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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:समयसार - गाथा 195

From जैनकोष



जह विसमुवभुंजंतो वेज्जो पुरिसो ण मरणमुवयादि ।

पोग्गलकम्मस्सुदयं तह भुंजदि णेव बज्झदे णाणी ।।196।।

एक मांत्रिक के दृष्टांतपूर्वक उपयोगकाल में भी ज्ञानी के कर्मनिर्जरण का कथन―जैसे विष को भोगते हुए भी वैद्य पुरुष मरण को प्राप्त नहीं होता है उस ही प्रकार ज्ञानी जीव पुद्गल कर्मों के उदय को भोगता तो है किंतु बंध को प्राप्त नहीं होता है । विज्जो शब्द के यहाँ दो अर्थ हैं―एक तो वैद्य आयुर्वेदिक और दूसरा विद्यासिद्ध पुरुष । विद्या से वैद्य बना है, जो विद्या का जानकार हो । जैसे किसी को मंत्र विद्या सिद्ध है और जिसमें ऐसा प्रताप है कि विष भी खाये तो उसका असर नहीं होता । ऐसा विद्यावान पुरुष विष खाता हुआ भी मरण को नहीं प्राप्त होता है और विद्याहीन पुरुष विष खाने पर शीघ्र ही मरण को प्राप्त हो जाता है । इसी प्रकार जिसको स्वरूप विद्या अनुभव में आ गई है, जिसकी निरंतर आत्महित के लिए आत्मरक्षा के लिए अपने आपके सहज ज्ञानस्वरूप की दृष्टि दृढ़तम हो गई है ऐसा विद्यावान पुरुष, सहज ज्ञानवान पुरुष इस भोग को भोगता हुआ भी, कर्मफलों को पाता हुआ भी कर्मो से नहीं बंधता है ।

कर्मभोग के काल में भी ज्ञानी की कर्मनिर्जरा पर एक वैद्य का दृष्टांत―अथवा जैसे कोई आयुर्वेद का जानकार वैद्य है, उसे संखिया विष दे दें और वह औषधि के रूप में विधिवत् सिद्ध कर ले तो उस ही संखिया को खाते हुए गई वह मरण को प्राप्त नहीं होता । उस ही प्रकार ज्ञानी पुरुष इस कर्मफलरूप भोगों को भोगता हुआ भी उस भोग परिणाम के साथ-साथ ज्ञानदृष्टि की औषधि के कारण उसकी मार्मिक शक्ति को दूर कर देता है । फिर उस-उस भोग को भोगता हुआ भी यह सम्यग्दृष्टि ज्ञानी पुरुष बंध को प्राप्त नहीं होता है । अत: इस सम्यग्दृष्टि को अबंधक कहा है।

संसारबंधन की बंधनता―जैसे किसी पुरुष पर 1 लाख का कर्जा है और उसने 99 हजार 999 रुपया कर्जा चुका दिया है और 1 रुपया शेष देना रह गया है तो वह कर्जा नहीं कहलाता है । जैसे आप किसी धनिक की ऐसी कथा सुनते हैं कि जब कोई गरीब था तो उसके इतनी नौबत आ गई कि घर का लोटा भी दूसरे के यहाँ धरोहर धर दिया और उन्हीं पैसों से खाने का काम चलाया । कहीं वह चला गया और व्यापार बढ़ गया तो वह करोड़पति हो गया । बाद में ख्याल आया कि अमुक के यहाँ धरोहर में लोटा रखा है, और उसने कहा अपना हिसाब कर लो । हमारा लोटा दे दो और अपना हिसाब ठीक करा लो । हिसाब किया तो 10 हजार का कर्जा हो गया । वह तो 2-4 रुपयों का धरोहर था । पर वह कहता है कि अपने 10 हजार ले लो । मुझे कर्जदार नहीं कहलाना है । उसके वैभव को देखकर लोग यह नहीं समझते हैं कि ये कर्जदार है तो इस लोक की व्यवस्था भी तो देखना चाहिए । वैभव देखकर ही तो व्यवस्था बनती है । इसी प्रकार यह ज्ञानी सम्यग्दृष्टि जब अनंतसंसार को काट चुका, कोड़ाकोड़ी सागरों की स्थिति को खतम कर दिया मिथ्यादृष्टि अवस्था में सम्यक्त्व की उन्मुखता में तो अब समझो कि सम्यक्त्व जगने पर बहुत कम अंतः कोड़ाकोड़ीसागर की स्थिति रहती है, उसका संसार कट चुका, अब संसार का बंधक नहीं रहा ।

