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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:समयसार कलश - कलश 53

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नोभौ परिणामत: खलु, परिणामो नोभयो: प्रजायेत ।

उभयोर्न परिणति: स्याद्यदनेकमनेकमेव सदा ।।53।।

524―अज्ञान आपत्ति व ज्ञान से निरापदता जानकर ज्ञान की दिशा में बढ़ने की उमंग का आवरण―जगत में रहने वाले जीवों को संकट है तो अज्ञान से संकट है । अज्ञान होने से मोह भाव होता है और जहाँ मोह है वहाँ-वह स्वयं दुःखरूप ही है । तो दुःख का कारण क्या? दुःख रूप क्या? यह मोह । मोह अज्ञान से रचा जाता है तो दुःख दूर कैसे होगा? ज्ञान से । अज्ञान से कष्ट है, ज्ञान से शांति है । तो वह अज्ञान क्या जिससे कष्ट होता है, और वह ज्ञान क्या जिससे शांति होती है, इसका निर्णय करें । अज्ञान―जैसा पदार्थ है, जैसी मैं हूँ, जैसे सब कोई है वैसा न जानकर विपरीत जानना, इसे कहते हैं अज्ञान और जैसा पदार्थ है -वैसा ही ज्ञान करना इसे कहते हैं ज्ञान ! तो पदार्थ कैसा है, सर्व पदार्थ अपनी-अपनी सत्ता लिए हुए हैं । कोई भी पदार्थ किसी दूसरे पदार्थ की दया पर सत् (Existante) नहीं । स्वयं अपने ही वजूद पर पदार्थ की सत्ता है, यह सभी पदार्थों की बात है । परमाणु-परमाणु सब अपनी-अपनी स्वतंत्र सत्ता रखते हैं । यह तो अनुभव में भी बात उतरती है । जो बात सही है उसके जानने के लिए सब कोई तैयार रहता है । मैं सच जानूं, झूठ जानने का कोई प्रोग्राम नहीं बनाता । क्या कोई ऐसा सोचता है कि जरा मैं झूठ जानूं, मुझे झूठ जानने का काम पड़ा है करने को? चाहे झूठ काम करले, जानता हुआ भी करके, मगर जानने के लिए कोई इस तरह तैयार नहीं होता कि मैं झूठ जानूं । हर एक कोई सच जानने के लिए ही उमंग रखता है हर परिस्थिति में, और सच जानने का जो आनंद है वह आनंद किसी भी परप्रसंग में नहीं हे । जैसे किसी बालक से कोई गणित का सवाल पूछ दिया―बोलो बच्चे 168=कितने होते हैं? तो जब तक उसे याद नहीं होता, सही उत्तर नहीं बनता तब तक की सकल देख लो, कितना व्यग्र, कैसी फिकर में, कैसा चिंतन चल रहा, और जिस काल में उसको उत्तर आ गया 1688=128, तो उस उत्तर के आते ही उस बच्चे के दाँत कैसा मोती की तरह चमकने लगते हैं । उसके कैसे ओंठ, कैसी हँसी, कैसी मुस्कान, उसके चेहरे पर, रोम-रोम पर देखो हर्ष छाया है । भला बतलावो इस तरह का हर्ष, इस तरह का आनंद तो कोई लड्डू पेड़ा खिलावे तो भी नहीं आ सकता । ज्ञान का आनंद अलौकिक है, अद्भुत है तो सच्चा ज्ञान करने के लिए सभी लोग उमंग रखा करते हैं ।

