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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:समयसार कलश - कलश 38

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निर्वर्त्यते येन यदत्र किंचित्तदेव तत्स्यान्न कथचनान्यत्

रुक्मेण निर्वृत्तमिहासिकोशं पश्यंति रुक्मं न कथंचनासिम् ।।38।।

352― वर्णादिक भाव व रागादिक भाव की अनात्मीयता का प्रकरण―प्रकरण चल रहा है कि जीव तो एक ज्ञान मात्र, सर्व पदार्थों से निराला, परभावों से निराला, अपने आपमें ज्ञानघन आनंदमय है, जिसको अति संक्षेप में कहें तो जीव तो ज्ञानघन है, इसके वर्णादिक, रागादिक भाव ये कुछ नहीं हैं, क्यों नहीं है? ऐसा एक प्रश्न होता है तो यों समझिये कि जिसका रूप रस गंध स्पर्श है, शरीर है, उनका तो उपादान ही भिन्न है पुद्गल द्रव्य हैं । वे मेरे कैसे हो सकते? और उनके अनुभाग का निमित्त पाकर जो आत्मा में प्रतिफलन, छाया, झाँकी होती है जिससे जीव राग कर सके वह कर्म का निमित्त पाकर हुई, वह मेरे स्वरूप में नहीं पड़ी इसलिए मेरी नहीं है । जो चीज मेरे साथ शाश्वत रहे वह मेरी चीज, और जो मेरे साथ शाश्वत न रहे वह मेरी चीज नहीं । हां अब परखिये एक कुंजी है । जो चीज जिसके द्वारा रची गई है वह उस समय होती है । जैसे सोने का आभूषण अंगूठी सोने के द्वारा रची गई है इसलिए वह स्वर्णमय है, पर अंगूठी के बीच में पड़ा हुआ जो हीरे का नग है वह तो स्वर्णमय नहीं, क्योंकि वह स्वर्ण के द्वारा रचा गया नहीं है । तो ऐसे ही जो मुझ द्रव्य के द्वारा रचा गया है वह तो पुद्गल है, पर यह जीव यह पुद्गल के द्वारा रचा गया नहीं, यह पुद्गल नहीं । यह जीव इस शरीर से निराला है, ऐसे ही रागभाव को भी लीजिए । रागादिक भाव ये पुद्गल द्रव्य के द्वारा रचे गए हैं इसलिए पौद्गलिक हैं । एक दृष्टांत लो―जैसे दर्पण के सामने तीन रंगों का रंग-बिरंगा प्रतिबिंब पड़ा है । अब रंग बिरंगापन दो जगह मिला ना । कपड़े में है और दर्पण में है । दो जगह देखा है ना । अच्छा तो दोनों ही दर्पण से भिन्न हैं, यह बात समझना है । तो कपड़े का रंग बिरंगापन कपड़े में है, इसके समझने में तो ज्यादा कष्ट न होना चाहिए । दुनिया जानती है कि कपड़े का रंग बिरंगापन कपड़े में है, दर्पण में जो रंगबिरंगापन आया सो यह दर्पण से न्यारा है कि नहीं? उस काल में तो न्यारा नहीं मगर स्वरूप से न्यारा है । वह रंगबिरंगा प्रतिबिंब स्वरूप की चीज नहीं । स्वरूप की चीज नहीं तो कैसे यहाँ आ गई? तो उस रंग बिरंगे कपड़े का सन्निधान पाकर दर्पण में ही ऐसी योग्यता है कि अपनी कला से रंगबिरंगे प्रतिबिंब रूप परिणम गया । ये नैमित्तिक भाव हैं, इसलिए दर्पण की चीज नहीं । ये राग, द्वेष मोह, ये विभाव, ये कषायें आत्मा की चीज नहीं । इसको समझाने वाला कौन? निमित्त नैमित्तिक भाव । इनका परिचय बड़े-बड़े आचार्यों ने सही रूप से कराया है ।

