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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:समयसार कलश - कलश 17

From जैनकोष



दर्शनज्ञानचारित्रैस्त्रिभि: परिणतत्वत: ।

एकोऽपि त्रिस्वभावत्वाद् व्यवहारेण मेचक: ॥17॥

191―साधारणासाधारणगुणोंमय आत्मा की स्वलक्षणता विलक्षणता―जीव पदार्थ, आत्मा पदार्थ याने स्वयं सिद्ध अंतस्तत्त्व, इसकी चर्चा चल रही है । पहले तो यह निर्णय करना कि मैं कौन हूँ जैसे कि सब हैं वैसा ही मैं भी हूँ । जैसे कि सबमें 6 साधारण गुण पाये जा रहे हैं मुझमें भी पाये जा रहे हैं अतएव मैं हूँ । मैं हूँ, यों 6 साधारण गुणों के नाते से जाना, पर मैं क्या हूँ, इस प्रश्न के उत्तर में जाना जायेगा जो कि असाधारण हूँ, सबसे निराला हूँ, वह हूँ मैं एक चैतन्य स्वरूप । पदार्थ यह है, और कैसा विलक्षण पदार्थ है यह आत्मा अमूर्त है, इसमें रूप, रस, गंध, स्पर्श नहीं है, शब्द भी नहीं है, मैटर नहीं, पुद्गल नहीं, कोई ऐसा पुद्गल जैसा पिंड रूप सो भी नहीं । आकाश की तरह एक अमूर्त पदार्थ हूँ । आकाश है सर्वव्यापक और यह हूँ मैं, असंख्यात प्रदेशी देह प्रमाण । ऐसा अमूर्त होकर भी एक विशेषता है कि चैतन्यस्वरूप हूँ मैं । इसकी प्रकृति स्वभाव चेतने का समझने का, जानने देखने का है, यह स्वभाव किसी दूसरे पदार्थ की दया से नहीं आया, मेरा स्वभाव मुझमें अपने आपके ही स्वभाव से है । मैं जो चेतता रहता हूँ जानता रहता हूँ, जो साधारण वृत्ति है, जो सामान्य वृत्ति है वह तो हम में अपने आप चलती है और जब विशेष वृत्ति बनती, रागद्वेष प्रवृत्ति बनती तब भी है तो परिणमन इसका, मगर वह कार्माण पुद्गल की छायारूप है । जैसे दर्पण में खुद में निज का अपने आप से परिणमन क्या है? झिलमिल, जगमग, अपने आपमें झिलमिल हो रहा, यह तो दर्पण में खुद की बात है और जब सामने मान लो लाल कपड़े का सान्निध्य हुआ तो दर्पण में लाल प्रतिबिंब हुआ, तो है प्रतिबिंब उस दर्पण की परिणति, मगर वह एक वस्त्र परिणति की छाया है । कपड़े का सन्निधान पाकर उस दर्पण में कुछ परिणति बनी । ऐसा उपादान न हो तो वह परिणति नहीं बन पाती । भींट में स्वच्छता नहीं, सो वहाँ प्रतिबिंबरूप परिणमन नहीं बनता अथवा यह जो फर्श है चिकना उसमें अस्पष्ट पड़ती है छाया, तो यह अपने-अपने उपादान के अनुकूल बात चलती है, मगर विकार जो भी है वह पर सन्निधान का निमित्त पाकर होता है इसलिए उसकी प्रतिष्ठा इस आत्मतत्त्व में नहीं मानी गई, क्योंकि इसके निज की ओर से निज की चीज हो, परसन्निधान बिना हो, उसकी यहाँ प्रतिष्ठा है, बाकि जो नैमित्तिक भाव है उसकी प्रतिष्ठा नहीं ।

