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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:समयसार कलश - कलश 98

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कर्ता कर्मणि नास्ति नास्ति नियतं कर्मापि तत्कर्तरि, द्वंद्वं विप्रतिषिध्यते यदि तदा का कर्मकर्मस्थिति: ।

ज्ञाता ज्ञातरि कर्म कर्मणि सदा व्यक्तेति वस्तुस्थितिनैंपथ्ये बत नानटीति रभसा मोहस्तथाप्येष किम् ।।98।।

817―परकर्तृत्व की असंभवता का संस्मरण―कर्तृकर्माधिकार अब संपूर्ण होने वाला है । तो जो बात पहले से उठाई गई थी कि यह जीव किसी परपदार्थ का कर्ता नहीं है, पुद᳭गल कर्म का कर्ता नहीं है । इस तथ्य को उपसंहार में कहा जावेगा । देखो ये जो संसारी जीव हैं मनुष्य, पशु पक्षी आदिक ये सब तीन पदार्थों के पिंड हैं जीव, कर्म और शरीर में शरीर की बात होती जा रही, कर्म में कर्म की बात होती जा रही है और जीव में जीव की बात होती जा रही है । इन तीनों की बात जुदी-जुदी नहीं मालूम होती इस अज्ञानी जीव को, और इन तीनों के पिंडोले में ही यह मैं हूं, ऐसा अनुभव करता है । कोई रास्ते में कुछ बोझा लादे जा रहा था, थक गया, कुछ देर को नीचे रख दिया अब वह उठाये तो अकेले उठे नही । किसी से कहा भाई बोझा उठा दो तो वह कह देता मैं क्यों उठाऊं? देखो शरीर में कितना मोह बसा है कि इसे जरा भी कष्ट नहीं देना चाहते बड़े आराम से इस शरीर को रखना चाहते । दूसरे के चाहे गये छोटे-छोटे कामों में भी मैं ऐसा क्यों करूं इस प्रकार सोचता है । अच्छी बात है, कुछ भी न करे उसकी तो महिमा है, मगर कर तो रहे सब कुछ । पर शरीर में इतना तीव्र मोह है कि छोटे-छोटे काम भी दूसरे का करना नहीं चाहते । देह में यह जान करके कि मैं यह हूँ और मैं अपनी देह को तकलीफ क्यों दूं? इतना इसको मोह बस गया है तो मुख्यता से बताया जा रहा है कि जीव पुद᳭गल कर्म का कर्ता नहीं है और पुद्गल कर्म जीव का कर्ता नहीं, बात दोनों ओर से है । पुद्गल कर्म जीव का कर्ता नहीं है यह बात इसमें बतायी गई है ।

818―विकार को ज्ञानविकल्प व पौद᳭गलिक समझ लेने का प्रभाव―लोग झट समझ जाते हैं कि रागद्वेष को पुद्गल कर्म ने किया । देखो जो लोग ज्ञान में कुशल नहीं हैं वे कुछ नहीं समझ पाये । यह भी समझना चाहिए कि रागद्वेष का करने वाला जीव नहीं है, पुद्गल कर्म है और यह भी समझना है कि रागद्वेष को पुद्गल कर्म नहीं करता, जीव करता है । सुनने में तो आ रहा होगा कि दोनो परस्पर विरोधी बातें हैं लेकिन ज्ञानी इतने संतुलन से समझ रहा है कि वहाँ विरोध नही है । राग नाम किसका? जो ज्ञान में विकल्प आया, जो ज्ञान में दशा बदली, जो ज्ञान में बात समा गई उसी को ही तो रागद्वेष कहते हैं । तो ज्ञान के इस प्रकार के परिणमन को ज्ञान के विकल्प को ऐसे रागद्वेष को कर्म करता कि जीव? कर्मविपाक निमित्त है और परिणमने वाला जीव ही है ऐसा