353―निमित्त नैमित्तिक भाव की यथार्थ समझ में आत्महित का दिग्दर्शन―भैया ! सोचने की ऐसी आदत न रखना कि करणानुयोग के ग्रंथों में व्यवहारनय से सब कथन है इसलिए झूठ है, ऐसी आदत नि:शंकित अंग के खिलाफ है । समझो प्रयोजन है स्वभाव दृष्टि, जरा तुलना कर लो । यदि कोई ऐसा ही एकांत करके चले कि जीव में जब राग आया है तो अपनी योग्यता से राग आया, ऐसा-ऐसा हो गया, इस तरह जीव को देखना, और एक इस तरह देखना कि राग प्रकृति का उदय है सो उस राग का प्रतिफलन है यहाँ यह राग का प्रतिफलन जीव के स्वरूप से निकला हुआ नहीं है, यह तो अन्य की छाया है । तो आप सच्चा भेदविज्ञान बनाकर स्वभावदृष्टि में लगने की बात किस उपाय में कर सकेंगे? विभाव की परभावता समझने के लिये जरा निमित्त कारण की खोज कीजिये, अच्छा दो बातें रखो । जब जीव के राग होता है तो कर्मोदय खड़ा हो जाता है, एक इस तरह से निरखना । और एक यों निरखना जैसे कि यहाँ आगम में सभी जगह लिखा है कि जब कर्मोदय होता है तो जीव रागपरिणत होता है, दृष्टांत लो-यों निरखना कि जब दर्पण में प्रतिबिंब आता है तो कपड़ा सामने खड़ा हो जाता है, एक यों निरखना कि जब कपड़ा सन्निधान में होता है तो दीपक अपने प्रतिबिंब रूप परिणमन करता है अथवा और दूसरा दृष्टांत लो-एक यों निरखना कि जब कमरे के पदार्थ प्रकाशित होते हैं तो दीपक खड़ा हो जाता है, तथा यों निरखना कि जब दीपक प्रज्वलित होता है तो कमरे के सारे पदार्थ प्रकाशित हो जाते हैं । कितना अंतर आया? जब यह माना कि कमरे के पदार्थ जब प्रकाश में आते हैं तो दर्पण खड़ा हो जाता है । इसका अर्थ यह बना कि पदार्थों का प्रकाशित होना निमित्त है और दीपक का खड़ा हो जाना नैमित्तिक है, ऐसी भाषा दिगंबर जैन ग्रंथों में एक भी जगह न मिलेगी । यद्यपि पदार्थों का प्रकाशित होना उसी समय है जब दीपक का प्रकाशित होना बन रहा है । समय एक है । निमित्त नैमित्तिक भावों में समय एक होता है फिर भी निमित्त नैमित्तिक विधि से कार्य कारण भाव का विचार करें तो पदार्थों के प्रकाशित हो जाने का निमित्त पाकर दीपक बना कि दीपक के उजलने का निमित्त पाकर पदार्थ प्रकाशित हुए? सही निमित्त नैमित्तिक भाव से सोचियेगा । वस्तु दोनों स्वतंत्र है । दीपक पदार्थों में जाकर प्रकाशित नहीं करता, पदार्थ दीपक में घुसकर प्रकाशित नहीं होते । दीपक अपनी जगह जल रहा, पदार्थ अपनी जगह प्रकाशित हो रहा, लेकिन विज्ञान से, युक्ति से विचारें कि दीपक का जलना कारण है पदार्थ के प्रकाशित होने में या पदार्थ का प्रकाशित होना दीपक के जलने में कारण है ? अब यहाँ विचारों एक यों देखे कि जब जीव में राग आया तो कर्मोदय खड़ा हो गया । अरे