192―स्व में स्वसर्वस्व देखने का अनुरोध―अच्छा अब देखो निज में क्या परिणतियां होती है । तो प्रयोजनभूत परिणतियाँ देखें वैसे तो है आनंद की परिणति और ज्ञान की परिणति पर वह विधि भी आ जाये, इस तरह देखें तो सम्यग्दर्शन, सम्यज्ञान, सम्यक्चारित्र का परिणमन है जो यह खुद की चीज है । यह किसी दूसरे से नहीं मिली । जो दूसरे से हो वह उसी दूसरे की परिणति है । यद्यपि सम्यक्त्व कर्म के क्षय से हो, क्षयोपशम से हो, सम्यक्त्व कहा ही है, तो इसका अर्थ यह है कि इसका आवरण करने वाले इसके घात में निमित्तभूत पदार्थ के हटने से हुआ तो निवृत्ति से हुआ । किसी दूसरे की वृत्तिरूप से नहीं हुआ और इसीलिए यह अपने स्वभाव की गाँठ की चीज कहलाती है । आत्मतत्त्व को पाने का उपाय सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक᳭चारित्र है । सम्यक्त्व निज सहज चैतन्य स्वरूप में यह मैं हूं इस प्रकार की प्रतीति होना । मैं अन्य कुछ नहीं हूँ । जैसे―बहुत-बहुत चीजों से हट-हटकर हम अपने आपका निर्णय बनाते हैं, मैं विदेश का नहीं हिंदुस्तान का हूँ । हिंदुस्तान में भी बहुत से प्रांत है, मैं इन सब प्रांतों का नहीं, मैं तो यू. पी. का हूँ । यू. पी. में भी अमुक जिले का हूँ, जिले में भी अमुक गाँव का हूँ । उस गाँव में भी अमुक मोहल्ले का हूँ । उस मोहल्ले में भी अमुक कुटुंब का हूँ, उस कुटुंब में भी अमुक परिवार का हूँ । परिवार में भी सबका नहीं हूँ जो घर में स्त्री पुत्रादिक है मैं उनका हूँ । अरे जरा और बढ़िये तो मैं इनका भी नहीं हूँ । मैं तो एक हूँ, दूसरा कुछ मैं नहीं, यह देह भी मैं नहीं । यह देह पौद्गलिक है । मैं चेतन अमूर्त तत्त्व हूँ । अच्छा और इसके अंदर चलें तो प्रकाश लो रागद्वेष आदिक रूप भी मैं नहीं हूँ, क्योंकि ये मेरे अपने आपके स्वभाव से नहीं उठते, ये परपदार्थ का निमित्त पाकर होते, ठीक इसी तरह जैसे दर्पण में परवस्तु का निमित्त पाकर छाया हुई ऐसे ही जीव में उदयापन्न कर्मानुभाग का निमित्त पाकर एक छाया बनी, उपयोग में प्रतिफलन बना, तो वह प्रतिफलन मैं नहीं हूँ क्योंकि मेरे सहज स्वरूप की चीज नहीं है, इसी तरह आवरण के हट जाने पर जो इसमें विचार ज्ञान छुटपुट बनता है वह भी मैं नहीं हूँ । मैं तो एक पूर्ण ज्ञानानंदस्वभावी हूँ । सो जब उपयोग में ज्ञानानंद आता है सो वह अब ही तो आया । मैं क्या अब से हूं । क्या मेरी पहले से स्वयं सत्ता न थी? तो यह भी एक परिणाम है कि अनादि अनंत अहेतुक चैतन्यस्वरूपमात्र हूँ । जो एक यह जान रहा है उसके लिए सब जीव उसके परिवार बन गए । अब जीवों में वह यह भेद न करेगा कि ये तो मेरे पक्ष के हैं, ये गैर पक्ष के हैं, ये मेरे परिवार के हैं, ये गैर परिवार के हैं, ये मेरे साथी हैं, ये मेरे शत्रु हैं, ये मेरे समर्थक हैं, ये मेरे विरोधी हैं । अरे जीव स्वरूप का परिचय होने पर भी यदि यह बंधन रहे तो फिर और उपाय क्या है तिरने का? ऐसे ही आत्मा का परिचय होने पर ये कषाय नहीं रहते और वहाँ अंत: ऐसा खिल जाता है कि सब जीवों में अपने को एकरस रूप से निरखता है, स्वरूपदृष्टि करता है, उसमें मग्न होने की बात नहीं कह रहें और फिर मग्न तो प्रत्येक अपने में होता है । प्रभु की भी ऐसी स्थिति है कि “सकल ज्ञेय ज्ञायक तदपि निजानंद रसलीन, अलौकिक आनंदमय, जगमग दशा । ज्ञान से हुए जग, आनंद से हुए मगन”, ऐसा यह आत्मस्वरूप है । उसकी उपासना करें सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, सम्यक᳭चारित्र ऐसी वृत्ति द्वारा । तो यह आत्मा तीनों में वर्त रहा―दर्शन ज्ञान और चारित्र । इन तीनों में सर्वस्व होने के कारण आत्मा है तो एक पर एक होने पर भी तीन स्वभावात्मक है । दर्शन ज्ञान चारित्र या श्रद्धान ज्ञान चारित्र ।

