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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:समयसार - गाथा 182

From जैनकोष



अट्ठवियप्पे कम्मे णोकम्मे चावि णत्थि उवओगो ।

उवओगम्हि य कम्मं णोकम्मं चावि णो अत्थि ।।182।।

नाना पदार्थविषयक भेदविज्ञान―8 प्रकार के कर्मों में और 5 प्रकार के नोकर्मों में उपयोग नहीं है, यह स्थूल भेदविज्ञान है । पहिले एक वस्तुविषयक भेदविज्ञान था । अब यहाँ नाना पदार्थविषयक भेदविज्ञान है ।

कर्म का घर―ये कर्म अनंत कर्म परमाणुओं के पुंज है । लोक में सर्वत्र ठसाठस अनंत कार्माण वर्गणाएं भरी हैं । और प्रत्येक संसारी जीव के साथ अनंत कार्माणवर्गणायें जो कर्मरूप नहीं भी है, प्रकृत्या इस आत्मा के साथ एक क्षेत्रावगाह में हैं और किसी विलक्षण न होने लायक वह होने वाली बात है कि जो कर्मरूप नहीं भी है तो भी आत्मा के साथ ऐसे चिपटे हुए हैं कि मानो इस इंतजार में कि जरा करे तो यह विभाव जीव कि हमारी बन आयेगी, तत्काल कर्मरूप बन जायेंगे । यों अनंत कार्माणस्कंध विस्रसोपचय के रूप में जीव के साथ चिपटे हैं । यह जीव एक भव छोड़कर दूसरे भव को जाये तो वहाँ भी इसी प्रकार साथ जाते हैं जैसे कर्मों के साथ परिणमें हुए कार्माण स्कंध साथ जाते हैं । ये सारे शत्रुरूप हैं निमित्तदृष्टि से । कोई शत्रु सामनेरूप में आ गया, कोई शत्रु शीत युद्ध के सकल में बैठा है अर्थात् सामने लड़ाई में तो नहीं है मगर विश्वास उसका नहीं है । जिस चाहे समय शत्रु के रूप में सामने खड़ा हो जायेगा उम्मीदवार ।

कर्म और आत्मा का परस्पर अत्यंताभाव व निमित्तनैमित्तिक संबंध―यों भिन्न पुद्गल द्रव्य हैं ये कर्म । इस आत्मा के द्रव्य, क्षेत्र, काल, भाव का कोई प्रवेश नहीं है कर्मों में, इसी प्रकार कर्मों के द्रव्य, क्षेत्र, काल, भाव का कोई प्रवेश नहीं है आत्मा में । सब अपने-अपने स्वरूप में रह रहे हैं । किंतु बिगड़ा हुआ होने के कारण दोनों का परस्पर में निमित्त-नैमित्तिक संबंध है । और कैसा अनिवार्य निमित्तनैमित्तिक संबंध है कि जीव विभाव परिणमन करे तो ये कर्म प्रदेश अमुक-अमुक स्थिति अनुभागरूप कर्म प्रकृति बन जायेंगे । और क्षयोपशम आदि का निमित पाकर आत्मा में विशुद्ध परिणाम जागृत हो तो जैसे ये कार्माणवर्गणायें ऊँची स्थिति से हटकर नीची स्थिति में मिल जाये, विशिष्ट अनुभाग से हटकर साधारण अनुभाग में हो जाये और स्थिति का बहुत पहिले क्षय का परिणमन हो जाये, ये सब बातें निमित्तनैमित्तिक संबंध में स्वयमेव सर्वत्र अपने-अपने में होती रहती हैं ।

निमित्तनैमित्तिक संबंध से विभाव व्यवस्था―करने में उत्तम व्यवस्था नहीं होती, होने में उत्तम व्यवस्था बनती है । किया जाने में सैकड़ों चूकें हो सकती हैं और यथायोग्य निमित्त सन्निधान होने पर स्वयमेव ही दूसरे में कुछ परिणमन होकर रहने में कभी चूक नहीं हो सकती । यदि घड़ी की सुई को घुमाने के लिए एक आदमी नियुक्त कर दिया जाये तो वह कितनी भूल करेगा, पर चाभी देते ही निमित्त की सन्निधि से वह योग्य घड़ी 7 दिन तक कभी चूक नहीं कर पाती क्योंकि वहाँ निमित्तनैमित्तिक संबंध पूर्वक हो रहा है, इस समस्त लोक में यदि बनाने वाला कोई एक होता तो नाना अव्यवस्थाएं प्रत्येक समय खड़ी रहा करती । किंतु यह किया कुछ नहीं जाता । जो कुछ होता है वह योग्य उपादान में अनुकूल निमित्त की सन्निधि में स्वयं होता है, निमित्त पाकर उपादान में विभावपरिणमन स्वयं की वृत्ति से होता है । करने वाला किसी अन्य द्रव्य का कोई अन्य द्रव्य नहीं है । यह कर्मों के और आत्मा के भेद की बात कही जा रही है ।