खड़ा हो चाहे न हो, यह तो आ रहा, खैर खड़ा भी सही । अब जीव से इतना चिपटाव लगा कि विकार जीव में भरा है, जीव में से आया है, जीव में अपनी योग्यता से हुआ उसको सहेतुक करार नहीं किया तो वह स्वभाव बनाना । जब चाहे जीव में राग आ सकता है ना? कभी सिद्ध में भी आ बैठ । कहते कि सिद्ध में ऐसी योग्यता नहीं है, यहाँ जीव में ऐसी योग्यता है । क्यों है? सहेतुक माने बिना कोई उत्तर नहीं हो सकता । चाहे जो चाहे कहे जाओ । तो इस राग विकार को नैमित्तिक मानो कि भाई जैसे रंगबिरंगे कपड़े का सन्निधान पाकर यह दर्पण रंग बिरंगा बना, यह हट सकता है, क्योंकि नैमित्तिक है, ऐसे ही समझो पुद्गल कर्म का विपाक उदय में आया-उसकी सब झाँकी है, मेरे में तो विकार नहीं । मैं तो चैतन्य हूँ, मेरी बात तो चेतना हैं ज्ञाताद्रष्टा रहना है । ये विकार प्रासंगिक हैं नैमित्तिक हैं, इनसे मेरा मतलब नहीं है ।

354―नैमित्तिक भाव से विविक्त सहज ज्ञान स्वभाव के दर्शन का महत्त्व―ज्ञान की पूज्यता किस बात से है, ज्ञानी निरखता है कि ये नैमित्तिक भाव मेरे स्वरूप नहीं, ये विकार मेरे स्वरूप में नहीं, ये एक्सीडेन्टल भाव हैं, मेरी चीज नहीं, मेरा स्वरूप तो केवल ज्ञान चेतना है, कल्याण के लिए क्या चाहिए? स्वभाव में मग्न होना, ज्ञान स्वरूप में मग्न होना । ज्ञान स्वरूप में मग्न होने का उपाय जो आचार्य संतों ने बताया उसके अनुसार चलेंगे तो अपना उपाय बन जायेगा, और अपने मन से कुछ भी सोचकर चाहें कि हम यह उपाय बनायें जो दिगंबर जैन संतों की वाणी से मेल न खाये तो उसके उपाय में यह सामर्थ्य नहीं कि वे विभाव मिट सकें, स्वानुभाव जग सके । बहुत सीधी सी बात है, समयसार में कहा गया है कि मिथ्यात्व दो तरह के हैं (1) जीव मिथ्यात्व (2) अजीव मिथ्यात्व । कषाय दो तरह के (1) कर्म कषाय (2) जीव कषाय । हुआ क्या? कर्मकषाय बांधने में जीवकषाय कारण था, अब जीवकषाय बनने में कर्मकषाय का उदय कारण बना । जब तक क्षयोपशमलब्धि, विशुद्धि लब्धि आदिक 5 लब्धियाँ प्राप्त नहीं होतीं, मिथ्यात्व का अपकर्षण नहीं होता तब तक जीव बेहोश है । वह इस आत्मस्वरूप की सुध नहीं कर पा रहा है, और जो प्रतिबिंब है, रागद्वेष मिथ्यात्व दर्शनमोह उसकी जो झाँकी है उसमें ही यह तन्मय बन गया है और बाह्य पदार्थों का संबंध मानकर अपने आपके जन्म मरण की परंपरा बढ़ा रहा है । अब बुद्धि जगी, इतना तो सब अनुभव कर लें कि हमको अब विवेक जगा है, हम समझ सकते हैं कि पदार्थ वास्तव में कैसा है? यह मैं आत्मतत्त्व परमार्थत: क्या हूँ । इसमें विकार भरा नहीं । यह तो जैसे कोई मुसाफिर चलता जा रहा है तो रास्ते में पेड़ों की छाया पड़ती है, आगे बढ़ा तो वह छाया छूटती गई, दूसरी छाया आती गयी । तो जैसे वह छाया अध्रुव है, वह छाया मनुष्य के शरीर में प्रविष्ट नहीं है, ऊपर-ऊपर लोटती है ऐसे ही ये सब विकार जीव के ऊपर लोटते हैं, स्वरूप में इनका प्रवेश नहीं है । ये नैमित्तिक हैं । इनसे मैं निराला हूँ । ज्ञानमात्र अंतस्तत्त्व, उसकी प्रीति करें । उसकी रुचि करें और प्रयत्न बनावें । ध्यान बनावें ।

