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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:समयसार - गाथा 190-192

From जैनकोष



तेसिं हेदू भणिदा अज्झवसाणाणि सव्वदरिसीहिं ।

मिच्छत्तं अण्णाणं अविरयभावो य जोगो य ।।191।।

हेदुअभावे णियमा जायदि णाणिस्स आसवणिरोहो ।

आसवभावेण विणा जायदि कम्मस्स वि णिरोहो ।।192।।

कम्मस्साभावेण य णोकम्माणं पि जायदि णिरोहो ।

णोकम्मविरोहेण य संसारणिरोहणं होदि ।।193।।

संसारनिरोध का क्रम―किस क्रम से संसार निरोध होता है उस क्रम का यहाँ वर्णन चल रहा है । रागद्वेष मोहरूपी आस्रवों के कारण सर्वज्ञदेव ने मिथ्यात्व अज्ञान अविरति भाव और योग इन चारों अध्यवसानों को कहा है । अज्ञान के इस आस्रव का अभाव होने से नियम से आस्रव का क्षय होता है । करुणानुयोग की दृष्टि से तो मिथ्यात्व जहाँ है वहाँ मिथ्यात्वजनित आस्रव नहीं है । जहाँ अविरति नहीं हैं वहाँ अविरतिजनित आस्रव नहीं है । इसी प्रकार कषायादिक से भी अलग होने से कषायजनित कर्मों का भी निरोध होता है । तथा योग का अभाव होने पर सर्वथा आस्रव का अभाव होता है । कर्मों के निरोध से नोकर्म का निरोध होता है और नोकर्म का निरोध होने से संसार का निरोध होता है और संसार के ही निरोध का नाम मोक्ष है । जगह का नाम संसार नहीं हैं, किंतु मलिन परिणामों का नाम संसार हैं । और निर्दोष परिणामों का नाम मोक्ष है । द्वेष सहितपने को संसार कहते हैं और द्वेष रहितपनेको मोक्ष कहते हैं ।

परिणामशुद्धि का फल निराकुलता―भैया ! वीतरागता से पहले ज्ञानी जीव के रागद्वेष भी कुछ पदवियों तक चलता है किंतु राग द्वेष में वे बसते नहीं हैं । उदय है, होते हैं विभाव, पर उन उदयों में, उनके उपयोगों में ज्ञानी जीव फंसते नहीं हैं । जैसे पानी में नाव रहे तो नाव का बिगाड़ नहीं होता पर नाव में पानी आ जाये तो नाव का बिगाड़ है । इसी प्रकार संसार में ज्ञानी आत्मा

बसता है पर ज्ञानी में संसार बस जाये तो ज्ञानभाव छूटकर अज्ञानभाव आ जाता है । जगत का नाम संसार नहीं है, मुक्त जीव भी लोक के अंदर ही हैं कहीं अलोक में नहीं पहुंच जाते हैं, लोक में रहकर भी अनंत आनंदमय हैं ।

मलिन परिणाम का फल क्लेश―जिस जगह मुक्त जीव हैं उस ही स्थान में अनंत निगोदिया जीव भी हैं । उस ही एकक्षेत्र में हैं जिस क्षेत्र में मुक्त जीव हैं । पर निगोदिया जीव वहाँ उतने दु:खी हैं जितने दु:खी यहाँ के निगोदिया हैं । वहाँ ऐसी रंच भी सुविधा नहीं है कि चलो वे सिद्धलोक के वासी निगोदिया हैं तो इनका स्वास में 18 बार जन्ममरण होता है तो कम से कम उनका जन्ममरण आधा कर दें, स्वास में 9 बार ही जन्ममरण करें सो नहीं है । वैसा ही क्लेश, वैसी ही मलिनता उनमें है जैसे कि यहाँ के निगोदिया जीवों में है । इस लोक में ही समस्त द्रव्य रहते हैं, उन द्रव्यों के रहने से कुछ अंतर नहीं पड़ता है । रह रहे हैं । परमार्थ से समस्त द्रव्य अपने-अपने स्वरूप में रह रहे हैं, पर खुद के स्वरूप का जैसा परिणाम है वैसा ही उनको फल मिलता रहता है ।

स्वरक्षा का उपाय―भैया ! इन संसार के जीवों का रक्षक कोई दूसरा नहीं है । आँख पसारकर देखते हैं, जो दृष्टिगोचर होता है वह सब अपने ही तरह मायामय परिणति वाला है । वे स्वयं अशरण हैं, उनका क्या सहारा सोचते हो । सहारा तो अपने आपके उस अनादिअनंत अहेतुक स्वभाव का लो । इसका ही सहारा लो । जगत चाहे कैसा ही परिणमें, अपने प्रभु का सहारा लेने वाला कर्मों का क्षय करके मुक्ति को प्राप्त करेगा । और अपना सहारा छोड़ दिया, बाहर में दृष्टि दिया तो बाह्यपदार्थ न तो शरण हैं, न उनका सदा संयोग है कुछ काल का समागम है पर अंत में उनका वियोग नियम से होगा । जैसे कि चींटी भींत पर चढ़ती है फिर गिर जाती है, फिर चढ़ती है फिर गिर जाती है, फिर चढ़ती है । इसी प्रकार यहाँ भी भाव चढ़ता है, फिर गिर जाता है । गिरने दो चढ़ने दो, पर अपनी धुन यही रखो कि हमको तो अपने परिणामों में चढ़ना ही है । यह निज शुद्ध ज्ञानमात्र जो परमानंदमय स्वरूप है उसकी दृष्टि करना है । उस दृष्टि में रहें तो हमारी रक्षा है और उस दृष्टि में न रहें तो न पड़ोस के लोग रक्षक हैं और न कुटुंब के लोग रक्षक हैं । हमारी रक्षा करने में समर्थ कोई दूसरा पुरुष नहीं है ।

