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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:समयसार कलश - कलश 67

From जैनकोष



ज्ञानिनो ज्ञाननिर्वृत्ताः सर्वेभावा भवंति हि ।

सर्वेप्यज्ञाननिर्वृत्ताः भवंत्यज्ञानिनस्तु ते ।।67।।

642―ज्ञानी के ज्ञानमय भाव व अज्ञानी के अज्ञानमय भाव होने के कारण का विवरण―ज्ञानी के जितने भी भाव होते हैं वे सब भाव ज्ञान द्वारा रचे हुए होते हैं और अज्ञानी के जितने भी भाव बनते हैं वे सब अज्ञान द्वारा रचे हुए बनते हैं । इससे पहले के कलश में यह प्रश्न किया गया था कि क्या कारण है कि ज्ञानी के ज्ञानमय भाव ही होते हैं और अज्ञानी के अज्ञानमय ही भाव होते हैं ऐसा होने का क्या कारण है? तो वह कारण यहाँ स्पष्ट किया जा रहा कि ज्ञानी के जितने भी भाव होंगे वे ज्ञानमय होंगे और अज्ञानी के जितने भी भाव बनेंगे वे अज्ञानमय बनेंगे । ज्ञानमय भाव से ज्ञानमय ही बनता है और अज्ञानमय भाव से अज्ञानमय ही बनता है, मिट्टी से मिट्टी के ही घड़े बनेंगे, कहीं लोहे या सोने के तो न बन जायेंगे, लोहे से जो भी बनाया जायेगा वह लोहामय ही तो बनेगा, अन्य रूप न बनेगा, जैसा उपादान है उस कारण की तरह कार्य देखा जाता है, गेहूं बोने से गेहूं ही पैदा होंगे, चने न पैदा हो जायेंगे, या चने बोने से चने ही पैदा होंगे, गेहूं न पैदा हो जायेंगे । तो जो जीव अज्ञानी है अपने ज्ञानस्वरूप का जिन्होंने परिचय नहीं किया और जो कर्मों का आक्रमण है, कर्मानुभाग का प्रतिफलन है उसमें ही आया अनुभव किया उनकी जो अंतर्बाह्य चेष्टायें होती वे तो अज्ञानभाव के अनुरूप होती हैं, और, देखो कर्मानुभाग को जान नहीं पाता अज्ञानी कि यह कर्मरस है और कर्मरस रूप अपने को अनुभव होता, बस यह ही तो अज्ञान है, जैसे अंधेरे में मनुष्य चलता कि नहीं, बैठता कि नहीं, ऐसे ही जब कर्म का अनुभाग प्रतिफलन है तो यहाँ अंधेरा ही है पूरा, मगर ज्ञानविकल्प बन ही रहा है, जैसा कर्मानुभाग है उस रूप अपने को मानता और अपनी चेष्टा कर रहा है, ज्ञानी ने जाना कि मैं केवल ज्ञानमात्र हूँ, यह कर्मानुभाग, ये कर्म के विपाक इनसे मैं अत्यंत जुदा हूँ, स्वयं सही एक चैतन्य मात्र हूँ, ऐसा जिसने भेदविज्ञान किया, भीतर में जिसकी ऐसी समझ बन गई बताओ वह कितना बड़ा है? एक राजा बराबर होगा क्या? नारायण बराबर है क्या? चक्रवर्ती बराबर है क्या? अरे यह तो ज्ञानियों के बराबर है । ज्ञानानंद के समक्ष ये तो सब छोटी बात हैं, तीनों लोक की विभूति भी सामने आ जाये तो वह आत्मा को क्या आम देती?