355―संयमकवच से सुरक्षित निर्विघ्न स्थिति में अंतर्दृष्टि करने का प्रताप―चरणानुयोग में जो चारित्र की विधि बतायी है वह कोई कूड़ा कचरा नहीं है किंतु इस जीव को अपने आपके स्वरूप में रमने के लिए निर्विघ्नता की स्थिति पैदा करती है । जो विषय कषाय के भाव उमड़ते हैं, खोटी जगह हमारा उपयोग लगता है तो क्या करना? बस व्रत, तप, संयम, शुभभाव, भक्ति, प्रभुपूजा आदिक कार्य करते हैं तो उसका फल इतना है कि विषय कषाय व्यसन पाप ये भाव रुक जाते हैं । अब वहाँ एक निर्विघ्न स्थिति हमारी बनी, उसमें रहकर हम इन सर्व बाह्य क्रियाकलापों को भूलकर एक अपने विशुद्ध ज्ञानमय अंतस्तत्त्व की सुध लें और इस ज्ञान के अनुभव द्वारा अपना आनंद पायें तो कर्म तड़ातड़ अपने आपके कारण कटेंगे ।

356―वर्णादि गुणस्थानांत भावों की अनात्मता―ये वर्णादिक भाव हमारे नहीं हैं । गुणस्थान आदिक भाव ये सब पौद्गलिक हैं । अहा देखो ना, कैसा रुचिया संत है, कैसा यह ज्ञान का प्रेमी है, भव्य जीव, जो इस तरह निरख रहा है कि ये गुणस्थान भी पौद्गलिक है । जैसी-जैसी कर्म में बात है वही बात यहाँ चल रही, जैसा-जैसा रंगबिरंगापन कपड़े का है वैसा यहाँ चल रहा है । कपड़े ने दर्पण को रंगबिरंगा नहीं किया, कपड़ा भिन्न पदार्थ है, दर्पण भिन्न पदार्थ है पर ऐसा योग है कि वहाँ सामने रंग बिरंगा पदार्थ आया कि दर्पण अपनी कला से अपने में वैसी कला खेल लेता है । यहाँ एक बड़ी आशंका हो सकती है । सयोग केवली भगवान, अरहंत भगवान, जिनकी हम मूर्ति रखकर पूजा करते हैं, क्या सयोगकेवली गुणस्थान भी पौद्गलिक है? देखो सयोगकेवली गुणस्थान किसे कहते है? जहाँ योग है, वह सयोग है । सयोग केवली याने केवली होकर सयोग हैं तो योग जो बना वह एक दोष है और वह बना कर्मोदय का सन्निधान पाकर ही । तो इतना दोष रह गया इस कारण सयोग केवली कहलाये, नहीं तो शुद्ध आत्मा की दृष्टि से तो वे शुद्ध कहलाते । तो ऐसे ही समझिये कि कमी के कारण गुणस्थान भी अन्य है । सयोग केवली भी कितना पवित्र आत्मा, सिद्ध होने वाले फिर भी जब तक इनमें चार अघातिया कर्मों का संबंध है तब तक उस बाह्य संबंध को निरखकर यह गुणस्थान का नाम बना ना? यह जीव का स्वरूप नहीं है । जहाँ इतनी सूक्ष्म दृष्टि दी है वहाँ क्या इस मोटी बात को भी नहीं समझ सकते कि ये रागादिक विकार मेरे नहीं? यह तो पुद्गल की छाया है ।