ज्ञानी का संसारच्छेद―देखो भैया ! कोड़ाकोड़ी से बहुत ही नीचे की स्थिति है वह अंत: कोड़ाकोड़ी । 70 कोड़ाकोड़ी खतम हो जायें और मामूली स्थिति रह जाये तो समझो कि यह ज्ञानी जीव सम्यक्त्व उत्पन्न करने के लिए मिथ्यात्व अवस्था में कितनी निर्जरा कर डालता है? अब उसके लिए निर्जरा करने लायक कर्म अत्यल्प रह गए, 5 प्रतिशत भी नहीं बैठता । तो अब देख लो मिथ्यादृष्टि जीव की अपेक्षा यह सम्यग्दृष्टि जीव अबंधक हुआ ना । यह सब ज्ञान और वैराग्य का ही तो प्रताप है । यों ज्ञान और वैराग्य में सामर्थ्य देखी जा रही है ।

अज्ञानी के बंध का कारणभूत भी उपभोग ज्ञानी के बंध का अकारण―जैसे किसी पुरुष के लिए विष मरण का कारण है और वैद्य में वह सामर्थ्य है कि वह उस विष की शक्ति को कील देता है, रोक देता है इसलिए अब वह नहीं मरता है । इसी प्रकार जो पुद्गल रागादिक भावों का सद्भाव होने के कारण ज्ञानी जनों के बंध के कारण होते हैं वही उपभोग अमोघ ज्ञान की सामर्थ्य होने से चूंकि रागादिक नहीं रहते हैं सो उपभोग की आसक्ति को विच्छिन्न कर देते हैं । अब वे ज्ञानी जीव कर्म नहीं बाँधते हैं ।

भ्रम के विच्छेद में विकास―भैया ! हम ज्ञानमय हैं, कुछ न कुछ निरंतर जानते रहते हैं । हम कैसा जानें कि सुख हो जाये और कैसा जानें कि दुःख हो जाये । ये सुख और दुःख ज्ञान पर ही निर्भर हैं । बाह्य वस्तुओं पर सुख और दुःख निर्भर नहीं है । बाह्यपदार्थ हमें दु:ख नहीं देते हैं किंतु मेरे ही ज्ञान की कला यदि उल्टी चलती है तो दुःख होता है और हमारे ही ज्ञान की कला यदि स्वरूप के प्रतिकूल चलती है तो दुःख होता है और हमारे ही ज्ञान की कला यदि स्वरूप के अनुकूल चलती है तो सुख हो जाता है । अपने दु:ख में किसी दूसरे जीव को अपराधी बताएँ तो यह एक भ्रम है ।

कुत्ते के उपमा की अरुचिकरता―इस ही भ्रम में रहने के अंतर का एक दृष्टांत प्रसिद्ध है । एक जानवर होता है कुत्ता । बड़ा आज्ञाकारी होता है । रोटी के दो टुकड़ों में ही कितना विनयवान हो जाता है? आपके चरणों में गिर जाता है । कितना आपके काम आता है । अगर कोई पशु तुम्हारे ऊपर आक्रमण करें तो वह उसका मुकाबला करता है, रात्रि में चोर आदि आये तो उन पर टूटकर मुकाबला करता है । इस तरह से कितना आज्ञाकारी और विनयशील कुत्ता होता है । यदि कोई सभा में किसी की प्रशंसा करें कि भाई आप तो बड़े परोपकारी हैं, इस देश की समाज की आप निश्छल सेवा करते हैं । इनका वर्णन कहाँ तक किया जाये, ये तो कुत्ते के समान हैं । देखो अच्छी बात कही गई है, कुत्ता उपकारी है, विनयशील है, आज्ञाकारी है, सर्व गुण युक्त है तो भी उसकी उपमा सुनकर क्या यह खुश होगा ? नहीं । न तो सुनने वाले खुश होते हैं और न जिसकी प्रशंसा की गई वह खुश होता है, बल्कि बुरा मान जाते हैं । यहाँ क्या कारण हो गया है?

सिंह की उपमा की रुचिकरता―और देखो सिंह जो महादुष्ट है, हिंसक है, जिसकी शकल दिख जाये तो देखते ही होशहवास उड़ जाते हैं । अजायबघर में लोहे के सींकचों के अंदर सिंह बँधे रहते हैं । देखने वाले जाते हैं तो जान रहे हैं कि सींकचे के अंदर बंद है यहाँ से निकल नहीं सकते, किंतु जरा सा गुर्रा जाये तो देखने वाले डर के मारे 10 हाथ दूर भाग जाते हैं । इस प्रकार का भय पैदा करा देने वाला, वध करने वाला सिंह है, पर यदि कोई यह प्रशंसा कर दे कि आप तो सिंह के समान हैं तो कहा तो गया कि आप सिंह के समान आक्रमणकारी हैं, आप किसी काम के नहीं हैं, दूसरों को मारने वाले हैं, किसी के काम न आने वाले हैं, अर्थ तो यह हुआ, पर सिंह की उपमा सुनकर सुनने वाले और जिसको कहा जा रहा है वह भी सभी प्रसन्न हो जाते हैं ।

