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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:समयसार कलश - कलश 50

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ज्ञानीजानन्नपीमां स्वपरपरिणतिं पुद्गलश्चाप्य जानन्,

व्याप्तृव्याप्यत्वमंत: कलयितुमसहौ नित्यमत्यंत भेदात् ।

अज्ञानात्कर्तृकर्मभ्रममतिरनयोर्भाति तावन्न यावत्,

विज्ञानार्चिश्चकास्ति क्रकचवददयं भेदमुत्पाद्य सद्यः ।।50।।

498―मोहविध्वंसक तथ्यनिर्णय में प्रवेश―अपने आपके भीतर ही घटना की निरख की जा रही हैं, क्या गुजर रहा है इस आत्मा के क्षेत्र में? यहाँ जीव और कर्म दो की बात चल रही है । अगर यह जीव अकेला ही होता इसके साथ कर्म का संबंध न होता तो जीव की नाना गतियाँ न बनती । वह तो अपने स्वभाव के अनुरूप ही परिणमता और वहाँ परिणमन और स्वभाव ये एक रस प्रकट होते । जैसा कि भगवान में हो रहा है, किंतु यहाँ जो नाना दशायें जीव की चल रही हैं ये ही यह स्वीकार करती हैं, यह बताती हैं कि इस जीव के साथ कोई दूसरी विरुद्ध चीज लगी है, जिसका निमित्त पाकर जीव में नाना दशायें बन रही हैं । बना रहा है यह जीव, परिणम रहा यह जीव । कर्म जीव की दशा नहीं बनाते, किंतु कर्मोदय का सन्निधान पाकर जीव में स्वयं ऐसी विभाव दशा प्रकट होती जाती है, जैसे किसी मनुष्य को साँप ने काट लिया, विष चढ़ गया, अब मंत्रवादी मंत्र पढ़ रहा है, तो मंत्रवादी तो अपने में अपनी ही भावना बना रहा है, वह उस मनुष्य के शरीर में प्रवेश नहीं करता, किंतु उसका निमित्त पाकर यह स्वयमेव दूर हो रहा है । निमित्त नैमित्तिक भाव की यथार्थ घटना जीव और अजीव के प्रकरण में समझ लेंगे । रोटी पकती है आग पर, आग कहीं रोटी रूप नहीं बन जाती, रोटी आग रूप नहीं बन जाती । रोटी में रोटी है, आग में आग है, लेकिन ऐसा ही निमित्त नैमित्तिक योग है स्पष्ट बात है कि अग्नि का सन्निधान पाकर रोटी में रोटी सिक गई । सर्वत्र यह ही हाल हो रहा है, जो जगत को इस दृष्टि से निरख रहा कि प्रत्येक अणु-अणु स्वतंत्र-स्वतंत्र अपने आपके उत्पाद व्यय से परिणमने वाला, प्रत्येक जीव स्वतंत्र अपने आपकी परिणित से परिणमने वाला है । इस तरह की जो दृष्टि पा लेगा उसके मोह नहीं हो सकता । इस मोह ने इस जगत को कष्टमय बना दिया । बात कुछ नहीं और बतंगड़ बन गया । जीव जीव है, कर्म कर्म है, प्रत्येक जीव स्वतंत्र-स्वतंत्र है । कोई किसी का स्वामी नहीं । किसी पर किसी दूसरे का अधिकार नहीं । सबकी सत्ता जुदी-जुदी है । यह तो इस जीव ने उन परपदार्थों में मोह बुद्धि करके मेरा है, मेरा था, मेरा होगा, यों व्यर्थ की कल्पना की, जिसमें रंच भी तथ्य नहीं है, एकदम मिथ्या है, पर इस जीव ने कल्पनायें करके अपने आपको समर्पित कर दिया । याने जैसे दही बिलोया जाता तो मथानी का संबंध पाकर दही बिलो लिया जाता है ऐसे ही यह आत्मा (जीव) बिलोया गया । अच्छा तो इतने बड़े कष्ट को हटा देने का उपाय क्या है? सम्यग्ज्ञान का प्रकाश लावें, मोह का त्याग करें, कष्ट तो था ही । मानने का था, सो यह मान्यता मिट जायेगी, आनंद मिल जायेगा ।