643―दुर्लभ मानव जीवन का सदुपयोग करने का संदेश―देखिये बड़ा दुर्लभ यह मनुष्य जन्म मिला, जिसको बड़े-बड़े देवेंद्र भी तरसते हैं, जिसके बिना संयम की सिद्धि नहीं बनती, ऐसा दुर्लभ मानव जीवन मिला, और देखो इस अनंत काल में असंख्याते परिवर्तन के बाद कोई समय मिलता है कि यह जीव त्रस बने और उसकी भी अवधि ज्यादह से ज्यादह कुछ अधिक दो हजार सागर की है और उसमें भी मनुष्य होना कितना दुर्लभ, और मनुष्य बन गए, अब यहाँ मूढ़ता की, दुराग्रह किया, हठ रखा याने इंद्रिय और मन के विषयभूत साधनों में ही प्रीति रही तो यह नरजन्म पाना बिल्कुल बेकार है । क्या पाया? खाने पीने का सुख क्या पशुओं को नहीं है ? यदि आप कहें कि पशुओं को क्या सुख, वे तो रूखी सूखी घास खाते हैं, हम लोग तो वह रसगुल्ले खाते, तो भाई जो सुख आप लोग रसगुल्ले खाकर मानते वैसा सुख वे पशु हरी घास खाकर मानते । जितना हापड़ धूपड़ आप रसगुल्ले खाने में मचाते उतनी हापड़ धूपड़ वे पशु हरी घास खाकर मचाते । अब बताओ कौन सी कमी है पशुओं में इन मनुष्यों से, जो धर्महीन पुरुष हैं, उनकी अपेक्षा कौन सी कमी है पशुओं में जिससे मनुष्यों को पशुओं से बड़ा कहा जाये? मनुष्य जैसी नींद लेते वैसी नींद पशु भी लेते, बल्कि मनुष्यों को तो सोते हुए में भी शल्य बनी रहा करती है, पशुओं में वैसी शल्य नहीं होती जैसी कि मनुष्यों में । मनुष्यों को तो मारे शल्य के कभी-कभी रात भर नींद नहीं आती । उन्हें नींद आने के लिए डाक्टर से इलाज कराना पड़ता है, और पशुओं को देखो उन्हें कैसी प्राकृतिक मजे की नींद आती है, उनकी मुद्रा देखो, कैसे ढंग से सोते हैं, कौन सी बात है ऐसी कि मनुष्य पशुओं से बड़ा कहलाये? आप कहेंगे कि वे तो जानवर कहलाते और हम लोग मनुष्य कहलाते, अच्छा तो इस नाम की अपेक्षा ही देख लो । जानवर नाम अच्छा है कि मनुष्य । तो मनुष्य उसे कहते कि जिसके मन हो और जानवर उसे कहतेजो जानने में श्रेष्ठ हो, ज्ञान में श्रेष्ठ हो, तो इस शब्द की अपेक्षा से भी पशु बड़े कहलाये । देखो, पशु का अर्थ भी पश्यति इति पशु: दृष्टा को पशु कहते । और बात बताओ―किस बात से यह मनुष्य इन पशुओं से ऊँचा हैं, काम विषय की बात ले लो । जैसा कल्पित मौज ये मनुष्य मानते उससे कम मौज ये पशु नहीं मानते । विषयों के सेवन में जैसा उत्साह रखते वैसा पशु भी रखते, तो किसी बात में मनुष्य ऊँचा नहीं इन पशुओं से, हां सिर्फ एक बात में ऊँचा है । किसमें? धर्म में ।

