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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:समयसार कलश - कलश 43

From जैनकोष



जीवादजीवमिति लक्षणतो विभिन्नं, ज्ञानी जनोऽनुभवति स्वयमुल्लसंतम् ।

अज्ञानिनो निरवधिप्रविजृंभितोऽयं, मोहस्तु तत्कथमहो बत नानटीति ।।43।।

391―जीव का अनेक अपेक्षा से परिचय होने पर परमार्थ जीवस्वरूप के अनुभव की सुयोग्यता―कल के कलश में यह जान लिया होगा कि जीव और अजीव का लक्षण परस्पर भिन्न है । अजीव का लक्षण अचेतना है, जहाँ चेत है चेतना है वह जीव है । जहाँ चेत नहीं, चेतना नहीं प्रतिभास नहीं यह अजीव है, मुख्यतया शरीर से इस जीव को न्यारा परखना है, यह तो बात है ही, पर मुख्यतया पुद्गल कर्म के उदय से उत्पन्न हुआ जो उपयोग में झांकी हुई, अंधेरा हुआ जिस अंधेरे में दबकर यह जीव उसे अंधेरे रूप अपने को मानता है या उस अंधेरे के अनुरूप क्षोभ मचाता है । उस अंधेरे से भी अपने को न्यारा समझता है, यह है एक प्रखर भेद विज्ञान । तो जान लिया जीव चैतन्य मात्र है और अजीव सब भिन्न-भिन्न हैं । जीव के बारे में जिसको हर तरह का परिचय है उसके भेदविज्ञान और विशद होता है, जैसे कोई नया आदमी आया और आपने उससे पूछ लिया कि भाई तुम क्या काम करते हो? तो उसने कह दिया कि हम तो इंजीनियर हैं सर्विस करते हैं, तो बस इतना ही पूछकर वह रह गया, मन ही मन में जान लिया कि यहाँ कोई पास पड़ोस के किसी गांव का होगा, इतना जानने मात्र से उसका परिचय तो नहीं बना । कहां घर है, घर में कितने आदमी हैं, क्या काम होता है इसका कहां-कहां संबंध है, ये सब बातें अगर और ज्ञात हों तो भला उसका अधिक परिचय कहलाया ना? तो ऐसे ही जीव के बारे में जीव का लक्षण चेतन है, इतना भर जानने से स्पष्टता नहीं आती और जब यह जीव जान जायेगा कि जीव कितना बड़ा है, कितने प्रदेश हैं, इसके कितने गुण हैं, इसकी क्या-क्या अवस्थायें हुई, क्या-क्या और हो सकती हैं और वर्तमान में यह जीव क्या कर रहा है, इन बातों का परिचय हो तो चैतन्य लक्षण समझकर और अच्छा ज्ञान परिचय बनता है । तो चैतन्य है जीव का स्वरूप, इतना तो सब बोल देते है पर मतलब क्या? चेतना क्या? ऐसी और-और बातों में यथार्थता न हो तो जीव के लक्षण का सुपरिचय नहीं होता ।