499―उदाहरण पूर्वक जीव के स्वपरिणाम कर्तृत्व व परपरिणामना कर्तृत्व का निर्णय―ये सब विभाव की बातें जीव में आयी हैं तो उस कर्मोदय का निमित्त पाकर आयी हैं, सो भले ही कर्मोदय निमित्त मात्र है वह, पर उसका सब कुछ तादात्म्य, कर्म का कर्म के परिणाम के साथ है, जीव का तादात्म्य जीव के परिणाम के साथ है, एक कोई दूसरे का परिणाम करता नहीं, हाँ कर्म उदय में आया मायने उसने अपने आपमें ही बुरा ढंग बना डाला, उसकी झलक इस उपयोग से हुई, जीव में हुई । उसका निमित्त पाकर जो कुछ विकल्प बना वह परिणाम जीव में हुआ । अब यह जीव जानने वाला तो अवश्य हो रहा, जिसका जितना ज्ञान है, अपने को जानता, परपदार्थ को जानता, मगर जिसको जान रहा, जिसके बारे में जान रहा उससे तादात्म्य नहीं बन पाता । उदाहरण लो दर्पण के सामने कोई रंग बिरंगा खिलौना रखा है, जिसमें चाबी भर दी जाये उसमें हलन चलन होने लगती है । अब उसका सन्निधान पाकर दर्पण में चलता हुआ रंग बिरंगा खिलौना, जैसा प्रतिबिंब पड़ रहा सो पड़ रहा, मगर दर्पण उस रंग बिरंगे खिलौने का कुछ भी नहीं कर पा रहा । वह तो भिन्न क्षेत्र में पड़ा है, और रंग बिरंगा खिलौना कितनी ही हलचल कर रहा हो और उसके अनुरूप दर्पण में फोटो आ रही है तिस पर भी वह रंग बिरंगा खिलौना हलचल वाला इस दर्पण में कुछ नहीं कर रहा । हो रहा फिर भी एक-दूसरे का कोई कुछ नहीं कर रहा । यह जीव जानता है कि मैं अपने संकल्प विकल्प को, राग द्वेष को अनुभव रहा हूँ, यह अच्छा है, यह बुरा है, इस तरह का ज्ञान भी कर रहा है, उसे जान रहा है और आगम के आधार पर, युक्ति के आधार पर यह भी जान रहा है कि कर्म विपाक की झलक है, कर्म को जान रहा मगर सब कुछ जानता हुआ भी जीव कर्म में कुछ करता नहीं है और कर्म कुछ भी नहीं जान रहा और कर्म के उदय का निमित्त पाकर जीव में बहुत हलचल होती रहती है तिस पर भी कर्म जीव में कुछ नहीं कर रहा । यहाँ यह आत्मा साक्षी (गवाह) बन जाता है, घटना से न्यारा, अलग, साक्षी मात्र रहता है, वह वादी और प्रतिवादी से अलग रहता है । साक्षी न वादी का होता न प्रतिवादी का होता और न्यारा रह कर जो तथ्य की बात है उसे ही बताता है । तो यह आत्मा यहाँ की सारी घटनाओं का साक्षी बन जाये, उस घटना से व्यग्र न हो हमारा ज्ञान, यह शिक्षा लीजिये इस तथ्य परिचय से । आत्मज्ञानी के जगता है वह ज्ञान । कह दीजिए कि वह तो जीवन मुक्तसा है । रह रहा है संसार में, मगर भीतर जो उसका ज्ञान प्रकाश है उस ज्ञान प्रकाश के कारण वह आकुलित नही हो रहा । व्याकुल होता कौन? जो परपदार्थों में मोह राग द्वेष का परिणाम रखता है ।