क्यों समझने की जरूरत है कि कहीं यह न मान लिया जावे कि कर्म इस जीव की रागी बनाता है तो अब जीव का इसमें वश क्या है? वह तो कर्म की दशा है । कर्म जब जीव को छोड़े तो उसे छुट्टी मिले, कर्म न छोड़े तो छुट्टी न मिले । ऐसा मान लेने पर तो जीव कायर हो जायेगा, बिल्कुल गिर जायेगा, मैं कुछ करने में समर्थ ही नहीं, फिर तो जैसे अन्य लोग ईश्वर को मानते हैं कि ईश्वर सब जीवों को सुखदुःख पुण्यपाप कर देता है, जीव उसमें क्या करे? यह ही दशा इस कर्मवादी की होती है तो मोक्षमार्ग के प्रकाश के लिये कहा जा रहा है, समझाया जा रहा है कि रागद्वेष तो ज्ञानविकल्प का नाम है और ज्ञान के विकल्प, ज्ञान की बदली हुई दशा में जानकारी आदिक इनको तो यह जीव कर रहा है । यह तो जीव की परिणति है । समझ जाये, चेत जाये, तथ्य जान जाये तो विकार विकल्प न करेगा । लो उसको पुरुषार्थ का मौका मिल गया । अच्छा और एक भेद समझने के लिए कि यह मैं जीव समग्र परभावों से निराला हूँ, केवल चैतन्य स्वभाव मात्र हूँ, यह तथ्य समझने के लिए यह बात जानना आवश्यक है कि राग द्वेषादिक जो विकार हैं सो ये उदय में आये हुए कर्म की छाया मात्र हैं, ये मेरे स्वरूप से नहीं उठे हुए हैं, तब ये कर्मकृत हैं, कर्मविपाक हैं, नैमित्तिक हैं औपाधिक हैं, पर भाव हैं, इन्हें मैं नहीं करता । इन्हें तो कर्म करता है और कर्म के ये परिणमन हैं । जैसे किसी बीमार की चिकित्सा करने वाले वैद्य को बड़ा होशियार होना चाहिए । दवा दे रहा उस दवा में एक साथ ही गरम दवा भी और ठंडी दवा भी चल रही है । कौन कितनी मात्रा में, किस ढंग में देना चाहिए, यह कुशल वैद्य को विदित है, अगर उल्लंघन हो जाये उसका तो रोगी को तो बड़ा कठिन पड़ेगा । समझना पड़ेगा सब अंदर में ही, सारा नाटक एक अंदर में ही चल रहा है । यह कर्मरस, कर्म के उदय हैं, इसमें मेरा क्या मतलब? और जब कभी ऐसा अज्ञान बस जाये कि इन सबको तो कर्म ही करता है जीव इसमें क्या करे, तो यह अनुचित औषधि बन गई, वहाँ समझना होगा कि आत्मा ज्ञानस्वरूप है, वह ज्ञान के विकल्प करता है उस फोटो का उस छाया का संबंध पाकर ज्ञान का उल्टा विकल्प कर दिया गया । यह जीव ज्ञान को ही करता है तो सही ज्ञान बनायें और उल्टा ज्ञान छोड़ देवें तो छुट्टी मिल जायेगी । ऐसे ही इन सब तथ्यों का इस परिच्छेद में उचित वर्णन हुआ ।

819―ज्ञानविकल्पों से वस्तुविज्ञान करके ज्ञानविकल्पों को तजकर ज्ञानमात्र अनुभवन में आत्मलाभ―तथ्यों का प्रकाश करते-करते अंत में यह कहा गया कि ये दोनों ही नय पक्षपात हैं कि जो कुछ भी सोचे वह सब पक्ष है । सोचें तो जरूर । सोचे बिना आगे बढ़ न सकेंगे । चिंतन मनन करें मगर चिंतन मनन करने पर सब कुछ समझ लिया तो अब वह समझ ही समझ बनाये रहना है क्या या उस समझ विकल्प को छोड़कर एक विश्राम लेना । कोई आदमी रसोई बनाता है तो बनाता ही बनाता जाता है क्या या बना चुकने