392―जीव के स्वरूपास्तित्व का यथार्थ परिचय न होने पर जीवलक्षण के सुपरिचय का अभाव―जैसे कोई मानता है कि यह जीव चेतन तो है, पर सर्वव्यापक है, सब जगह फैला हुआ है और जैसे घड़ा रखा है उल्टा, तो वहाँ घड़े के प्रदेश घड़े में है, आकाश के प्रदेश आकाश में है, पर वहाँ घड़ा रखा है तो कहीं ये दोनों अलग-अलग तो नहीं दिखाई पड़ते कि यह घड़े का आकाश, यह आकाश का आकाश, यह जीव का आकाश । तो जैसे आकाश ये जुदे-जुदे कहलाते हैं पात्रों के भेद से, ऐसे ही ब्रह्म तो एक है, पर जिस-जिस शरीर में जीव है ना उसमें जो आ गया वह जुदा-जुदा जीव कहलाता है । ऐसा कोई-कोई लोग मानते हैं । अन्यथा जब तक यह न बतायें कि कोई-कोई ऐसा मानते हैं तो ऐसा मान लेना होगा कि बड़ा ठीक कह रहे हैं । आकाश तो एक है और शरीर जुदा-जुदा हैं तो इसमें जुदे-जुदे आकाश कहे जा रहे हैं, मगर यह बात बतलाओ कि आकाश एक है और घड़ा यहाँ धरा है मंदिर में और यह घड़ा उठाकर अगर यहाँ जैन बाग के मंदिर में पहुंचा दिया जाये तो बताओ यहाँ के मंदिर का आकाश उठकर जैन बाग के मंदिर तक आ गया या जैन बाग के मंदिर का ही आकाश उस घड़े के अंदर आया? अरे यहाँ के आकाशप्रदेश यहीं है वहाँ के आकाश प्रदेश वही है, आकाश तो वस्तुत: एक है । तो इसी तरह दुनियाँ में जीव अगर एक ही हो तो पहली आपत्ति तो यह आती कि अगर एक जगह किसी जीव को दुःख हो तो सभी जगह के जीवों में उसी जगह दु:ख हो जाना चाहिए जैसे बाँस एक है, यदि एक जगह हिलाया तो सब हिलता, ऐसे ही एक जीव का देह अगर दुःखी हो तो सब जगह के जीव दुःखी हो जाने चाहिए । एक बड़ा स्थूल दृष्टांत दे रहे―जैसे मानों आपने कहा कि बाँस में एक जगह आग लग गई तो वह उसी जगह जलता, एकदम से सभी जगह तो नहीं जलता । जो एक चीज है उसमें यह द्वैत न बनेगा कि कुछ प्रदेशों में तो दुःख होवे, कुछ में सुख होवे, अन्य परिणमन होवे, बाकी प्रदेशों में न होवे यह एक चीज में बनता है । तो जीव का लक्षण चैतन्य है, इतना कह कर भी जब जीव के बारे में और और तरह के परिचयों में झूठपना है, यथार्थता नहीं है, तो मोही चैतन्यरस कहकर भी जीव का अनुभव नहीं कर पाता ।

393―जीव के क्षेत्र परिचय में भूल होने पर जीवलक्षण के सुपरिचय का अभाव―कोई कहता है कि देह में जीव है, कितना बड़ा है जीव? तो कहता है कि इतना बड़ा है जीव कि जैसे बड़ का बीज । अर्थात् एक सरसों के दाने से भी बहुत छोटा, मगर वह बीज तो उतने बड़े बरगद के वृक्ष में निरंतर बड़ी तेजी से चक्कर चलाता रहे ऐसा नहीं है किंतु यह जीव जीव के शरीर के सारे प्रदेशों में निरंतर तीव्र गति से चक्कर लगाता है, कोई लोग तो जीव को इस तरह का अणु प्रमाण मानते हैं । और कोई लोग कहते हैं कि जीव इतना बड़ा है कि सारे संसार में फैला है, वह हिल डुल ही नहीं सकता । जैसे घड़े में खूब पानी भर दिया तो वह घड़ा अब हिल डुल नहीं सकता । ऐसे ही जीव इतना बड़ा है कि वह हिल डुल नहीं सकता । तो जीव के बारे में अनेक तरह की धारणायें लोगों की हैं जो विभिन्न धारणायें हैं । वे इतना भी बोल जायें कि जीव का लक्षण चेतन है फिर भी वे पहुंच नहीं पाते । क्योंजी, किसी ने एक पहिचान कर लिया, नया आदमी है । बोला―भाई हमें ठहर जाने दो ।....हाँं ठहर जाओ । आप क्या काम करते हो ।....हम एक जगह क्लर्क हैं बस यदि संतोष हो गया वह नया पुरुष वहाँ ठहर गया और उसकी यह धारणा बनी कि होगा यहीं कोई पास के गाँव का, लेकिन पूरा परिचय न करने के फल में हुआ क्या कि वह कुछ सामान लेकर चंपत हो गया । अब आप इधर उधर उसका पता लगाते फिर रहे तो जैसे उसका पूरा ज्ञान न करने का यह फल सामने आया है ऐसा ही फल जीव द्रव्य की गुण पर्यायों आदि का ज्ञान न होने पर मिलता है ।