500―अंत: वास्तविकता के निर्णय की आवश्यकता―भैया ! वास्तविक भेदविज्ञान तो वहाँ अध्यात्म में करना है और स्थूल दृष्टि से देखें तो जिसको जितना सुहावना संग मिला है, अच्छे लड़के हैं, अच्छी कोठी है, अच्छा रोजिगार है, अच्छे मित्र हैं, अच्छी पार्टी है, सब कुछ अच्छा है, मगर यह सब अच्छा तो क्या? यह तो हे आत्मन्! तेरे लिए अंधेरा है, वे अंधकार नहीं, किंतु उनको अच्छे-अच्छे मानकर राग विकल्प बनाकर जो अपने आत्मा भगवान का हनन हो रहा है, सुध नहीं हो रही है और बाह्य पदार्थों में उपयुक्त हो रहा है यह तो एक अपनी बात है, पुण्य पाप के फल में मत हर्ष करो, मत खेद करो । अपनी सही-सही सुध सम्हाल लो, सब कुछ सब सही-सही जान लो, देख लो जो अपनी ऐसी स्थिति बनायेगा कि बस जान लिया, देख लिया और कुछ हमें मतलब नहीं, उसको तो आत्मीय अनंत निधि प्राप्त होगी । प्रभु को हम पूजने क्यों आते । वह तो बिल्कुल अकिन्चन हैं, यहाँ तो फिर भी कोठी है, कुटुंब है, पैसा है, रोजगार है, पर इन भगवान के पास तो ये कुछ भी नहीं हैं, वे तो केवल अकेले हैं । हम उनके दर्शन करने क्यों आते? अरे भाई ! ऐसा अकेलापन जिसके प्रकट हो जाता उसे आत्मीय अनंत निधि प्रकट हो जाती । यहाँ का तो यह सारा वैभव सब बेकार हैं, बाहरी पदार्थ हैं, पौद्गलिक स्कंध हैं, इनकी सत्ता न्यारी, मेरी सत्ता न्यारी । उनसे मेरा कोई लाभ नहीं होता । प्रभु ने अपने आत्मीय अनंत आनंद का लाभ लिया । और, वैसे भी देखो―यहां के संग में यदि आसक्ति हो जाये, जो कुछ है सो सब यही है मेरा सर्वस्व ऐसी यदि आसक्ति हो जाये तो उसका फल बहुत बुरा है । यह तो रहेगा ही नहीं, पर आगे का भव और बुरा है । बड़ा कष्टमय होगा । जगत के जीवों को देखो कैसे-कैसे दुःखी है, मनुष्यों को ही देखो किसी का दिमाग खराब है, उसमें बहुत कष्ट पा रहा है, किसी को बुद्धि थोड़ी मिली तो वह यों ही कष्ट पा रहा है, किसी को रहने का स्थान नहीं, खाना पीना नहीं वह कष्ट पा रहा, किसी को कोई रोग लगा वह कष्ट पा रहा, किसी को अटूट संपदा मिली फिर भी उसके अनेक तरह की बेचैनी की बीमारी लगी हैं । जगत में कोई सुखी नहीं । आज जो लोग संपन्न हैं तो वह तो उनके पूर्वभव की कमाई है, कुछ तपश्चरण किया होगा जिससे आज सब प्रकार सुविधायें मिली हुई हैं, मगर इन सुविधाओं का सही सदुपयोग हो तो ठीक कहा जाये । और अगर इन सुविधाओं को पाकर इनका दुरुपयोग किया गया तो इसे ठीक नहीं कहा जा सकता । तो ये सब बाहर के झंझट तो एक विषयभूत हैं, झंझट तो सारा हमने अंदर में लगा रखा है ।

501―कर्म, कर्मरस, जीव व विकल्प इन चारों के बोध के लिये कुछ दृष्टांत―जरा निरखिये―यहाँ चार बातें कही गई थीं कल-कर्म कर्मरस, जीव और विकल्प । कर्म व कर्मरस मायने कर्म में ही जो क्रोध, मान, माया, लोभ अनुभाग का विपाक होता है, फूटता है वहाँ वह कर्मरस है इसे यों समझिये कि जैसे चूने का डला है । बताओ उस चूने की डली में स्वस्थ रहने की म्याद होती कि नही? म्याद तो है, कोई 100-50 वर्ष तो वह डला रहेगा नहीं, साल दो साल भी नहीं रह सकता । मान लो, कोई 6 माह की उसकी म्याद है और उस पर अभी पानी कोई डाल दें तो वह तो अभी पिघल जायेगा, उसकी जो शक्ति थी वह फूट जायेगी । तो जैसे चूने का डला फूटता है, अन्य रूप बनता है इसी प्रकार कर्म भी अपनी आखिरी स्थिति पाकर उदयकाल में फूटता है, उसमें फूलता है जो अनुभाग है, कषाय है, वह प्रकट होता है, उसे कहते हैं कर्मरस । तो यहाँ देखिये―यह तो हुआ कर्म व कर्मरस और उसका सन्निधान पाकर यहाँ क्या हुआ जीव में? जीव तो है ही पदार्थ मगर उसमें संकल्प विकल्प हुआ―याने कर्मरस की झलक संकल्प विकल्परूप होती है । जैसे चार चीजें कहीं थी कल कबूतर, कबूतर का रंग या कबूतर की फुरफुरी, जैसे कबूतर फुरफुरा देता है तो वह फूलकर डयोढ़ा मोटा हो जाता है । दो बातें तो वहाँ और दो बातें दर्पण में । दर्पण खुद और दर्पण में उस प्रकार का फोटो, तो कबूतर और कबूतर का रंग आकर इनका तादात्म्य कबूतर में है, दर्पण में रंच नहीं । और उसका निमित्त पाकर हुआ है वैसा प्रतिबिंब । मगर प्रतिबिंब और दर्पण इनका तादात्म्य है । यह कबूतर में कुछ नहीं जाता, ऐसे ही कर्म, कर्मरस इनका कहीं तादात्म्य है, उसका सान्निध्य पाकर हुआ जीव में विकल्प सो जीव और विकल्प इनका यहाँ तादात्म्य है । तो यह जीव अपने संकल्प विकल्प

