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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:समयसार कलश - कलश 174

From जैनकोष



रागादयो बंधनिदानमुक्तास्ते शुद्धचिन्मात्रमहोऽतिरिक्ता: ।

आत्मा परो वा किमु तन्निमित्तमिति प्रणुन्ना: पुनरेवमाहु: ॥174॥

1404- चिन्मात्र तेज से अतिरिक्त रागादिकभाव के निर्णय से तथा अविकार स्वरूप के परिचय से ज्ञानी के अंतर में निर्व्यग्रपना-

रागादिकभाव, ये बंध के निदान कहे गए हैं। जीवस्वरूप को देखें, जब अपने ध्यान में यह बात आयी कि मैं समस्त पर पदार्थों से विविक्त; पर के द्रव्य से, क्षेत्र से, काल से, उसका निमित्त पाकर अपने में होने वाली परिणतियों से विविक्त सहज शुद्ध चैतन्यमात्र हूँ, ऐसा ध्यान जाय जिस समय में, कुछ अनुभव बने उस समय में तो वह यों समझो कि त्रिलोकीनाथ राजा है, अनाकुल है, वह तो परम आह्लाद का अनुभव करने वाला है। उसको कोई शल्य नहीं, कोई फिक्र नहीं, कोई चिंता नहीं, मगर ऐसी स्थिति ठहर तो नहीं पा रही है, तो क्या बातें आ जाती? जो कर्मविपाक प्रतिफलित हुए बस उनमें वह झुक जाता, उनके स्वर में स्वर मिलने लगता। जो सहज ज्ञानानंद-स्वरूप को अहं रूप से मिलाये सो ही सम्यग्दृष्टि, उसके भी उपयोगनिमित्तक कुछ व्यग्रता होती है फिर भी ऊपर व्यग्र होकर भी निराकुलता का अनुभव कर लेते हैं, तो उसकी याद में, उसकी प्रतीति में यह भीतर में व्यग्र नहीं होता। यह ज्ञानी गृहस्थ प्रमत्त व्यग्र होता हुआ भी निर्व्यग्र है, जब क्षोभ होता है तो वह क्षोभ ही कहलाता है फिर भी वह अंतरंग में निर्व्यग्र है।

1405- ज्ञानी की प्रमत्तदशा में भी निर्व्यग्रता का कारण अविकार स्वभाव के आश्रय पर अधिकार-

जैसे किसी को कोई अधिकार मिला है। अधिकार है पूर्ण उसको और कदाचित् कोई बात ऐसी होती हो ऊपरी बात जो थोड़ी प्रतिकूल पड़े तो जैसे वह निर्व्यग्र है, क्योंकि उसको अपने अधिकार पर गौरव है, कभी भी अधिकार का प्रयोग कर प्रतिकूलता को हटा देगा। अब आजकल की ही बात देख लो, जो देश में आपत्तिकालीन स्थिति बनी है इससे पहले देश में ही कहीं विघटन वाली बातें भी कोई-कोई करने लगे होंगे। लेकिन सरकार को यह पता तो था ही कि ये-ये कानून बने हैं और किसी न किसी दिन ऐसे कानून लागू कर दिये जावेंगे सो व्यग्रता तो न रही उन्होंने पहले से ही अपने को सावधान कर लिया था। ऐसे ही ज्ञानी सम्यग्दृष्टि को अपने उस भीतर के अंतस्तत्त्व पर इतना अधिकार है कि वह जानता है कि जब दृष्टि करें तब देख लेंगे। जैसे एक उर्दू शायर ने कहा है- अपने ही अंदर छिपा है वह खुदा, जब जरा गर्दन झुकायी देख लो। तो इस ज्ञानी ने निराकुल होने का जो इतना प्रभुत्व पा लिया है गृहस्थावस्था में भी, प्रमत्त मुनि अवस्था में भी इसकी जो निराकुल दशा है उसका कारण यह है कि इसको अपने उस मूल स्वरूप पर ऐसा अधिकार है समझने का, अनुभवने का, परखने का कि उस संतोष के कारण, उस धैर्य के कारण कर्मविपाक की व्यग्रतायें भी हों, क्षोभ भी हों तो भी वह यों ही गिनता है कि जैसे कोई बच्चा साधारण ऊधम करे, पिता देखता रहता उस बच्चे का ऊधम मगर वह कुछ नहीं बोलता। क्योंकि उस पिता को अपने अधिकार पर गौरव है कि जब चाहूँ तभी इसका ऊधम बंद कर सकता हूँ। और करता भी यही है कि जब देखा अब ठीक नहीं है ऊधम तो उस ऊधम के समय उसका हाथ पकड़कर 2-4 तमाचे जड़ देता तो उसका ऊधम मचाना बंद हो जाता है, ऐसे ही जिस ज्ञानी को पता है कि यह क्षोभ आता है तो आने दो यह तो कर्मविपाक का खेल है, कुछ हर्ज नहीं, अपनी कला पर उसे गौरव है कि जहाँ ही अपने इस ज्ञायकस्वरूप को सम्हाला, वहाँ दृष्टि दी कि क्षोभ खतम। वहाँ अलंकार में बोल रहे, कहीं ज्ञानी इस तरह प्रमाद नहीं रखता कि ये क्षोभ, राग वगैरह आते तो आने दो, वे सब जरा सी देर में मिट जायेंगे। एक बाह्य तत्त्व की उस समय अनास्था है, उपेक्षा है, कहीं इस तरह नहीं कहता कि आता है तो आने दो जरा सी देर में मिटा लेंगे, ऐसा स्वच्छंदता का भाव वहाँ नहीं है। यह तो हम आप सबकी भाषा में बोल रहे, वह तो स्वभावाश्रय के अधिकार के कारण निर्व्यग्र रहता है। भैया ! धर्मपालन अपने निज की चीज है, जो पराधीन नहीं है, किसी का आश्रय नहीं तकना है, किसी की आशा नहीं बनाना है कि मेरा धर्म कोई कर देवे। कोई दूसरा कर देवे। यहाँ कोई ऐसा जाप नहीं है कि किसी पांडे से जाप करा लें तो अपने पाप मिट जायेंगे। यहाँ भी यह स्वपौरुष से सिद्ध होने वाली स्वाधीन बात है। ज्ञानी को स्वानुभव के संतोष का इतना गौरव है, गुरुता है, अधिकार है, विश्वास है कि उसे निरखकर वह सारे क्षोभ को दूर कर देता है।

