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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:समयसार कलश - कलश 89

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एकस्यभातो न तथा परस्य चिति द्वयोर्द्वाविति पक्षपातौ ।

यस्तत्त्ववेदी च्युतपक्षपातस्तस्यास्ति नित्यं खलु चिच्चिदेव ।।89।।

783―प्रतिभात अप्रतिभात के पक्षों से भी अतिक्रांत भव्य की मंगलरूपता―आत्मा की जानकारी चल रही है कि यह आत्मा कैसा है । बोले बिना गुजारा नहीं और बोलकर भी गुजारा नहीं, यह स्थिति इस प्रसंग में स्पष्ट दिख रही है । आत्मा को जाना कुछ समझ में आया प्रतिभास हुआ, ज्ञानरूप में जाना, वह ज्ञान में झलका, यह बात तो ठीक चल रही है मगर उसके बारे में जब कुछ बोलना शुरू किया जायेगा तो पक्ष बन जायेगा । यह व्यवहार का पक्ष है कि यह जीव प्रतिभात है प्रतिभास में आया हुआ है, तो निश्चय का पक्ष है कि प्रतिभात है―ऐसा नहीं है, ये दोनों ही एक विकल्प हैं एक चेतन के बारे में । इन दोनो नयपक्षों से जो अतिक्रांत हो तत्त्व वेदी जानता है उसकी दृष्टि में तो यह चेतन चेतन ही है याने आत्मा अनुभवगम्य है, शब्द गम्य नहीं, और अनुभव तब बनता है कि जब वह पूर्ण तत्त्व अखंड रूप से ज्ञान में आ रहा हो । ज्ञान में ज्ञान रूप समाया हो यह मैं ज्ञानमात्र हूँ, ज्ञानसिवाय मैं और कुछ नहीं हूँ । देखो यहाँ स्वानुभूति में ऐसे अच्छे अच्छे विकल्प भी बाधक बन रहे । आत्मा के बारे में सोचना कि यह प्रतिभास स्वरूप है, वेदन में आता है, यह दृश्य है, ज्ञेय है, सूक्ष्म है यह कथन एक आत्मा के स्वरूप का परिचय कराने वाला है, लेकिन यह भी एक नयपक्ष बन गया । जिसको स्वानुभूति के महल में पहुंचने की चाह है उसके लिए ये सारे विकल्प बाधक मालूम पड़ रहे हैं । तो एक ऊंचा धर्म पाने के लिए ऐसे सुंदर-सुंदर विकल्पों से भी परे होने की आवश्यकता है । तब जो जीव एकदम स्पष्ट बाहरी पदार्थों में हठ बनाये हुए है कि यह मेरा स्वरूप है, इसके बिना मेरा गुजारा नहीं, इससे ही मेरा बड़प्पन है ऐसी जो हठ बनाये है वह तो पूर्ण अंधकार में है । वह तो संसार में रुलने वाला ही है एकदम । जीव को जब अपने स्वरूप की सुध नहीं होती तो वह कर्म दशा को अपनाता है जो विचार ख्याल उठे उनमें इसका पक्ष हो जाता है, मैं इसको ऐसा कर दूं, लोग मुझे क्या समझते? मेरी बड़ी इज्जत है, मेरी बड़ी महिमा है, न जाने क्या-क्या नहीं बकता है यह अज्ञानी जीव । जब ज्ञानभाव की सुध नहीं है तो वह तृप्त कैसे होगा? वह अकृत है । जैसे जब किसी का दिमाग बिगड़ गया तो वह अट्ट-सट्ट बकता है ऐसे ही इसकी बुद्धि बिगड़ गई ज्ञानस्वरूप की सुध न होने से तो यह भी अटपट बकता है, सोचता है, पर मनुष्य भव पाकर करने का काम ये सब बाहरी प्रसंग के लगाव के नहीं हैं । अपने को ज्ञानमात्र अनुभव कर सके केवल ज्ञान स्वरूप, ज्ञानमात्र तो यह अनुभव वास्तविक मंगल है । देखो निज में इसको कोई जानता ही नहीं, जब कोई उसका समझने वाला नहीं तो मैं किसमें अपना सिर रगडूँ, किससे राग बढ़ाऊं, मेरा कौन सहाय है? जगत में कोई भी वस्तु मेरे लिए शरण नहीं है, बड़े-बड़े वैभव हों तो क्या वे मेरे कष्ट दूर कर देंगे? बड़े-बड़े धर्मात्माजन भी हों, उनके बीच रहूँ तो क्या वे कष्ट दूर कर देंगे? खुद को ही ज्ञान प्रकाश लाना होगा । खुद को ही अपने में उस ज्ञानमात्रस्वरूप की दृष्टि बनानी होगी तो यह खुद के लिए शरण होगा अन्यथा कोई इसका शरण नहीं है । विकल्प जाल से दूर होकर ही इस जीव को अपने में अपना शरण प्राप्त होता है ।


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