193―प्रत्येक आत्मा की दर्शनज्ञानचारित्रमयता―प्रत्येक जीव में ये तीन बातें मिलेंगी । श्रद्धान, ज्ञान, चारित्र । कोई सा भी जीव ले लो―कीड़ा मकोड़ा पशु पक्षी आदि प्रत्येक जीव में ये तीन बातें मिलेगी―श्रद्धान, ज्ञान, चारित्र । अब वह श्रद्धान ज्ञान चरित्र किसका कैसा है यह अलग बात है । कोई पर को आत्मरूप से श्रद्धान कर रहा, कोई इन वैषयिक सुख में रम रहा, कोई इन औपाधिक भावों में रम रहा, ऐसा जीव तो संसार में जन्म-मरण करने वाला है । कोई सहज चैतन्य स्वरूप में यह मैं हूँ इस प्रकार की श्रद्धा रख रहा और उसी में रम रहा, उसी की धुन बना रहा ऐसा जीव संसार से पार होने वाला है । श्रद्धान, ज्ञान, चारित्र, इनके बिना कोई काम भी नहीं बनता । मानो दुकान का ही काम है, तो उसके प्रति आपको जब विश्वास हो कि उससे आय होती है फिर उसका ज्ञान हो कि किस-किस तरह से दुकान चलाई जाती है फिर उसको प्रयोगात्मक रूप से करें तो यही हुआ, श्रद्धान ज्ञान चारित्र । यदि ऐसा त्रितय न हो तो काम न बनेगा । मानो रोटी बनाना है तो इसके प्रति भी पहले विश्वास होता कि आटे से रोटी बनती, फिर ज्ञान होता कि इस-इस तरह से रोटियाँ बनकर तैयार होतीं, फिर उसको प्रयोगात्मक रूप से करे, तो रोटियाँ बन जाती है । यही हुआ रोटियों के बारें में श्रद्धान, ज्ञान और चारित्र । यही बात हर काम में लगा लो । इन तीन के बिना कोई काम नहीं किया जाता । ये जो कीड़े मकोड़े हैं तो इनके भी श्रद्धान, ज्ञान, चारित्र है, पर इनका इनके ढंग का है । इनका श्रद्धान, ज्ञान, चारित्र इनके ढंग का चल रहा । तो मोक्ष का यत्न चाहिए―मोक्ष मायने केवल आत्मा ही आत्मा रह जाये इसका नाम है मोक्ष । मोक्ष कोई ऐसी चीज नहीं है कि यहाँ जाना, ऐसे बैठना, ऐसा होना, बाहरी बातों से मोक्ष की बात न लेना । बाहरी बातें तारीफ में तो बतायी जाती हैं, पर मोक्ष नाम है खालिस आत्मा ही आत्मा रहना, मायने जो-जो बंधन थे उन सबसे छुट्टी मिल गई, मोक्ष हो गया, केवल वह आत्मा रह गया । अब केवल आत्मा रह जाये, ऐसी अगर स्थिति पाना है तो यह श्रद्धान तो करना चाहिए कि हाँं ऐसा केवल आत्मा हूँ मूल में । यह तो बिल्कुल अपने घर की सुगम गणित जैसी बात है, ठीक ही है, कठिन बात नहीं ।

194―सर्वथा कैवल्य पाने के लिये वर्तमान में अंत: केवल स्वरूप परखने की आवश्यकता―अगर हमें केवल रहना है, मोक्ष पाना है, अकेले हम ही हम रहें, इसके साथ अन्य चीजों का बंधन न रहे, केवल एक खालिस यह आत्मा रहे, अगर ऐसा चाहिए तो पहले विश्वास तो करें कि ऐसा है भी कि नहीं? भले ही बहुत चीजों से ढका है, दबा है मगर ऐसा है या नहीं? अगर नहीं है फिर उसके स्वप्न क्यों देखना कि मैं अकेला रह जाऊँ? अकेला है