644―धर्मपालन से ही मनुष्यों की श्रेष्ठता―अत: धर्मपालन करके मनुष्य जीवन का सदुपयोग करो । अगर मनुष्य में धर्म न रहे तो यह पशुओं भी हल्का रहा, ऊँचा नहीं । पशुओं का आहार अच्छा है, मनुष्यों का अच्छा नहीं । पशुओं का तो अगर पेट भर जाये तो उनके सामने कुछ भी बढ़िया चीज रख दी जाये तो वे उसे देखेंगे भी नहीं, उसको सूंघेंगे भी नहीं और मनुष्य का पेट भर जाये और उसके सामने स कोई चाट वाला निकल जाये तो कुछ न कुछ चटपटी चाट खाने की जगह निकल ही आती है । मनुष्य को खाने के विषय में इतना धीर नहीं हो पाता जितना कि पशुओं को । देखिये यह सब बात धर्महीन मनुष्यों की तुलना में कह रहे । नींद में देखो मनुष्यों को जब नींद आती है तो उस पर कोई पानी के छींट भी डाले, उसको हाथ से भी झकझोरे तो भी उसकी नींद झट नहीं खुलती और पशुओं को ऐसी नींद आती कि जरा सी आहट आयी कि झट आखें खुल जाती । तो नींद में यों समझो कि यह मनुष्य है राक्षस जैसा । ऐसा लोग कहते भी हैं । तो जैसी खराब नींद मनुष्य की है वैसी पशुओं की नहीं है । अब भय डर की बात देखें । जितना अधिक भय मनुष्यों को है उतना पशुओं को नहीं । अगर कोई पशुओं के सामने लाठी कर दे तब तो वे थोड़ा सा भय मानते, मगर ये मनुष्य गद्दा तक्कों में पड़े-पड़े भी भय किया करते । खूब आराम से अपने रक्षित कमरे में कोमल गद्दों में पड़े हैं, मित्र लोग भी पास में बैठे हैं, पान बीड़ी सिगरेट खापी रहे हैं, उस समय आपस में वार्ता करते हुए बड़ा मौज मान रहे हैं । कष्ट की बात उस समय कोई नहीं मगर उस समय भी अंदर ही अंदर यह भय बनाये रहते कि कहीं अचानक कोई घटना न घट जाये, कहीं सरकार कोई ऐसे कानून न बना दे कि हमारा सब कुछ छिन जाये आदि, यों निरंतर इन मनुष्यों को भय बना रहता । और, पशुओं को क्या शल्य? क्या भय? और बात देखो-काम भोग मैथुन प्रसंग में ये मनुष्य तो साल के 12 महीना रहा करते हैं, इनके बच्चे सभी महीनों में होते हैं पर इन पशुओं के तो साल के कुछ महीने नियत होते हैं । यह तो उसमें भी पशुओं से गया बीता हो गया । तो कौनसी बड़ी बात है कि जिससे यह मनुष्य पशुओं से अच्छा कहलाये? बस एक धर्म ही ऐसी ऊँची चीज है कि जिसकी वजह से यह मनुष्य पशुओं से ऊँचा कहलाता ।

645―धर्मपालन के उच्च अधिकारी मानव की महनीयता―इस धर्म की अपेक्षा से ही तो यह मनुष्यभव इन देवेंद्रों से भी महान है । अनेक लोग तो मेघ न बरसने पर इंद्रदेवता की उपासना करते हैं, उनके नाम यज्ञादि कार्य करते हैं, पर वे यह नहीं समझते मनुष्यभव इतना श्रेष्ठ है कि इसे देवेंद्र भी तरसते । मनुष्यभव में ही संयम धारण करके मुक्ति की प्राप्ति की जा सकती । कितना उत्कृष्ट है यह मनुष्यभव, मगर इससे कोई लाभ नहीं लेते । अरे ! इतना ही विचार लो कि आज हम जिंदा हैं, ऐसा भी तो हो सकता था कि अब से 10-5 वर्ष पहले किसी ऐसी विपत्ति में फंसा था, रोग में घिरा था, वहीं मर गए होते तो आज का यह पाया हुआ समागम फिर मेरे लिए कुछ भी तो नथा, और मरे नहीं, जिंदा हैं तो यह समझो कि इन संसार की बातों के लिए नहीं जीवित हैं किंतु धर्मधारण के लिए ही