1406- विकार-निष्पत्ति के निमित्त के परिचय की जिज्ञासा-

हाँ, तो बंधन के कारण कौन हुए? रागादिक भाव। ये बंध के निदान बताये गए हैं। कैसे हैं वे रागादिक भाव? आत्मा का जो चैतन्य तेज है, सहजस्वरूप है उससे अतिरिक्त है, पृथक् है वह तेज। स्वरूप का उल्लंघन करके आदेश नहीं है ऐसा कि रागादिक बनें, मगर वह स्वरूप इस प्रकार का है कि विपाक हो, प्रतिफलन हो, विकल्प हो। ये बातें यहाँ बना करती हैं, तो बन तो गया, मगर स्वरूप से निराली चीजें हैं ये विकार। विकारनिष्पत्ति के संबंध में विचार करना चाहिए कि आत्मा में जो रागादिक हुए हैं, विकार हुए हैं सो इनके उत्पन्न होने में कोई बाह्यतत्त्व निमित्त है या नहीं है, कोई इसमें निमित्त पड़ता या नहीं पड़ता अथवा निमित्त पड़ता है तो बाहरी चीजें निमित्त पड़ती है या खुद ही निमित्त बनता है? इन सब प्रश्नों पर विचार किया जायगा। इसकी उत्थानिका में कह रहे हैं कि उसका निमित्त क्या है? आत्मा है या पर है? ऐसा प्रश्न करने वाले को इतना तो ज्ञात है ही कि जो विकारभाव हुए हैं वे निमित्त पाये बिना नहीं हुए, निमित्त कुछ इसमें अवश्य है। तब ही तो यह नैमित्तिक कहलाते हैं। जैसे कहा कि क्रोध नैमित्तिक है तो उसका अर्थ यह न लेना कि जिस मनुष्य पर क्रोध आया है वह उसका निमित्त है क्रोध में और यह क्रोध नैमित्तिक है यह अर्थ नहीं है। वहाँ वह पुरुष, वह बाह्य प्रसंग ये तो निमित्त हैं ही नहीं, इसने तो पुरुष को आश्रयभूत बनाया है उसमें उपयोग जोड़ा है, वह उसके क्रोध में निमित्त नहीं है। निमित्त तो वह परखा जायगा कि जिसके होने पर ही यह क्रोध हो और जिसके न होने पर यह क्रोध न हो, कोई ऐसी दूसरी चीज है, उसमें निमित्तपना आता है। हर जगह आप घटा लीजिये। उस नौकर के होने पर ही क्रोध हो, उस नौकर के न होने पर क्रोध न हो, क्या यह नियम बनता है? घर में बच्चे पर क्रोध कर रहे हैं, जैसे माना कभी कोई बड़ा फँसाव में पड़ गया, एक झंझट में पड़ गया और भीतर में बड़ी व्यग्रता हो रही हो तो बच्चों पर क्रोध करने लगते हैं। जैसे एक अहाना है कि ‘धोबी से न जीते गधी के कान मरोड़े’। जैसे किसी धोबी को उसकी खुद की स्त्री से लड़ाई हो गई, कुछ कहा-सुनी हो गई तो धोबी ने गुस्सा में आकर स्त्री को पीट दिया। अब वह स्त्री धोबी को तो पीट नहीं सकती थी, सो क्या किया कि पास में ही बँधी थी उसकी गधी, सो कोई बहाना बनाकर उसी के कान मरोड़ने लगी, तो ऐसे ही समझो कि ये पर पदार्थ निमित्त नहीं हैं हमारी कषाय के लिए, हमारे विभाव परिणामों के लिए, किंतु ये सब आश्रयभूत हैं।