जिनशासन से उपलभ्य भाव―जैन शासन की प्राप्ति का सर्वोत्कृष्ट फल यही है कि ऐसी दृष्टि जगे कि मैं सर्व से भिन्न केवल ज्ञानमात्र हूँ । मेरा न कोई दूसरा सुधार कर सकता और न कोई बिगाड़ कर सकता । मुझे कोई सुख या दुःख नहीं दे सकता । यह मैं ही अपने आपके स्वरूप से चिगकर बाह्य अर्थों में विकल्प करता हूँ तो स्वयं ही बिगड़ता हूँ स्वयं ही दु:खी होता हूँ । सर्व पदार्थ स्वयं सत् हैं । किसी भी पदार्थ का कोई दूसरा पदार्थ कुछ परिणमन नहीं कराता । ऐसा आत्मस्वरूप समझकर अपने आपमें रमने का यत्न करना चाहिए । यदि अपने खिलौने में न रम सके तो बाहरी दूसरे पदार्थरूपी खिलौनों में बुद्धि फंस जायेगी और दूसरे का खिलौना तो दूसरे का ही है । उस पर तो इस बालक जीव का कुछ अधिकार नहीं है । तो वे खिलौने सदा साथ रहते नहीं, मन के माफिक परिणमते नहीं तो निरंतर आकुलताएं बनी रहती हैं ।

वास्तविक जीवन―भैया ! कोई क्षण ऐसा हो जब ज्ञानमात्र आत्मस्वभाव का अनुभव हो, वही वास्तविक नया दिन है, नया क्षण है वही । जीवन का प्रारंभ वहाँं से है जहाँ से पासा एकदम पलट जाये, यह बड़े साहस की बात है । आज का समय कई बातों में कुछ क्षीण है । शरीर बल से, मनोबल से, सत्संग बल से सब ओर से ह्रास का परिणाम होता जा रहा है । ऐसे समय में भी जो ज्ञानी गृहस्थ संत श्रावक अपने आपके स्वरूप की दृष्टि बनाए हुए गृहस्थ धर्म को निभाते हैं वे इस काल के आदर्श मुमुक्षु हैं । जितने क्षण अपने शुद्ध ज्ञानस्वरूप पर दृष्टि तो स्वरक्षा है और जितने क्षण अपने स्वभाव से चिगकर बाह्य पदार्थों में दृष्टि रहेगी उतने क्षण अरक्षा है ।

मोक्षमार्ग व संसारमार्ग―संवर अधिकार के प्रकरण में ये अंतिम तीन गाथाएँ हैं । यहाँ संवर का क्रम बतलाया जा रहा है । संवर का विरोधी है आस्रव । उस आस्रव का मूल है अध्यवसान अर्थात् मिथ्यात्व अविरति अज्ञान और योग । इन चार चीजों में तीन चीजें तो नहीं हैं जो मोक्ष मार्ग के विपरीत हैं पर योग भी किसी अंश में चारित्र का विघात है । सम्यग्दर्शन ज्ञानचारित्राणि मोक्षमार्ग: । मोक्ष तो सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान व सम्यक्चारित्र की एकता को कहा है । तो मिथ्यादर्शन ज्ञानचारित्राणि संसारमार्ग: । संसार, मिथ्याज्ञान व मिथ्याचारित्र कहा है । इसी का नाम है मिथ्यात्व, अज्ञान और अविरति । ये तीनों भावात्मक चीजें हैं और योग प्रदेशात्मक चीज है । आस्रव का कारण अध्यवसाय है और साथ ही योग है । इन चार अध्यवसायों का मूल है आत्मा और कर्म के एकत्व का निश्चय । आत्मा है ज्ञायक स्वभावमात्र और इसका कर्म है रागादिक विकार भाव । इन रागादिक कर्मों में और इस ज्ञायक स्वभाव में भेद न करके एकत्व का परिचय रहना सो ही कर्मों का आस्रव का मूल है । किंतु जैसे हंस अपनी चोंच के स्पर्श से दूध और पानी को अलग कर देता है, पानी को छोड़कर केवल दूध ग्रहण कर लेता है इसी प्रकार ज्ञानी भव्य इस स्वभाव और विकार में इस मिले हुए तत्त्व में उपयोग और विकार को अलग-अलग कर लेता है । जो ध्रुव है, अनादि अनंत अहेतुक है, निश्चय प्राणरूप है, ऐसा ज्ञानस्वभावी तो मैं हूँ । और उपाधि का निमित्त पाकर जो विकारभाव होते हैं वे विकारभाव मुझसे अत्यंत पृथक् हैं ।