394―जीव का अनेक अपेक्षाओं से परिचय होने पर जीव लक्षण का सुपरिचय―देखो इस जीव में श्रद्धा, दर्शन, ज्ञान, चारित्र और आनंद आदिक शक्तियाँ है । तो जिसमें इतनी शक्तियाँ पायीं जायें वह जीव और जितनी शक्तियाँ है उन शक्तियों की अवस्थायें हैं ना, जैसे जानता है, रमता है, विश्वास रखता है, सुखी होता है, तो ऐसा गुण और पर्यायों का जो पिंड है वह जीव है, अच्छा भीतर का परिचय हो गया, अब क्षेत्र का परिचय करो । यह जीव असंख्यात प्रदेश वाला है, जीव है एक, मगर वहाँ गुण यह भी है कि फैले तो फैल जाये बहुत और सिकुड़े तो सिकुड़ जाये बहुत, और चीज एक है । आपको यह उदाहरण अन्य किसी द्रव्य में न मिलेगा । आप कहेंगे कि वाह रबड़ तो है ऐसी चीज कि फैलाओं तो बहुत फैल जाये और फिर वह बहुत सिकुड़ जाये? तो भाई वह रबड़ एक चीज कहां है? वह तो अनंत परमाणुओं का पिंड है । जो एक हो और फैले तो बहुत फैले, सिकुड़े तो बहुत सिकुड़े, यह कला सिर्फ जीव में ही है । धर्मद्रव्य में यह कला है क्या? अधर्म में, आकाश में है क्या? काल तो एकप्रदेशी है । जीव ही एक ऐसा अद᳭भुत पदार्थ हैं कि जिसमें यह कला पायी जाती है । वह जीव हैं खुद ही जिसकी चर्चा चल रही मगर उसके भी समझने में बड़ी हैरानी चल रही हैं, यह कितने अंधेर की बात है? एक पुरुष किसी सन्यासी के पास जाकर बोला―महाराज मुझे आत्मा का कुछ भी ज्ञान नहीं है, ज्ञान करा दो । तो वह सन्यासी बोला―देखो तुम अमुक घाट पर चले जाओ वहाँ एक मगर रहता है, वह देगा

तुम्हें आत्मज्ञान । वह पहुंच गया मगर के पास, बोला मगरराज, मुझे एक बड़े ज्ञानी संन्यासी ने आपके पास भेजा है । मुझे जीव का, आत्मा का कुछ भी ज्ञान नहीं है सो आप मुझे ज्ञान करा दे । तो वह मगर बोला―अरे भाई ठीक है हम तुम्हें आत्मा का खूब ज्ञान करायेंगे, पर पहले एक काम करो―तुम्हारे हाथ में तो लोटा है हमें बहुत प्यास लग रही है, पहले एक लोटा पानी लाकर पिला दो फिर तुम्हें ज्ञान देंगे । तो वह पुरुष बोला―हे मगरराज ! तुम तो बड़े मूर्ख मालूम होते हो । तुम स्वयं लबालब समुद्र में डूबे हो फिर भी कहते हो कि हमको प्यास लगी हैं । तो मगर बोला―बस यही उत्तर तो मेरा तेरे लिए है । अरे तू स्वयं ज्ञानस्वरूप है, ज्ञान से लबालब भरा है फिर बाहर में उस ज्ञान की तलाश कहाँ करता फिर रहा है । यह ज्ञान क्या है? खुद के जीव की परिणति ही तो है । यह जीव अनंत आनंदस्वभावी हैं, लेकिन इसकी यह दशा चल रही है । देखो किसी भी जीव के बारे में यह समझना हो कि इस जीव के पास वास्तव में उसका वैभव क्या है? तो उसके लिए बताया है कि मौलिक चार चीजों का परिचय करना चाहिए अच्छी तरह से, बस आत्मा का (जीव का) परिचय बहुत अच्छी तरह से बन जायेगा । तो पहले जान लेवें वे चार बातें । कौन सी हैं वे चार बातें? एक तो―यह जीव क्या है, दूसरा―कहां रहता है? तीसरा―क्या करता है और चौथा―इसके पास धरा क्या है? बस ये ही चार बातें समझना है, जीव का ज्ञान हो जायेगा, तो क्या जवाब आया? जीव क्या है? गुण पर्यायों का पिंड । जीव कहाँ रहता है? अच्छा बुरा जानन देखन । कुछ जीव के पास धन भी है कि नहीं? हाँ है । जीव के पास ज्ञान दर्शन आदिक शक्तियां है । तो जीव का सब ओर से परिचय होने पर समझो कि जीव का वह लक्षण दिखेगा जिसकी परिणति से आत्मा का वैभव, आत्मा का चैतन्यरस समझ में आता है । जान लिया, अजीव से भिन्न जीव को जान लिया ।