दृष्टि से वृत्ति में अंतर―कुत्ता और सिंह की उपमा में यह फर्क कहां से आ गया? यह फर्क इस ही प्रकरण को सिद्ध करने वाला है कि कुत्ते में सब गुण हैं किंतु एक अज्ञान ऐसा है कि जिसके कारण सब गुण पानी में फिर गए । वह अज्ञान है केवल दृष्टि का । कुत्ते के लाठी कोई मारे तो वह लाठी को चबाता है, वह समझता है कि मुझे मारने वाली लाठी है उसके आशु बुद्धि नहीं होती । वह जानता है कि मुझे लाठी ने मारा । जब कि सिंह के सही दृष्टि होती है । उसे कोई तलवार मारे, भाला मारे, तीर मारे, बंदूक मारे तो वह इनको देखता भी नहीं है, सीधे आक्रामक पर ही वह आक्रमण कर देता है । उसकी दृष्टि शुद्ध होती है । इसी प्रकार मिथ्यादृष्टि तो निमित्तों को सुख दुःख पाता मानता है, किंतु पुरुष भोगों के साधन होने पर भी उनपर दृष्टि नहीं देता है । वह अपने विकल्पों को क्लेशकारी मानता है । वह समझता है कि मुझे दुःखी करने वाला मेरा विकल्प ही है । मुझे कोई अन्य पदार्थ दुःखी नहीं करते हैं ।

बाह्य में स्व की बाधकता का अभाव―भैया ! जब तक अंतरंग में समीचीन दृष्टि नहीं जगती है तब तक इस जीव का कल्याण नहीं हो सकता है । कितना ही वैभव एकत्रित हो जाये पर इससे पूरा न पड़ेगा । क्या इसका वियोग कभी होगा नहीं? अवश्य होगा । अपने आपमें जो परिणाम बनाए जाते हैं, संकल्प विकल्प किये जाते हैं उनके फल में जो भाव-बंध और द्रव्यबंध होता है उसको भोगना पड़ेगा । तो अपने एकत्व का निर्णय करो कि मैं केवल एक अकेला ही चैतन्यरूप मात्र हूँ । यह मैं केवल अपने चैतन्यभाव के परिणमन को ही कर सकता हूँ और इसको ही भोग सकता हूँ । मेरा विरोधी जगत में कोई दूसरा जीव नहीं है । सब जीव अपने-अपने परिणामों के अनुसार अपनी-अपनी योजनाएँ किया करते हैं । मेरा विरोधक बाहर में कुछ नहीं हो सकता है । मैं ही अज्ञानवश सर्व चेष्टाओं को चखकर एकरूप बनाकर स्वयं दुःखी हुआ करता हूं । ऐसा यथार्थ निश्चित हो जाना सर्व वैभवों से बढ़कर है, जो तीन लोक की संपदा से बढ़कर है, उत्कृष्ट है । इससे उत्कृष्ट और कोई वैभव नहीं हो सकता है ।

निजशरण की दृष्टि―भैया ! मरकर भी, पचकर भी, असह्य वेदना भोगकर भी यदि एक यह आत्मस्पर्श की दृष्टि बन जाती है तो समझो कि कृतकृत्यता होगी । जो करने योग्य काम हैं वे कर लो, अंतरंग में विश्वास किसी उत्कृष्ट तत्त्व का ही रहना चाहिए । इन जड़ों में और भिन्न चेतन पुरुषों के समागम में महत्त्व न देना चाहिए । रहते हैं वहां, व्यवस्था करते हैं, वहाँ महत्त्व नहीं देना चाहिए । इस लोक में किसी जीव का कोई अन्य शरण नहीं है । अपनी सावधानी ही अपने लिए वास्तविक शरण है―ऐसा जानकर अपने को विश्राम में लाकर विश्राम मिलता है, परपदार्थों में इष्ट अनिष्ट का ख्याल न करने से होने वाले विश्राम में रहकर अपने आपके अतुल इस ज्ञानसंपदा का अनुभव करें और कृतकृत्यता के मार्ग में बढ़ें, यही मनुष्यजन्म में एक सर्वोत्कृष्ट अपना कर्तव्य है:―

अब वैराग्य का सामर्थ्य दिखाते हैं ।


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