357―आत्मस्वरूप में विकार का अभाव―अज्ञानी जीव उस पुद्गल की छाया में एकत्व मानकर, अपने को भूलकर, परंपरा बढ़ाता है । निगाह रखो और दर्पण के दृष्टांत से अपने दृष्टांत की दृष्टि बढ़ाते चलो तो सब बात यथार्थ विदित हो जायेगी । दर्पण के स्वरूप में विकार नहीं । दर्पण के ऊपर विकार आकर भी इसे बाहर लोटने वाला समझियेगा । दर्पण के स्वरूप में आया नहीं । बात देख लो वह रंगीन कपड़ा हाजिर माना है । उसने कुछ किया नहीं दर्पण में । निमित्त सब हाजिर मात्र होते हैं निमित्त उपादान में कुछ करता नहीं, मगर ऐसा संबंध देखें कि जब दर्पण में प्रतिबिंब आया तो कपड़ा हाजिर हुआ । सब अपनी-अपनी परिणति से परिणमते हैं और जो पदार्थ विकार रखने की योग्यता रखता है वह अनुकूल निमित्तसन्निधान को पाकर अपनी कला से उपयोगरूप खेल जाता है । यह तथ्य जिन्होंने पहिचाना उन्होंने अपने स्वभाव का स्पर्श किया । ओह मेरा स्वभाव विशुद्ध चैतन्यमात्र है । जो कर्मरस झलक रहा है, यह मैं नहीं, इससे मुझे रुचि नहीं । इसकी प्रीति से अनादि काल से अब तक मैं इस संसार में डोलता रहा ।

358―मुक्त्यर्थ पौरुष करने का अनुरोध―भैया अब ऐसा काम करो कि संसार में फिर जन्म मरण के संकट सहना न पड़े । अपने आपके विशुद्ध स्वरूप का अंत: दर्शन करो, विकारों को न चिपकाओ, ये तो मेरी ही योग्यता से हुए हैं, अहेतुक हैं ये मेरे हैं । ये मेरी योग्यता से तो हुए, पर यह सब इन कर्मों की छाया है । जैसा कर्म उदय में आया उसकी छाया पड़ रही है । हाँ ज्ञान और वैराग्य में इतना बल है कि इस छाया से लगाव न रखने के कारण अनेक स्थितिखंड, अनुभागखंड, बंधापकर्षण हो होकर ये कर्म दूर हो जाते हैं । ज्ञान में अत्यंत बल है । तो ये वर्णादिक भाव जिसके द्वारा रचे गए हैं वे वे ही हैं, वे आत्मा नहीं । कितना आदर्श, कितनी स्वच्छता का यहाँ परिचय हो रहा कि यह सब कर्मरस है, कर्मलीला है । हे ज्ञानी, हे चेतन, तू ज्ञानानंद स्वभावी होकर कर्ममल में चिपकेगा क्या, तू व्यर्थ के नोनै कर्मों से अपना उपयोग जोड़ेगा क्या? तू कर्मलीला मात्र अपने को अनुभवेगा क्या? अगर यह ही आग्रह है तो बस तुम संसार का बड़ा उपकार कर रहे हो । संसार की वृद्धि कर रहे हो । संसारी जनों में से नंबर न कटाकर इस संसार की पार्टी को मजबूत कर रहे हो । अब तक ऐसा ही करते आये हो । अब अगर चित्त में यह आया है कि मुझे आत्मा का हित चाहिए तो इस कर्मरस से चित्त हटाओ । ये विभाव हैं, परभाव हैं, कर्मरस की झाँकी है, मैं अपने चैतन्यरस से निर्भर हूँ, यह बात मन में आये तो कटाव कर लीजिए उन बाहरी बातों से, चित्त में ऐसा समा जाये कि ये मेरे कुछ नहीं हैं । जब ये कर्मरस ही मेरे कुछ नहीं तो कर्मरस के नोकर्म मेरे क्या बन सकेंगे? छूटेगी तो ये सभी चीजें ना एक दिन? जब ऐसी बात है तो कुछ पहले से ही उन समस्त चीजों के प्रति चित्त में ऐसी बात ठान लें कि ये समस्त बाह्य चीजें मेरी कुछ नहीं । इन सब बाहरी संग प्रसंगों का कटाव कर देने से और अपने आपके स्वरूप के अनुरूप होने से यह जीव कल्याण कर लेगा, अगला जब भी धर्मप्रसंग वाला मिल जायेगा और वहाँ रही सही कमी की पूर्ति करेगा और संभव है कि निःसंग होकर केवल ज्ञानमात्र आत्मतत्त्व में यह मैं हूँ इस प्रकार का अनुभव करने से सर्व बंधनों से मुक्ति पा लेगा ।