525―ज्ञानानंदधाम अंतस्तत्त्व में उपयोग को रमाने में वास्तविक बुद्धिमानी―तो यहाँ यही बात कही जा रही है कि सच-सच बात जान लो याने लोग अपना दिल खुश करने के लिए क्लब खोलते हैं, कैसे-कैसे क्लब, किसमें क्या-क्या खेल, क्या-क्या ढंग, किसलिए खेलते कि मन खुश हो जाये, लेकिन मन खुश होगा तो यहाँ होगा, ज्ञान में होगा, बाहर में मन खुश नहीं हो सकता, वह सब अंधेरा है, वह सब विडंबना है । जो सुगम है, जिसमें निर्धन के लिए असुविधा नहीं, निर्धन सोचे कि मेरे पास पैसा नहीं, मैं कैसे धर्म कमाऊँ, मैं कैसे आत्मा का ध्यान बना लूँ, तो उसको कोई सुविधा नहीं, न धनी को असुविधा, न राजा को, न रंक को, और यह एक ऐसा क्लब है इस आत्मा का कि जिसके अध्यात्म तथ्यों का पता पड़ जाये तो सदा के लिए शांति रहती है, आनंद रहता है, उस धाम का लाभ उठावें, मगर जब मोह का उदय है, जब पाप का उदय है और मानो बड़े बन गए पूर्व पुण्य के प्रसाद से तो वहाँ धर्म की सुध तो रहती नहीं, बाहरी-बाहरी बातों का कितना ही अच्छा ढंग बन गया हो, मन बहलाने के लिए बहुत-बहुत बातें करेंगे मगर सब कुछ करने पर भी शांत नहीं हो पाते । शांति है ही नहीं वहाँ, शांति तो एक अपने अंतस्तत्त्व में है, यही तो आनंदनिधान है, तो स्वभाव का परिचय हो, ज्ञान हो तो बस यह ही तो है परमात्मा से मिलन ।

526―एक के परिणाम का उसी एक में व्याप्यव्यापक भाव होने से स्वयं का स्वयं में ही कर्तृत्व―हाँ ज्ञान और अज्ञान का प्रभाव देखिये―जब वस्तु समग्र स्वतंत्र-स्वतंत्र सत्ता रख रहे हैं, जिस कारण एक पदार्थ दूसरे पदार्थ रूप नहीं बन पाता, दो पदार्थ मिलकर कोई एक काम नहीं किया करते, एक पदार्थ कहीं दी का काम नहीं किया करता, एक पदार्थ अपने काम की परवाह न रखकर मात्र दूसरे का काम कर दे ऐसा भी नहीं है, प्रत्येक पदार्थ अपना-अपना ही परिणाम, परिणमन, बनाव किया करता है, जब यह वास्तविक बात है तो इसके विपरीत बात चित्त में लाना सो कष्ट है अन्य विपरीत बात चित्त में लाना सो कष्ट है और विपरीत बुद्धि से समग्र वस्तुओं का निरखना सो अशांति का स्थान है । तो यहाँ यह बताया जा रहा है कि प्रत्येक पदार्थ में अपने आपके अकेले से ही उसका सारा जोड़ तोड़ है, अपने में परिणमा, नया परिणाम बनाया, पुराना परिणाम विलीन कर दिया, वह वही का वही रहा, भले ही कोई विकार भाव आता है तो वहाँ पर पदार्थ निमित्त है, मगर वह पर में अकिंचित्कर है, वह अपनी कोई परिणति इस उपादान में डालता नहीं है, यह केवल अपने आपमें आप ही विराज रहा हें, इसको एक दृष्टांत द्वारा परखिये, मिट्टी का घड़ा बनाया, सब जानते हैं, कुम्हार बनाता है, मिट्टी का बनाता है, पर वहाँ यह बात देखो कि उस घड़े में व्यापक कौन है याने घड़ा रूप मिट्टी है या कुम्हार है? घड़ा बन गया तो अब वही मिट्टी है या कुम्हार है? मिट्टी है, तो बड़े का मिट्टी में व्याप्य व्यापक भाव है मिट्टी कलश मय है, मिट्टी घड़े रूप में है, इस कारण निश्चय से तो यह कहना चाहिए कि मिट्टी के द्वारा घड़ा किया गया, रचा गया, मिट्टी के द्वारा रचा गया है वह घड़ा कुम्हार के द्वारा रचा गया नहीं हैं निश्चय से, क्योंकि व्याप्य व्यापक भाव नहीं है घड़े का कुम्हार में । निमित्त का खंडन तो नहीं किया जा सकता, वह निमित्त ज्ञान तो है, मगर कुम्हार हो स्वयं घड़ा रूप बन गया ऐसी बात नहीं है, तो निश्चय से तो जो जिस रूप बने वह उसका कर्ता कहा जाता है, व्यवहार से उस कार्य में जो निमित्त हो वह कर्ता कहा जाता, तो निश्चय से चूँकि मिट्टी के साथ ही कलश में व्याप्य व्यापक भाव है इसलिए मिट्टी के द्वारा ही कलश किया गया है, ऐसा निश्चय समझें ।

