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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:समयसार कलश - कलश 155

From जैनकोष



लोक: शाश्वत एक एष सकलव्यक्तो विविक्तात्मन-

श्चिल्लोकं स्वयमेव केवलमयं यल्लोकयत्येकक: । लोकोऽयं न तवापरस्तदपरस्तस्यास्ति तद्भी: कुतो निश्शंक: सततं स्वयं स सहजं ज्ञानं सदा विंदति ॥155॥

1227- ज्ञानी के इहलोकभय का अभाव होने से नि:शंकत्व- बताया है ना पहले कलश में कि सम्यग्दृष्टि जीव निसर्गत: निर्भय रहता है। उसके भय नहीं आता। तो अब उन भयों का विश्लेषण कर रहे हैं- भय होते हैं 7 प्रकार के- इहलोकभय- मैं इस लोक में अच्छी तरह जीवित रह सकूँगा या नहीं, धन वैभव कुटुंब परिवार आदिक किसी बाधाओं में तो न दब जाऊँगा। परलोकभय- परलोक में मेरा क्या होगा। कहाँ जाऊँगा, क्या बनूँगा, क्या बीतेगी...। इसी प्रकार के 5 और भय है। इस छंद में तो दोनों भयों का जिक्र चल रहा है लोकभय- इस लोक का भय होना। कहीं मेरा धन न मिट जाय। कहीं मुझे भूखों न मरना पड़े। कहीं कोई धोखा न दे दे। यों इस लोक में नाना प्रकार के भय लगे हैं। अज्ञानी के लोकभय है, मगर ज्ञानी के लोकभय नहीं, इसका कारण है कि ज्ञानी जानता है कि मेरा लोक तो जो मेरा शाश्वत स्वरूप है। यह बाहरी क्षेत्र, यह दुनिया यह बाहरी परिकर परिणमन यह मेरा लोक नहीं। मेरा शाश्वत लोक है मेरा स्वरूप। जो सदाकाल व्यक्त हैं अंत:प्रकाशमान है और ज्ञानी को इस सबका बोध है। मैं कहाँ रहता हूँ तो इसके अनेक उत्तर आयेंगे। मैं इस नगर में रहता हूँ, मैं इस देश में रहता हूँ, मैं इस विचार में रहता हूँ...। पर सही उत्तर क्या है कि मैं मुझमें रहता हूँ। अच्छा मैं शरीर में रहता हूँ क्या यह बात गलत है? तो भाई गलत तो नहीं है, यह रह तो रहा है, व्यवहार में, यों देखने से विदित तो होता है, मगर परमार्थ दृष्टि से देखें तो, एक अपने आपके एकत्व दृष्टि से देखें तो मैं अपनी सत्ता में रहता हूँ। मैं अपने स्वरूप में रहता हूँ। मैं और जगह नहीं रहता। तो जब मैं मुझमें ही रहता हूँ, मैं अपने प्रदेशों में ही रहता हूँ। मैं अपनी गुणपरिणतियों में ही रहता हूँ तो मेरी दुनिया? बस यही तो कहलायी। इसमें बाहर मेरी दुनिया नहीं। मेरी दुनिया में अगर कोई ऐब की बात, कष्ट की बात, विकल्प की बात आती है तो वहाँ तो हमारा बिगाड़ है, पर मेरी दुनिया से बाहर जो पदार्थ पड़े हुए हैं उनमें कोई बिगाड़ की बात क्या है? उसका तो ज्ञाता रहना है कि हो गया यह। 1228- सर्वविविक्त स्वैकत्वगत अंतस्तत्त्व के शरणागत की निसर्गत: निर्भयता- मेरा लोक है मेरा यह शाश्वत आत्मस्वरूप क्योंकि मैं स्वभावत: ही समस्त पदार्थों से निराला हूँ। सभी पदार्थ अपने स्वरूप से अर्थात् अन्य सर्व पदार्थों से निराले रहते हैं। क्योंकि वे सत् हैं। जो-जो सत् हैं वे अपने में परिपूर्ण और अन्य से निराले हैं। यह बराबर व्याप्त मिलेगी सर्वत्र। जो भी वस्तु है वह अपने एकत्व में रत और पर से विभक्त, ऐसा प्रत्येक पदार्थ रहता ही है। तो मेरे में मैं ही रहा, मेरी दुनिया मैं ही रहा, और कोई मेरी दुनिया नहीं। तब इसमें कोई भय ही नहीं बसा। मेरे आत्मप्रदेश, मेरा स्वरूप, इसमें डर की कोई बात है क्या? क्या यह मिट जायगा? सच कभी नहीं मिटता, मैं यह आत्मा कभी न मिटूँगा, रहूँगा, इसको इस लोक का भय नहीं, क्योंकि यह अपने को एकाकी तक रहा है। यह है तेरा लोक। और, यह बाहर का जो आँखों दिखता है, शरीर है, यह आकाश है, यह नगर है, ये सब मेरे कोई लोक नहीं है, फिर उसको इस लोक का भय क्या होगा? वह अपने में एकाकी निरख रहा और अपने में सहज आनंदस्वरूपको पा रहा। ज्ञानी के लोक भय नहीं होता। 1229- ज्ञानी के परलोकभय का अभाव-