पर अच्छी जगह पालथी मारकर अच्छी प्रसन्न मुद्रा बनाकर थाली में कटोरे में खुद परोस कर खाने का मजा भी लेता है? खूब तो परिश्रम किया, लकड़ी जलाया, गर्मी सहा, धुवाँ भी आंखों में लगा, हाथ भी जले, बहुत-बहुत काम तो किया, यह ही काम वह दिन भर करता रहेगा क्या? या ठसक के साथ बैठकर थाली सजाकर उसके खाने का भी ध्यान है? बोलो इसमें तो कह दोगे कि रसोई बनाते ही नहीं रहना है, ऐसी क्या पड़ी है? खाने का भी आनंद लेना है । ऐसे ही इन सब तत्त्वों का स्वरूप जान लिया, जान रहे, समझ रहे, विकल्प कर रहे, परख रहे, युक्तियाँ लगा रहे, आगम का प्रमाण दे रहे, तो ऐसा ही जिंदगी भर करते रहना है क्या? या सब कुछ जानने के बाद इन सब जानन विकल्पों को भी छोड़कर विश्राम के साथ ज्ञान में ज्ञानोपयोग को बसाते हुए उस विशुद्ध ज्ञानपरिणाम का आनंद लेना है? तो उस आनंदलाभ के लिए अंतिम दो तीन गाथाओं में बताया गया कि व्यवहार नय का कोई पक्ष ले तो वह भी विकल्प और निश्चयनय का कोई पक्ष ले तो भी वह विकल्प । उन समस्त विकल्पों से हटकर एक ज्ञानस्वभाव मात्र को अनुभव में लेना और उस सिलसिले में बताया कि देखो अपने भीतर जो झलक हुई, कर्मरस में उपयोग दिया और उसे माने कि यह मेरा है उसे तो कहा है कर्ता और जो कर्मरस को मजाक के साथ देखता है ओह यह हो रही है उसकी लीला और अपना सहजस्वरूप उपादान बुद्धिपूर्वक रुचिपूर्वक अभिमुख होकर निरखता है वह कहलाता है ज्ञान ।

820―स्वयंपूर्ण पदार्थों में एक में दूसरे की कृति की असंभवता―ज्ञातृत्व में कर्तृत्व नहीं, कर्तृत्व में ज्ञातृत्व नहीं, यह बात बतायी गई अज्ञानी और ज्ञानी जीव के निश्चय परिणमन में । आखिर जो जीव कर्ता हो रहा है और अभी बताया गया था कि वहाँ पर द्रव्य के कर्ता की बात नहीं बतायी गई किंतु झलके हुए कर्मरस में यह मैं हूँ, मैं करने वाला हूँ उसको मैं कहकर उस क्रिया में अहंकार रखने वाले को कर्ता कहा है । आखिर इस प्रकरण में सूक्ष्म से सूक्ष्म समालोचना करते-करते अंतर तक पहुंचे । अब चूँकि कर्तृकर्माधिकार पूर्ण हो रहा है तो जो सबसे पहले बात उठायी थी उनका उपसंहार करते हुए कह रहे हैं । तो यहाँ सीधे दो द्रव्यों की बात लेना चाहिए । कर्ता मायने अज्ञानी जीव, कर्म मायने ज्ञानावरणादिक पुद्गल कर्म । कौनसा जीव कर्ता? अज्ञानी जीव । अज्ञानी जीव भी पुद्गल कर्म का करने वाला नहीं है, यह बात भी कही । अगर कोई अज्ञानी ऐसा मान बैठे कि यह मकान मेरा है तो वह मकान उसका हो जायेगा क्या? अगर मानने से वैसा बन जाये अज्ञानी को तब तो फिर वह अज्ञानी भगवान से भी बढ़कर हो गया । क्या है अपना मान लो, मगर अपना मानने में कोई अपना बनता है क्या? अज्ञानी इसी बात से तो दुःखी है कि वह पर को अपना मानना छोड़ नहीं सकता और पर अपना बन सकता नहीं । उसके सामने बहुत बड़ी गहरी यही तो समस्या है । तो अज्ञानी जीव भी पुद᳭गल कर्म का कर्ता नहीं वह तो अपने विकल्पों का ही करने वाला है कितना भेद है दो द्रव्यों में सबकी कितनी अपने आपकी पूर्णता है, स्वतंत्रता है । कोई एक द्रव्य का त्रिकाल भी कुछ परिणमन नहीं कर सकता, उसकी परिणति नहीं कर सकता । तो फिर यहाँ मोही जीव मैं इसको यों बना दूंगा इन बच्चों को इतना पढ़ा लिखा दूंगा इतना होशियार बना दूंगा यह व्यर्थ का अध्यवसान है ।