527―निश्चयत: स्वयं का स्वयं में भोक्तृत्व―अब भोगने की बात देखो, भोगना मायने अनुभवना । अनुभवना मायने होते को अनुभवना । तो उस बड़े का अनुभव कौन कर रहा निश्चय से? मायने घड़े में रंग बदल रहा, कोई और परिणमन चल रहा तो इसका अनुभव वाला कौन वही मिट्टी है । निश्चय से कह रहे । व्यवहार से तो उस घड़े को कुम्हार ने बेचा और उन पैसों से रोटी खायगा तो कुम्हार तो कहेगा कि हम घड़े को भोग रहे हैं, या घड़ा लेकर कोई पानी मरता है, ठंडा पानी पीता है तो बह कहता है कि हम घड़े को भोग रहे हैं, पर यह कथन व्यवहार से है, 6 द्रव्यों का जुदा-जुदापन बताता है निश्चय । तो एक पदार्थ में एक की ही बात देखना चाहिये―उस कलश को, घड़े को किसने भोगा ? मिट्टी ने । तो निश्चय से वह घड़ा मिट्टी के द्वारा किया गया, मिट्टी के द्वारा भोगा गया ।

528―निश्चय और व्यवहार दोनों दृष्टियों से कर्तृत्व व भोक्तृत्व का विचार―अब बाह्य संबंध देखो, अभी तो एक बात कही थी, अब बाहर में व्याप्य व्यापक भाव देखो तो हुआ क्या? पहले करने की बात देखो । जब वह घड़ा बनाया गया तो घड़ा जैसे उत्पन्न हुआ उसके अनुकूल कुम्हार ने व्यापार किया था, सब जानते हैं, घड़ा लंबा मोटा जैसा -कड़ा बनाना है उस तरह से कुम्हार ने अपना हाथ चलाया, ऊपर हाथ चलाया । तो घड़ा कैसे उत्पन्न होता उसके अनुकूल कुम्हार ने व्यापार किया ना, तो कोई संबंध बना कि नहीं? वना वह बाह्य का संबंध, भीतर का नहीं बना । तो इस बाह्य व्याप्य व्यापक संबंध को देखा जाये तो कहा जायेगा कि कुम्हार के द्वारा घड़ा बनाया गया और यह ही बात भोगने की कही जायेगी । बेचा, उस दाम से खाया तो कहते हैं कि कुम्हार ने घड़ा भोगा या जो ले गया उसने ठंडा पानी पिया तो कहता है कि मैंने बड़ा भोगा मगर घड़े में जो रूप, रंग वगैरह परिणमन हो रहा उसे भोगने वाली मिट्टी ही है, तो जैसे यहाँ दो प्रकार के कथन हैं―एक निश्चयदृष्टि से और एक है व्यवहारदृष्टि से । ऐसे ही आत्मा में निरखिये―आत्मा ने क्या किया? अपना आत्मा तो अपने परिणाम को करता है । और, भोगा किसे? अपने ही परिणाम को । भले ही कर्म के उदय में एक ऐसी ही छाया हुई कि उसमें ज्ञानरस ऐसा भीगा कि वह रागद्वेष करने लगा, मगर वहाँ भी आत्मा ने अपने परिणाम को ही किया । पर व्यवहार से यों कहा जायेगा कि कर्म का उदय होने पर रागद्वेष को कर्म ने किया, यों कहा जायेगा, और दूसरी ओर देखो―कर्म ने क्या किया? कर्म ने ज्ञानावरण आदिक 8 प्रकार के कर्मों की प्रकृति बना ली, यह किया पुद्गल कर्म ने, क्योंकि अंतर में व्याप्य-व्यापक संबंध कर्म का कर्म के साथ है, पर व्यवहार से चूंकि रागद्वेष का निमित्त पाकर कर्म बंधे तो कहा जाता है कि आत्मा ने किया, पर वस्तुत: कर्म की बात कर्म ने की और उस कर्म में अनुभाग फूटा तो जो कुछ बात बनी निश्चय से कर्म में ही बनी, मगर जीव ने रागद्वेष किया और उसे कहें कि कर्म ने भोगा सो बात नहीं । प्रत्येक द्रव्य अपने आप ही करने वाला, भोगने वाला है ।