परिणाम को जान रहा है, अनुभव रहा है तिस पर भी इस जीव का तादात्म्य कर्म में नहीं । कर्मरूप से जीव नहीं बन जाता, जीव जीवरूप ही बनता है । एक बहुत मोटा दृष्टांत लो―वक्ता और श्रोता और वक्ता की हलचल और श्रोता की हलचल, ये चार बातें लीजिए । श्रोताओं में हलचल ज्ञान सूझ, समझ, चिंतन जो कुछ चल रहा वह श्रोता में तन्मय है या वक्ता में? यह सब कुछ तो श्रोता में ही तन्मय है और वक्ता के विचार चिंतन, उस तरह का बोलना प्रक्रिया, हलचल है, उसकी तन्मयता वक्ता में है या श्रोता में? वक्ता में । सो देखो यद्यपि परस्पर हलचल में निमित्त नैमित्तक संबंध है । श्रोताओं का सान्निध्य पाकर वक्ता इस प्रकार का हलचल कर रहा । वक्ता के व्यापार का निमित्त पाकर श्रोतागण अपने चित्त में उस प्रकार की तर्कणा कर रहे, मगर संबंध जरा भी नहीं । मात्र निमित्त नैमित्तक भाव है ।

502―कर्म, कर्मफल, स्वपरिणाम का जाननहार होने पर भी जीव में कर्म के कर्तृत्व की असंभवना―अब यहाँ भी देखिये यह ज्ञानी आत्मा कर्मों के उदय की बात जान रहा, कर्म में कर्म की बात जान रहा और उसका निमित्त पाकर जो संकल्प विकल्प चल रहा, उसे भी जान रहा मगर जीव का व्याप्य व्यापक भाव कर्म में नहीं, कर्म का व्याप्य व्यापक भाव जीव में नहीं, व्याप्य मायने समाया हुआ और व्यापक मायने सामने वाला याने जिसमें समाया हो । जो समाया है वह व्याप्य, जिसमें समाया है वह व्यापक । जैसा मिट्टी का कड़ा बना तो घड़ा समाया मिट्टी में सो मिट्टी व्यापक और घड़ा व्याप्य । क्या का क्षेत्र काल थोड़ा होता है, जहा जैसा व्याप्य व्यापक माना हो । व्यापक का स्थान बड़ा होता है । तो कर्म का संबंध जीव में नहीं, जीव का संबंध कर्म में नहीं, मगर ऐसा निमित्त नैमित्तक योग चल रहा है कि कर्मविपाक से आच्छन्न यह जीव अपनी भूल से दुःखी हो रहा है । शान नहीं करता सही और ज्ञान थोड़ा बहुत करता तो उसमें आस्था नहीं ज्ञान होना और सानुभव ज्ञान होना, इन दोनों में ऐसा अंतर है कि जैसा मानो आप लोगों में से कोई जो अभी तक श्रमण बेलगोल ( बाहुबलि जी) नहीं गया और जिसमें बाहुबलि स्वामी की प्रतिमा को नहीं देखा और यहाँ फोटो देख रहा है, पुस्तक पढ़ रहा है, नाप तौल जान रहा है, उस मूर्ति का इतना बड़ा अंगूठा, इतना बड़ा घुटना, इतना बड़ा अंगूठे का नख, यों बहुत-बहुत उसका ज्ञान कर रहा, बल्कि उस मूर्ति को देखते हुए में उसके संबंध मैं जितने विकल्प नहीं होते कहो यहाँ उस मूर्ति के संबंध में ज्ञान करते हुए में उतने विकला हों, पर यह बताओ कि एक तो यहाँ पढ़कर ज्ञान किया और कभी जैनवद्री ही जाकर एक उस मूर्तिक साक्षात् दर्शन करके ज्ञान किया, बताओ इन दोनों प्रकार के ज्ञानों में कुछ अंतर है कि नहीं? हों अंतर है, क्योंकि प्रत्यक्ष दर्शन करके किया हुआ ज्ञान अनुभवात्मक ज्ञान हैं, अभी यहाँ जो बालकों को रूस, अमेरिका, चीन, जापान, जर्मनी, इंग्लैंड आदि के नदी पहाड़ आदिक का ज्ञान पुस्तकों के आधार से कराया जाता है, तो भले ही वे उसका बहुत-बहुत ज्ञान