821―कर्त्तव्य और प्रतीति का वातावरण―देखो आप घर में रहते हैं, आपके बच्चे पढ़ते हैं, आप उनके प्रति विकल्प करते हैं, उनका पढ़ना बनता है यह तो ठीक है, और घर में इसी ढंग में सुख शांति है, बच्चों को मूर्ख रखने में खुद भी कैसे अच्छी तरह रह सकेंगे । बच्चे पढ़ लिख जायेंगे, अच्छी कमाई करने लगेंगे तो यह बाप चिंता मुक्त होगा, लौकिक हिसाब से बात कही जा रही । सो काम तो यह होता है, मगर जिसकी श्रद्धा में यह बसा है कि मैं पढ़ाता हूं, मैं पढ़ा दूंगा तो इस श्रद्धा के कारण भीतर में उसके चोट निरंतर रहा करती है कर्तव्य बात और है, अज्ञान की बात और है । कर्तव्य में क्लेश नहीं, अज्ञान में क्लेश है । कर्तव्य में कोई बच्चा यदि मूर्ख है, बुद्धि में कमजोर है, वह नहीं पढ़ पाता तो यह बाप उसके पीछे दुःखीं तो नहीं होता । वह जानता है कि इसका तो उदय ही ऐसा है इसको जो होगा वह इसके कर्म की बात है । दुःखी नहीं होता और जो अज्ञान में रहता है मेरा यह बच्चा है, मैं इसे पढ़ाकर रहूंगा और वह पढ़ता है नहीं, उसके पास बुद्धि है नहीं तो वह दु:खी होता है, माथा धुनता है, हाय मेरे इतना बड़ा पाप का उदय है, मैं तो मर गया । जो अज्ञानी होगा सो यों मरेगा ही । तो भीतर में जिसका ज्ञान बिलकुल स्पष्ट है―मैं मैं हूँ, मैं अन्य कुछ नहीं करता मैं अपने परिणाम को ही भोगता हूं अन्य कुछ नहीं भोगता, इस प्रकार जो अपने आपके भीतर स्पष्ट है उसको कष्ट नहीं । स्पष्टता में कष्ट नहीं । तो यह समझना कि प्रत्येक द्रव्य मात्र अपने-अपने परिणमन को करता है, कोई किसी दूसरे का परिणमन नहीं करता । प्रकरण में यहाँ जानो, ये दो पदार्थ रखे आलोचना करने के लिये । जीव कर्ता और पुदगल कर्म । अज्ञानी जीव का नाम है कर्ता । कर्ता कर्म में नहीं है और कर्म कर्ता में नहीं है यह बात पूर्णतया निश्चित है, दो पदार्थ हैं उनमें एक दूसरे में कैसे प्रवेश करेगा? तो जब दोनों परस्पर स्वतंत्र जुदे हैं तो उनमें कर्ता कर्म की बात बताना कैसे युक्त हो सकती है? कर्ता कर्मपना वहाँ ठहर ही नहीं सकता तो हो क्या रहा? अब जो ऐसा जान गया वह आत्मा जो अज्ञान अवस्था में कर्ता था सो अब ज्ञाता हो गया । सो यह नहीं रहा ज्ञाता ज्ञाता में रह रहा है और कर्म कर्म में रह रहे, बात तो यहाँ भी ऐसी ही है । अज्ञानी जीव भी अपने आपमें रह रहा है, कर्म कर्म में रह रहे हैं, पर इस तथ्य को जानने के बाद यह जीव तो ज्ञाता बन गया जाननहार, बिल्कुल स्पष्ट बात है । अब यहाँ नजर आ रहा है कि ज्ञाता ज्ञाता में रह रहा है और कर्म कर्म में रह रहा है, यह विशेष स्थिति एकदम व्यक्त है ।

