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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:समयसार कलश - कलश 192

From जैनकोष



बंधच्छेदात्कलयदतुलं मोक्षमक्षय्यमेत-

न्नित्योद्योतस्फुटितसहजावस्थमेकांतशुद्धम् ।

एकाकार-स्व-रस-भरतो-ऽत्यंत-गंभीर-धीरं

पूर्णं ज्ञानं ज्वलितमचले स्वस्य लीनं महिम्नि ॥192॥

1593- सिद्ध होने का मूल उपाय बंधच्छेद-

यह मोक्ष अधिकार का अंतिम कलश है, कुछ ऐसा सुयोग है कि आज दसलक्षण के दिन पूरे हो रहे और आज ही यह अधिकार भी पूर्ण हो रहा है। और इस कलश में भी यही कहा जा रहा है कि यह ज्ञान अपनी अचल महिमा में लीन होता है। इस ज्ञानी की महिमा, बड़प्पन, विकास उदारता बहुत विशाल है। तीन लोक, तीन काल के समस्त पदार्थ युगपत् प्रतिभासित हों, ऐसी ही इनकी महिमा, और यह महिमा अचल है, आज है, कल न रहे, ऐसा नहीं है, ऐसी अचल महिमा में अब यह ज्ञान लीन होता है। इस तरह क्या किया पहले, जो इतनी ऊँची बात मिल गई? सर्वप्रथम बंध का छेद हुआ उपयोग से, श्रद्धा से बंध का छेद बहुत पहले हो गया था, और अब विभावों से उपेक्षा करना, स्वभाव में ही उपयुक्त रहकर स्वभाव के ही अभ्यास में ऐसी महिमा बैठाये कि कुछ भी अविनाशी अनुपम मोक्षपद प्राप्त हो। मोक्ष की कोई उपमा हैं? सिद्ध भगवान को क्या सुख है, सिद्ध भगवान की क्या स्थिति है, इसके लिए कोई उपमा मिलेगी क्या? हाँ, मिल तो जायगी, बोलो अच्छा, सिद्ध भगवान का पद सिद्ध भगवान की तरह है, और दूसरा न मिलेगा कहने-सुनने को, तो बंध का छेद होने से इस अतुल अविनाशी मोक्ष को पाता हुआ यह ज्ञान ऐसा हो गया कि नित्य प्रकाशमान दशा जहाँ जिसका उद्योत निरंतर चल रहा ऐसे प्रकाश के कारण जिसकी सहज अवस्था स्फुटित हो गई, प्रकट हो गयी।

1594- मोह में दुर्लभ संसार की सुगमता व सुगम मोक्ष की असंभवता-

देखो, सिद्ध बनने में कुछ व्यायाम नहीं पड़ा, कठिनाई नहीं पड़ी, पर संसार में रहने में बहुत कठिनाई पड़ती, न जाने किस-किस पर पदार्थ की आशा करें, किस-किस का मोह बतायें, किस-किस का संग्रह करें, किस-किस को मनायें, कितनी ही बातें करनी पड़ती हैं, तब ही तो इस संसार का मिलना बड़ा दुर्लभ है, यह अपने वश की बात नहीं हैं, आसानी से संसार नहीं मिलता, दुर्लभ है यह संसार न जाने क्या-क्या विकल्प करें, न जाने कितनी कितनी चीजों का संग्रह-विग्रह करें, बहुत दुर्लभ है संसार और मोक्ष यह बहुत सुगम है, खुद का खुद से मतलब, खुद को जाने, खुद में रमें, इसमें न कोई किसी की आशा, न किसी की प्रतीक्षा, और निज स्वभाव के आश्रय से बस वही स्वभाव प्रकट हो गया, सिद्ध बन गए तो सिद्ध होना कोई कठिन बात नहीं, कठिन बात तो यह है संसार में रुलना सो देखो हम आप लोग ये संसार के जीव हैं, ये सब संसार के लोग सिद्ध भगवान से भी बड़ा काम कर रहे, बड़ा अज्ञान छाया है इस निर्णय में कि ऐसे विरुद्ध पराश्रित अनेक मलिनताओं से यह संयोजन, ये काम तो लग रहे आसान और सिद्ध पद की प्राप्ति यह लग रही कठिन, इसको क्या कहा जाय? जो मोह का नशा ही कहना चाहिए। जो निज की बात है, सुगम है, सहज है, उसकी तो सुध तक नहीं है और जो असंभव है उसमें कल्पना लग रही है, तो प्रभु का मार्ग कितना निर्विघ्न है, कितना अनुपम है और कितना एक विडंबना रहित है, जो अपने आपकी ओर दृष्टि करे उसको तो मोक्ष पाना बिल्कुल स्पष्ट है, इस ज्ञान ने अब वह सहज अवस्था दृष्टि में प्राप्त की।