394―ज्ञानियों को अज्ञानी जनों के मोहनाट᳭य पर आश्चर्य―अब यह स्वयं ही स्पष्ट विकास में, विलास में ज्ञान प्रतिभास की दृष्टि में है । इसे ज्ञानी जन अनुभव करते हैं, ज्ञानी ने अनुभव किया कि मैं हूँ और थोड़ा अपनी पहली अज्ञान दशा का ख्याल किया तो उसे अचरज होता है कि अहो, इसका स्वरूप तो चेतन है, जिसको सही जानना परखना है उसको यह मोह कैसे बनेगा? ज्ञानी पुरुष को आश्चर्य होता है कि अरे मोही जनों को यह भ्रम क्यों हो गया? जैसे एक आदमी को यह भ्रम हो गया कमरे में आने पर कि रस्सी को साँप समझ बैठा, कुछ अंधेरा सा भी हो गया था । दूसरा बालक खूब अच्छी तरह समझ रहा था कि यह रस्सी पड़ी है तो इधर एक बालक तो भ्रम होने से घबड़ा रहा था और एक बालक को आश्चर्य हो रहा था कि अरे यह तो देखो कैसा व्यर्थ ही घबड़ा रहा है । तो जैसी दशा यहाँ इन दो बालकों की है ऐसी ही दशा यहाँ के मोहीजनों की और ज्ञानी पुरुषों की है । तब ही तो जरा जरासी बात में मोही घबड़ा रहे हैं, मोह ममता का दुःख भोग रहे हैं, पर ज्ञानी पुरुष जानता है कि अरे यह सब कर्मलीला है, यह सब कर्मोदय झलक रहा है । उस रूप विकल्प बनाकर मैं क्यों अपने को दुःखी करूं । ज्ञानी पुरुष को मोही जनों की क्रियायें देखकर बड़ा आश्चर्य होता है । वह आश्चर्य करता है कि अरे ये मोही जन इस तरह का मोह नृत्य में क्यों नाच रहे हैं ? जैसे कोई मूर्ख व्यक्ति हठ कर जाये कि 2 और 2 मिलाकर तो 6 होते हैं, तो उसकी इस हठ पर तो लोग कुछ हँसेंगे और कुछ आश्चर्य भी करेंगे―अरे क्या हो गया इसके दिमाग में । ठीक ऐसी ही बात मोहियों की और ज्ञानियों की है । मोह जन परद्रव्यों के संग्रह विग्रह में, उनकी सम्हाल करने में, उनके पीछे रात-दिन कूटने पिटने में ही खुश होते हैं, मिथ्यात्व भरी बातों में ही अपनी वीरता समझते हैं, पर ज्ञानीजन उनसे विरक्त रहने में ही खुश रहते हैं । अज्ञानी जनों की मोहभरी वृत्तियाँ देखकर वे बड़ा आश्चर्य करते हैं, ज्ञानी पुरुष अपने को जानता कि मैं चैतन्यस्वरूप हूँ । मेरा काम केवल जानन भर है, मोह करना, विकल्प करना, ममता करना नहीं, कषाय करना नहीं । ये सब अज्ञानभरी चेष्टायें हैं । ये दशायें मेरी कुछ नहीं लगती । मैं तो अपने स्वरूप का ही अनुभव करूं ।


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