822―निष्पक्ष ज्ञाता रूप नेपथ्य में मोह भेषी के नाचने पर आश्चर्य―आचार्य कहते हैं खेद के साथ, आश्चर्य के साथ, कि जब ज्ञाता ज्ञाता में है, कर्म कर्म में है तो फिर इस नेपथ्य में बड़े वेग के साथ यह मोह नच कैसे रहा है? नाटक में आप जानते होंगे, नेपथ्य याने नाटक में पार्ट करने वाले और हैं और और नेपथ्य वाला कोई दूसरा ही है । तो वह रहता है ज्ञाता की भांति और पार्ट अदा करने वाले रहते हैं कर्ता की भाँति । तो जहाँ नाटक करने वाले पार्ट अदा करने वाले हैं उनमें तो करना, नाचना, खेलना, हंसना पीटना, मारना चल रहा है, पर जो नेपथ्य में बैठा है, उस पर्दे के पीछे उस नाट्य भूमि से अलग जो बैठा है उसमें तो कोई पार्ट अदा नहीं हो रहा वह तो सीधे से पीछे उस घटना का चित्रण कर रहा है, तो ऐसे ही जब कर्ता कर्म का भेद जान लिया द्रव्य की स्वतंत्रता पहिचान ली, ज्ञाता बन गया अब तो वह एक नेपथ्य की तरह है । पार्ट अदा करने वालों में अब वह शामिल नहीं रहा । तो यह समझ रहा कि सब बातें यहाँ भिन्न-भिन्न हैं ऐसा समझने में नेपथ्य में यह मोह वेगपूर्वक कैसे नाचेगा? नहीं नच रहा । एक बड़ी दृढ़तापूर्वक उन सब बिगाड़ों का खंडन कर रहा है । कुछ नहीं सीधी सही बात है, सब कुछ समझ गए, घटना यथार्थ जानी, और नैपथ्य में रहता है माने बात बोलता है वह पुरुष शांत होगा । खूब समझ लो, देखो आप लोग कभी-कभी नाटक देखते भी होंगे । जो पर्दे के पीछे से संचालक बोलता वह बड़ा शांत है और ललित है, सुंदरता से बोलता है मुख से, एक रस से । उदार है, धीर है, कोई क्रिया नहीं, ऐसे ही जो नैपथ्य में आ गया याने सब घटनाओं को सही-सही बतला रहा ऐसे इस ज्ञाता में भी ये चार गुण हैं । वह शांत है, ललित है । अरे सही ज्ञान करने वाला पुरुष तो आनंद में है, उसकी ललितता को कौन मना कर सकता? वह तो उदात्त है । बड़ा ऊंचा दिल है क्योंकि जो ऐसा जान गया सही-सही वह सारे जगत के जीवों को अपने समान स्वरूप में समझता है । उदारता तो तब नष्ट होती है जब यह द्वैत आता कि यह मेरा है यह गैर है । तो जिसने अपने स्वरूप का परिचय पाकर समस्त जीवों का स्वरूप अच्छी प्रकार समझा उसको इष्ट अनिष्ट कहाँ आयेगा? मेरा और गैर यह बुद्धि कहाँ जगेगी । इस कारण वह उदात्त है, और धीर है । धीर उसे कहते हैं जहाँ बुद्धि काम कर सके, और अधीर उसे कहते हैं जहाँ बुद्धि काम न कर सके । यह तो आप जानते ही हैं, ऐसा होता । जो अधीर होता है उसकी बुद्धि काम नहीं करती । जो धीर होता है उसका ज्ञान, उसकी बुद्धि बड़ी व्यवस्था से काम करती हुई चलती है । देखो यह बात धीर शब्द में खुद बसी हुई । धी मायने बुद्धि, र मायने देना । जो बुद्धि को दे, बुद्धि का विकास करे उसे कहते हैं धीर । धीं बुद्धि राति ददाति इति धीर: । तो जिसने जीव और पुद्गल