जीवित हैं । तो किसी प्रकार ऐसा स्वच्छ उपयोग बनावें कि धर्म सुहाये, सत्संग सुहाये, ज्ञान सुहाये, आपका तन, मन, धन वचन सब कुछ धर्म के लिए, ज्ञान के लिए, सत्संग के लिए समर्पित हो, न्योछावर हो । इतना साहस जग जाये बाकी दुनिया में बाहर कुछ भी नहीं है । मेरे लिए सब बेकार है, एक ज्ञान का वातावरण ही मेरे लिए शरण है अन्य कुछ मेरे लिए शरण नहीं । देखो अंदर में धुन उत्पन्न हो जाये तो कितना भला है, मैं आत्मा सबसे निराले ज्ञानमात्र अपने अंतस्तत्त्व का परिचय पा लूँ । यदि यह अपने अंतस्तत्त्व का परिचय पा लेवे तो यही निर्णय पा लेगा कि सच्ची तृप्ति, वास्तविक संतोष, सही आनंद, निराकुलता, पवित्रता बस ज्ञान में ज्ञानस्वरूप ही रहे, इस स्थिति में है । इसका जिसने अनुभव पा लिया उसके लिए तीन लोक का वैभव क्या चीज? जीर्णतृणवत् ।

646―ज्ञान द्वारा ज्ञानतत्त्व की झलक होने पर लोकवैभव की उपेक्षा, मुक्ति की निकटता आदि की संभावना―मोहीजन, संसारीजन ऐसा सोचते हैं कि वैराग्य की बात कहना तो कुछ पद्धति है वक्तव्य कहने की, अरे ! सब कोई तो धन वैभव इज्जत पोजीशन पक्षपार्टी आदिक नहीं पाता, हमने तो अपनी कला से ये सब कुछ पाया है, ये कैसे जीर्णवत् हम समझें, ऐसा मोहीजन सोचते हैं, अज्ञानीजन क्या जाने वह रहस्य? ज्ञानी ही इस रहस्य को जान सकता है । जैसे जीर्ण तृण से कोई लाभ नहीं ऐसे ही तीन लोक के वैभव से इस आत्मा को कोई लाभ नहीं । अपने ज्ञानस्वरूप को निरखें, इस ही ज्ञानस्वरूप में तृप्त रहें यह ही मेरी धुन में रहे, अगर बोलना पड़े तो ऐसे ज्ञान की रूचि रखने वाले इसही ज्ञान की बात करने वाले इसही ज्ञान की उपासना का भाव रखनेवाले लोगों से बोल लिया । अन्य से बोलने से क्या प्रयोजन? चिंतन हो उसी का । तो इसही ज्ञानस्वभाव के अभ्यास से इसकी पवित्रता बढ़ती जायेगी, कर्म कलंक दूर हटते जायेंगे, और बस वह परमपद बहुत ही जल्दी मिल जायेगा । जिसने रास्ता पाया और रास्ते पर चलना शुरु किया उसको फिर इष्ट स्थान क्या दूर रहा? जैसे लोग कहते हैं न वायदा कहता है कि तू चल मैं आया । जैसे चौमासा तो दीवाली को खतम होता, अब नियम कर लिया दीवाली तक का एक जगह रुकने का तो दीवाली का दिन निकल जाने में कुछ देर लगती क्या? वायदे का दिन निकल जाने वाला ही तो है । वायदे के बाद फिर उस समय में कमी ही तो आती है । तो ऐसे ही अगर कोई मुक्ति का वायदा करले कि मुझे तो मुक्ति पाना है, ऐसी स्थिति पाना है तो वायदा कहता है―तू चल, मैं आया । तू, अपनी उस गल्ती से चल, उस ज्ञान के पथ से चल, उसी में रम, उसी की धुन रख, स्वप्न में भी तू अन्य पदार्थों का महत्त्व मत विचार । मोक्ष का वायदा बिल्कुल पक्का है कि तू चल इस रास्ते से, मैं अभी आया । कोई विलंब न लगेगा । “साभर दूर सिमरिया