यह अपने स्वरूप में, तब ही तो यह अकेला हो सकता है । देखिये सब जानते―जैसे यह चौकी है, चौकी पर बहुत मैल चढ़ गया, अब उस चौकी को साफ करने वाला यह श्रद्धा में लिए है कि नहीं कि इसको साफ करके जैसी हमें चौकी निकालना है वैसी यह अभी से इसके अंदर है? ऐसा ज्ञान है तब ही तो साफ करता है, मैल को निकालता है । अगर जाने कि इसके अंदर वह बात नहीं है जैसा कि हम चाहते हैं खालिस तो कभी भी यह केवल न हो सकेगा । चौकी ठीक रह जाये, मैल न रहे तो चौकी ही इस तरह की है श्रद्धा हैं ना, तभी निर्मल कर दी जाती है, यदि चौकी के निरपेक्ष स्वरूप का परिचय न हो तो कोई भी चौकी धोने का काम नहीं कर सकता । जिसे विश्वास है कि चौकी के ऊपर मैल को साफ कर दिया जाये तो खाली चौकी साफ-साफ निकल आयेगी और वैसा ही वह प्रयोग करता है तो वह चौकी शुद्ध हो गई, केवल हो गई,, ऐसे ही आत्मा के बारे में जिसे यह विश्वास है कि स्वरूप में आत्मा यह तो केवल वही है, यह दो रूप नहीं है । यह तो अपने में अद्वैत है, एक है, वही है, पर वर्तमान स्थिति हो गई ऐसी कि अनादि से कर्म का बंधन है । कर्म उदय में आते हैं, प्रतिफलन होता है । तिरस्कार ज्ञान का हो रहा है । उपयोग बदल रहा है । उपयोग में व्यग्रता चल रही है । बाहरी पदार्थों का आश्रय ढूंढ़ते हैं, यह सब बात चल रही है पर यह चल रही है निमित्तनैमित्तिकरूप से । जिसको निमित्तनैमित्तिक का सही बोध नहीं है वह विभावों से हट कैसे सकेगा, उपेक्षा कैसे कर सकेगा । तो निमित्तनैमित्तिक भावों का सही परिचय विभावों से उपेक्षा करने में बड़ी मदद देता है और एक द्रव्यदृष्टि से होने वाला परिचय एक स्वभाव में रमने में । प्रोग्राम पहले सामने हो, तो श्रद्धान हो ऐसा कि मैं केवल हूँ, मैं केवल चैतन्यस्वरूप मात्र हूँ । कुछ तो परद्रव्य के संबंध से और कुछ परद्रव्य का निमित्त पाकर विकार का संबंध हुआ, मगर इन दोनों से मैं परे हूँ यह तो पर का संबंध है, और विभाव क्या हैं? ये तो एक्सीडेंटल भाव हैं, ये मेरे निज के भाव नहीं हैं । भले ही मेरे में हो रहे हैं, पर मैं तो एक परमपावन भावस्वरूप विशुद्ध चैतन्यस्वरूप हूँ ।

195―व्यवहार में सर्वथा अनास्था रखकर मनचला बनने में सन्मार्ग का तिरोभाव―जो आत्मा अनात्मा का भेद जानकर विशुद्ध अंतस्तत्त्व को जानेगा, उसका आश्रय करेगा वह इस आश्रय के बल से सब संकटों से दूर होकर केवल बन जायेगा, मगर ये गृहस्थ धर्म और मुनिधर्म बीच में क्यों आ गए? क्यों करने पड़ रहे? यह एक प्रश्न हो सकता ना? जब बात सब मेरी मेरे अंदर है, मैं केवल इस अंतस्तत्त्व को जानूं, केवल अंतस्तत्त्व का श्रद्धान करूँ, केवल अंतस्तत्त्व में रमूँ, जब मोक्ष का यह ही उपाय है तो फिर गृहस्थधर्म, मुनिधर्म क्यों कहे गए? उत्तर―ये यों कहे गए कि यह कोई केवल बात ही बात के लड्डू नहीं है । मात्र कह दिया, सुन लिया इतने से काम न बनेगा अब यह जान लें कि जो गृहस्थ धर्म पाले, जो मुनिधर्म पाले वे अज्ञानी हैं, ऐसा मन में भाव न रखना, क्योंकि मार्ग तो निश्चय में