    ज्ञानी के परलोक भय भी नहीं होता। परलोक कहाँ? परलोक को तो शब्द ने ही बता दिया, गैर लोक, मेरा है ही नहीं वह। मेरा लोकतो यह आत्मस्वरूप है और मरकर याने इस देह को छोड़कर जाऊँगा तो यह ही आत्मस्वरूप साथी है। वहाँ परलोक इसके लिए कुछ नहीं है। तो लोक और परलोक सब कुछ अपने आपके आत्मा में ही हैं ऐसा जानने वाले ज्ञानी को इस लोक और परलोक का भय कैसे होगा? वह तो नि:शंक होता हुआ निरंतर स्वयं अपने आप सहज ज्ञानस्वरूप का अनुभव करता है, सहज ज्ञान क्या? ज्ञानस्वभाव। अपने सत्त्व के कारण अपने आपही रहने वाला। इस ज्ञानस्वभाव में कोई सीखना पढ़ना नहीं बनता। उसका कोई निर्माण नहीं किया जाता। वह तो सत्तासिद्ध अधिकार है। प्रत्येक पदार्थ अपने आपके स्वरूप में हुआ करते। तो तेरा लोक वही अंतस् तत्त्व है, अन्य कोई तेरा लोक नहीं। ऐसा निर्धारण करने वाला ज्ञानीनिरंतर स्वयं ही सहज ज्ञान का अनुभव करता है। ज्ञानी के इह लोक भय भी नहीं, परलोकभय भी नहीं, बस उस दृष्टि की महिमा है सब। काम एक ही है, उसके विस्तार अनेक बताये जा रहे हैं। एक काम क्या? अपने को निरखना, अपने में गुप्त होना। यह उपाय बनता कैसे है? कम से कम इतना निर्णय तो पड़ा हुआ हे कि मेरा जिम्मेदार केवल मैं ही हूँ। कोई दूसरा मेरा जिम्मेदार नहीं। जैसा करेगा वैसा भरेगा। दूसरा उस भरने में न शामिल होगा। ऐसा अपना एकाकीपन का स्वरूप जब चित्त में है तो वे सब कलायें अपने आप आयेंगी। देखो अकेले ही जन्म लेना पड़ेगा, कोई साथी नहीं है, अकेले ही मरण करना पड़ेगा, कोई साथी नहीं है। जन्म के समय में यह संक्लेश करता है, मरण के समय भी वह संक्लेश करता है। मेरा सत्य स्वरूप तो यह सहज आनंदघन हे। बस उसकी ही सम्हाल में वहाँ ही निरंतर ज्ञानदृष्टि देते रहें, इस अंत: प्रोग्राम में सम्यग्दृष्टि समय व्यतीत करता है।