करले फिरभी उस ज्ञान से व इसमें अंतर है जो वहाँ जाकर प्रत्यक्ष देखकर ज्ञान किया जाये । वह ज्ञान एक अनुभवात्मक ज्ञान होता है । तो ऐसे ही कोई अध्यात्म का बड़ा भारी ज्ञात पुस्तकों के आधार से कर ले, एक तो वह ज्ञान और एक प्रयोगात्मक रूप से करके अपने अनुभव में आया हुआ है वह ज्ञान, इन दोनों में निरनुभव व सानुभव का अंतर है । जो सहज ज्ञान स्वरूप को ज्ञान में लेकर जो एक अनुभव जगता है उस अनभव में जो परमात्मतत्त्व का दर्शन, आनंद का अनुभव अलौकिक दुनिया का परिचय होता है वह अनुभव सहित ज्ञान है, वास्तविक ज्ञान इसको ही कहते हैं । ऐसा ज्ञान जिसे प्राप्त हो गया वह कदाचित् पूर्व संस्कार वश असाता का उदय होने पर कुछ भोगोपभोग के कार्यों में भी पड़े उसको सम्यक्त्व के कारण पवित्र कहा गया है । वह अबंधक है, संसार का बंध अब वह न कर सकेगा और अंत: आनंदमय है ।

503―अपने में ज्ञानमात्रता व ज्ञानवर्तना निरखकर संकटहीन हो जाने का अनुरोध―भैया ! अपने को ज्ञान मात्र जानकर अलौकिक फकीराना अंगीकार करें, चिपकना नहीं धन वैभव से, कुटुंबादिक से । अपना व्यवहार सही करना । प्रीत रखे बिना घर में गुजारा न चलेगा, मगर यथार्थ बात जानते हुए धर रह जाये तो इसमें जो संकट हीनता रहेगी इसको कोई दूसरा नहीं दे सकता, खुद ही अपने को संकट हीन बना सकते हैं । दूसरे में सामर्थ्य नहीं कि किसी दूसरे को कोई संकट हीन बना दे क्योंकि समझना तो खुद को ही पड़ेगा । खुद के समझने से ही काम बनेगा, दूसरे के समझने से काम न बनेगा । किसी को आप लाख रुपये भी दे दें, करोड़ों का मालिक बना दें, कितना ही वैभव हो जाये, पर शांति का अनुभव तो वह तब ही कर सकेगा जब सहज ज्ञान स्वरूप का, अंतस्तत्त्व का उसको परिचय होगा कि मैं यह हूँ । तो यह जीव जान तो रहा है, अपने संकल्प विकल्प को, जान रहा है कर्म की परिणति को, मगर यह कर्मरूप से नहीं परिणमता, यह जीव कर्ण की परिणति को नहीं करता । वह झलक रहा है, उसको जान रहा हे यहाँ बैठे-बैठे आप इस मंदिर की दीवाल को भी देख रहे हैं तो आप दीवाल के करने वाले हैं या केवल जानने वाले हैं? जानने वाले हैं, करने वाले नहीं । और, कदाचित् ईंट उठाकर रहने लगे, बनाने लगे कोई कुछ तो वह उस दीवाल का करने वाला है या जानने वाला? वह भी जानने वाला । बनाते-बनाते वह दीवाल गिर जाये, ढल जाये, खूब आँधी तूफान वर्षा आदि के होने से दीवाल गिर जाये तो उस समय जो आप कुछ मन में खेद मान रहै हैं सो बतलावो कि आप कहा जान रहे हैं या दीवाल गिरने का अनुभव कर रहे हैं? जान रहे हैं । दीवाल का अनुभव परिणमन दीवाल को हो रहा है, मुझमें मेरा अनुभव चल रहा दै, हर जगह बुरा बनो, अच्छा बनो, मैं अपने ज्ञान का ही परिणमन करता हूँ, अन्य कुछ नहीं करता । इसी प्रकार कर्म भी जो कुछ बेचारा जानता नहीं उसका उदय पाकर जीव संकल्प विकल्प हलन चलन हो रहा है तो भी कर्म में जीव का हलचल व्याप्य नहीं है । तो जब एक दूसरे में समाया ही नहीं, दोनों में अत्यंत भेद है, तो कर्ता कर्म की बात तो रही नहीं ।