359―अंत: केवलत्व के दर्शन बिना कैवल्य के लाभ की असंभवता―मुक्ति के मायने क्या? केवल रह जाना । खालिस रह जाना । यदि यहाँ खालिस न समझ सके तो किसके बल बूते पर केवली बन सकेंगे? चौकी पर गर्दा चढ़ी है तो उसका साफ करने वाला यह जानता है कि चौकी अपने आप गर्दा से रहित है । चौकी अपने में केवल स्वरूप रख रही तभी तो वह चौकी पर पानी डालकर उसे कपड़े से साफ करता है । कोई अगर ऐसा समझ बैठे कि गर्दा चौकी से बाहर कोई चीज नहीं है, वह तो चौकी में चौकी की शक्ति से चौकी की योग्यता से चौकी में प्रवृत्त हुई है तो वह कैसे उस गर्दा को धो सकेगा? तो जिस ज्ञानी को स्पष्ट दिख रहा कि यह सब कार्माण प्रसंग की छाया है, कर्म लीला है, कर्मरस होना यह मेरी कोई परिस्थिति नहीं । इस मेरे विशुद्ध चैतन्य स्वरूप का कोई पहिचान करने वाला नहीं है । कोई पहिचान कर रहा तो वह अपने आपमें संत है, फिर उसका यह व्यवहार क्या रह सकेगा? इसको कोई जानता ही नहीं । यह कर्मरस लीला तो उसके लिए एक बंधन है जो लाख की तरह बन गया है । जैसे पेड़ में लाख लग जाये तो वह पेड़ को बरबाद कर देती है ऐसे ही मुझमें कर्मरस का यह प्रतिफलन यह मेरे को बरबाद कर रहा है, इससे हटना चाहिए । प्रज्ञा छैनी द्वारा इस ही सूक्ष्म संधि को तोड़ना है । मैं चैतन्यमात्र हूँ । मैं कर्मरस भार वाला नहीं हूँ, मैं निर्भार हूँ । मेरे स्वरूप में अन्य का प्रवेश नहीं है । ऐसा निर्णय करके केवल एक ज्ञानस्वरूप को दृष्टि में लो और आनंद पाओ । ज्ञानमात्र का अनुभव करो । मैं ज्ञानमात्र हूँ, ज्ञानघन हूँ वही सहज ज्ञानानंद स्वरूप । अब जरा बाहर निरखो―ये वर्णादिक भाव जिनका सीधा प्रसंग चल रहा है ये पौद्गलिक हैं । जैसे चाँदी के म्यान में तलवार पड़ी है, म्यान चाँदीमय है, तलवार चाँदीमय नहीं, तलवार से निराली है यह म्यान । म्यान से निराली है यह तलवार । ये वर्णादिक समस्त भाव जो कुछ जच रहे, दिख रहे, प्रतिभास में आ रहे, जिसके द्वारा बने उस ही मय हैं, वहाँ ही जाओ । देखिये―मोटी दृष्टि यह बना लो कि ये परतत्त्व कुछ तो पुद्गल उपादान वाले हैं और कुछ पुद्गल का निमित्त पाकर उत्पन्न हुए हैं, सो इनका संबंध पुद्गल में लगाकर इनको मिटा दो, इनसे अपना संबंध मत जोड़ों । ये नैमित्तिक भाव हैं । यहाँ का भेद विज्ञान बाहर के भेद विज्ञान को सच्चा बनायेगा । यहाँ का भेद विज्ञान हुए