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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:समयसार - गाथा 185

From जैनकोष



एवं जाणदि णाणी अण्णाणी मुणदि रागमेवादं !

अण्णाणतमोच्छण्णो आदसहावं अयाणंतो ।।185।।

ज्ञानी की असाता की स्थिति में भी ज्ञान से अविचलितता―जैसे अग्नि से तप्त हुआ स्वर्ण अपने स्वर्णपने के नहीं छोड़ता है उसी तरह ज्ञानी जीव कर्मों के उदय से तप्तायमान हुआ भी ज्ञानीपने के स्वभाव को नहीं छोड़ता है । इस तरह ज्ञानी जानता है और अज्ञानी राग को ही आत्मा मानता है क्योंकि वह अज्ञानी अज्ञानरूपी अंधकार से ग्रस्त है, इस कारण आत्मा के स्वभाव को नहीं जानता । जिस जीव के उत्तम प्रकार से भेदविज्ञान हुआ है उसके क्रोधादिक नहीं है । इस ज्ञान और कषाय का स्वरूप न्यारा-न्यारा है । इनका परस्पर में आधार-आधेय संबंध भी नहीं है । ज्ञान अपने स्वरूप में है, कषाय अपने स्वरूप में है । इन दो प्रकार के भावों का स्वभाव का और विभाव का जो भेदविज्ञान कर लेता है वह ज्ञानी भेदविज्ञान के सद्भाव के कारण केवल जानता रहता है ।

संकट मात्र भ्रम―इस लोक से संकट केवल भ्रम का है । और तो कुछ संकट ही इस लोक में नहीं है । जगत में जितने भी जीव हैं वे सब एक स्वरूप हैं और अपने जीव से सब पृथक्-पृथक् सत्ता रखने वाले हैं । इस दृष्टि से देखो तो अपने आत्मा के सिवाय अन्य कोई भी आत्मा अपना नहीं है, चाहे कोई घर में उत्पन्न हुआ है, चाहे आपको दोस्त मानने लगे हों, कोई आपके कुछ नहीं है पर जब स्वरूप की दृष्टि से देखा तो कौन गैर है? जितने भी जीव हैं वे सब हमारे ही स्वरूप वाले तो हैं । हम किससे मुंह मरोड़े और किससे प्रेम करें? यहाँ सब अंधकार है । स्वरूपदृष्टि से देखने पर ये सब जीव एक समान दिखते हैं और भेददृष्टि से देखने पर सब जीव पृथक् दिखते हैं । और अपने सहज ज्ञानस्वभाव के अतिरिक्त सब जीव अपने से न्यारे दिखते है । ऐसा जो ज्ञानी जीव है वह अपने ज्ञानीपन को नहीं छोड़ सकता है ।

निर्भांत दशा से भ्रम की असंभवता―किसी सामने पड़ी हुई रस्सी में यह भ्रम हो जाये कि यह सांप है तो कितना आकुलित होता है और जब निकट जाकर जान लेता है कि यह तो कोरी रस्सी है, ऐसा मात्र ज्ञान होने के बाद फिर घबड़ाहट नहीं रहती है और ऐसा जानने के बाद जो उसके ज्ञान जागृत हुआ उस ज्ञान को फिर कौन मेटेगा? कोई मित्र आकर कहे कि भाई मेरे कहने से इस रस्सी को सांप जान लो और वैसे ही आकुलित हो तो क्या वह ऐसा कर सकता है? नहीं कर सकता है । एक बार यथार्थ ज्ञान हो जाये और उसको टटोलकर स्पष्ट ज्ञान कर ले, फिर मित्र के समझाने से या किसी के कहने से वह रस्सी को साँप जान ले क्या ऐसा हो सकता है ? नहीं ।