शुद्धभाव है, पर अनादिकाल से जो अज्ञानवासना का संस्कार है उसका तिरोभाव करने का प्रयोगात्मक रूप गृहस्थधर्म और मुनिधर्म है । संस्कारवश क्रोध, मान, माया, लोभादि कषायें जगती हैं, जब ऐसी स्थिति में फंसे हैं तब उनको मेटने का, उनको दूर करने का, उनका उपयोग बदलने का, उपयोग बराबर विषय कषायों में लगता है तो उसको झट बदलने का यदि कोई उपाय है तो वह है श्रावकों के बारह व्रत और मुनियों के तेरह प्रकार का चारित्र । बस ये उपयोग को बदल देते हैं और स्वभावदृष्टि के पात्र बनाये रखते हैं । अब जितना बने सो करें । “कीजे शक्ति प्रमाण” न बन सके तो श्रद्धा तो रखो । थोड़ा करते बने थोड़ा करो, ज्यादा करते बने ज्यादा करो, पर अपनी श्रद्धा तो सही बनाये रहो । सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, सम्यक᳭चारित्र इस पथ का विस्तार व्यवहार में 13 प्रकार का चारित्र, 8 प्रकार की विधि से सम्यग्ज्ञान और 8 प्रकार के अंग का सम्यग्दर्शन है । अब हम अपने मन की स्वच्छंदता में अपना ऐसा ही दुराग्रह कर लें, कि हमें क्या मतलब व्यवहार के अंगों से? सो भैया प्राक् पदवी में व्यवहार का आश्रय होना ही होता है । अन्यथा फिर तो सम्यग्दर्शन के 8 अंगों से भी गये ज्ञान व चारित्र के अंगों से भी गये । सो भैया, व्यवहार की विधि बताई गई, व्यवहार के चारित्र भी बताये गए । उनकी वृत्ति होते हुए भी लक्ष्य न भूलो । भले ही आज कलिकाल में मोक्ष नहीं बताया गया, पर जिसे भी आत्मकल्याण करना है उसे इसी ढंग से चलना होगा ।

196―प्रयोगात्मकरूप से धर्मपालन करने में हित―एक सहज अखंड चैतन्यस्वरूप मैं हूं ऐसी दृष्टि होनी चाहिए और व्यवहार करने में, प्रवृत्ति करने में, परिणमन करने में कुछ पात्रता बनाये रहने लायक बुद्धि लगाना चाहिए, कुछ चतुराई रखनी होगी और अपना प्रवर्तन सही रखना होगा । आचार विचार से भी अगर गिर गए तो हम इसके पात्र न रहेंगे । यह तो केवल गाना ही गाना रहेगा । जैसे एक ब्राह्मण के घर तोता पला हुआ था । वह ब्राह्मण तोता पालने का बड़ा शौकीन था । तोता तो पाठ भी बोलते हैं, एक दिन उसका तोता पिंजड़े से बाहर निकल गया । ब्राह्मण ने बहुत खोजा, पर न मिला । दूसरा तोता खरीदने ब्राह्मण निकला । देखा कि एक पंजाबी की दुकान पर एक तोता था । ब्राह्मण ने पूछा―क्या आप अपना तोता बेचेंगे? हाँ हाँं बेचेंगे । कितने में दोगे? एक सौ रु. में ( 100 रु. में) अजी तोते तो दो-दो रूपये में मिलते हैं, इसमें क्या खास बात है जो 100) कह रहे? अजी तोते से ही पूछ लो कि वास्तव में तुम्हारी कीमत 100) है या नहीं । ब्राह्मण ने कहा―कहो तोते क्या तुम्हारी कीमत 100) है? तो तोता बोला―इसमें क्या शक? (बस इसमें क्या शक, ये ही शब्द उस तोते को रटा दिये गए थे । हर बात में वही-वही बोलता था) तो तोते की बात सुनकर ब्राह्मण ने समझा कि तोता तो बुद्धिमान मालूम होता है, आखिर 100) देकर तोता खरीद लिया । जब ब्राह्मण घर ले गया, कुछ रामायण का पाठ सुनाया और बाद में पूछा―कहो तोते यह पाठ ठीक है