निमित्तनैमित्तिक संबंध होने पर भी निमित्त व उपादान का परस्पर में अत्यंताभाव―यद्यपि कर्मों का और विभावों का निमित्तनैमित्तिक संबंध घनिष्ठ है, इतने पर भी स्वरूप परदृष्टि करो तो जीव में कर्म नहीं है और कर्मों में जीव नहीं हैं । यद्यपि निमित्तनैमित्तिक संबंधवश गाय का गला गिरवा से बंधा हुआ है, पर स्वरूपदृष्टि से देखो तो गिरवा में गले का अंश भी नहीं है और गिरवे का गले में अंश भी नहीं है । गिरवा गले के ऊपर लोट रहा है और गला अपने गले में ही प्रतिष्ठित है, फिर भी वहाँ ऐसे निमित्तनैमित्तिक संबंध का वातावरण है कि वह गाय स्वतंत्र होकर कहीं हट कर जा नहीं सकती । इसी प्रकार जीव और कर्मों का निमित्तनैमित्तिक संबंध देखें तो यह जीव कर्मों से बंधा हुआ है । यह मनमानी नहीं कर सकता । कर्मबद्ध हुए हैं और उनके उदयकाल में नाना विभावोंरूप परिणमना पड़ता है किंतु स्वरूप चतुष्टय को देखो तो आत्मा में कर्मों का नाम नहीं है व कर्मों में आत्मा का नाम भी नहीं है ।

स्वरूपचतुष्टय की दृष्टि में स्वतंत्रता―स्वरूपचतुष्टय की दृष्टि से देखना निश्चयदृष्टि है और दो पदार्थों के संबंध से देखना यह व्यवहारदृष्टि है । यद्यपि व्यवहार की बात असत्य नहीं है किंतु निश्चयदृष्टि के रंगमंच पर बैठकर देखते हैं तो व्यवहार का विषय दिखा नहीं करता । जैसे कि जब व्यवहारदृष्टि के मंच पर बैठकर निहारा करते हैं तो निश्चयदृष्टि विषय इसकी दृष्टि में नहीं आ पाता । यहाँ निश्चयदृष्टि से देखा जा रहा है, कर्मों में उपयोग नहीं है और उपयोग में कर्म नहीं हैं ।

पंच शरीरों का विवरण―औदारिक, वैक्रियक, आहारक, तैजस और कार्माण नाम के 5 शरीर हैं । इन शरीरों में उपयोग नही है और उपयोग में शरीर नहीं है । औदारिक शरीर तो मनुष्य तिर्यंचों की देह का नाम है । जो स्थूल हो उसे औदारिक शरीर कहते हैं । जिसका उपघात तो सकता है वह औदारिक शरीर है । मनुष्य और तिर्यंच के शरीर औदारिक शरीर कहलाते हैं । देव और नारकियों के शरीर वैक्रियक शरीर कहलाते हैं । जिसमें छोटा बड़ा होने की योग्यता है, एक अथवा नानारूप होने की योग्यता है ऐसी प्रक्रिया वाले शरीर को वैक्रियक शरीर कहते हैं और छठे गुणस्थानवर्ती मुनियों के मस्तिष्क से निकले हुए धवल पवित्र शरीर को आहारक शरीर कहते हैं । औदारिक और वैक्रियक शरीर के तेज का कारणभूत तैजस शरीर के पिंड को तैजस शरीर कहते हैं । और कर्मों के समूह को, विशिष्ट सन्निवेश में प्राप्त हुए कर्मों के समुदाय को कार्माण शरीर कहते हैं।

