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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:समयसार कलश - कलश 159

From जैनकोष



प्राणोच्छेदमुदाहरंति मरणं प्राणा: किलास्यात्मनो

ज्ञानं तत्स्वयमेव शाश्वततया नोच्छिद्यते जातुचित् । तस्यातो मरणं न किंचन भवेत्तद्भी: कुतो ज्ञानिनो निश्शंक: सततं स्वयं स सहजं ज्ञानं सदा विंदति ॥159॥

1253- मरणभय और प्राणोच्छेद का संक्षिप्त विवरण-

    अज्ञानी जीव को मरण का बहुत बड़ा भय है। इससे बढ़कर और कोई भय न मानताहोगा जितना कि मरण का भय मानता। मैं मर जाऊँगा, उसके साथ ये सारे ऐब छुपे हुए हैं जिसके कारण वह भयभीत हो रहा। मैं मर जाऊँगा, ऐसी शंका के साथ वह सब दृश्य इसकी निगाह में आ गया कि यह छूट जायगा, वह छूट जायगा, बच्चे छूट जायेंगे...। सारी की सारी बातें उसके पास एक साथ लगी हैं, वे सब संग प्रसंग मरण भय को और अधिक बढ़ा रहे हैं। अज्ञानी जीव को मरणभय क्यों होता है? अज्ञानी के मोह है आसक्ति है, ये सारी व्यथायें हैं, ये सारी विडंबनायें हैं जो कि उसके भय को उत्पन्न करती हैं। मरण के मायने क्या है? प्राण का उच्छेद होना प्राण का वियोग होना। प्राण मायने क्या? परमार्थ प्राण तो एकमात्र चैतन्य है, उसका तो वियोग होता नहीं, पर व्यवहार प्राण क्या? 5 इंद्रिय, 3 बल, श्वासोच्छवास और आयु जिनका वियोग होने से मरण बने, जिनका संयोग होने से जीवन बने उसे कहते हैं प्राण। स्पर्शन आदिक जो 5 प्राण हैं इंद्रिय वाले ये ज्ञानसंबंधित हैं, ऊपरी चीज नहीं, शरीर की रचना मात्र से मतलब नहीं। नहीं तो कहो कि हमने दोनों आँखें फोड़ लिया, पर हम मरे तो नहीं, तुम तो कहते कि जिनके वियोग से मरण हो जाय। तभी तो ये 5 इंद्रिय प्राण 12 वें गुणस्थान तक हैं। इंद्रिय प्राण 13 वें गुणस्थान में नहीं है। अच्छा, और देखने में तो शरीर 13 वें गुणस्थान में भी आ रहा, 5 इंद्रियाँ हैं, रहें, वह पंचेंद्रिय जाति नामकर्म की बात चल रही है। मगर यह इंद्रिय प्राण लब्धिरूप है, याने उन-उन इंद्रियों के द्वारा ज्ञान करने की बात आती, ये अगर मिट जायें तो मरण हो जाय। भले ही  उसमें आप ऐसा निर्णय करें कि लो गला कटे या कुछ बात बने तब बनता है यह। बनो मगर इंद्रिय प्राण के मायने है इंद्रिय द्वारा ज्ञान करने की बात। वह क्षयोपशम लब्धि 12 वें गुणस्थान में है। जब 13 वें गुणस्थान में प्राण मिट जाते, वहाँ मनोबल भी मिट जाता तो वचनबल, कायबल, श्वासोच्छवास और आयु - ये4 प्राण रहते। मनोबल भी नहीं रहा क्या 13 वें गुणस्थान में? हाँ नहीं रहा। इन छहों का काम वहाँ नहीं है। इनके माध्यम से ज्ञान की बात नहीं चलती, और मुख्य बात है आयु का क्षय सो मरण। तो इन प्राणों के वियोग का नाम मरण है।

1254- परमार्थ प्राण के वियोग की असंभवता का परिचय होने से ज्ञानी के मरणभय का अभाव-