नीरी” ऐसी ही एक कहावत है, और वह किस घटना पर हुई? एक बार सिमरिया गांव के कुछ व्यापारी साभर गाँव में नमक खरीदने गए । फिर वहाँ से नमक खरीदकर अपने गाँव के लिए वापिस चले । कुछ ही दूर आये थे कि उनमें से एक व्यापारी पूँछ बैठा कि अभी अपना सिमरिया गाँव कितना दूर है? तो उनमें से एक मुखिया बोला―साभर दूर सिमरिया नीरो । याने अब साभर गाँव दूर हो गया और सिमरिया गांव पास आ गया है ? अरे ! कैसे यह बात कह रहे? अभी तो कोई मील दो मील ही आये हैं सामर से । अभी तो करीब 500 मील दूर है तो फिर वह मुखिया बोला देखो जिसकी ओर मुख हो गया वह तो निकट आ गया और जिसकी ओर पीठ हो गई वह दूर हो गया । तो ऐसा ही यहाँ समझिये कि जिस भव्य पुरुष का उपयोग आत्मा की ओर हुआ है, उपयोग मुख मोक्षमार्ग में चलते हुए मोक्ष की ओर हुआ है और पीठ संसार की ओर हो गई है उसके लिए संसार अत्यंत दूर हो गया और मुक्ति निकट हो गई । वैसे भी देखो जब चित्त में किसी वस्तु का ध्यान रहता है वह चाहे कितनी ही दूर हो पर वह उसके लिए अत्यंत निकट है । उसका जब उपयोग में वास है तो उपयोग में तो वह निकट ही हो गया है और उसकी ओर दृष्टि होने से वह निकट होता चला जा रहा है, व्यवहार भी तो ऐसा ही होता है अब वह निकट होता जा रहा है, तो जिस पुरुष ने मुक्ति का वायदा किया, मैं मोक्ष जाऊंगा तो वायदा करते ही वह अपने उद्देश्य में चल पड़ा । चलने की देर है बस मुक्ति निकट आती जा रही । इसको कहते हैं वायदे ने कहा―तू चल मैं आया ।

647―ज्ञानवृत्ति की ही शक्यता का परिचय होने पर संकटों का पलायन व प्रलयन―ज्ञानी पुरूष जिसने अपने अंत:स्वरूप का अनुभव किया मैं ज्ञानमात्र हूँ, ज्ञान के सिवाय अन्य कुछ नहीं है मेरा । आत्मा ज्ञानमात्र, मेरा सर्वस्व ज्ञानमात्र । इस समय में भी जो कुछ कर रहा हूँ वह सब ज्ञान का ही कार्य कर रहा हूँ, बाह्य वस्तु से तो मेरे जीव का संबंध नहीं । कितना विकट व्यामोह है इस जीव को कि है तो यह आनंद का धाम, शांति का निधान, कष्ट का जहाँ काम नहीं,लेकिन ऐसा आवरण छाया, ऐसी मोह मदिरा का पान किया कि इस जीव को अपनी कुछ सुध बुध न रही । बाहर में यह अपना उपयोग लगाता है । अगर बाहरी पदार्थों में उपयोग न लगाये और वहाँ से पीठ फेर ले और अपने रुप-झप की ओर लगे तो मुक्ति एकदम पास ही है, किंतु अज्ञानी जीव जो कुछ भी अपने अंत: में कर रहा वह सब अज्ञानभाव द्वारा रचित ही कार्य हो रहा । करना तो ज्ञान ही है ना? अब जो ज्ञान ज्ञानस्वरूप हो गया मायने विशुद्ध ज्ञान के परिचय वाला हो गया तो ऐसे ज्ञान से अब जो भी कार्य होंगे वे सब ज्ञानमय ही कार्य होंगे । और जिस पुरुष ने अपने ज्ञान में बाह्य भावों को ही बसाया, कर्मविपाक को ही स्व माना, अपने आपकी सुध छोड़ दी उसके अज्ञानभाव है, अज्ञान से रचा हुआ है । जो अज्ञान से रचा हुआ भाव है, वह संसार का ही कारण होता है, उस जीव को शांति नहीं प्राप्त होती । तो भाई बोध यह करना है अपने जीवन में कि अपने को अपने स्वरूप का परिचय हो जाये, मैं केवल ज्ञान ज्योति मात्र हूँ, ज्ञानातिरिक्त मेरा कुछ नहीं । ज्ञानस्वरूप का ज्ञानरूप में जब अपना अनुभव चलता है तो वहाँ कष्ट का कोई काम नहीं ।