ना? तो तोता बोला―इसमें क्या शक? ब्राह्मण ने समझा कि यह तो और विशेष जानता होगा तो बड़ी-बड़ी ऊँची ब्रह्म की बातें सुनाने लगा । यह आत्मा ब्रह्मस्वरूप है सर्व-व्यापक है । फिर ब्राह्मण ने पूछा कहो ठीक है ना? तो तोता बोला―इसमें क्या शक? अब तो ब्राह्मण को भी शक हो गया कि शायद यह तोता उतना ही शब्द बोलता है, तो पूछा―बताओ तोते मैंने जो 100) का तुम्हें खरीदा तो क्या वे 100) पानी में चले गए? तो तोता फिर बोला―इसमें क्या शक? तो भाई केवल कुछ शब्द रट लेने से काम न चलेगा । वह तो एक तोता रटंत जैसी बात हो जायेगी । केवल मुख से बोल भर देने से मोह दूर न होगा । इसके लिए बड़ा तत्त्वाभ्यास चाहिए । देखो मेरी परिणति मेरे साथ, सबकी परिणति उन सबके साथ, मैं अपनी कषाय के अनुकूल परिणमता, सब अपनी कषाय के अनुकूल परिणमते, मैं अपने सुख के लिए सब प्रयत्न करता वे अपने सुख के लिए सब प्रयत्न करते । इस देह से भी मैं निराला हूँ । जिस शरीर को देख देखकर हम खुश होते हैं, मोह करते हैं, यह शरीर एक दिन यहाँ पड़ा रह जायेगा और यह इस तरह जलाया जायेगा, जैसे बहुत से शरीर जलते देखा होगा वैसे ही यह शरीर भी एक दिन जला दिया जायेगा । इस शरीर को छूकर जरा चित्रण कर लो । कोई भी तरीके से समझो तो सही, मैं इस देह से भी निराला हूं?, अब कोई उपाय तो बनाये नहीं, प्रयोग तो बनाये नहीं और हठ वही, कषाय वही रखें, बताओ हित कैसे हो ।

197―सहजस्वरसपूर्ण अंतस्तत्त्व का दर्शन होने पर वेश का अप्रभाव―नाटक खेलने वाले इतने होशियार खिलाड़ी होते हैं कि जिनकी करतूत देखकर दर्शक लोग रोने लगते और वह पार्ट करने वाला वास्तव में रोता नहीं, क्योंकि वह तो जानता है कि मैं तो अमुक बालक हूं, यहाँ पार्ट अदा कर रहा हूँ । तो ऐसे ही मैं इस देह से निराला हूं । देह से निराला हूं, यह एक ढंग से समझना है । मैं देह से निराला और कषायों से निराला हूँ, क्योंकि यह पुद्गल की छाया है, पुद्गल का प्रतिफलन है, क्रोध, मान, माया, लोभ, ये सब कर्मानुभाग कहे गए हैं । करणानुयोग को जिसने अच्छी तरह से नहीं समझा वह विभावों की परकीयता, लावारिसपना, भिन्नता भली भाँति नहीं समझ सकता । जो-जो अनुभाग चलते वैसा ही प्रतिफलन होता । क्रोध प्रकृति अलग क्यों रखी ? मान प्रकृति अलग क्यों रखी? उनमें ये प्रकृतियाँ भरी हैं, उन प्रकृतियों में, जैसा अनुभाग हुआ सो विपाककाल आने पर कर्म में बड़ा क्षोभ हुआ । जैसे पानी में बड़ी खलबली कर दी जाये तो भले ही पानी अनुभव न करे मगर क्षोभ तो हो गया । तो जैसे ही कर्म का अनुभाग उदित हुआ, उसका प्रतिफलन हुआ जिससे ज्ञान में क्षोभ होता है उसके आश्रयभूत में उपयोग जुड़ता है और एक चक्की चलती हैं । ये सब कैसे हटे? जब हम समझ लें कि ये मैं नहीं हूँ, ये सब पौद्गलिक ठाठ हैं तो इन विकारों से उपेक्षा हो जाती है । समयसार में, जीवाजीवाधिकार में और बंधाधिकार में इसका बहुत वर्णन किया । ये पुद्गलकर्म निष्पन्न हैं तू इनमें मत रम, ये औपाधिक हैं, और यहाँ तक कह दिया कि शुद्धनिश्चय से