यथार्थज्ञान होने पर ज्ञानित्व का अपरिहार―यथार्थ भेदविज्ञान होने के बाद फिर यह अपने ज्ञानीपन को नहीं छोड़ता । जैसे तीव्र अग्नि में तपाया गया स्वर्ण अपने स्वर्णपने को नहीं छोड़ता है इसी प्रकार कर्मोदय को प्राप्त हुआ भी ज्ञानी अपने ज्ञानस्वभाव को नहीं छोड़ता । स्वर्ण को कितनी ही बार अग्नि में तपावो, क्या तपाने से स्वर्ण अपने स्वर्णपने को छोड़ देगा ? नहीं, बल्कि स्वर्ण को अग्नि में तपाने से स्वर्णत्व के और कांति बढ़ जायेगी । ज्ञानी जीव के कर्म ही कर्मों का उदय हो, पर उन कर्मों के विपाक में यह कहीं अज्ञानी न बन जायेगा । यह तो ज्ञानीपन के स्वभाव को न छोड़ेगा । कितने ही तीव्र उपसर्ग हों, कर्मों के उदय से वह संतप्त हो फिर भी भेदविज्ञानी जीव शुद्ध आत्मा के सम्वेदन को नहीं छोड़ता है ।

उपसर्ग में भी ज्ञानी का ज्ञानित्व―जैसे सुकुमाल, सुकौशल, पांडवों पर और भी अनेक महापुरुषों पर कितने ही उपसर्ग आए पर उन उपसर्गों के समय वे अपने शुद्ध ज्ञान से विचलित हुए । यह सब ज्ञान की महिमा है । जैसे रस्सी को रस्सी जान ले कोई, फिर कोई चाहे मुक्का घूंसा मारे पर कहे कि अरे तू इस रस्सी को सांप जान, तो क्या वह रस्सी को सांप समझ सकता है? नहीं । बस इसी प्रकार जिसने आत्मा के सहजस्वरूप का दर्शन कर लिया है और सर्व साधारण शुद्ध तत्त्व समझ लिया है वह कितने ही परिषह और उपसर्ग में पड़ जाये किंतु यथार्थ जान लेने से वह उल्टा जान कैसे सकता है? शुद्ध आत्मतत्त्व का सम्वेदन और सहजानंद का अनुभवन जो किए है वह तो नहीं मिटाया जा सकता है । ऐसे उपसर्ग में जब वह निर्विकल्प समाधि में रत है उस काल में सुख दुःख का भी ज्ञान नहीं है और कदाचित् निर्विकल्प समाधि में रत नहीं है किंतु ध्यान अवस्था में है उस काल में वह परिणमन ज्ञेयमात्र रहता है कि यह भी ऐसा हो रहा है ।

भेदविज्ञान का अलौकिक बल―भेदविज्ञान की कितनी पराकाष्ठा है यहाँ कि जैसे दूसरे के बुखार का दूसरा पुरुष ज्ञान की कर सकते हैं दुःख नहीं भोग सकता है, इसी प्रकार ये भी सर्व आत्मा से भिन्न वस्तु हैं, ऐसा भेदविज्ञान उनके दृढ़ होता है जो ज्ञातामात्र रहते हैं । फिर उससे कोई नीचे दर्जे की तीसरी परिस्थिति में कदाचित कुछ वेदना भी जागृत होती है तो वह सामान्य रूप से होती तो है, किंतु ज्ञानबल के प्रताप से उस वेदना को नगण्य मानकर वह अपने कार्यों में प्रवृत्त होता है । साधुसंतों के उपसर्ग के समय में ये तीनों प्रकार की परिस्थितियां होती हैं । सो जो जैसे विकास वाला साधु है वह अपने आपमें उस योग्य विकास को करता है । किंतु ज्ञानी ज्ञानीपने के स्वभाव को नहीं छोड़ता, क्योंकि हजारों विरुद्ध कारण जुट जाये तो भी स्वभाव दूर नहीं किया जा सकता । यदि उस स्वभाव को भी दूर कर दिया जाये तो वस्तु का तो अत्यंत अभाव हो जायेगा ।