648―ज्ञानी की चेष्टा स्व-पर हित के लिये एवं अज्ञानी की चेष्टा स्व-पर अहित के लिये―देखो, ज्ञानी की जितनी चेष्टायें होती हैं स्व-पर हित के लिए होती हैं, अज्ञानी की जितनी चेष्टायें होती हैं वे स्वपर अहित के लिए होती हैं । चाहे किसी का कोई कितना ही प्यारा मित्र हो, क्या करेगा वह मित्र कि उसे व्यसनों में लगायेगा, विषयों के उपभोग में लगायेगा । जैसे वह सिनेमा अच्छा है, चलो देखने चलें....यों मनचाहे विषयों में लगाने की प्रवृत्ति करेगा और विषयों का जो प्रसंग है वही अहित है । आतम के अहित विषय कषाय । उन विषय कषायों में जो लगाये वह कोई ज्ञानमय भाव तो नहीं है । अज्ञानीजन ज्ञान के रास्ते में कैसे उमंग दिला सकते हैं । उन्हें खुद ही पता नहीं कि संसार के संकटों से छूटने का मार्ग क्या है? जो इन बाहरी प्रसंगों से ही परिचित हैं, उन्हें इन बाहरी प्रसंगों का ही अनुभव है अनादि से । है नहीं अनुभव बाहरी प्रसंगों का किंतु जिस उपयोग में बाहर के प्रसंग बस रहे हैं उस उपयोग का जो स्वाद है वहाँ तो कल्पनायें कर रहा है यह जीव कि मुझे इन बाहरी पदार्थों से आनंद मिल रहा है । सो भाई इस संसार में सबसे बड़ा संकट है तो अज्ञान संकट है । जिस किसी भी प्रकार यह अज्ञान संकट मिटे तो यह जीव का सबसे बड़ा लाभ है । वह अज्ञान संकट कैसे मिटेगा? जब तक अपने आत्मा में स्व-पर का विवेक नहीं जगता तब तक यह संकट मिट नहीं सकता । स्व मैं क्या हूँ । मानते तो सब हैं कि मैं हूं, तो किस रूप में वह मैं माना जा रहा है इस पर भी तो ध्यान करो । जो ज्ञानज्योतिमात्र आत्मतत्त्व को न मानकर अन्य किसी रूप ही अपने को मानते―मैं ज्ञानी हूँ, विद्वान हूँ, जानकार हूँ―आदिक किसी भी अन्यरूप अपने को माने तो वह सब अज्ञानभाव है, और इस अज्ञानमयभाव से यह जीव कभी निराकुल नहीं हो सकता । तो अज्ञानभाव को छोड़ना है और ज्ञानभाव में आना है । इसीलिए तो निमित्तनैमित्तिकयोग और वस्तुस्वातंत्र्य का परिचय आवश्यक है ।