529―वस्तुतथ्य को उपयोग में प्रयुक्त करने का लाभ―दखो अपने भीतर में चित्त में तथ्य उतारोगे तो बात बनेगी और न घटित करोगे तो यह संसार बंधन जैसे चल रहा यह बना रहेगा । कुछ तो ध्यान करो केवल उस ज्ञान की ही बात कही जा रही है । ज्ञान से अपने आपमें सच्ची समझ बना लीजिए । सच्ची समझ बनाने में कन्जूसी क्या? सच्ची समझ बनाने में कौन असुविधा है? बात सही हो तो मान लो और न सही हो तो मत मानो । खूब समझलो, जोव सब जुदे-जुदे हैं या नहीं? जीव सब अपने आपके ही ज्ञान को करते भोगते हैं या अन्य का भी कुछ करते हैं? होता स्वयं जगत परिणाम, मैं जग का करता क्या काम? ये जगत में जितने पदार्थ हैं उन सबका परिणमन स्वयमेव चलता रहता है । उनमें मैं आत्मा कुछ नहीं करता । इस तरह से एक-एक अणु को अगर देखते हैं, इस तरह से प्रत्येक जीव का जानना प्रारंभ करे यह जीव तो उसे ऐसा ज्ञान प्रकाश मिलेगा कि जिस ज्ञान प्रकाश में यह सदा के लिए संकटमुक्त हो जायेगा । यह बात एकांत में लो, गुप्त होकर करो । बाहरी राग सता रहा, चलो वह भी आज ललक रहा । जरा भीतर डुबकी लगाकर परख लो कि मैं आत्मा समग्र जीव अजीवों से अत्यंत जुदा हूँ कि नहीं और मेरा भविष्य मेरी ही करनी पर निर्भर है कि नहीं? यहाँ कोई कितना ही प्रेमी हो कोई भी मित्र कुटुंब, मगर वस्तु स्वरूप की सीमा को कोई तोड़ नहीं सकता । यहाँ कोई किसी का मददगार नहीं । त्रिकाल भी किसी के द्वारा किसी दूसरे का कोई काम नहीं किया जा सकता, यह बात निरखना है कि अपने आपकी दया की बात होगी । कोई बाहर सहारा नहीं, एक अपना भीतरी ज्ञानप्रकाश यह ही मददगार है, दूसरा कोई मददगार नहीं ।