1230- सम्यक्त्व के प्रथम 4 अंगों का संक्षिप्त परिचय-

    पहले अंग का नाम है नि:शंकित अंग। नि:शंकता से अपने आपमें विहार करना। जैसे कोई पुरुष चलता है ना तो वह आगे का पैर कैसा नि:शंक होकर धरता है। कहीं वह यह तो नहीं सोचता कि पता नहीं हमारा यह पैर जमीन पर पड़ेगा भी कि नहीं। वह तो नि:शंक होकर अपना अगलापैर रखता है। और, देखो पिछला पैर बड़ी उपेक्षा के साथ उठता है। कोई ऐसा सोचता है क्या कि पिछला पैर हमने जिस धरती पर रखा है उस धरती की बड़ी मेहरबानी रही। जरा उस धरती को देख तो लूँ...ऐसा नहीं है। ऐसे ही ज्ञानी जीव मोक्षमार्ग में अपनी प्रगति नि:शंक होकर करता है- और विषय इच्छा इनसे उपेक्षाभाव करता है। ऐसे ये दो अंग है सम्यक्त्व के, नि:शंकता और नि:कांक्षितता और देखो हम आप सबके दो-दो हाथ हैं- बायें हाथ से रोज मल साफ करते हैं। इतना होने पर भी किसी ने इस बायें हाथ से घृणा की क्या? तू यहाँ क्यों रहता है, तू यहाँ यों ही स्टेशन के सिगनल की तरह खड़ा रह,...कोई इस बायें हाथ को तोड फेंकता है क्या? कैसा वह अपने में निर्विचिकित्सा अंग पाल रहा है। ऐसे ही जीव को अंतर में कर्मविपाकवश ग्लानि की बात बहुत आती है, क्षुधा, तृषा, क्लेश, ये तो अंतरंग में आने पर इनमेंग्लानि याने विषाद नहीं करता, इनमें एकत्व नहीं करता, इनकी उपेक्षा करता है, आये होंगे, कर्मरस हैं, कर्मफल हैं, उस विषाद में वह अधीर नहीं बनता।यह है ग्लानि करने के मायने विषाद करना और व्यवहार में  ग्लानि करने के मायने घृणा करना। कोई साधु त्यागी व्रती पात्र बीमार हो जाय, मल मूत्र भी खिरे तब भी उससे घृणा नहीं करता ज्ञानी सम्यग्दृष्टि जीव। और, समय तो घृणा करने का काम ही क्या? ऐसे समय में भी यह जीव घृणा नहीं करता। निर्विचिकित्साअंग। और दाहिना हाथ देखो, यह अमूढ़ दृष्टि, जरा भी ढिलाई नहीं रखता, मोह नहीं आता अटक नहीं आती, अज्ञान नहीं छाता। आदेश करना, बतलाना, यह काम करना ठीक नहीं, ऐसा ही ठीक, ऐसे ही ज्ञानी भी अपने मार्ग में अमूढ़ है, इसके कोई अज्ञान नहीं।

1231- सम्यक्त्व के अंतिम चार अंगों का संक्षिप्त परिचय-

    देखो पीठ और पेट, सब अंगों की बात देख लो, शरीर में भी 8 अंग हैं, और एक अंग है नितंब, जिस पर कि आप लोग बैठे हैं, इसे तो आप लोग धोती से पाजामा आदि से छुपाकर रखते। यह तो शरीरांग में उपगूहन है। किसी धर्मात्मा पुरुष में कदाचित् कोई त्रुटि हो, कुछ बात हो तो उसका उपगूहन करना, मायने उसको प्रकाशित न करना। यह सम्यक्त्व अंग में उपगूहन है नहीं तो अन्य सुनने वाले लोगों को धर्म से अरुचि हो जायेगी कि क्या रखा है धर्म में। बस देख लिया सब, और उसके साथ उसे समझाना, यह बात तो अलग है, मगर जनसमूह की बात, जैसे अपने नितंब का उपगूहन करते ऐसे ही धर्मात्मा के दोषों का उपगूहन करना सो उपगूहन अंग है। अब इस पीठ पर देखो कितना बोझ रख लेते ऐसे ही स्थितिकरणच्युत होने वाले को स्थित कर देना। और यह वात्सल्य अंग है हृदय। जैसे हृदय में प्रेम उमडता तो वह है वात्सल्य अंग का सूचक। मस्तक है प्रभावना अंग का सूचक। जैसे मनुष्य की प्रभावना मस्तक से जानी जाती। धानी के धर्म की प्रभावना उसके आचार विचार से होती है। इन 8 अंगों के दूषण लगने से सम्यक्त्व का घात होता है। तो इस 8 प्रकार के अंगों का पालन हो और अंतरंग से स्वभाव का आश्रय हो।



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