बिना पीछे से कितनी ही भेद की बातें करते जायेंगे मगर बाहरी पदार्थों से लगाव हट न सकेगा । कहते तो सभी लोग हैं-आबाल गोपाल बच्चों से लेकर बड़े तक देहाती गंवार भी कि यह धन दौलत किसका? ये मकान महल किसके? ये कुटुंब परिजन किसके? कोई किसी के नहीं । ये सब एक दिन सबसे छूट जाते हैं...., मगर इतना ज्ञान हो जाने मात्र से कहीं उन्हें आत्मानुभव तो नहीं हो गया ।

360―नैमित्तिकभाव भूमि में गुप्त अंतस्तत्त्व के दर्शन का यत्न―यह आत्मा इन नैमित्तिक भावों में गुम गया । अपनी सुध भूल गया । तो जैसे इस पृथ्वी के अंदर गढ़ी हुई निधि है वह अदृश्य हो गई है, पृथ्वी को खोदकर निधि को निकाले तो निधि के दर्शन होते हैं, ऐसे ही इन रागद्वेषादिक विभावों में, इस कर्म छाया में यह जीव अटक गया, और अपने स्वरूप को भूलकर दर-दर का भिखारी बना । अरे अपने अंदर गढ़े हुए उस ज्ञानस्वरूप चैतन्य स्वरूप की निधि को निरख इन विभावों को हटा, ज्ञान से विचार, ये विभाव, ये झांकियां मेरा स्वरूप नहीं, इनको हटाकर फेंके और एक अपने आपमें ज्ञानस्वरूप का बल प्रकट करें । ज्ञान से ज्ञान को निहारो, दर्शन हो जायेगा । आवरण हटे कि दर्शन हो गया, विभाव हटाओ, दर्शन हुआ । तो ये विभाव सहयोग के आधार पर ही हैं, व्यवहारनय समझा रहा है । यह सब कि पुद्गल कर्म का निमित्त सन्निधान पाकर विभाव हुए है । क्यों समझा रहे हैं? क्या पड़ी हैं उन्हें? अरे वे बड़े दयालु है । वे मेरे पर कृपा कर रहे हैं कि ढंग से कि इन विभावों से हटे । विभावों से उपेक्षा करने के लिए व्यवहारनय का प्रयोग है । विभावों से बिल्कुल मुख मोड़ देने के लिए यह व्यवहार द्वारा निमित्तनैमित्तिक का परिचय है । काम आया ना । इन विकारों को, इन कूड़ा करकट को, इन विपत्तियों को हटाने के लिए उसने दृष्टि दी । तेरा यह स्वरूप नहीं है, इनसे अब तू विराम पा, अब आगे बढ़, शुद्धनय की दृष्टि से मैं अपने आपको निरख रहा हूँ । विभावों से हटने के कारण ज्ञानस्वरूप की ओर रुचि रखने के कारण मौका मिला है शुद्धनय के प्रयोग का । मैं परिपूर्ण अखंड चैतन्य एक रूप चिदेक ज्ञायक हूँ, गुण भेद नहीं है । पर्याय अनिवारित है फिर भी पर्याय भेद नहीं । गुण और पर्याय दोनों का भेद छोड़कर इतना ही नहीं, द्रव्य का भी भेद छोड़कर द्रव्य, गुण, पर्याय इन तीनों प्रकार के भेदों से अतीत होकर अभेद एक परम निज अर्थ में आना है । वहाँ न पर्याय का विकल्प, न गुण का विकल्प, न द्रव्य का विकल्प, किंतु द्रव्य गुण पर्याय इन तीनों में जो समवस्थित है ऐसा जो कोई परमार्थ है बस वही एक ज्ञान का विषय बन रहा है । ऐसा केवल यह चैतन्यमात्र आत्मा मेरे ज्ञान में आओ और इसी तरह की दृष्टि में यह मेरा काल व्यतीत होओ ।


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