504―प्रज्ञानेत्र कर्तृ कर्म का बुद्धि के विनाश होने पर संकटों का उद्यम―यह जोव अज्ञान से ही कर्ता कर्म की बुद्धि कर रहा । सारा झगड़ा कर्तृत्व बुद्धि का है । देखो किसी पुरुष ने एक धर्मशाला बनवा दी या कोई अन्य चीज प्याऊ वगैरह लोगों के उपकार के लिए बनवा दी और जनता उसके सत्कार में कोई समारोह करे तो लोग व्याख्यान दे जायेंगे पर जिसने उपकार किया, जिसने वह चीज बनवाया उससे लोग अंत में कहें कि भैया अब आप भी कुछ कहो―तो उसके मुख से शब्द न निकल सकेंगे कि भैया हमने आप सब लोगों का दुःख दूर करने के लिए यह धर्मशाला या यह अमुक चीज बनवा दिया है । क्यों नहीं ऐसा बोलेगा? इसमें तो कर्तृत्व का भाव बसा है, अहंकार का भाव बसा है और वह अपराध है वह तो यही बोलेगा कि भैया आप सबका भाग्य था सो हमारे द्वारा यह काम हो गया । जहाँ कर्तृत्व का भाव होता है वहाँ उन शब्दों में अपराध समझा जाता । और अपराध कीं बात कोई जनता में बोल नहीं सकता । कोई चोरी कर आये, या कुशील कर आये तो क्या वह जनता के बीच कह सकता कि हमने ऐसा काम किया? नहीं कह सकता । जो अपराध की बात है वह जनसमूह में नहीं कही जा सकती । तो कोई यह नहीं कह पाता कि मैने यह काम किया वह तो यही कहेगा कि आप लोगों की कृपा से यह काम बन गया । तो यह मोटी वात भी इस बात को जाहिर करती कि किसी पर पदार्थ के साथ कर्तृत्व बुद्धि रखना अपराध हें । तो यह कर्तृत्व बुद्धि कब मिटती है? जब कि अंदर में ये विज्ञान की किरणें प्रकट होती है, जब अंत: निज सहज स्वभाव का बोध होता है । पदार्थ के संबंध में परिचय होता है । तो जैसे ही ज्ञान सही जगा―दो पदार्थो में दो जगह देखा तो यह हुआ ऐसा एक काठ को करौत से जैसे काट दिया उसके टुकड़े हो गए ऐसे ही जो अज्ञान में रह रहा था कर्ता कर्मभाव में सत्य ज्ञान में उसमें प्रज्ञा की करोंत डाल दी और उन दोनो का सत्त्व शान में अलग-अलग कर दिया कि इसका तो परस्पर में अत्यंताभाव है यह न इसे कर पाता न उसे कर पाता । निमित्तनैमित्तिक योग में घटना हो जाये, मगर एक द्रव्य दूसरे द्रव्यरूप परिणमता नहीं । इस जानन का फल हमें क्या लूटना चाहिए? इस मोह को ध्वस्त कर देना चाहिए । एक का दूसरा कुछ नहीं, मेरा दूसरा कुछ नहीं, मेरा मात्र यह मैं ज्ञानमात्र तत्त्व हूँ ऐसा अपने अंतस्तत्त्व को अंगीकार करें, स्वीकार करें इसी में ही तृप्त हों, इसी में ही अपने ज्ञान को डुबा दें बस कल्याण हो गया, मोक्ष मार्ग हो जायेगा और नियम से निकट काल में मुक्ति होगी ।


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