रखा तो उसने अपनी एक बाधा ही बढ़ा ली मायने अवसर का लाभ न ले पाया।

1094- कल्पित कुल की कक्षायें- रही एक बात की कुल चलेगा कैसे? तो यह कुल कोई कुल नहीं है, यह ही तो मूढ़ता है, जो इस घर में हो रही, कुल चल रहा, यह कुल मिला, यह ही तो बड़ी अटक है, काहे का कुल? यहाँ के मरे न जाने कहाँ के कहाँ पैदा होंगे, फिर काहे का कुल? यहाँ के मरे किसी और जगह पैदा हुए तो निज चैतन्यकुल तो नहीं छूटा, वह स्वरूप तो रहता ही है, तो जो चैतन्यकुल है उसकी शोभा बढ़ाने की बात सोचें, यहाँ के सांसारिक कुल की शोभा बढ़ाने की आसक्ति न करें। तो जो इस चैतन्य कुल के अनुरूप बात हो वह तो है पद और उसके खिलाफ जो बात है वह है अपद। अच्छा जीव की एक प्रकृति है लगाव की। लगाव लगाना। अपद में लगाव लगे तो उसका स्वाद क्या आयगा? जैसे कई लोग दूसरे को गोद लेकर फिर यहाँ वहाँ रोने लगते- अरे बड़ा हैरान किया इसने, हमें मारा पीटा है...तो यह भी उसे स्वाद मिला और जिसके यहाँ कोई अच्छा निकल गया तो कहते हैं कि गोद तो लिया मगर बड़ा अच्छा निकला, आज्ञाकारी निकला।तो यह भी एक स्वाद लिया। जो लोग विषयों में प्रवृत्ति करते हैं तो बताओ उनको उन विषयों में स्वाद आया कि नहीं? आया, और कोई सर्व प्रकार के विकल्प त्याग कर केवल एक सहज चैतन्यस्वरूप में अपनी मग्नता बनाये तो उसको भी स्वाद आता कि नहीं? उसे भी आता है। 1095- स्वपद की स्वाद्यता-

    भैया, स्वाद अनेक प्रकार के हैं। उनमें यह निर्णय कर लें कि हमको कौनसा स्वाद लेना चाहिए। तो यही बात इस छंद में बतला रहे कि एक उसका ही स्वाद लीजिए कि जिसमें विपत्ति का स्थान नहीं और जिसमें विपत्ति आये वह स्वाद लिया जाय तो वह कैसे लिया जाय? वह तो दु:ख के लिए ही है। जैसे देखा होगा कि कभी कभी घर में कोई छोटा बच्चा बिगड़ जाता है कि मुझे तो अमुक चीज खाना है तो माँ के सामने वह बहुत रोता है। उसकी माँ उसे मार भी देती है और खाने की चीज भी देती है। अब वह बालक रोता भी जाता है और उस चीज को खाता भी जाता है तो बताओ उसका वह स्वाद किस काम का है? कोई विपत्ति भी भोगता जाय और उसका स्वाद भी लेता जाय तो वह स्वाद किस काम का? किसी को भोजन करा रहे और बीच बीच में उसे गाली भी देते जा रहे, उसे डाटते भी जा रहे, वह स्वाद भी लेता जा रहा तो वह कहता है कि ऐसा स्वाद भी किस काम का? तो स्वाद तो वही ठीक है जहाँ कोई विपत्ति नहीं, और जहाँ कोई विपत्ति हो वहाँ कोई स्वाद नहीं कहलाता। तो एक उसका ही स्वाद लेना चाहिए, वही एक पद स्वाद लिए जाने योग्य है, जो विपत्ति का स्थान नहीं है, जहाँ विपत्तियाँ नहीं आती और जिनके समक्ष अन्य जितने भी पद हैं वे सब अपदरूप प्रतिभास होते हैं। तो अब एक बहुत संक्षेप में यह कहें कि जब स्वाद लेते हैं एक तरह का ऊँचा स्वाद तो ऊँचा स्वाद तो किसी एक का ही होगा। वह एक ज्ञान है। वह है ज्ञानमय भाव। एक ज्ञान का ही स्वाद लें, यह ही आत्मा का पद है, इसमें किसी तरह की आपत्ति नहीं है, और, उस पद से बाहर और जितने पद हैं वे सब आपत्तिरूप हैं, रागद्वेष, क्रोध, मान, माया, लोभ इनमें जीव बस रहा, उमंग ले रहा तो ये सब विपत्तियों के घर हैं, और एक विशुद्ध आत्मा का ज्ञानस्वभाव का जो स्वरूप है उसमें मग्न हों, वहाँ विपत्ति का कोई स्थान नहीं।

