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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:समयसार - गाथा 131

From जैनकोष



अण्णाणमया भावा अणाणिणो बहुविहा वि जायंते ।

णाणिस्स दु णाणमया सव्वे भावा तहा होंति ।।131।।

ज्ञानी व अज्ञानी के उपादानानुकूल भाव की उद्भूति सदृष्टांत―जैसे स्वर्णमय भाव से कुंडलादिक स्वर्णमय ही भाव होते हैं और लोहामय भाव से बेड़ी आदिक लोहामय ही पर्यायें होती हैं इसी तरह ज्ञानी जीव के ज्ञानमयभाव से समस्त भाव ज्ञानमय ही होते हैं और अज्ञानी के अज्ञानमय भाव से नाना प्रकार के अज्ञानमय भाव होते हैं । सोने की धातु से जो भी चीज बनेगी वह स्वर्णमय ही बनेगी लोहामय न बनेगी और लोहे की धातु से जो चीज बनेगी वह लोहामय ही बनेगी स्वर्णमय न बन जायेगी । पुद्गल द्रव्यों में स्वयं परिणमन का स्वभाव पड़ा हुआ है, द्रव्यों का शाश्वत परिणमन होता है इन्हीं बातों को समझना जैन सिद्धांत के मर्म का मूल ज्ञान है । जैसे जिसे हिसाब लगाने की कुंजी याद हो जाती है―गुणा की, भाव की गणित की उसे फिर सब हिसाब करने आसान हो जाते हैं, लीला मात्र में सब हिसाब करता चला जाता है । इसी प्रकार सम्यग्ज्ञान की कुंजी यह ही है कि वस्तु शाश्वत है, परिणमनशील है, इन दो बातों को समझ लेना यही सारे ज्ञान की कुंजी है ।

शास्त्रों से यथार्थ हितार्थ निकालने की कुंजी―प्रत्येक पदार्थ सदा रहते हैं और प्रतिसमय परिणमते रहते हैं । ये दो बातें समझ लेना ही ज्ञानी का मूल ज्ञान है । फिर किसी भी सिद्धांत के ग्रंथों को पढ़ते जाइए सबका ठीक-ठीक अर्थ लगा लेंगे, और जहाँ जो गलती मिलेगी वह ज्ञान में आयेगी कभी-कभी ऐसे ज्ञान की किरण झलकेगी कि मानो कोई चीज मिली, ऐसा अनुभव होता है । वह नई बात भी जैन सिद्धांत की ही है उनके ग्रंथों में, पर किन्हीं अजैन आचार्यों का कुछ उपदेश भी ऐसा झलका हुआ होता है कि बड़ा बोध देने वाला होता है । जिसे यह कुंजी याद है उसे हित की बात सभी जगह मिल जाती है और जिसे यह कुंजी याद नहीं है उसे इन ग्रंथों से भी कुछ मिलना कठिन हो जाता है ।

कार्यों की कारणानुविधायिता―पुद्गल द्रव्य स्वयं परिणामस्वभावी है सो ऐसा नियम है कि कार्य जितना होता है वह कारण के अनुविधायी होता है । जैसा कारण होता है वैसे ही कार्य उपजते हैं । जैसे चने के बीज से चने के अंकुर निकलते हैं अथवा और-और बातें । जो स्वर्णमय भाव है, पदार्थ है उससे स्वर्णमय ही भाव बनेगा, कहीं लोहे के कड़े वगैरह नहीं बन जायेंगे । और लोहे के पदार्थ का लोहे की जाति का उल्लंघन न करते हुये ही भाव बनेगा, कहीं कुंडल आदिक न बन जायेगा । अज्ञानी की जाति अज्ञान है यह पर्यायरूप पदार्थ लिए है, जिस उपादान की जैसी पर्याय योग्यता है उस उपादान में वैसी ही बात प्रकट होती है । कितना ही उसे सुधार कर सफाई से रखे पर वह तो न बदल जायेगा वह वही रहता है । नकली मोती जवाहिरात के गहने बेचने वाले लोग उस नकली मोती की जितनी कीमत हो उतनी ही कीमत का उसका डिब्बा उसकी सजावट रखने के लिये करते हैं । यदि 50 रूपये का मोती है या और कोई गहना है तो 50 ही रूपये और उसके श्रृंगार के सजावट के लिए लगा दिये जिससे कि चमक दिखे । तो उसे कितना ही सुंदर सजाकर रखें, कितनी ही सजावट करें पर उसमें रहने वाला जो जेवर अथवा मोती है वह तो न बदल जायेगा । जो जैसा रहेगा उसके वैसी ही बात प्रकट होती है ।

