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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:समयसार कलश - कलश 157

From जैनकोष



र्ज्ञानं सत्स्वयमेव तत्किल ततस्त्रातं किमस्यापरै: ।

अस्यात्राणमतो न किंचन भवेत्तद्भी: कुतो ज्ञानिनो निश्शंक: सततं स्वयं स सहजं ज्ञानं सदा विंदति ॥157॥

1238- अज्ञानी के अत्राणभय और उसका कारण- सम्यग्दृष्टि जीव के अत्राणभय नहीं होता, अरक्षा भय नहीं होतामेरी कुछ रक्षा ही नहीं, मैं अरक्षित हूँ, मेरा कोई सहाय नहीं, अब क्या हाल होगा? यह अरक्षाभय अज्ञानी के होता, क्योंकि उसे अपने स्वरूप का श्रद्धान ही नहीं। मेरा स्वरूप कैसा है, इस बात का उसे बोध ही नहीं। वह तो यह जान रहा है कि यह जो शरीर है सो ही मैं हूँ। यह ज्ञानी की बोली की बात बोल रहे कि अज्ञानी ऐसा मानता है कि जो यह शरीर है सो मैं हूँ, ज्ञानी ने नहीं ऐसा माना कि जो यह शरीर है सो में हूँ ऐसा अगर मान ले तो उसके भ्रम में थोड़ा फर्क पड़ गया। इतना तो मुख से कह लिया कि जो यह शरीर है सो मैं हूँ। दो बातें तो दिमाग में आयीं- मैं और शरीर। किंतु अज्ञानी के इतनी भी बात चित्त में नहीं रहती। उसके चित्त में एक ही बात रहती कि यह मैं, या मैं हूँ। यह मैं हूँ ऐसा भी कहा जा सकता। ज्ञानी भी तो कहता है अपने स्वरूप के लिए ‘‘एव सम्वेदन प्रत्यक्ष: दर्शन-ज्ञानसामान्यात्मात्माह’’ इत्यादि...‘यह प्रत्यक्षभूत आत्मा’ ऐसे ही भ्रम में उस एक को ही कह रहा है ये अज्ञानी। यहाँ इस एक को ही कह रहा है, जो पर्याय है, जो शरीर है, बस उसमें तो जरा भी भेद-अज्ञानी के उपयोग में नहीं है। जैसे कहा जाय कि घड़े में गोलाकार है, तो कहीं धरा है क्या घड़े में गोलाकार? अरे गोलाकार मय वह घडा है, ऐसे ही अज्ञानी जीव को जो पर्याय है वही पूरी उसका सर्वस्व है उसके लिए ‘‘मैं’’ का प्रयोग है। वहाँ थोड़ी भी दुविधा नहीं है। जैसे ज्ञानी को बाह्य पदार्थों में जरा भी दुविधा नहीं हे कि ये मैं हूँ ऐसे ही अज्ञानी को जरा भी अपने बारे में दुविधा नहीं है कि जो शरीर है सो में हूँ। 1239- भगवान आत्मा की विकारस्थिति की लीला-

    ज्ञानी और अज्ञानी की होड़ चले अगर उनके विश्लेषण की दौड़ के लिए तो अज्ञानी ज्ञानी से कम रहेगा क्या? और कभी तो अज्ञानी यों कह बैठेगा सिद्ध भगवान से भी कि हे सिद्ध भगवान जरा तुम हमारी जैसी अद्भुत लीला करके तो दिखा दो। देखो हम कैसी अद्भुत लीला करके दिखाते, न जाने कितने कितने प्रकार के भेष धारण करते, कभी पेड़ के रूप में हुए तो कैसे कैसे पेड़, कैसे कैसे पुष्प, कैसी कैसी पत्तियाँ, भिन्न भिन्न प्रकार के पुष्प, भिन्न भिन्न प्रकार के पराग, केसर मकरंदों के रूप में दिखाई पड़ते। यह तो इस बिगड़े हुए परमात्मा की लीला कही जा रही। कैसी विचित्र लीला यह बिगड़े रूप में दिखा देता कि जिसे देखकर लोग हैरान हो जाते, न जाने कितने तरह के वृक्ष, न जाने कितने तरह के कीट पतिंगें...यह सब इस बिगड़े हुए परमात्मा की लीला है। तो मानो वह अज्ञानी कभी सिद्ध भगवान से भी कह बैठता है कि हे भगवान हम जितनी अद्भुत लीला करके दिखा सकते, क्या वैसी तुम नहीं दिखा सकते? देखो जब घर का कोई बड़ा आदमी बिगड़ जाता, नाराज हो जाता तो उसे देखकर सभी लोग थर-थर काँपते, तो ऐसे ही यह परमात्मा इस समय बिगड़ रहा है। अनंतानुबंधी क्रोध, मान, माया, लोभ ये सब इसके चल रहे हैं, तो ये सब भी उस बिगड़े हुए परमात्मा की अद्भुत लीलीयें हैं। तो बात यह है कि ज्ञानी और अज्ञानी की होड़ में अज्ञानी अद्भुतता के लिये कम नहीं रहेगा। परंतु जब एक प्रश्न आता है कि जीव का प्रयोजन केवल आनंद है तो उसकी होड़ दिखावें, मौलिक बात करें तो वहाँ यह बिगड़ा हुआ परमात्मा पिछड़ जाता है और मानो कहता है कि महाराज मैं आपके सामने पामर हूँ, सत्य तो तुम हो, अनंत आनंदमय तुम हो, ऐसा ज्ञान विकास है कि तीनों लोक जिसके ज्ञान में प्रतिभासित होते वहाँ की होड़, वही सच्ची बात है परम विकास है, अनंत आनंद है। तो बताओ के सिद्ध प्रभु कितना उत्कृष्ट है, वे सुरक्षित हैं और यहाँ ये संसारी जीव अरक्षित है।