ज्ञानी के ज्ञान का अनुच्छेद―ज्ञानी का ज्ञान है शुद्ध ज्ञाताद्रष्टा रहना । यदि ज्ञाताद्रष्टा रहना नष्ट हो जाये तो अब वह ज्ञानी ही क्या रहा, और ज्ञान ही न रहा तो आत्मा ही क्या रहा? वस्तु का उच्छेद हो जायेगा, पर वस्तु का उच्छेद नहीं है । जो सत् पदार्थ है उसका नाश असंभव है । ऐसा जानता हुआ कर्मों से आक्रांत भी ज्ञानी हो रहा है तो भी न राग करता है, न द्वेष करता है, और न मोह करता है किंतु शुद्ध आत्मा को ही प्राप्त करता है ।

ज्ञानी के ज्ञान की एकरूपता―आत्मा ज्ञानमात्र है, उसका काम जानना है । और अयथार्थ जानन का अदल बदल होता है पर यथार्थ जानन का अदल बदल नहीं होता है । जहाँ यह ज्ञान हुआ कि लो यह मैं तो ज्ञान ज्योतिमात्र हूँ जो कुछ कर सकता हूँ अपने में कर सकता हूँ, उसका जो फल मिलता है वह अपने लिए मिलता है । अपने ही परिणमन से हटकर अपने ही परिणमन को करता हूँ और ये सब अपने में किया करता हूँ । मेरे स्वरूप का किसी भी अन्य पदार्थ से कोई संबंध नहीं है । ऐसा जो पुरुष जानता है वह शुद्ध आत्मा को प्राप्त करता है । अर्थात् समस्त परपदार्थों से भिन्न और उन सब पर का निमित्त पाकर उत्पन्न होने वाले विभावों से भिन्न केवलज्ञान ज्योतिमात्र मैं हूँ―इस प्रकार का अनुभव करता है ।

संकट से छूटने के लिये मोही का संकटरूप यत्न―भैया ! जगत के जीव जितना भी यत्न करते हैं वे सब सुख पाने के लिए करते हैं और आनंद की प्राप्ति इस जीव को शुद्धज्ञान से ही हो सकती है । इस जीव को जितने भी संकट हैं वे सब भ्रम में हैं । घर में रहकर अच्छे मजे मौज के परिवार को देखकर आनंद मनाते हैं, संपदा बढ़ती है तो खुश होते हैं अथवा कुछ अपनी ही गोष्ठी के बीच कुछ दिलचस्प बातें मन के अनुकूल होती हैं तो आनंद मानते हैं किंतु यह सबका सब जो कुछ गुजर रहा है यह जीव पर संकट है । क्या धन इस जीव का सहायक होगा? नहीं । मृत्यु के बाद तो साथ में रंच भी न जायेगा और जब तक जीवित हैं तब तक भी सुख का विषय नहीं बन सकता । किंतु धन पर ही सबकी दृष्टि है, धन कम है तो दु:खी रहते हैं और अधिक है तो तृष्णा में व्याकुलता रहेगी । ये सबके सब जिन्हें कहते हैं पुण्य वैभव, वे सब संकट हैं इस जीव पर ।

संकट मेटने का उपाय―इस जीव के संकट मेटने का उपाय है शुद्ध ज्ञान का अनुभव होना । यह संसार एक जाल है, गोरखधंधा है । इससे निकलना कठिन भी है और बड़ा सुगम भी है । अहो इसी समय सर्व पर का विकल्प त्यागकर अपने इंद्रिय मन को संयत करके अंतर में ही कुछ निरखा जाये तो लो इसी समय सुख हो गया और इतनी बात नहीं की जा सकती है तो सुख कभी मिल ही नहीं सकता । कैसे लाओगे, कहाँ से लाओगे सुख? जड़ वस्तुओं में तो सुख गुण है ही नहीं । उनका संचय विग्रह किया तो सुख आयेगा कहाँ से? अन्य जीवों में सुख गुण तो है मगर उनका सुख गुण उनके ही लिए है, मेरे लिए नहीं है । ऐसा जो वस्तु के स्वरूप को यथार्थ जानता है वह शुद्ध आत्मा को प्राप्त करता है और जो शुद्धआत्मा को जानता है वह संकट से दूर हो जाता है ।