ज्ञानी जीव से विपरीत अज्ञानी की स्थिति―भैया ! स्वभाव व विभाव में भेदविज्ञान करके विकारों को छोड़कर स्वभाव को जो ग्रहण करता है और स्वभाव को पी लेता है, अर्थात् स्वभाव दृष्टि करके एक समरसरूप अनुभव करता है वह विवेकी पुरुष है ज्ञानी संत निकटभव्य है किंतु इससे उल्टा जो अभव्य है, जिसका होनहार उत्तम नहीं हैं वह हाथी की तरह सुंदर और असुंदर भोजन को मिलाकर एक साथ खा लेता है । हाथी के सामने मिठाई भी डाल दी जाये और घास भी डाल दी जाये तो उसकी ऐसी वृत्ति है कि वह घास में मिलाकर चबा लेता है । इसी प्रकार अज्ञानी जीव उसके समक्ष दो तत्त्व मौजूद है―एक ज्ञानरूप तत्त्व और दूसरा अज्ञानरूप तत्त्व । तो वह अज्ञानी जीव ज्ञेय और ज्ञान को मिलाकर एक रसरूप अनुभव करता है । वह ज्ञान तो स्वयं में ही है ना, पर उस ज्ञान में एक ऐसी कल्पना आ गई कि अपने स्वरूप को तो भूल गया और ज्ञेय को याने परस्वरूप को सर्वस्व मानने लगा तो ऐसी कल्पना में इसने ज्ञान और ज्ञेय को मिलाकर एक रसरूप अनुभव किया, इस प्रकार ज्ञान और ज्ञेय का मिश्रित स्वाद यह अज्ञानी जीव लेता है । ऐसी तो अज्ञानी जीव की स्थिति है और ज्ञानी जीव की स्थिति यह है कि वह स्पष्ट एकदम ज्ञानस्वभाव को परखता है, जानता है और उसमें रमने का यत्न करता है ।

सांसारिक सृष्टि का हेतु―आस्रव भाव हैं मिथ्यात्व, अविरति, अज्ञान और योग । उसका कारण है आत्मा और कर्मों के एकत्व का निश्चय करना । ये आस्रव भाव नवीन कर्मों के आने के हेतु हैं और ये कर्म नवीन शरीर पाने के हेतु हैं और ये नवीन कर्म संसार के हेतु हैं । तब यह निश्चय करो कि नित्य ही यह आत्मा, आत्मा और कर्मों में एकत्व का भ्रम करके मिथ्यात्व, अज्ञान, अविरति, योगमय अपने आत्मा का निश्चय करता है । जैसे अब सब भाई अपने आप में ऐसा निश्चय किए बैठे हैं कि मैं अमुक लाल हूँ, मैं अमुक चंद हूँ, अमुक स्थिति का हूँ, ऐसे घर वाला हूँ, ऐसा निश्चय भी एक स्वभाव के विपरीत निश्चय है । पर ऐसा होते हुए भी चूंकि व्यवहार में कुछ न कुछ नाम तो रखना ही पड़ता है और कुछ न कुछ परिणमन में रहना ही पड़ता है, सो रहते हुए भी अपने आपमें जो यह निश्चय बनाए रहता है कि यह मैं सामान्य जीव एक ऐसा शुद्ध आत्मा हूँ जिसका कि कुछ नाम नहीं । यह तो केवल अपने स्वभाव में अंत: चकचकायमान चैतन्य चमत्काररूप है । ऐसा अपने आपका विश्वास रखे तो वे क्रियाकलाप सब खत्म हो जाते हैं । जो अपने को नाम वाला, परिवार वाला, समागम वाला अनुभव करता है ऐसा निश्चय करने वाला रागद्वेष मोहरूपी आस्रव भाव को भाता है । उस आस्रवभाव से कर्मों का बंध होता है । उन कर्मों से फिर नोकर्म होते हैं । उन नोकर्मों से फिर संसार उत्पन्न होता है, और इस संसार के होने से ही दुःख है ।