1240- ज्ञानी के सत् के अविनाशित्व का निर्णय- हाँ है तो संसारी अरक्षित, मगर ये जो सम्यग्दृष्टि ज्ञानी जीव हैं उनका विकास, उनका ध्यान, उनका ज्ञान इसी प्रकार चल रहा है कि वे अपने में अरक्षा का रंच भी अनुभव नहीं करते। जो सत् है वह कभी भी नाश को प्राप्त नहीं होता। भगवद्गीता में बताया है ‘‘नासतो विद्यतेभावो नाभावो विद्यते सत:,’’ कितना भी कोई किसी प्रकार गड़बड़ सिद्धांत में चले, कुछ न कुछ सच्चाई को लिए हुए होगा तो गड़बड़ भी निभ जायगी और जहाँ रंच भी सच्चाई नहीं है वहाँ गड़बड़ का एक पग भी नहीं चल सकता। जो पदार्थ सत् है उसका कभी नाश नहीं होता। कल्पना करो कि जो है वह प्रतिभासात्मक है, जो है वह गुणात्मक है। जो भी सत् है उसका बिल्कुल अभाव हो यह कुछ कल्पना में आ सकता क्या? क्या हो गया कुछ भी रहा क्या? अरे वह गुणप्रदेशात्मक जो वस्तु है याने सत् है उसका सर्वाभाव कैसे हो जाय? अरे जिसको अन्य लोग अभाव कहते हैं वह तो तुच्छाभाव है। एक बात और ध्यान में रखना। जैन सिद्धांत में अभाव तुच्छाभाव नहीं है किंतु अन्य के सद्भावरूप होता है। जब जब भी अभाव की चर्चा करे तब तब अन्य के सद्भाव की बात देखें। क्योंकि जैन सिद्धांत में अभाव तुच्छाभाव रूप नहीं है, और इसी कारण से अभाव प्रमाण नहीं है जैन सिद्धांत में। वैशेषिक मानते हैं अभाव प्रमाण, क्योंकि उनका अभाव प्रमाण तुच्छाभाव को बताने के लिए कल्पित हैं। तो जहाँ अभाव की भी कोई बात कही जाय, तो वहाँ पर अत्यंताभाव याने सर्वाभाव नहीं है, पूर्ण अभाव नहीं है। मात्र अभाव कुछ होता नहीं। पर्याय में अभाव की बात तो चलती है, पर वहाँ इस पर्याय का अभाव है, मायने अन्य पर्याय के सद्भावरूप है यह प्रत्यक्ष होगा। 1241- अभाव की अन्यउद्भावरूपता-

    कोई भी अभाव पूर्ण अभावरूप नहीं होता। तो जो सत् है वह कभी नाश को प्राप्त नहीं होता। यह बात, यह वस्तुस्थिति एकदम स्पष्ट है, याने पदार्थ को हाथ में लेकर अभाव कर करके भी दिखा दो। पर्याय का अभाव तो हो गया मगर सत् का अभाव नहीं है। पर्याय का भी अभाव अन्य पर्यायरूप होता।अँगुली अभी सीधी है, कुछ टेढ़ी करने पर सीधी का अभाव हो गया, मगर वह सर्वाभाव नहीं है। वह टेढ़ी अंगुलि हुई तो उस रूप से ही सीधी का अभाव कहेंगे। एक बार एक बुढ़िया रहटा काट रही थी तो उसका तकुआ टेढ़ा हो गया। अब अगर तकुआ घर में किसी हँसिया वगैरह से ठोक ठोककर सीधा करे तो सही न होगा यह सोचकर वह लुहार के पास ले गई। लुहार से बोली- भाई हमारे तकुआ की टेढ़ निकाल दोगे?...हाँ-हाँ निकाल देंगे।...कितने पैसे लोगे?...एक आना।...अच्छाभाई निकाल दो। बस लुहार ने उसे ठोंक पीटकर सीधा कर दिया। जब लुहार ने 4 पैसे माँगा तो बुढ़िया बोली- ठीक है अपने एक आना पैसा तो ले लो पर जो तकुआ का टेढ़ निकाला है वह मुझे दे दो। अब भला बताओ यह काम कैसे किया जा सकता? अगर वह कहे फिर टेढ़ा कर दे तो टेढ़ निकली कहाँ और अगर टेढ़ी न करे तो टेढ़ निकली अलग है कहाँ? तो वहाँ बात क्या है कि वह सीधी और टेढ़ी पर्याय है।टेढ़ी पर्याय का विनाश हुआ और सीधी पर्याय का उत्पाद हुआ तो टेढ़ी पर्याय का अभाव सीधी पर्याय के सद्भावरूप है। देखो वहाँ बात तो ऐसी हुई मगर सत् का नाश तो नहीं हुआ। जो सत् है वह कभी नाश को प्राप्त नहीं होता।