भेदविज्ञान बिना आत्मा की उपलब्धि का अन्य उपाय नहीं―जिसके भेदविज्ञान नहीं है वह भेदविज्ञान के अभाव से अज्ञान अंधकार से आच्छन्न होकर, डूबकर, तिरोहित होकर चैतन्य चमत्कार मात्र आत्मा के स्वभाव को न जानता हुआ, रागादिक को ही आत्मा मानता हुआ राग करता है, द्वेष करता है, मोह करता है । वह पर से विविक्त इस निज शुद्ध आत्मा को नहीं प्राप्त कर सकता ।

शुद्ध स्वरूप की दृष्टि का प्रताप―शुद्ध के मायने हैं सबसे न्यारा । न्यारा बन जाये, शुद्धपर्याय तो अपने आप हो जायेगी । केवल ज्ञानपरिणमन करने के लिए उद्यम नहीं करता है । वह तो स्वयं होगा । यत्न तो इस बात का करना है कि परपदार्थों में मैं हूँ, मुझ में पर है, मैं इस रूप हूँ इस प्रकार का जो पर में सम्मिश्रण हो रहा है उस पर के उपयोग से हटना है और सबसे न्यारे विविक्त केवल अपने को स्वभावमात्र निरखना है । ऐसी दृष्टि यदि कुछ क्षण तक लगातार रह जाये, अंतर्मुहूर्त तक लगातार निर्विघ्न रह जाये तो -इस अनंत ज्ञान के अनुभव में ही सामर्थ्य है कि बिना चाहे, बिना उपयोग लगाए, बिना बुद्धि किए समस्त लोकालोक का एक साथ ज्ञान हो जाता है । भैया ! जिसमें लोग सुख मान रहे हैं, घर गृहस्थी में, धनवैभव में, ये सब शुद्ध ज्ञान विकास के बाधक हैं । तो जो अपने शुद्ध ज्ञानस्वरूप को देखेगा उसको सर्व कुछ प्राप्त होगा । इससे यह निश्चय करना कि भेदविज्ञान से ही शुद्ध आत्मा की प्राप्ति होती है ।

भेदविज्ञान के स्थान―अब भेदविज्ञान कितनी श्रेणियों में होगा? स्पष्ट पृथक् तो धन वैभव मकान हैं, सो इन्हें प्रथम ही भिन्न निरखना -चाहिए । फिर इनके बाद जो चेतन पदार्थ हैं पुत्र, मित्र, स्त्री इन सबको अपने से भिन्न देखना, तीसरे भिन्न देखना इस देह से? जिस देह से एक क्षेत्रावगाह रूप से ठहरा है । इस देह से न्यारा देखना, यह भेदविज्ञान तीसरी श्रेणी का है । उससे उत्कृष्ट इसके पश्चात् जैसे कि आगम के द्वारा जाना गया है और युक्तियों से समझा गया है, ज्ञानावरणादिक द्रव्य कर्म से भिन्न अपने को तकें यह हुई चौथी बात । पांचवीं बात―इन कर्मों के उदय का निमित्त पाकर जो रागद्वेषादि भाव होते हैं उन रागद्वेषादि भावों से अपने को न्यारा समझो । छठी बात―जो इतने विचार विकल्प हुआ करते उन विचार विकल्पों से न्यारा अपने को समझो । 7 वीं बात―जो इतना जानने में परिवर्तन चल रहा है यद्यपि उन परिवर्तनों का संबंध रागद्वेष भावों से नहीं है, रागद्वेष पहिले थे इस संस्कार के कारण रागद्वेष में मिट जाने पर जो ज्ञप्ति परिवर्तन रहता है, जानन की अस्थिरता रहती है उस ज्ञप्ति परिवर्तनरूप क्रिया से भी अपने को भिन्न समझना है । फिर इसके पश्चात् शुद्ध आत्मा की उपलब्धि के प्रताप से केवलज्ञान प्रकट होगा, किंतु प्रकट होने वाले उस केवलज्ञान से भी न्यारा केवल ज्ञानस्वभावमात्र अपने को देखो ।