यथार्थ दर्शन के लिये प्रेरणा―हम रहते कहाँ हैं? कहीं रहें पर हमारी दृष्टि में सर्वोच्च तत्त्व रहना चाहिए । यह सर्वोच्च तत्त्व क्या है? व्यवहार से तो परमात्मस्वरूप है और परमार्थ से आत्मस्वरूप है । ये दो ही सर्वोच्च तत्त्व हैं । जहाँ तक हो आत्मस्वरूप में स्थित रहें । न हो सके तो उस आत्मतत्त्व की दृष्टि करने के लिए हम परमात्मस्वरूप का ध्यान करते रहें । इन दो के अतिरिक्त और तो कोई शुद्ध तत्त्व नहीं है इसी कारण व्यवहार में शरण है तो अरहंतदेव सिद्ध भगवान शरण हैं । परमार्थ से शरण है तो हमारा भगवान शरण है । यों दृष्टि उस शुद्ध सर्वोच्च तत्त्व पर रहनी चाहिए । ऐसा ख्याल छोड़ दो, संस्कार और विश्वास छोड़ दो कि मैं अमुक नाम धारी हूँ, मैं अमुक जाति का हूँ, मैं अमुक पोजीशन का हूँ, मैं अमुक संग वाला हूँ, इस विपरीताशय को छोड़ दो, ऐसा ख्याल करो कि यह मैं केवल अपने आपमें अपने स्वरूप हूँ, और ऐसा ही हम संस्कार बनाएँ कि मैं शरीर से बिल्कुल पृथक् केवल चैतन्यमात्र आत्मतत्त्व हूँ । ऐसी दृष्टि होने पर हम अपने को शुद्ध पायेंगे, और शुद्ध आत्मतत्त्व की प्राप्ति होने से यह संवरतत्त्व प्रकट होगा । यह संवरतत्त्व हमारा परम सुखदायी है । हमारा कर्तव्य है कि हम अपने आपको बस भावना से वासित बनाए रहें कि मैं तो केवल ज्ञानमात्र हूँ, अन्य अधिकरूप मैं नहीं हूँ, मैं अन्य विकाररूप नहीं हूँ―इस भावना से संवरतत्त्व प्राप्त होता है ।

संसारनिरोध का हेतु और संवर का क्रम―संसार का निरोध कैसे होता है ? संसार के हेतु क्या हैं उनका निरोध करें तो संसार का निरोध हो सकता है । संसार का हेतु है शरीर, शरीर का हेतु है कर्म, कर्मों का निरोध हो तो नोकर्म का निरोध हो सकता है और कर्मों का हेतु है आस्रव भाव याने के रागद्वेष मोह, और रागद्वेष मोह का साधन है आत्मा और कर्मों के एकत्व का अभ्यास । आत्मा जो कुछ करता है उस क्रिया में और अपने स्वरूप में आस्रव से होते हैं कर्म में, कर्मों से नोकर्म और नोकर्म से संसार होता है । जहाँ इस जीव ने अपनी और अपनी क्रिया की, भेदविज्ञान किया अर्थात् मैं शाश्वत ज्ञानस्वभावी हूँ और परिणतियां मेरे स्वभाव से अत्यंत भिन्न हैं―ऐसा भेदविज्ञान जब किया और शुद्ध चैतन्य चमत्कार मात्र आत्मा को प्राप्त किया तो मिथ्यात्व, अज्ञान, अविरति, योगरूपी अध्यवसानों का अभाव हो जाता है । जब रागादिक का अभाव होगा, जब मिथ्यात्व आदिक का भी अभाव होगा और जब रागादिक का अभाव हुआ तो कर्मों का भी अभाव हो जाता है । कर्मों का अभाव हो जाने पर नोकर्मों का भी अभाव होता है और नोकर्मों का अभाव होनेपर संसार का भी अभाव होता है । ऐसा यह संवर का क्रम है ।

अनवरत भेदविज्ञान करने की प्रेरणा―भैया ! शुद्ध तत्त्व की उपलब्धि होने से साक्षात् संवर तत्त्व उपलब्ध होता है और वह उपलब्धि भेदविज्ञान से होती है । इस कारण भेदविज्ञान की ही निरंतर भावना करनी चाहिए । यह भेदविज्ञान तब तक बनाए रहना चाहिए जब तक पर से च्युत होकर यह ज्ञान स्वरूपी अपने आत्मतत्त्व में प्रतिष्ठित न हो जाये । शरीर को छोड़कर आत्मा के सहजस्वरूप चैतन्यभाव का अध्ययन करना चाहिए । जितने भी सिद्ध हुए हैं वे सब भेदविज्ञान से ही हुए हैं और जितने भी अभी तक बंधे है वे सब भेदविज्ञान के अभाव से बंधे हुए हैं । यद्यपि केवलज्ञान की अपेक्षा से रागादिक विकल्परहित स्वसम्वेदनरूप भाव श्रुतज्ञान शुद्ध निश्चयनय की दृष्टि से परोक्ष कहा जाता है याने ज्ञान के 5 भेद हैं―मति, श्रुत, अवधि, मनःपर्यय और केवल । इन पांचों में से आत्मानुभवरूप भावज्ञान को किसमें गर्भित करोगे? मति श्रुत के सिवाय कोई तीसरा ज्ञान तो अपने नहीं हैं । या तो मति रूप कहो या श्रुत रूप कहो । मतिज्ञान कहो तो परोक्ष हुआ, श्रुतज्ञान कहो तो सविकल्प हुआ । सो यह यद्यपि केवलज्ञान की अपेक्षा परोक्ष कहा जाता है तो भी इंद्रिय और मन से उत्पन्न हुए विकल्प ज्ञान की अपेक्षा से वह प्रत्यक्ष कहा जाता है । इस कारण से आत्मा स्वसम्वेदन ज्ञान की अपेक्षा से प्रत्यक्ष होता है और केवलज्ञान की अपेक्षा से वह परोक्ष कहलाता है । पर उस स्वसम्वेदन ज्ञान को केवल परोक्ष नहीं कहना चाहिए ।