1242- स्वयं अद्भुत ज्ञानमात्र आत्मा के अत्राण का अभाव-

    ज्ञान स्वयं सत् है। ज्ञान कहो, आत्मा कहो। ज्ञानमात्र रूप में आत्मा का अनुभव, परिचय करने से उसका सही परिचय सुगम बनता है। यह ज्ञान स्वयं सत् है, यह नाश को प्राप्त नहीं होता, स्वयं ही यह सुरक्षित है, जो है उसका नाश हो ही नहीं सकता। तो दूसरे के द्वारा रक्षा की क्या बात आयी? और अरक्षित हुआ कहाँ? जो है वह कभी नष्ट नहीं होता, तब कुछ अत्राण है ही नहीं, इसकी कभी अरक्षा है ही नहीं। कल्पनायें कर करके मैं अरक्षित हूँ, ऐसा सोच सोचकर कोई मर भी जाय तो भी अरक्षा नहीं है। सुरक्षित है वह। यहाँ न रहा और जगह चला गया। आत्मा अरक्षित नहीं है, क्योंकि वह स्वयं सत् है। जो सत् है उसका अत्राण कुछ नहींहै। यहाँ जो घबड़ाहट होती है सत्त्व की कुछ भी अरक्षा नहीं। ये सब घबड़ाहट क्या हैं? ये मोह के विकल्प हैं। प्रत्येक चीज अपने आपमें है, उसका कभी विनाश होता नहीं है। तो यहाँ अत्राण कहाँ रहा? अत्राण आत्मा का ही क्या किसी का भी नहीं है।

1243- स्वयं सत् स्वयं सुरक्षित अंतस्तत्त्व की श्रद्धा में नि:शंक शांतिवेदन-

    मैं सुरक्षित हूँ, सदा रहने वाला हूँ, ऐसी दृष्टि कोई भीतर बनाये तो सही, इसी को कहते हैं सन्यास मरण की तैयारी। यहाँ तो भय छोड़कर जा रहा है वह, बड़ा प्रसन्न होकर जा रहा है वह, खेद सहित नहीं जा रहा। वह जान रहा है कि जो मैं हूँ वह पूरा का पूरा तो यहाँ से चला। इनमें हमारी अरक्षा क्या हुई? अरक्षा तो वहाँ है जहाँ दूसरे पदार्थ में ममता लगी है और वह अपना साथ निभा नहीं सकता। कोई पर पदार्थ हमारा साथ निभा दे यह कभी हो ही नहीं सकता। इतना निकट है यह शरीर, मगर बोलो- यह शरीर साथ निभा सकेगा क्या? एक संवाद दिया है। मानो यह जीव बोल रहा है मरते समय कि अरी काया मैंने तेरे लिए क्या क्या काम नहीं किया। पाला पोसा, खिलाया पिलाया और बड़े प्यार से रखा। जब नहाते हैं तो ऊपर से फव्वारा चाहिए। खूब साबुन तेल फलेल लगा लगाकर इस शरीर की खूब सेवायें किया, फिर आईना देख देखकर खूब खुश हुआ, खूब अच्छे अच्छे स्वादिष्ट व्यंजन खिलाया पिलाया। अरे शरीर मैंने तेरी बड़ी सेवा किया। अब अंत में यही कहता है कि तू मेरे साथ चल। तो मानो शरीर कहता है कि अरे तू बड़ा बेवकूफ है। यह तो मेरी आदत ही नहीं। मैं किसी के साथ नहीं गया। बात तो सही यह है किंतु इसको भय होता है अज्ञान से। ज्ञानी तो अपने अकंप उस चैतन्यस्वरूप को निरखता है, यह मैं हूँ। इसका कहीं विनाश नहीं, त्रिकाल विनाश नहीं, फिर अरक्षा क्या? ऐसी स्थिति वाले सम्यग्दृष्टि ज्ञानी को अत्राण का भय नहीं, किंतु यह नि:शंक होता हुआ एक निज सहज स्वभाव का अनुभव करता है। यों सम्यग्दृष्टि जीव ऐसा महान साहस करता है कि कठिन से कठिन स्थिति हो तो भी वह अपनी अरक्षा नहीं मानता। अपनी सत्ता पर उसका श्रद्धान है। वह तो जानता है कि यह सत् है, सुरक्षित है, इसका कोई बिगाड़ नहीं कर सकता। तो यह अपने को सुदृढ़ सुरक्षित मानता हुआ अपने सहज ज्ञानामृत का निरंतर पान करता रहता है।



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