उपादानसदृश कार्य होने का एक दृष्टांत―एक घराने में चार लड़के थे ꠰ वे सब तोतले थे ꠰ एक सी ही सुंदर सकल के थे । और दूसरे सेठ के यहाँ दो तीन लड़कियाँ थी, तो सगाई के लिए नाई भेजा । पहिले नाई पसंद करता था लड़का लड़की के संबंध के लिए । फिर जब नाई पर विश्वास न रहा तो घर के बड़े बाबा वगैरह पसंद कर आते थे । और जब लड़कों को बाबाओं की बात पसंद न आई तो लड़के का बाप पसंद करने जाता था । अब लड़कों को अपने बाप पर भी विश्वास न रहा तो वे स्वयं जाते हैं । तो नाई गया उन लड़कों को देखने के लिये, सेठ ने उन लड़कों को खूब सजाकर रखा था । कमरे में महागद्दी लगाकर बढ़िया चमकदार कोट-टोपी आदि पहनाकर बैठा दिया । बाप ने पहिले हो समझा दिया था कि चुप रहना । अब नाई पसंद करने आया तो देखा कि वाह बड़े ही सुंदर लड़के हैं, ये तो इंद्र के जैसे रूप वाले हैं । इसी प्रकार की दसों प्रशंसा की बातें उसने बोल दी । अब उस नाई की प्रशंसा की बातें सुनकर उन लड़कों का हृदय भर आया । और एक लड़का बोला कि ऊं अभी तो टंडन वंडन लगा ही नहीं है । भाव उसका यह था कि अगर चंदन लगा होता तो देखते कितने अच्छे लगते हैं । तो दूसरा लड़का बोला―अरे डाडा ने क्या कहा था, अरे कहना तो यह था कि चुप रहो, बोलो नहीं । तो तीसरा लड़का बोलता है कि अबे टुप-टुप । याने ये सब अपने वायदे से भ्रष्ट हो रहे हैं । वायदा क्या था कि बिल्कुल न बोलना । तो जिसका जैसा उपादान होता है, कितनी ही शोभा अंबार कराये, वे बातें फूट निकलती हैं ।

दृष्टांत में उपादानरूप पर्याय और परिणतिरूप पर्याय―तो जैसे वे लोहा और सोना पुद्गल हैं पर उनका उपादान जैसा है वैसा वे अपनी पर्याय की जाति का उल्लंघन नहीं कर रहे हैं । देखो लोहा और सोना वे भी तो पदार्थ हैं । जैसे जीव पदार्थ है ऐसे ये भी तो पदार्थ हैं । इन पदार्थों में कभी यह अन्याय नहीं देखा गया है कि सोने का लोहा बन जाये या लोहे का सोना बन जाये । इसी प्रकार यह भी अन्याय नहीं होता कि अज्ञानी के ज्ञानमय भाव हो जाये और ज्ञानी के अज्ञानमय भाव हो जाये । ज्ञानी और अज्ञानी द्रव्य नही हैं, द्रव्य की पर्यायें हैं, उपादानरूप पर्यायें हैं । उससे जो भाव पैदा होगा वह परिणति रूप पर्याय है । जैसे लोहा और सोना ये द्रव्य नहीं हैं, द्रव्य तो परमाणु परमाणु, और लोहा और सोना पर्याय है पर उपादानरूप पर्यायें हैं । और जो गहना आदिक बनते हैं वे इसकी परिणतिरूप पर्यायें हैं । ऐसा दृष्टांत में बताया जा रहा है ।