स्वानुभव की अतींद्रिय प्रत्यक्षता―भैया ! क्या चतुर्थकाल में भी केवलज्ञानी इस ज्ञान को हाथ में रखकर दिखा पाते थे? वे भी दिव्यध्वनि से बोलकर चले जाया करते थे । वहाँ भी उनके उपदेश के श्रवण से श्रोताजनों को जो बोध होता था वह सब परोक्ष ही था । किंतु स्वानुभव के काल में वह एक ज्ञानस्वरूप का अनुभव प्रत्यक्ष था । आत्मा के संबंध में जितनी भी विवेचना सुनी जाये और जो कुछ भी विकल्प किया जा रहा हो वह सब परोक्ष है किंतु समाधि काल में ज्ञानानुभव के समय में वह ज्ञान प्रत्यक्ष होता है । सो वह स्वसंवेदन प्रत्यक्ष इस काल में भी हो सकता है । इस कारण परोक्ष आत्मा का कैसा ध्यान किया जाता है? ऐसा प्रश्न होने पर इन गाथाओं को कहा गया है । सीधी बात यह है कि आत्मानुभव की कोई ऐसी सरल तरकीब पायें कि अपने को ज्ञानमात्र अनुभव कर लें । सबसे विविक्त केवलज्ञान ज्योतिमात्र मैं हूँ―ऐसा अपने आपको अनुभवें तो आत्मानुभव हो जाता है । स्व-सम्वेदन का उपाय ज्ञानगुण ही है । अनुभव तो यह आत्मा का कुछ न कुछ कर ही रहा है, अपने को परिवार वाला माने, किसी जाति कुल वाला माने, किसी गोष्ठी वाला माने, पर अपने को कुछ न कुछ यह मानता जरूर है । बजाये उन सब कल्पनाओं के केवलज्ञान मात्र अपने को माने तो यह भाव स्वानुभवजनक होगा । अपने को ज्ञानमात्र अनुभवना यही स्वानुभव का उपाय है स्वानुभव ज्ञप्ति में अतींद्रिय प्रत्यक्ष है ।

स्वानुभव का उपाय―यह ज्ञान, ज्ञान में ही निश्चल प्राप्त हो, एतदर्थ पहिले तो भेदविज्ञान के उदय होने का अभ्यास हो, ज्ञानमार्ग में आगे बढ़ें । उसमें सबसे पहिले करने योग्य काम है सो भेदविज्ञान का है । सर्वद्रव्य भेदविज्ञान के द्वारा प्रसिद्ध होते हैं । इस भेदविज्ञान से भिन्न-भिन्न द्रव्यों को भिन्न-भिन्न समझा जाता है । मैं आत्मा जुदा हूँ और शेष पुद्गलादिक जुदा हैं । पहिले तो भेदविज्ञान से यह जाना जाता है, फिर भेदविज्ञान से शरीर और आत्मा जुदा हैं, फिर यह जाना जाता है कि शरीर जड़ है, मैं आत्मा चेतन हूँ । फिर तीसरी बार में आगम और युक्ति से सिद्ध हुए कर्मों में और अपने आपके आत्मा में भेद किया जाता है कि वे कर्म जुदा हैं और मैं आत्मा जुदा हूँ । चौथी बार में उन कर्मों के उदय की अवस्था को पाकर जो आत्मा में रागादिक विभाव होते हैं उन रागादिक विभावों में और अपने आत्मा में भेदविज्ञान किया जाता है । ये रागादिक विभाव जुदा हैं और यह मैं ज्ञायकस्वरूपी ये रागादिक विभाव जुदा हैं और यह मैं ज्ञायकस्वरूपी आत्मा जुदा हूँ । ऐसा फिर भेद-विज्ञान किया जाता है । उन कर्मों के अनेक अवस्थाओं का निमित्त पाकर जो वितर्क उत्पन्न होते हैं, युक्ति विचार उत्पन्न होते हैं उन विचारों से भी यह मैं ज्ञानस्वभावी आत्मा जुदा हूँ, इसका भेद विज्ञान किया जाता है, फिर आगे और बढ़कर ऐसा भेदविज्ञान किया जाता है कि शुद्ध ज्ञान की किरणें भी जा रही हैं । जो ज्ञान की शुद्ध परिणति होती है उस परिणति से भी भिन्न ज्ञानस्वभावमात्र मैं आत्मा हूँ, ऐसा वस्तुज्ञान किया जाता है । यावन्मात्र परिणति है, उन सब परिणतियोंरूप अपने को न तककर अनादि अनंत अहेतुक असाधारण चैतन्यस्वभाव मात्र अपने आपको निरखकर अपने आपकी ओर उन्मुख हो, यह है स्वानुभव का उपाय ।