1595- सहज सौंदर्य-

भैया, सहज अवस्था में ही सुंदरता है। जो बहुत श्रृंगार किया जाता है शरीर पर तो यों समझ लो कि शरीर में खुद सुंदरता नहीं इसलिए उसे सजाया जाता। खुद सुंदरता हो तो सजाने की क्या जरूरत? जब अशुचिका भरा है यह शरीर तो कहीं से पसीना बन रहा तो कहीं से नाक बनती, कहीं से कीचड़ बनता, कहीं से कुछ, तो यह अपवित्रता लोगों के ध्यान में नहीं आये और यह सुंदर जँच जाय, इसका उपाय यह ही है कि चमकदार कपड़े पहिन लिये जायें और चमकदार हाथ में कंगन पहन लिये जायें, वे चमकते रहेंगे तो यह भीतर की पोल ढकी रहेगी, यह भाव है श्रृंगार का। जो अपवित्र शरीर है, जिसे देखकर घृणा होनी चाहिये, अब उस बाहरी बात को ढकने का क्या उपाय है? बस यही उपाय है। सो ज्यों-ज्यों हम उपाय करते हैं त्यों-त्यों क्या बात घटित होती है कि यह कपड़ा, यह हीरा, यह अंगूठी, यह तो सही है, ढंग है, जिसके कारण शरीर की अशुचिता ध्यान से हटकर बढ़िया बताना चाहते। बताओ अब वह शरीर बढ़िया रहा कि कपड़ा? सहज अवस्था वही सुंदर अवस्था है और बनावट अवस्था विकृत अवस्था है, वह एक चिंता उत्पन्न करने वाला है। प्रभु की अवस्था सहज अवस्था है, यह ज्ञान अपने नित्य चेतनप्रकाश के उदित होने से सब सहज अवस्था में आ गया।

1596- सहज परमात्मतत्त्व की एकाकारस्वरसनिर्भरता-

अब यह ज्ञान एकांत: शुद्ध है, मायने अत्यंत शुद्ध है, पर्याय शुद्ध। स्वभाव शुद्ध तो था ही, पर्याय शुद्ध और हो गया, ऐसा यह ज्ञान अब अपनी अचल महिमा में लीन हो रहा है। अब क्या है? एकाकार। मानो जो कुछ जाना जा रहा है वह उसमें रहा स्वभाव के अनुरूप, जान गए तो भी जाना गया सा नहीं, क्योंकि वह ज्ञातादृष्टा की स्थिति है, सामान्य अवस्था है। सहज अवस्था है, इसलिये अब एकाकार हो गया और वही उसका स्वरस है, इसी से वह भरपूर है। जो था सो ही रह गया, केवल रह गया, शुद्ध पर से रहित जो कुछ है सो ही वह नानाकार होकर भी एकाकार हैं। तीन लोक, तीन काल को जानते हुये भी विकल्पों की दृष्टि में न जानने की तरह, ऐसी स्वभाव के अनुरूप दशा बनी है। भला एक दृष्टि तो बनाओ, कहते हैं कि रूप, रस, गंध, स्पर्श पुद्गल हैं। हमें तो विविधता बहुत अच्छी जँचती है। नाक से सूँघों तो गंध लगती, आँखों से देखें तो रूप दिखता और रसना से चखें तो रस समझ में आयगा, और हाथ से छुवें तो स्पर्श समझ में आयगा, मगर सिद्ध भगवान के तो शरीर ही नहीं, इंद्रिय ही नहीं। उन चारों का ज्ञान किस ढंग से होता होगा? कोई अंदाज किया जा सकता है? जैसे वहाँ नानाकारता इसको ध्यान में आती है ऐसी नानाकारता वहाँ चलती है क्या? जानता है और नहीं जानता यों कह लो, जानना भी नहीं जानना सो हो रहा। एकाकार, स्वरस, सब कुछ जान गए मगर स्वरस झरता, अपने ही स्वरस के फल से वह अत्यंत गंभीर है, ऐसा ज्ञान ही अपनी महिमा में लीन हो रहा।