530―दो का, अनेक का मिलकर एक परिणमन करने की अशक्यता―इस छंद में बतला रहे हैं कि दो द्रव्य मिलकर परिणमन नहीं करते, याने जैसे कहते हैं ना कि यह काम चार जनों ने मिलकर कर लिया, सो भले हो कहें, पर अनेक के द्वारा एक काम किया ही नहीं जा सकता । आप कहेंगे वाह एक मकान बनाया जाता, 8-10 मजदूर काम करते तो सब मिलकर एक कामकर रहे ना ।अरे वे सब मिलकर एक काम नहीं कर रहे । वह मकान कोई एक काम नहीं है । एक पदार्थ में जो काम हो उसे एक काम कहा जाता हे । एक काम की भी परिभाषा समझो । एक वस्तु में जो परिणमन होता उसे एक काम कहा जाता हे । अच्छा मोटे रूप में देखो तो जो मजदूर ईंटें ला रहा, बस ईंटें जाने का ही काम कर रहा, दूसरा काम नहीं । जो राज गारा बिछा रहा वह वही काम कर रहा, दूसरा नहीं, वहाँ पर भी एक आदमी एक ही काम कर रहा, दूसरा नहीं । यह एक बड़ी मोटी बात कह रहे । वस्तुत: वहाँ भी उक्त काम नहीं किया जा रहा । वह मजदूर ईंट लाने का काम नहीं कर रहा । जरा मालिक की नजर बची और मैं यहाँ बैठ जाऊँ बीड़ी पीने का बहाना लेकर और आराम कर लूं, जो-जो भी वह भीतर सोच रहा मजदूर वह काम कर रहा, वह ईंट उठाने का काम नहीं कर रहा, ईंट उठाने की हालत में भी अपने अंदर इच्छा ज्ञान प्रयत्न जो कुछ बन रहा बस उसको कर रहा उसका निमित पाकर ईंटें उठ रहीं वह बात अलग है, मगर जो एक पदार्थ है उसका खुद का क्या काम है उसे निरखिये । दो पदार्थ मिलकर एक काम नहीं करते । दो पदार्थ मिलकर एक काम कर डालें ऐसी, कोई मिसाल न मिलेगी और जिसको बतावोगे इन दो ने मिलकर एक काम किया वहाँ उसे इन कामों में भ्रम हो गया, वास्तव में काम क्या किया? इस पर दृष्टि उसकी नहीं है ।

531―पदार्थ का एकत्व जाने बिना कर्तृकर्मत्व का यथार्थ परिचय कराने की अशक्यता―एक पदार्थ अपने में जो परिणमन करे उसको उस पदार्थ का काम कहते हैं । एक के काम में दूसरा नहीं हो सकता । सुनने में आपको ऐसा लग रहा होगा कि व्यवहार में तो ये सब बातें कही जाती हैं । दूसरों को आर्डर दिया जाता है, सब काम चल रहे हैं, पर यहाँ कही जा रही है वस्तुस्वरूप की बात । वस्तु में खुद के निज में क्या बात पड़ी है उसे बताया जा रहा है । प्रथम तो देखो भूल कि मनुष्य क्या एक चीज है? मनुष्य को एक पदार्थ माने तो फिर इस मनुष्य ने यह काम किया, इसका उत्तर ही गलत है । इस एक ने यह काम किया यह सही उत्तर नहीं है । मनुष्य एक पदार्थ नहीं है । तब फिर मनुष्य कितना पदार्थ है । मनुष्य के मायने क्या समझते? यदि यह समझते कि जैसे हम आप बैठे है इतने बड़े वजन रंग रूप के, जो कुछ सामने है क्या यह एक पदार्थ है? यह एक पदार्थ नहीं । यह तो अनंत परमाणुवों का पिंड है जिनको मिलाकर यह शरीर बना । तो अनंत पदार्थ तो ये ही हो गए, और उसमें कर्म के भो अनंत परमाणु हैं, तो अनंत पदार्थ वे हो गए और फिर इसके खून में जो रक्ताणु हैं, जिन्हें डाक्टर लोग बताते वे भी बसे हैं, जिनके बिना जिंदगी नहीं बताते, और एक स्वयं जीव है । जो कि सब कुछ सोचता है, तो अब बतलावो यह जो पिंडोला दिख रहा यह क्या एक चीज है? यह तो अनंत पुद्गल परमाणुवों का पिंड है । जब अनंत पदार्थ हुए तो उन अनंत में से एक-एक को देखकर काम बताओ तब तो सही उत्तर आयेगा कि एक का काम एक ही कर सकता । एक पदार्थ दो को याने अनेक को नहीं कर सकता ।