भेदविज्ञान द्वारा साध्य लक्ष्य―स्वानुभव के उपाय में प्रथम तो भेदविज्ञान का उदय हुआ, फिर भेदविज्ञान के अभ्यास से शुद्ध तत्त्व की प्राप्ति हुई, उस शुद्ध तत्त्व की प्राप्ति से रागादिक के समूह को पृथक् करके आस्रव रुका, आस्रव के रुकने से कर्मों का संवर हुआ । कर्मों का संवर होने से आत्मा ने परमशांति को धारण किया, जिसका प्रकाश निर्मल है ऐसा यह ज्ञान का उदय भेदविज्ञान के प्रताप से होता है । कुछ क्षयोपशम के दोष से ज्ञान में जो मलिनता थी अब वह नहीं रही । अब यह दोषरहित है । अब दोषों के न होने से निर्मलता है । इस ज्ञानस्वभाव को तका जा रहा है । यह एक है, अपरिणामी है, स्वतःसिद्ध है, मेरा निश्चय प्राण है, जो कभी जुदा नहीं किया जा सकता, इस रूप ही मैं सदा वर्तता हूँ । इससे आगे और मैं कुछ नहीं करता हूँ, ऐसा स्वरूप मात्र अपने को तकना बस यही भेदविज्ञान द्वारा साध्य फल है ।

भेदविज्ञानसाध्य आत्मसंतोष की श्रेयस्करता―भैया ! भेदविज्ञान द्वारा साध्य आत्मसंतोष के कारण ही कर्मों का क्षय हुआ करता है । कर्मों का विनाश क्लेशों से नहीं हुआ करता है । कर्मों का विनाश ऋद्धि सिद्धि से हुआ करता है । उसका जो चैतन्यस्वभाव है उसकी प्रसिद्धि ही ऋद्धि सिद्धि है । वही उसका लक्ष्य है, वही उसकी लक्ष्मी है । चाहे चैतन्य कहो, चाहे लक्ष्य कहो, चाहे लक्ष्मी कहो एक ही बात है । यही मेरा ज्ञानस्वरूप है, इसको छोड़कर यह न रहा, न रहेगा । ऐसे परमपिता, शरणभूत अपने आपके स्वभाव को न लखकर अब तक यह प्राणी संसार में भ्रमण कर रहा है । जिस किसी को अपना मान लिया उसे इष्ट मान लेता है और जिसको पराया मान लिया उसे अनिष्ट मान लेता है । यही रागद्वेषमोह भाव है । इसका मूल अज्ञानभाव है । उस अज्ञान का उच्छेद भेदविज्ञान के द्वारा होता है । सो भेदविज्ञान कर जिन महापुरुषों ने इस अज्ञान का उच्छेद किया, यथार्थस्वरूप अपने उपयोग में लिया, वे किसी भी परिस्थिति में रहें अपने अंतर में अनाकुलता का ही स्वाद लिया करते हैं । यों ज्ञान का प्रबल उदय हुआ और यह ज्ञान संवर के भेदविज्ञान से इस उपयोगभूमि में आया जाता है । यह उपयोग दर्शक है और अब उपयोगभूमि के संवर के रूप में आकर यह भेष निकलता है और यों संवराधिकार यहाँ पूर्ण होता है ।

निर्जराधिकार

अब निर्जरा का प्रवेश होता है । मोक्षमार्ग के पर्यायभूत 7 अथवा 9 तत्त्वों में यह एक निर्जरा नामक तत्त्व मोक्ष का मार्गभूत है । इस उपयोग में ज्ञानपात्र का अब निर्जरा तत्त्व के भेष में प्रवेश होता है ।

निर्जरा की संवरपूर्वकता―भैया ! निर्जरा से पहिले संवर तत्त्व आया था । संवर तत्त्व विकार शत्रुओं के रोकने का काम करता है । रागादिक आस्रवों के रुकने से अपनी धुरा को धारण करता हुआ यह उत्कृष्ट संवर तत्त्व आया था और अब वह संवर साथ चल रहा है । संवरपूर्वक निर्जरा ही मोक्ष का मार्ग है अन्यथा जो बंधे हुए कर्म हैं उनका उदय आने पर तो निर्जरा होती ही रहती है । निर्जरा कहो, उदय कहो एक ही बात है । सूर्य निकलना कहो या उदय होना कहो एक ही बात है । सूर्य निकलता है सूर्य उदित होता है―दोनों का अर्थ एक ही है । पर जो निकलना संवरपूर्वक नहीं हैं उसको तो उदय कहते हैं । और जो निकलना संवरपूर्वक है उसको निर्जरा कहते हैं । कर्म उदय में आए, खिर गए, वे नवीन कर्मों के बंध का कारण नहीं बनते, तो वे खिर ही गए, उसको निर्जरा कहते हैं । तो रागादिक आस्रवों के निरोध से अपनी धुरा को धारण करके यह उत्कृष्ट संवर तत्त्व होता है । अब पहिले बँधे हुए कर्मों को जलाने के लिए निर्जरा का उदय होता है । कोई कर्जा चुकाने जाये और नवीन कर्जा ले आए तो वह कर्ज से मुक्त तो नहीं कहला सकता । दूसरे से कर्जा लिया, दूसरे का चुकाया, ऐसी स्थिति में थोड़ा इतना तो सुख हो जाता है कि जिसका पुराना कर्जा है वह सिर नहीं चढ़ता, मगर वस्तुत: कर्जदार तो है ही । कर्जा से उन्मुक्त नहीं होता । इसी प्रकार कर्म उदय में आते हैं, झड़ जाते हैं पर नवीन कर्म बँध जाते हैं । तब वे तो ज्यों के त्यों रहे किंतु सम्यग्ज्ञान के प्रताप से नवीन कर्म तो रुके हुए हैं और पूर्वबद्ध कर्म खिर जाते हैं । ऐसी स्थिति को मोक्षमार्ग कहते हैं ।