ये पौद्गलिक हैं । क्यों कह दिया यों कि ये तो जीव के स्वरूप से बाह्य हैं, हम विविक्त चैतन्यमात्र तक रहे । ऐसी मुझे सुरक्षा रखना है उस दृष्टि को सुदृढ़ बनाना है । उस दृष्टि को सुदृढ़ बनाने के लिए जब पूछा गया कि ये कर्म किसके? तो कहा गया कि ये कर्म पौद्गलिक हैं । नयों का परिवर्तन भी ज्ञानी का शृंगार है जो बात अभी निश्चय है वही उससे और अंतर्दृष्टि मिलने पर वही व्यवहार हो जाता है । यह सब नयचक्र का बड़ा गहन वन है । इसमें जो पार उतर गया, जिसने परमार्थ तत्त्व का अनुभव कर लिया वह नियम से नयचक्र से उत्तीर्ण हो गया ।

198―पर व परभाव से विविक्त अंतस्तत्त्व की उपासना का अनुरोध―भैया देखना है पर से निराला परभावों से निराला केवल आत्मतत्त्व । यह है तो केवल एकरूप चैतन्य प्रतिभास मात्र केवल, फिर भी यह ज्ञेयाकार को कभी नहीं छोड़ता सो यहाँ भी ज्ञान ही है, ज्ञान इसका स्वरूप ही है, ऐसा जो जानता है सो ज्ञानी है । यह आत्मा ज्ञान बिना क्षण भर भी नहीं रह सकता । तो जानना मायने ज्ञेयाकार, जिस प्रकार प्रतिबिंबित हुआ, सब जान गए, अब उसमें श्रद्धा किया और रम गए । देखो श्रद्धान ज्ञान चारित्र बिना कोई काम नहीं होता । यह त्रितय सबके पास है । करते ही हैं सब, बस एक जरा सम्हालना है, सही श्रद्धा, सही ज्ञान, सही आचरण करना है । मैं यह हूँ चेतन । क्या मैं पंडित हूँ? नहीं, त्यागी हूँ? नहीं, व्यापारी हूँ? नहीं । किसी के बहकाने में ज्ञानी पुरुष न आयेगा । अपने आपको विशुद्ध चैतन्यमात्र अनुभव करो । देखो और बंधनों की तो बात क्या, मैं जैन हूँ, धर्मात्मा हूँ इस प्रकार का भी बंधन नहीं रहता है उनके आशय में । मैं एक चैतन्य आत्मतत्त्व हूँ । फिर अगर और और बंधन मानें कि मैं अमुक हूँ तमुक हूँ, तो उसके ये संस्कार अहर्निश इस भगवान आत्मा को मीढ़ते रहते हैं, और उसे आत्मानुभव का कोई क्षण नहीं प्राप्त होता । ये सब बातें अपने चित्त से निकाल दें । ये देह संबंधी जितनी बातें हैं उन सबको अलग कर दें, केवल मात्र चैतन्यस्वरूप अपने को देखें, मैं अमुक जाति का हूँ, अमुक कुल का हूँ आदिक कोई बंधन नहीं, केवल एक चैतन्यस्वरूप । फिर आप कहें कि यह व्यवहार क्यों चला? यह उच्च वर्ण का, यह नीचवर्ण का । तो यह कोई खाने पीने की बात नहीं कह रहे । वह तो आत्मा के श्रद्धान, ज्ञान, आचरण की बात थी । खाना पीना आदिक अगर आत्मा के निश्चय की बात हो तो इसे भी ठीक करें । जब खाने पीने की बात व्यवहार की है तो वह व्यवहार चलायें, यह तो एक ध्यान के प्रकरण की बात कही गई, आत्मा एक स्वरूप चैतन्यमात्र है, लेकिन सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्र इन तीनों रूप से परिणमता है, तीन स्वभाव हैं, एक होने पर भी, इसलिए निश्चय से एक है और व्यवहार से नानारूप है । दोनों तरफ से इनका ज्ञान करें और लाभ लेवे । अंत में लक्ष्य तो यही है कि ऐसा उपाय बने कि केवल रह जाऊँ, मेरे साथ किसी दूसरी चीज का संबंध न रहे ।


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