    आत्मा का वास्तविक प्राण क्या? ये 10 प्राण तो प्राण ही नहीं हैं। वास्तव में आत्मा के ये तो औपाधिक बातें हो गई। प्राण तो हमारा है ज्ञान। शाश्वत स्वभावमय यह ज्ञानमात्र अंतस्तत्त्व कभी मरता है क्या? ज्ञानस्वरूप कभी नष्ट होता है क्या? स्वरूप तो शाश्वत है, वह कभी भी छिदता नहीं। इस कारण इस जीव के मरण नहीं है। मरण होता ही नहीं। चेतन मिटता ही नहीं। तो अब इसको मरण का भय कहाँ से हो? जो अपने स्वरूप को अपना पूरा सर्वस्व मान रहा है और उससे बाहर में किसी चीज को अपना नहीं समझ रहा है। वह यदि एक शरीर त्यागकर दूसरे शरीर में जाय तो उसके भीतर कोई विषाद नहीं होता। वह जानता है कि मेरा तो सब कुछ मेरे साथ चल रहा है। जो मेरा न था, न है, न होगा, वह जहाँ का तहाँ है। उसे मरणभय कहाँ से?

1255- दृष्टांतपूर्वक ज्ञानवली के मरणभय के अभाव की सिद्धि- एक दृष्टांत लो- किसी बहुत बड़े आफीसर का तबादला हो रहा, मानो जिसके लिए एक रेल की बोगी स्वतंत्र मिलती है, एक माल का डिब्बा भी स्वतंत्र मिलता है, नौकर चाकर भी बीसों मिलते जो सब सामान रखेंगे, और पहले से अगले स्टेशन पर बीसों नौकर वहाँ खड़े, हजारों आदमी अगवानी के लिए खड़े, रहने के लिए अच्छा बँगला मिलता, ऐसे आफीसर का तबादला हो तो उसके चूल्हा, चक्की आदिक सब जायेंगे। कोई चीज तो नहीं रहती। सब सुविधायें हैं, दो डिब्बे मिले हैं, उसे क्या करना है, बस घर से कार में बैठा और वहाँ पहुँचकर ट्रेन परचढ़ा, उसका सारा सामान उसके साथ जा रहा। बताओ ऐसे आफीसर को तबादले में कोई दु:ख होता है क्या? हाँ ये छोटे-छोटे क्लर्क लोग जरूर दु:ख मानते क्योंकि इनके लिए तो वहाँ पहुँचकर कहीं क्वार्टर भी तलाशना पड़ेगा, स्थान परिवर्तन करने के लिए अनेक दिक्कतें भी उठानी पड़ेंगी। तो जैसे उस बड़े आफीसर को तबादले में कोई दु:ख नहीं होता ऐसे ही इस ज्ञानी जीव को भी इस तबादले में (मरण में) दु:ख नहीं होता। यह देह का छोड़ना आखिर तबादला ही तो है। इस भव को छोड़ो, अब तुम्हारी ड्यूटी देवगति को दी जा रही है। तो इस तबादले में यों कष्ट नहीं कि वह जानता है कि जो-जो कुछ मेरा है वह सब मेरे साथ चल रहा, उसे कोई कष्ट नहीं होता। यह तबादला भी कैसा विचित्र है। बताओ एक आफीसर दूसरे आफीसर को चार्ज देता है तो उनमें से महत्त्व किस आफीसर का अधिक समझा जाता? वैसे महत्त्व तो दोनों का है पर एक अधिकार की दृष्टि से देखो तो चार्ज देने वाले का महत्त्व अधिक समझा जाता, क्योंकि उसका हुकुम अधिक चल रहा और लोकप्रियता की दृष्टि से चार्ज लेने वाले का महत्त्व तो जब इस भव से तबादला होता है मानो मनुष्य यहाँ से मरा और उसे घोड़े की पर्याय में पैदा होना है तो उस बीच की ही विग्रहगति है वहाँ विग्रहगति में नाम तो रहेगा घोड़े का और आकार रहेगा मनुष्य का, ऐसा विचित्र तबादला है, तो यह बात तो आप सब जानते ही होंगे कि विग्रहगति में आकार रहता है पूर्वदेह का और नाम होगा अगली पर्याय का यहाँ से मरा, घोड़े के देह में पहुँचना है तो तिर्यंचगति बोली जायगी, आकार मनुष्य का रहेगा। ऐसी स्थितियाँ होती। परंतु फिक्र क्या है ज्ञानी जीव जानता है कि ज्ञान मेरा है, वह शाश्वत है, वह छिदता नहीं, इसका कभी मरण होता नहीं, तो उसको मरण का भय नहीं है, और वह नि:शंक होता हुआ स्वत: सहज ज्ञानस्वरूप का संवेदन करता है।



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