आत्मा व नोकर्मों का परस्पर अत्यंताभाव―कार्माण शरीर और कर्मों में ऐसा अंतर है जैसा ईंट और भींत में अंतर है । ईंटें सब पड़ी हुई हैं, वे बिखरी हुई हैं वे ईटें हैं और वे ही ईंटें एक सिलसिले से ही चिन दी जाती हैं तो उसका नाम भींत कहलाता है । ये कर्म औदारिक अथवा वैक्रियक शरीर के प्रस्तार के अनुकूल उनमें उनके आकार में जो बन जाते हैं उनका नाम है कार्माणशरीर । इन 5 प्रकार के शरीरों में उपयोग नहीं है और उपयोग में 5 प्रकार के शरीर नहीं हैं, क्योंकि इनका तो परस्पर में अत्यंत विपरीत स्वरूप है । उपयोग तो चेतन हैं और कर्म नोकर्म जड़ हैं । इनका तो परस्पर में रंच भी संबंध नहीं है ।

भिन्न पदार्थों के मोह में संक्लेश―जैसे विजातीय पुरुष एक साथ एक कार्यालय में रह रहे हैं तो वे रहते तो एक जगह है पर उनमें संबंध कुछ नहीं है । इसी प्रकार कर्म, नोकर्म और जीव ये एक क्षेत्र में रह रहे हैं, प्रदेशों का एक क्षेत्रावगाह हो रहा है, किंतु स्व-स्व का सांकर्य रंच भी नहीं है । इसमें परमार्थ से आधार और आधेय का संबंध रंच भी नहीं हो सकता । यों कर्म नोकर्म में उपयोग नहीं, उपयोग में कर्म नोकर्म नहीं, फिर भी मोही जीव इस शरीर को देखकर यह माना करता है कि यह मैं हूं, और इसी कारण जगह-जगह अपना अहंकार किया करता है । यह मैं हूँ, यह मेरी बात नहीं मानता है, यह मेरा अपमान करता है, मेरी बात नहीं रही आदि विकल्प मोही जीव के पर्याय बुद्धि के कारण होते हैं ।

देह की भिन्नता का निर्णय होने पर अहंकार का अभाव―मैं शरीररूप नहीं हूँ ऐसा निर्णय होने के पश्चात् फिर आत्मा में अहंकार नहीं हो सकता । मैं जब शरीर भी नहीं हूं तो और फिर क्या हो सकता हूं? मुझे लोग पहिचान भी नहीं सकते हैं । इस मूर्तिक पिंड को देखा करते हैं तो उसको ही पहिचाना करते हैं । पर इस मुझ आत्मतत्त्व को कोई पहिचानता भी नहीं है । ऐसा गुप्त सुरक्षित ज्ञानज्योतिमात्र मैं आत्मतत्त्व हूँ । इस प्रकार से सम्यग्दृष्टि जीव भेदविज्ञान कर रहा है ।

ज्ञान में और अज्ञान में आधार-आधेय भाव की असंभवता―ज्ञान में और कषाय में परमार्थ से आधार-आधेय संबंध नहीं है तथा ज्ञान में और कर्म नोकर्म में भी परस्पर में आधार-आधेय संबंध नहीं है क्योंकि इन सबका स्वरूप परस्पर में एक दूसरे से विपरीत है । जैसा कि जाननमात्र ज्ञान का स्वरूप है क्या ज्ञान का स्वरूप गुस्सा करना आदिक भी है? नहीं । और क्रोधदिक कषाय का जैसा गुस्सा करना आदिक स्वरूप है, क्या यह स्वरूप ज्ञानका हो सकता है? नहीं । जानन में और कषाय में भेद प्रकट है और जब स्वभावभेद है वस्तुभेद भी है, समझिये । इस कारण ज्ञान में और अज्ञान में आधार-आधेयपना नहीं है । ज्ञान में तो आया केवल यह निजतत्त्व और अज्ञान में आये पर और परभाव । परद्रव्य तो हुए कर्म और नोकर्म । परभाव हुआ कषायभाव । इनमें और उपयोग में परस्पर सद्भाव नहीं है ।

अब आगे बतलाते हैं कि ऐसा समागम जीव के तब होता है जब वह ज्ञानभाव के सिवाय अन्य कुछ परिणति क्रियाएं नहीं करता ।


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