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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:समयसार - गाथा 108

From जैनकोष



जह राया ववहारा दोसगुणुप्पादगो त्ति आलविदो ।

तह जीवो ववहारा दव्वगुणुप्पादगो भणिदो ।।108।।

उपचारकथन का एक दृष्टांत―जैसे कहा जाता है कि यह राजा प्रजा में दोष और गुण का उत्पादक है । कहते हैं ना कि यथा राजा तथा प्रजा । राजा सज्जन है तो प्रजा सज्जन कहलाती है । राजा दोषयुक्त है तो प्रजा भी दोषयुक्त है । राजा प्रजा में दोष और गुण दोनों ही उत्पन्न करता है यह कहना केवल व्यवहार से है । निश्चय से राजा राजा में ही कुछ कर सकता है और प्रजा का प्रत्येक व्यक्ति अपने आप में ही कुछ कर सकता है ꠰ फिर भी राजा प्रजा में दोष और गुण उत्पन्न करता है ऐसा कहना व्यवहार से है । इसी प्रकार यह जीव पुद्गल द्रव्य में कुछ करामात कर देता है ऐसा कहना व्यवहार से ही है । जैसे प्रजा में लोक में उनके ही कारण व्याप्य व्यापक भाव होने से गुण दोष उत्पन्न होते रहते हैं । प्रजा के गुण दोष का राजा के साथ व्याप्य व्यापक संबंध नहीं है । राजा पृथक चीज है और प्रजा का प्रत्येक व्यक्ति पृथक चीज है । एक दूसरे का व्याप्य व्यापक संबंध नहीं है फिर भी राजा प्रजा में दोष व गुणों को उत्पन्न करता है ऐसा कहना केवल उपचार है।

दार्ष्टांत में उपचारकथन―इसी प्रकार पुद्गल द्रव्य का जीव के साथ व्याप्य व्यापक संबंध नहीं है । जीव द्रव्य में जो गुण दोष उत्पन्न होते हैं वे जीव के ही प्रयोजन से व्याप्य व्यापक भाव से ही हुआ करते हैं । पुद्गल में पुद्गल के ही प्रयोजन से गुण अथवा दोष उत्पन्न होते हैं । उनमें जीव का व्यापकभाव नहीं है । फिर भी जीव पुद्गलद्रव्य के गुण और दोषों को उत्पन्न करता है ऐसा कहना केवल उपचार है । यहाँ तक यह बात सिद्ध हुई है कि जीवपुद्गल कर्म का कर्ता नहीं है । अब यहाँ जिज्ञासा उत्पन्न होती है कि यदि जीव पुद्गल कर्म को नहीं करता है तो फिर पुद्गल कर्म को और कौन करता है? ऐसी कुछ शंका के साथ प्रश्न किया जा रहा है । उस प्रश्न के समाधान में आचार्यदेव कहते हैं कि तुम्हारा जो यह तीव्रवेग सहित मोह है कि जीव को पुद्गल का कर्ता माना जाये तब तो तुम प्रश्न रहित होते हो और जब कहा जाये कि जीव पुद्गल का कर्ता नहीं है तब तुम्हें एक प्रश्न उत्पन्न होता है । यह तीव्र वेग वाले मोह का प्रताप है । सो उस मोह को नष्ट करने के लिए तुम्हारे वास्ते अब बतलाते हैं कि उस पुद्गल कर्म को करने वाला कौन है? पुद्गल कर्म का कर्त्ता पुद्गलकर्म ही है । इस बात को स्पष्ट करने के लिए एक साथ चार गाथाएँ आ रही हैं ।


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