की इस कपट भरी साझेदारी को समझ लिया और साझा तोड़ दिया, वह ज्ञाता ही है, है वहाँ है कर्म कर्म में ही बुद्धि जिसकी स्पष्ट हो गई वह भव्य धीर है, करने काम क्या है? मैं मैं हूँ मैं अपने को ही करता हूँ, मायने मैं ज्ञानस्वरूप हूँ, तो ज्ञान के परिणमन को ही करता हूँ, मायने मैं ज्ञानस्वरूप हूं, तो ज्ञान को ही भोगता हूं । शुद्ध ज्ञान भोगूँ, विकल्प को भोगूं अन्य कुछ नहीं भोगता तब अन्य बुद्धि त्याग दे कि मैं इस देह को करता, कर्म को करता इस जीव को यों बना देता ।

834―तत्त्वोपलब्धि की महनीयता―तथ्यप्रकाश की बुद्धि, ऐसा ज्ञान प्रकाश किसी ही एक बिरले को होता है, किसे होता? जो मोक्षमार्गी है उसे होता । ऐसे जीव कितने होते? बिरले कोई अंतरंग में अंतस्तत्त्व का ज्ञान प्रकाश पाने वाले जीव विरले ही होते हैं । उन विरलों में अपनी गिनती कर लो । आप कहेंगे कि यहाँ तो इतने लोग बैठे हैं, आप बिरले की बात कह रहे । अगर ये सभी लोग जो यहाँ बैठे हैं वह अनुभव करें कि मैं उन विरले में से हूँ, ज्ञान प्रकाश पाने वाला हूँ । अरे लाखों करोड़ों अरबों मनुष्यों के समक्ष तो आप लोग विरले ही तो हो । मान लो यहाँ तुम थोड़े ही लोग हो, पर तुम्हारे अलावा दुनिया में बाकी और भी तो अनगिनते जीव हैं । अभी इसी जगह कोई फिल्म देखने की सूचना मिल जाये तो मंदिर खड़े होने की जगह न मिले और कोई शुद्ध आत्मज्ञान की बात हो रही हो तो वहाँ देख लो कितने कम लोग आते हैं तो उपस्थिति का यह भेद यह जाहिर करता है कितने मनुष्य संसार में रुलने वाले हैं । उनकी कितनी संख्या है? अरबों खरबों की । उनमें से आप सब थोड़े से लोग बिरले ही तो कहलाये जो इस ज्ञानप्रकाश को पाने के अधिकारी बन सकते । इस तरह अब कर्तृ कर्माधिकार में यह बात भलीभाँति सिद्ध की गई कि एक द्रव्य दूसरे द्रव्य का कर्ता नही हो सकता । जीव भी कर्म का कर्ता नहीं । तो जब कर्म से कुछ संबंध नहीं तो ये कर्म यहाँ फिर जबरदस्ती क्यों नाचते? जैसे किसी का हम आदर नहीं करते, उससे बात भी नहीं करते, पर वह बिना पूछे ही, बिना आज्ञा के ही आगे-आगे नाचता, तो ऐसा क्यों हो रहा है? यह तो ज्ञाता है, केवल ज्ञायक है, जान रहा है, तो इसकी कमजोरी है, यह ललकार नहीं सकता तो दूसरे यहाँ अड्डा जमाये हैं । तो थोड़ी भीतर से एक ललकार चाहिए इन विभावों को हटाने की और वह ललकार उसी में बन सकती जो अपने आप में मजबूत हो । कोई एक कमजोर तो ललकार नहीं दे सकता । तो अपने ज्ञानस्वभाव में ही अपने आपका अनुभव रखने वाला पुरुष दृढ़ होता है और ऐसा दृढ़ पुरुष ही उन विभावों को ललकार सकता है, और इस घर को उन-उन ऊधमियों से सूना रख सकता है । इस तरह यह कर्ता कर्म के तथ्य का जाननहार पुरुष अपने को ज्ञाता अनुभव कर रहा है । अब इसके बाद अंतिम दृढ़ता की सूचना देने वाला एक कलश और आयेगा ।


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