1407- शुद्धपरिणति के लिये निमित्त एवं आश्रयभूत की अनावश्यकता व विकारपरिणति के लिये निमित्त के सान्निध्य की अनिवार्यता-

जिस काल में सम्यक्त्व उत्पन्न हो रहा उस काल में कोई बाहरी पदार्थ आश्रयभूत नहीं है, यह तो तीर्थप्रवृत्ति की रक्षा के लिए है। जैन ग्रंथों में, धवला में वर्णन किया है कि सम्यग्दर्शन के कहीं चार निमित्त हैं, कहीं तीन निमित्त हैं, क्या-क्या? वेदना, ऋद्धिदर्शन, जिनबिंबदर्शन, कल्याणदर्शन आदि, उससे क्या शिक्षा ली जायगी सो भी बतायेंगे, मगर जिस काल में यह जिनबिंबदर्शन, उपदेशश्रवण आदि जो-जो भी बात बन रही उस काल में उसका शुभोपयोग तो हो जायगा, वहाँ शुद्धोपयोग नहीं है। सम्यक्त्व होता है, पर सम्यक्त्व से पहले शुभोपयोग होना अनिवार्य है, अशुभोपयोग के बाद सम्यक्त्व किसी को नहीं हुआ, सो सम्यक्त्व से पहले जो शुभोपयोग है उस शुभोपयोग में तो आश्रयभूत था वेदनानुभव, जिनबिंबदर्शन आदि और उसके बाद ही सम्यक्त्व हुआ। वही एक प्रकार की प्रवाह-संतति चले, इस कारण से तीर्थप्रवृत्ति के लिए यह बात कही गई है कि सम्यक्त्व के ये-ये कारण हैं। अर्थ यह लेना कि इन कारणों को जुटावें, इनमें रहे, इनमें रहकर स्वरूप की दृष्टि करना सीखे तो गैल मिलेगा, सम्यक्त्व होगा। तो शुद्ध परिणति के लिए आश्रयभूत कारण नहीं होता। वहाँ निमित्त होता क्या? शुद्ध परिणति की उत्पत्ति के लिए याने प्रथम समय की शुद्ध परिणति के लिए कर्म का क्षय, अनुदय याने कर्मविपाक का अभावरूप है निमित्त, उस शुद्ध परिणति के विपरीत जो परिणाम हो रहा था विभाव परिणाम, उसमें तो सद्भावरूप निमित्त था मिथ्यात्व का उदय, अन्य-अन्य प्रकृतियों का उदय, वह उदय समाप्त हुआ, क्षय को प्राप्त हुआ, किसी तरह समझो और यहाँ शुद्ध परिणति हुई, तो वहाँ प्रथम समय में यह लीजिए कि उस प्रकृति के क्षय होने पर हुआ। और, वह धारा चलती रहेगी। अब वहाँ प्रति समय क्या निमित्त बनता रहता है सो विचारिये। कालद्रव्य एक ऐसी साधारण चीज है कि उसमें अनवय व्यतिरेक इस तरह नहीं चलता कि देखो कालद्रव्य न हो तो यह परिणमन तो नहीं होता, यह कोई बता नहीं सकता इस कारण वह भी सामान्य निमित्तभूत है। तो ये विकार जितने हुए हैं वे सब विषम परिणाम हैं, इनमें निमित्त कोई अवश्य है। तो वह निमित्त खुद आत्मा है, या कोई पर पदार्थ? निमित्त-नैमित्तिक क्या है? आचार्यदेव अब इस विषय में उत्तर दे रहे हैं।


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