532―पर की क्रिया निज की क्रिया अव्यतिरिक्त न होने के कारण परकर्तृत्व की असंभवता तथा क्रिया व कर्ता में अव्यतिरिक्तता होने से स्वयं का स्वयं में ही कर्तृत्व की संभावना―दो मिलकर एक काम नहीं कर सकते, यह वस्तु स्वरूप की ओर से निर्णय करके देखिये-क्यों नहीं कर सकता? सो सुनो । जो कुछ क्रिया है उस क्रिया के द्वारा ही तो सब कुछ किया जाता । लिख दिया तो लेखन क्रिया से ही तो लिखता गया । कुछ क्रिया होती है ना हर एक में । प्रत्येक पदार्थ की क्रिया, सब कुछ क्रिया जो है, वह है परिणामरूप परिणमनरूप, जो भा दशा है, दशारूप, तो वह क्रिया, वह परिणाम परिणामी से भिन्न नहीं हो सकता, याने क्रिया क्रियावान से जुदी चीज नहीं है । एक मोटा दृष्टांत लो―अंगुली ने अंगुली में अपना खूब हिलाव किया तो यह हिलाव, यह अंगुली की क्रिया क्या अंगुली से जुदी है? जुदी नहीं, अंगुली जैसी है, तो जितनी भी क्रिया है, जितना भी परिणमन है वह सब उस पदार्थ में ही हुआ करता है । उस ही में तन्मय है, उस पदार्थ से जुदा नहीं है । जैसे कहते हैं कि आपका आना अच्छा हुआ । अच्छा थोड़ी देर जरा आप तो रहे जावो घर में और आना यहाँ भेज दो, आप खुद क्यों कष्ट करते ? आप घर में रहो और अपना यहाँ आना भेज दो । अरे वह आना आपका आपसे अभिन्न है, आपको छोड़ आने वाली किया यह कोई जुदी चीज नहीं है । तो कितनी भी क्रियायें होती हैं वे चूंकि परिणामरूप हैं इसलिए परिणाम वाले पदार्थ से भिन्न नहीं होती । और, क्रिया भी परिणामी से भिन्न नहीं है, परिणामी भी क्रिया से भिन्न नहीं है । जैसे―अँगुली का टेढ़ापन अंगुली से जुदा नहीं, अंगुली उस टेढ़ेपन से अलग नहीं, ऐसे ही जितनी मो क्रियायें हैं वे सब क्रियावान में मिलीजुली हैं । इससे यह सिद्ध हुआ कि क्रिया और कर्ता एक ही रूप हैं, भिन्न-भिन्न नहीं है । हम क्या कर पायेंगे, हम दूसरा कुछ न कर पायेंगे । तो क्रिया और कर्ता अभिन्न हैं, यह है वास्तविक निर्णय ।

533―क्रियाओं की भिन्नता से पदार्थों की भिन्न-भिन्न सत्ता का परिचय―अब देख लो, जैसे मैं अपने परिणामों में तन्मय होता हूँ उस तरह अगर पुद्गल कर्म को करने लगूं या पुद्गल कर्म को भोगने लग? तो क्या अर्थ वना कि उसकी क्रियायें मेरे में आ गई । मुझमें भी काम कर रहीं, कर्म में भी काम कर रहीं, तो अब हम कैसे जानें कि ये दो पदार्थ हैं? फिर तो दो रहे नहीं । यहाँ यह कैसे जान पाते कि यहाँ दो आदमी बैठे हैं? हम इसी तरह तो जानते कि एक आदमी के हाथ पैर क्रिया बोलचाल उसका उसमें है, उसने अपनी क्रिया से दूसरे का हाथ नहीं चलाया । यह जब हमारी नजर में है तब ही तो हम कहते हैं कि ये दो आदमी हैं । अगर एक आदमी अपनी क्रिया से अपना भी काम करे और अपनी ही क्रिया से दूसरे का भी काम कर दे तो यह कैसे पता पड़ेगा कि ये दो पुरुष हैं? चूंकि क्रिया न्यारी-न्यारी है और एक अपनी क्रिया दूसरे में नहीं कर पाता है तब हम समझते हैं कि ये दो आदमी हैं, ऐसे ही जीव और कर्म ये दो न्यारे-न्यारे पदार्थ हैं यह समझ कब बनेगी? जब यह ध्यान में जमेगा कि जीव अपनी ही क्रिया से अपना काम कर पाता है, जीव अपनी क्रिया से पुद्गल कर्म का, देह का, किसी का काम नहीं करता । तब समझ में आयेगा कि दो चीजें हैं ।