ज्ञानस्वभाव की अनुभूति केवलज्ञान―भैया ! केवलज्ञान अभेद स्वानुभूति के पश्चात् प्रकट होता है, अनादि से नहीं है । वह समय-समय पर उत्पन्न होता है । प्रति समय नवीन-नवीन ज्ञान, ज्ञानरूप से परिणमा करता है । यह मैं स्वतःसिद्ध अनादि अनंत ज्ञानस्वभाव मात्र हूँ, यों समस्त पर और परभावों से और समस्त पर्यायों से भी न्यारा ज्ञानस्वभावमात्र अपने को देखना यह है भेद विज्ञान का फल । पहिले हुआ भेदविज्ञान उससे किया पर से अपने को न्यारा, फिर भी इस ही कर्म के फल से पर को छोड़कर केवल निज को ग्रहण किया और अब केवल निज में ही ग्रहण करने लगा । ऐसे भेदविज्ञान के फल में जो अभेद ज्ञान प्राप्त किया उस अभेद ज्ञान में इतनी सामर्थ्य है कि भव-भव के भी बांधे हुए कर्म क्षणमात्र में ही खिर जाते हैं और यह निर्मल आत्मा लोकालोक का ज्ञाता हो जाता है ।

आनंदमय पद की प्राप्ति का मूल उपाय आंतरिक भेदविज्ञान―जीव तो ज्ञान और आनंद में सहज तन्मय है । कहीं से ज्ञान और आनंद लाना नहीं है । बस केवल इसने जो ऊधम कर रखा है विवेक करके उन ऊधमों को, विभावों को दूर करना है । परमात्मत्व तो स्वयमेव प्रकट होता है । जरा निरूपित भेदविज्ञान को पुन: उपयोग में लायें, घर से मैं न्यारा हूँ इसको दुनिया कहती है । देह से भी जुदा हूँ इसे भी दुनिया मानती है पर अपने आपमें उत्पन्न होने वाले ज्ञान और कषाय इन दोनों में भेद किया जाना सफल भेदविज्ञान है । जैसे कभी लोग कहते हैं ना कि एक मन तो कहता है कि अमुक काम किया जाये और एक मन कहता है कि यह काम करने योग्य नहीं है । वे दो मन हैं क्या? अरे वे कुछ नहीं हैं । वे ज्ञान और कषाय के प्रतीक भाव हैं । कषाय कहता है कि ऐसा कर डालना चाहिए, तब ज्ञान कहता है कि यह करने योग्य नहीं है । इस प्रकार ज्ञान और कषाय में प्रकट स्वरूपभेद है ।

स्वरूपभेद से वास्तविक भेद―एक का दूसरा क्या लगता है? भिन्न प्रदेश है, भिन्न सत्ता है, भिन्न स्वरूप है । इस ज्ञान और कषाय का तो आधार-आधेय भेद भी नहीं है कि कषाय में कषाय स्थित है व ज्ञान में ज्ञान स्थित है । तब फिर क्या है? स्वरूप प्रतिष्ठितत्व संबंध है । ज्ञान अपने जाननस्वरूप में है, कषाय अपने गुस्सा आदिक के रूप में स्थित है । ज्ञान में कषाय नहीं है, कषाय में ज्ञान नहीं है ऐसे अपने आपमें ही स्वभाव को तिरोहित करके उत्पन्न होने वाले कषाय में और स्वभाव में भेद किया जा रहा है कि मैं ज्ञानमात्र हूँ । यह कषाय परभाव है । इसमें तो आधार-आधेय संबंध नहीं ।