1597- स्वरूपपरिचय से स्वरूपसर्वस्व की सिद्धि-

भैया, ऐसी पवित्रता का अपना कार्य बने- इस ज्ञान में स्वरूप का बोध, परभाव का बोध, परपदार्थ का बोध, आत्मवस्तु की कला, स्वभाव का परिचय, उसका अभ्यास। देखिये जिसके ज्ञान में स्वरूपसर्वस्व आ जाय उसको सरल हैं सब और जिसके मन में स्वयं का तत्त्व नहीं आता उसको कठिन है। जब सुकौशल आदिक की कथा सुनते हैं सुकौशल की पत्नी के शुरू-शुरू का गर्भ, छोटी अवस्था, वैराग्य हो गया, वन में पहुँच गये, दीक्षा लेने लगे तो मोहियों को अचरज होता और संभव है कि कई-कई मोही तो यह भी कह उठते होंगे कि कुछ दिमाग खराब तो नहीं हो गया। अरे ! स्त्री को छोड़कर जा रहा। और ज्ञानीजन आचरण करते इस बात पर कि जहाँ कुछ मिलता-जुलता नहीं, वहाँ ये मोही लोग क्यों रम रहे? अज्ञानी इस पर आश्चर्य करते कि यह सबसे उदास होकर अपने में, ज्ञान में, अपनी दीक्षा में लगे, तो कोई दिमाग में फितूर तो नहीं हो गया। जिसको जो बात रुचती है उसके लिए वह बात सुगम है। अब पर पदार्थ रुच जाय तो उसे नफा क्या मिलेगा और स्वरुच गया तो पवित्रता, कल्याण, साक्षात् शांति सब कुछ मिल गया। तो यह भाव क्यों नहीं बनता कि मुझे परपदार्थ न रुचे, स्व ही रुचे और इसके लिए थोड़ा ऐसा जानकर प्रयोग करें। बच्चे पर, मानो आपका हजारों रुपया खर्च होता तो गैर पर, औरों पर उसका कुछ अंश तो खर्च करने की आदत बनाओ, जिससे धीरे-धीरे यह बात समा जाय कि सब जीव समान हैं, अब उस मोह का विकल्प कर रहे, सुन रहे, सब कर रहे, वही इसके लिए प्राण न्योछावर हैं दूसरे को कुछ नहीं, इतना गहरा जहाँ आग्रह है दृढ़, तो वहाँ एक ऐसा प्रयोग कीजिए कि यह कुछ अपने में प्रगति कर सके। प्रयोग बनाओ, छोड़ना तो है ही सब, छूटेगा तो है ही सब। न कोई किसी का लड़का, न कोई किसी का कुछ। इस जिंदगी में भी नहीं, मृत्यु बाद तो फिर होगा ही क्या? अपने सबसे निरालेपन की, भावना बने तो धर्मलाभ भी मिलेगा। तो मोह, ममत्व से दूर हों तो कल्याण बने।

1598- मोक्ष तत्त्व के निरख की संपूर्णता-

जिसको स्वरूपज्ञान हुआ, उसको अभ्यास बना, कर्म की निर्जरा हुई। कर्म की बात कर्म में चलेगी, आपकी बात आपमें चलेगी। क्या सोचना किसी दूसरे की बात? खुद का खुद में करें ना? अंतस्तत्त्व की दृष्टि का अभ्यास होते-होते यह ज्ञानलीनता हो जाती है। वह आराधक ज्ञान ऐसे ज्ञानस्वभाव में आत्मा के परिपूर्ण है, वहाँ चलनपना नहीं, ऐसा यह ज्ञान अब इस अपने अचलस्वरूप में लीन होता है। लीन हो गया मायने बस वह साफ पार हो गया। अब इसको करने को कुछ नहीं रहा। वहाँ तो यह हुआ और यहाँ आराधक का, साधक का, अंतस्तत्त्व का स्वरूप निरखने वाले का उपयोग भूमि में किये हुये इस नाटक में क्या हुआ कि मोक्ष का वर्णन करते आ रहे थे, तो अब मोक्ष का वर्णन समाप्त हो रहा, मायने ज्ञान में जो मोक्ष की बात शुरू हो रही थी, भेष था सो यहाँ मोक्ष का निष्क्रांत हुआ, केवल मोक्ष की चर्चा करने वाले, ज्ञान करने वाले उसका उपयोग कर रहे थे, अब दूसरा उपयोग चलेगा। मोक्ष तत्त्व का वर्णन हो चुकने के बाद अब क्या रह गया कहने के लिये? क्योंकि कहने के लिये इतनी सारी बातें और रह गई जितनी कि कह चुके। क्यों रह गई। हुआ तो सब मगर राग-वासना से ये सब भूल गये। अब वही चर्चा फिर होना। किंतु लेखन की रचना में वह अधिकार तो कुछ नहीं आता कि वे सब अधिकार तो इस साधक के चिंतन में मनन में, कई बार आयेंगे। मगर लिखने में कुछ भी अधिकार न आयगा। सारभूत जिसका आश्रय करने से संकट टलते हैं, मुक्ति प्राप्त होती है, बस एक निचोड़ रूप, सारभूत ब्रह्मस्वरूप सर्वविशुद्ध ज्ञान, बस उसकी चर्चा सुन लेने के नाते से होगी, बाकी जो वक्तव्य था सात तत्त्वों के बारे में संक्षिप्त, वह इस अधिकार में अब समाप्त हो रहा है।

।इति समयसार कलश प्रवचन चतुर्थ भाग समाप्त।


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