534―दृष्टांतपूर्वक जीव व कर्म के परस्पर अकर्तृत्व का ख्याति―देखिये विषय बड़ा भीतरी है, जटिल है, जटिल भी कुछ नहीं, जब चित्त ही नहीं है आत्मा की बात समझने में तो उनको जटिल हो सकता है, कोई कहे वाह जब कोई पुरुष नहाता है तो देखो वह शरीर का कितना काम करता है? साबुन भी लगाता तेल भी लगाता, सारा शरीर पोंछता, कंघी करता, यों कितने ही काम कर रहा जीव, पर आप कहते कि शरीर का काम जीव नहीं करता । उत्तर जीव का कोई काम शरीर नहीं कर सकता और शरीर का कोई काम जीव नहीं कर सकता, कर्म जीव का काम नहीं करते और जीव कर्म का काम नहीं करता, कैसे सो सुनो―देखो जब कोई रेलगाड़ी या मोटर गाड़ी का इंजन ड्राइवर चलाता है तो वहाँ वह क्या करता है? वह तो केवल कोई पुर्जा इधर का उधर कर देता । वास्तव में तो वह ड्राइवर तो यह भी काम नहीं करता, वह तो ज्ञान करता व अंदर उस तरह की इच्छा बनाता, उसकी इच्छा के कारण उसके आत्मप्रदेशों में परिस्पंद हुआ बस इतना काम उस ड्राइवर ने किया, इससे बाहर ड्राइवर का कुछ काम नहीं है, फिर काम हो कैसे गया? तो उसका निमित्त पाकर इस शरीर में हवा चली, जिसे बोलते हैं वात वायु और जिस ढंग से हवा चली, किस ढंग से चली? जिस ढंग से उसकी इच्छा और प्रयत्न हुआ, और उसका संयोग पाकर वह पुर्जा भीतर चल गया, उसका संयोग पाकर दूसरे पुर्जे ने हरकत की, उसका संयोग पाकर यहाँ कोई डंडा चल उठा, उसका संयोग पाकर चक्र चल दिया, लो दिख तो रहा है ऐसा कि देखो ड्राइवर ने गाड़ी चला दी मगर ड्राइवर अगर जीव को मानते तो जीव ने अपने प्रदेशों में अपना काम किया, इससे बाहर कुछ भी काम नहीं किया, बाँ की काम जो कर रहे हैं वे निमित्तनैमित्तिक योगवश स्वयं-स्वयं के उपादान में । तो यह परख करलो कि एक पदार्थ कितना होता है? उस परख से यह समझ में आयेगा कि एक पदार्थ क्या काम कर पाता है? दो पदार्थ मिलकर भी एक काम नहीं करते, अगर एक बोरा को चार आदमी मिलकर उठायें तो वहाँ लगता कि चारों ने काम किया, मगर नहीं । प्रत्येक ने अपने में ज्ञान इच्छा की, अपने में अपने बल का प्रयोग किया, इससे अधिक कुछ नहीं किया, यह ही काम किया भीतर में, बाहर कुछ नहीं किया, यह ही सबने किया, सबने अपना-अपना काम अपने में किया, उसका निमित्त पाकर वह बोरा उठ गया, यहाँ का वहाँ पहुंच गया, पर एक काम को दो आदमी मिलकर नहीं करते, प्रत्येक व्यक्ति केवल एक ही काम कर पाता और इस ही बल पर फिर यह दिखता है कि प्रत्येक अणु, प्रत्येक जीव एक दूसरे से अत्यंत भिन्न है, जब यह भिन्नता ध्यान में आती हैं तो वह ज्ञान जगता है जिससे मोह दूर होता है, मोह मिटा वहाँ शांति, जहाँ मोह है वहाँ अशांति अज्ञान से मोह होता इसलिए अज्ञान को मिटाना, ज्ञान को प्रकट करना धर्म पुरुषार्थ में प्रारंभिक काम यही कहलाता है ।


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