दृष्टांत में उपादानरूप पर्याय व परिणतिरूप पर्याय―तो जिस प्रकार पुद्गल स्वयं परिणमन स्वभाव रखता है और उसमें कार्य कारणानुविधायी हुआ करता है इन दोनों बातों के कारण सोने से सोने का ही सामान बनता है और लोहा से लोहा का ही सामान बनता है । इस प्रकार जीव भी स्वयं परिणमन स्वरूप है, और उसमें कार्य कारणानुविधायी हुआ करता है । इन दोनों बातों के कारण अज्ञानी जीव के चूंकि स्वयं अज्ञानमय भाव है सो अज्ञान जाति का उल्लंघन नहीं करता । उसके नाना अज्ञानमय ही भाव होंगे । और ज्ञानी जीव चूंकि ज्ञानमय भावरूप है सो ज्ञान जाति का उल्लंघन नहीं कर सकता । वह ज्ञानमय होगा, अज्ञानमय न होगा । जिसमें ज्ञान है उसमें ज्ञान की बात है और जिसमें अज्ञान है उसमें अज्ञान की बात है । अज्ञानी भी ज्ञानी बन जाये तो ज्ञानमय भाव होने लगे । इस प्रकार अज्ञानी जीव अज्ञानमय अपने भाव की एक भूमिका को व्याप्त करके आगामी द्रव्यकर्म के कारण रूप अज्ञान आदिक भाव हैं उनकी हेतुता को प्राप्त करते हैं सो अज्ञानी जीव का भाव अज्ञानमय भूमिका को ही व्यापकर रहता है ।

भूमिका को व्यापकर होने का विवरण―भैया ! अज्ञानी के जो परिणाम पैदा होता है वह परिणाम तो कार्यरूप है और उसके उपादान कारण रूप जो अज्ञान भूमि है उस अज्ञान भूमि में व्याप करके वे परिणाम हो रहे हैं । जैसी भूमि है वहाँ वैसी ही फसल होती है । भुसावली केले भुसावल की ही भूमि में होते हैं यहाँ नहीं । काश्मीरी सेव काश्मीर की ही भूमि में होते हैं यहाँ की भूमि में नहीं । यहाँ के जैसे गन्ने यहाँ ही होते हैं मध्यप्रदेश में नहीं जहाँ जैसी भूमि है वहाँ वैसी उत्पत्ति है । इस अज्ञानी जीव की भूमि ही अज्ञानमय है । सो कुछ ग्रहण करे तो वह अज्ञानरूप ही ग्रहण करेगा।

कारणसदृश कार्य होने का व्यक्त प्रदर्शन―जैसे कोई श्रोता हितार्थी होता है और कोई श्रोता अपनी बात दूसरों को दिखा देने वाला भी होता है । अब उनसे जो वचन निकलेंगे, प्रश्नरूप वचन ही सही, उन वचनों में जुदा-जुदा ढंग मिलेगा । हितार्थी श्रोता का प्रश्न एक अच्छे ढंग का मिलेगा और लोगों को यह बताने के लिए कि हम बड़ी देर से चुपके-चुपके बैठे हैं, किसी ने मुझे समझ भी नहीं पाया सब श्रोतावों को कुछ समझा देने के लिए कोई प्रश्न छेड़ेगा उसके वचनों का ढंग ही एक नये ढंग का होगा । और वक्ता सुनेगा तो हितार्थीपुरुष के प्रश्न का उत्तर वह बड़ी शांति से दे डालेगा । और अपना गौरव रखने की इच्छा वाले पुरुष के वचनों से वक्ता को क्षोभ हो जायेगा कुछ न कुछ, कारण यह है कि वक्ता की समझ में यह आया है कि यह कुछ ज्ञानधारा की पद्धति से नहीं पूछ रहा है माने मात्र अपना बड़प्पन रखने की दृष्टि से पूछ रहा है तो वक्ता के चित्त में आया हुआ ऐसा जो क्षोभ होता है वह श्रोता के कारण नहीं होता है । वक्ता के मन में जो विकल्प भाव होता है उससे क्षोभ होता है । अत: दोनों वक्ता व श्रोतावों में व अन्य तीसरे का जो परिणमन हुआ है उनकी बुद्धि के कारणानुरूप परिणमन हुआ है । तो यह अज्ञानी जीव अज्ञानमय भाव की भूमिका को व्याप करके रहता है इस कारण उसका भाव द्रव्यकर्म के बंधन के निमित्तभूत बन जाता हे । इस प्रकार अज्ञानभाव का विवरण करके अब उसके उत्पन्न होने का विवरण बताने के लिये आगे एक साथ 5 गाथाएँ आयी हैं ।


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