649―निमित्तनैमित्तिकयोग व वस्तुस्वातंत्र्य के परिचय से संकटों से छुटकारा पाने की सुगमता―जहाँ यह जाना कि मेरी अपने आप में बड़ी गड़बड़ी चल रही है कषायें जग रहीं, मलिनतायें बन रहीं यह सब कर्म विपाक है, मेरे स्वरूप की बात नहीं है । मैं तो सहज विशुद्ध चैतन्यमात्र हूँ । यह सब प्रकृति की लीला है और इस लीला में इसका उपयोग फंसता तो उसका विकल्प रूप से परिणमन होता । बस यह ही तो संसार है, यह ही रुलने की बात है । तो यह विज्ञान करना है कि ज्ञान का काम तो मात्र इतना है कि जानन रहे, प्रतिभास रहे, बाकी इष्ट अनिष्ट आदिक जो भी कल्पनायें चल रही हैं वे सब कर्मरस हैं । मैं तो सबसे निराला ज्ञानरस मात्र आनंदनिधान एक चैतन्यपिंड हूँ, ऐसी दृष्टि जगे, भेदविज्ञान बने तो कर्मरस ज्ञानरस को स्वीकार कर लेगा । जिसने ज्ञानरस को स्वीकार किया उसको मोह नहीं होता, क्षोभ नहीं होता । बाह्य प्रवृतियों को देखकर वह व्यग्र नहीं होता । बाहरी पदार्थों में जिसमें जो परिणमन होता हो, उनका द्रव्य, क्षेत्र, काल, भाव उनमें है । मेरा द्रव्य, क्षेत्र, काल, भाव मुझमें है, उनकी कोई चीज निकलकर मुझमें नहीं आ सकती और मेरी कोई चीज निकलकर उनमें नहीं जा सकती । यह वस्तु का स्वरूप है । किसी भी अन्य वस्तु का द्रव्य, क्षेत्र, काल, भाव उसका उसमें है, किसी अन्य में नहीं पहुंचता । जो यहाँ व्यवहार में कहते हैं कि इस पर मेरा असर आया तो इसका अर्थ यह है कि उस जीव ने मेरे बारे में उस तरह का विचार करके अपने में वैसा असर बना लिया है तो वह खुद उस ही वस्तु का असर है । जो वस्तु परिणम रही, जिस वस्तु को उपयोग में लेकर ऐसा असर बनाया जा रहा है उस वस्तु पर आरोप किया जाता है कि यह प्रभाव अमुक वस्तु का है । एक का दूसरे पर कभी कोई प्रभाव नहीं पड़ता । वस्तु स्वरूप को विचारो प्रत्येक पदार्थ अपने आप में उत्पाद-व्यय करते हुए निरंतर सतत् बने रहते हैं । सबकी ऐसी ही फैक्ट्री अपने आप में चल रही है । फिर एक पदार्थ का दूसरा क्या लगेगा । जब एक का दूसरा कुछ हैं नहीं तो फिर इतना आकर्षण, इतना अहंकार, इतना मोहांधकार यह सब क्यों किया जा रहा है? भाई इस कर्मरस से अलग होओ, निमित्तनैमित्तिक भाव का परिचय होने से कर्मरस से अलग होने में बड़ी मदद मिलती है । जब कर्मरस से अपना उपयोग अलग किया तब लगना कहाँ है? जरा वस्तुस्वरूप को ही देख लो । मैं अपने आप में अपने सत्त्व के कारण कैसा हूँ, उस शुद्ध अंतस्तत्त्व का परिचय करें, मैं ज्ञानमात्र हूँ, सहजज्ञानस्वरूप हूँ, इस ज्ञान प्रकाशमात्र अपने आपका अनुभव करें, मैं ज्ञानमयभाव हूँ । ज्ञानमयभाव का सानुभाव ज्ञान होने पर जो भी परिणमन होगा वह सब ज्ञान से रचा हुआ होगा, ज्ञानमय ही होगा । फिर इसके अंदर में कोई संकट नहीं आता । इस ही तत्त्व का अनुभव इस ही अंतस्तत्त्व का स्मरण नरक निगोद आदिक की घोर यातनाओं से बचा लेता है, उसे कभी कोई व्यग्रता नहीं आती, उसके संवर निर्जरा चलती है । तो भाई इस कर्मरस से भिन्न ज्ञानरस को स्वीकार करो यह मैं हूँ, बस इस ही के फल में समस्त संकटों का निवारण हो जायेगा ।


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