1096- स्वानुभव बिना स्वस्थिरता की दशा मिलने की असंभवता-

    देखो स्व को जानते हैं, समझते हैं और फिर भी उसमें स्थिर नहीं हो पाते, या कुछ वैसा स्वाद नहीं ले पाते, इसमें मुख्य कारण है प्रमाद। स्वाध्याय में अधिक समय गुजरे, सत्संग में समय जाय, तो एक प्रेरणा मिलेगी इस ही ज्ञानभाव के स्वाद के लिये। या सामर्थ्य है तो निर्जन स्थानों में रहें, वहाँ और भी भला है, पर इतनी बात नहीं है चित्त में, योग्यता नहीं है, नहीं कर पाते हैं और रहना ही पड़ता है घर में, शहर में, समाज में तो दो बातें तो न भूलना चाहिए- (1) स्वाध्याय करना और (2) सत्संग करना। सत्संग वही कहलाता है जहाँ आत्महितेच्छु सत्पुरुष हों, सही पुरुष हों जो संसार, शरीर और भोगों से विरक्त हों। भैया, संसार, शरीर, भोगों से विरक्ति वहाँ ही मिलेगी जहाँ सारभूत जो अपना ज्ञानपद है वह अनुभव में आ गया हो। जैसे किसी भिखारी को जो कि अपने झोले में 7-8 दिन की बासी सड़ी रोटियाँ रखें हो, उससे कोई कहे कि अरे तू बासी रोटियों को फेंक दे, मैं तुझे 7-8 दिन के लिये ताजी पूड़ियाँ देता हूँ...तो वह उन्हें फेंकता नहीं है, क्योंकि उसके मन में यह शंका है कि कहीं ऐसा न हो कि पूड़ियाँ न मिले और रोटियाँ फेंक दूँ तो दोनों ओर से निपट गये। यदि ताजी पूड़ियाँ उसके झोले में लाकर रख दी जावें तो उसे उन बासी रोटियों के फेंकने में कोई हिचकिचाहट नहीं होती। ऐसे ही सब लोग कहते हैं कि देखो विषयों का त्याग करो, विषय कषायों का परिहार करो, इनमें बड़ी आपत्ति आती। तो यह विषय कषायों का भिखारी लोभी उन विषय कषायों को कैसे छोड़ेगा? नहीं छोड़ सकता। और, उसे यह अंदर का भगवान आत्मा, एक ज्ञानानुभव को ज्ञानदृष्टि को, ज्ञानस्वरूप के अंतस्तत्त्व को सौंप दें उपयोग के लिये कि यह है पद तेरा, यह है ज्ञानभाव, तू इस ज्ञानभाव में मग्न रह, और उस ज्ञानभाव का, सहज स्वरूप का अनुभव पा ले और उसके अलौकिक आनंद का अनुभव भी पा ले तो विषय कषायों को छोड़ने में उसे हिचकिचाहट नहीं रहती। प्रत्येक काम जिस विधि से होने चाहिये उसी विधि से ही बनता है। तो एक उस ज्ञानभाव का ही स्वाद लीजिये जिसमें विपत्ति को स्थान नहीं और जिसके आगे अन्य सब दशायें अपदरूप हैं याने ठहरने वाली नहीं, ठहर सकती नहीं, इसी के समर्थन में कहते हैं।


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