निर्जरा का अवसर―यह निर्जरा कब प्रकट होती है? जब ज्ञानज्योति संसार प्रसारक आवरण से रहित हो जाती है । मोह से यह ज्योति मूर्छित नहीं होती है । आत्मा का सर्वोत्कृष्ट वैभव है तो ज्ञानज्योति का मूर्छित न होना है । लाखों करोड़ों की संपत्ति भी प्राप्त हो जाये, बाह्य अर्थों में ही झुकाव बना रहे, अपने ज्ञानस्वभाव की रंच भी स्मृति न हो तो यह समस्त वैभव भी इस जीव का क्या हित करेगा? सर्वोत्कृष्ट वैभव तो निज ज्ञानज्योति का आलंबन है । सो जब ज्ञानज्योति प्रकट हो, आवरण से मुक्त हो तब जीव रागादिक से मूर्छित नहीं होता है, इसी का नाम निर्जरा है ।

रागादिक से भिन्न अपने आपको ज्ञानमात्र निहारना अपूर्व पुरुषार्थ―जैसे द्रव्यनिर्जरा में यह कहा जायेगा कि कर्म झड़ गए, पौद्गलिक कार्माण वर्गणायें झड़ गईं तो भावनिर्जरा में यह कहा जायेगा कि रागादिक झड़ गए अर्थात् रागादिक मूर्छा करने वाले उत्पन्न नहीं हुए । रागादिक भाव हों और उन रागादिक से पृथक् भावों का आशय बना रहे तो उसे निर्जरा ही कहते हैं । सबसे बड़ा पुरुषार्थ है ज्ञानी पुरुषों में कि वर्तमान में जो रागादिक भाव हो रहे हैं उससे भिन्न ज्ञानमात्र अपने को तकना―यह भावात्मक पुरुषार्थ है । यह सबसे किया जा सकता है । ऐसा अंतर में पुरुषार्थ हो तो उसके फल में सर्व सिद्धि प्राप्त होती है । पहिले बँधे हुए कर्म क्षणभर में ही झड़ जाते हैं, नवीन कर्मों का बंध नहीं होता, कोई संकट और आकुलताएँ उसके अनुभव में नहीं आती, उसके आत्मसिद्धि की आनंद की धारा बहती है । कब किसके? जो पुरुष अपने आपको वर्तमान में उदित रागादिक से न्यारा समझता है ।

परिकर में भी ज्ञानदृष्टि की संभावना―भैया ! यह बात घर गृहस्थी लोकव्यवहार में भी हो सकती है कि करते भी जाते हैं और उसमें मन नहीं है, उससे बिलगाव है तो परमार्थ से तो परमार्थ में भी यह बात न हो सकेगी । हो जाते हैं रागादिक और रागादिक से लगाव नहीं है ऐसी स्थिति हो, यही सबसे बड़ा वैभव है । प्रयत्न यह करना चाहिए । क्या कि वर्तमान में जो विकार चलते हैं, बंध चलते हैं, वांछा चलती है, प्रवृत्ति चलती है उन सबसे पृथक् ज्ञानमात्र मैं हूँ ऐसी दृष्टि जगे तो गृहस्थी में घर में रहकर भी जीव मोक्षमार्ग है । मोक्ष मार्ग की यही तो विशेषता है कि कितने ही संकट आएँ, कितने ही समागम जुटें, कैसी ही परिस्थिति आए प्रत्येक परिस्थिति में अपनी ज्ञानदृष्टि को न भुलाना । ज्ञानदृष्टि को भूले तो फिर जगत में कोई शरण न होगा ।

सब जीवों की भिन्नता व समानता―भैया ! यह सब मोह की नींद का स्वप्न है कि ये शरण हैं । जब तक पुण्य का उदय चल रहा है तब तक लोग तुम्हारे साथी हैं, तुम्हारे पुण्य का उदय न रहे तो वे स्वयमेव ही तुमसे अलग हो जाते हैं । यहाँ लोक में किसका विश्वास करें? एक शरण मानो तो अपने शुद्ध सम्यक्त्व परिणाम का मानो । जगत में कौन जीव पराया है और कौन अपना है जिसे अपना समझते हो । ये अभी तो कुछ समय से मिले हुए हैं । इससे पहिले कहां थे? तुम्हारे कुछ थे क्या? कहो पूर्वभव के वे शत्रु भी हों और कदाचित् आपके घर में सम्मिलित हो गए तो आप उन्हें अपना मान रहे हो और बाकि अन्य जीवों को पराया मान रहे हो । जिन्हें तुम पराया मानते हो कहो पूर्वभव में वे तुम्हारे हितैषी रहे हों । आज वे तुम्हारे घर में नहीं पैदा हो सके तो गैर समझते हो । जीव के स्वरूप को तो देखो । सब जीव एक स्वरूप वाले हैं । ऐसी वृत्ति सम्यग्दृष्टि के अंतर में बनी रहती है ।