ज्ञान और कषाय की अनाधाराधेयता पर एक दृष्टांत―जैसे आकाश जुदा है और ये मकान आदिक जुदा हैं । आकाश में मकान नहीं हैं मकान में आकाश नहीं है । अथवा मोटेरूप में चाहे समझ लो कि एक घर में ही दो भाई रहते हैं किंतु उनका किसी कारण चित्त परस्पर में फट जाये तो उस भाई का वह कुछ नहीं है । उसमें वह नहीं, उसमें वह नहीं । इसी प्रकार जितने भी जगत के पदार्थ हैं इन सब पदार्थो का स्वरूप फटा हुआ है, बंटा हुआ है । आकाश भी यहीं है और ये मकान आदिक भी यहीं हैं किंतु आकाश का अस्तित्व आकाश में है । आकाश के प्रदेश आकाश में ही हैं, आकाश में मकान नहीं, मकान में आकाश नहीं । व्यवहारदृष्टि से तो यद्यपि यह साफ नजर आ रहा है कि आकाश में ही तो मकान है, पर स्वरूप-दृष्टि से देखें तो मकान में मकान है, आकाश में आकाश है । उनमें आघार-आधेय का संबंध नहीं है ।

ज्ञान और कषाय की अनाधाराधेयता पर दूध पानी का दृष्टांत―जैसे और दृष्टांत लो । पावभर दूध में पावभर पानी मिल गया, वे एक में मिल जाने से एक रस हो गए, पर दूध में पानी नहीं है और पानी में दूध नहीं है । दिखने में ऐसे न्यारे नहीं आते हैं किंतु आग पर गर्म करने से वे न्यारे-न्यारे स्पष्ट मालूम होते हैं । पानी तो भाप बनकर उड़ जाता है और दूध रह जाता है । दूध में दूध था और पानी में पानी था । वे दोनों तन्मय नहीं हो गए थे । इस प्रकार की भेदयुक्ति से दूध में दूध रह गया और पानी में पानी रह गया । इसी प्रकार एक ही क्षेत्र में जीव, पुद्गल, धर्म, अधर्म, आकाश काल छहों बराबर रह रहे हैं । फिर भी किसी में कोई दूसरा नहीं है । आकाश में पांचों द्रव्य नहीं हैं । जीव में पांचों द्रव्य नहीं हैं । किसी भी द्रव्य में बाकी कोई द्रव्य नहीं है ।

सम्यक्त्व भाव की आदेयता―भैया ! सबसे उत्कृष्ट भाव है यह सम्यक्त्व भाव । यदि सम्यक्त्व प्रकट होता है तो फिर अन्य वस्तुओं का महत्त्व क्या है? ‘चक्रवर्ती की संपदा इंद्र सारिखे भोग । काकवीट सम गिनत हैं सम्यग्दृष्टि लोग ।।’ अपने आपके स्वरूप की महिमा जब तक अपने आपको न मालूम हो तब तक अपने को दीन समझना चाहिए और जब अपने स्वरूप की महिमा अपनी समझ में आ जाये तब यह समझना चाहिए कि हम अब सत्पथ पर हैं । अपनी ऋद्धि समृद्धि पर ध्यान देने से निराकुलता होती है । जितनी शक्ति बने उतना करो, पर शक्ति न हो तो श्रद्धा से न चिगो । श्रद्धा से चिग जाने पर फिर इस जीव का हित नहीं हो सकता है ।

इस प्रकार दो गाथाओं में यह वर्णन किया गया है कि शुद्ध आत्मा के अनुभव से ही हित होता है और शुद्ध आत्मा की प्राप्ति भेदविज्ञान से होती है । इसलिए सर्व प्रयत्न करके मूल में स्वभाव और विभाव का भेदविज्ञान उत्पन्न कर लेना चाहिये । अब शुद्ध आत्मा की प्राप्ति से संवर किस तरह होता है, ऐसा प्रश्न होने पर इसमें समाधान में यह गाथा कही जा रही है:―


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