मात्र जाननहार रहने का उद्यम―भैया ! गृहस्थी है । करना पड़ता है, भार लदा है, सम्हालना पड़ता है, पर शुद्ध बात तो सदा बनी रहनी चाहिए । शांति कौन देगा? किसमें ताकत है जो किसी दूसरे में शांति उत्पन्न कर सके? किसी में सामर्थ्य नहीं है । खुद ही ज्ञान को उल्टा कर औंधा कर चल रहे हैं, अटपट चल रहे हैं इसलिए दुखी हैं । अपने ज्ञान को सुल्टा दें तो लो अभी सुखी हो जाएँ । अपने आपके आत्मा को छोड़कर अन्य किसी को शरण और रक्षक मत मानो । ज्ञाताद्रष्टा रहो, जानते रहो सब, पर किसी से राग न करो । जिनको कल्पना से मान रखा है कि ये मेरे हैं उन्ही से अपना हित समझते हैं, और शेष अन्य जीवों को मान लिया कि ये तो गैर हैं, ऐसा मान लेने से उनसे उपेक्षा करते हैं ।

प्रभुदर्शन का संकल्प―कितना यह प्रभु बिगड़ रहा है? इसी में इसको अपने प्रभु के दर्शन नहीं हो पाते हैं । जहाँ जगत के जीवों में ये मेरे है, ये पराये हैं ऐसा भाव रहता है वहाँ प्रभु के दर्शन नहीं हो पाते हैं । और प्रभु दर्शन के बिना संसार से पार नहीं हो सकते । इसलिए किसी क्षण तो ऐसा घुलमिल जाओ कि सर्व जीवों में खुद मिल गए और कुछ अपने आपका पता न रहे । एक जाननस्वरूप में ही एकमेक हो गए । ऐसी दृष्टि कभी तो जगा लो । अपने जीवन में किसी भी समय प्राय: ऐसी दृष्टि बनाने के लिए कोई किसी दिन सोचे और हो जाये, ऐसा नहीं हो पाता । उसके लिए प्रतिदिन उद्यम होना चाहिए ।

प्रभुदर्शन का उद्यम―किसी भी क्षण तो ऐसा साहस बनाओ कि मैं तो किसी भी परद्रव्य को अपने उपयोग आसन पर न ठहराऊँगा । मैं सबसे न्यारे अपने आपके स्वरूप में रहूंगा । ऐसी दृढ़ साधना के साथ क्षणभर ठहर जायें तो वहाँ प्रभुता के दर्शन होते हैं । ऐसे ज्ञान को ही अपना सर्वस्व समझने वाले ज्ञानी पुरुष अपने स्वरूप की ओर झुकते हैं । सारा जहान प्रतिकूल हो जाये तो मैं अपने स्वरूप के प्रतिकूल न हो जाऊँ, और अपने अंतर्मुख रहूं ।

परपरिणति से मेरे परिणमन का अभाव―भैया ! जगत के सर्व प्राणी मेरे अनुकूल हो जाएँ, मेरा ही सब गुणानुवाद किया करें तो इससे भी मेरा हित नहीं हो सकता । मैं ही बहिर्मुखता को छोड़कर निज अंतर्मुखता को ग्रहण करूं तो मेरा सुधार हो सकता है । इस संसार में मैं अकेला हूँ, ऐसी अपने आपके अंदर भावना तो की जाये । यदि संसार के इन जीवों में ही लगाव रहा तो यह संसारचक्र बढ़ता चला जाता है । ऐसा दुर्लभ मनुष्य जन्म पाया है तो इसमें जरा अपना जो हितरूप है, अपना ज्ञानस्वभाव है उस ज्ञानस्वभाव की दृष्टि नियम से कर लेने का यत्न करिये ।

अपना ध्यान―भैया ! किसी की नहीं सुनना है । केवल एक अपने आपके अनुभव की धुन रखना है, करना पड़े सब, पर धुन न छूटे, हमारा लक्ष्य न छूटे । यहाँ न कोई विश्वास के योग्य है और न कोई रमण के योग्य है, न मेरे लिए कोई सुंदर है । मेरे लिए मैं ही सुंदर हूँ, शिवरूप हूँ और शुद्ध हूँ―ऐसा अपने आपमें बल बढ़ायें तो उनके कर्मों की निर्जरा होती है । इस निर्जरा के प्रकरण में कुंदकुंदाचार्य कहते हैं―


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