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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:समयसार - गाथा 205

From जैनकोष



णाणागुणेण विहीणा एदं तु पदं बहू वि ण लहंते ।

तं गिण्ह णियदमेदं जदि इच्छसि कम्मपरिमोक्खं ।।205।।

ज्ञान से ही परमपद की उपलब्धि―ज्ञानगुण से रहित होकर इस निरामय पद को बहुत श्रम करके भी प्राप्त नहीं कर सकते हैं । इस कारण हे भव्य जीव ! यदि कर्मों से छुटकारा पाने की चाह करते हो तो इस नियत ज्ञानपद का ज्ञान द्वारा ग्रहण करो अर्थात् अपने ज्ञान के द्वारा ज्ञानस्वभाव के स्वरूप को जानते रहो । इस ही परमार्थ ज्ञान में ऐसी कला है कि उस ही ज्ञान से यह ज्ञान अनुभव में आता है ।

मोक्ष का अर्थ है ज्ञान को शुद्ध बनाना । मोक्ष न किसी स्थान का नाम है और न मोक्ष किसी दूसरे का दिया हुआ कोई पदार्थ है । ज्ञान का शुद्ध रहना इसका ही नाम मोक्ष है । संसार अवस्था में यह ज्ञान शुद्ध नहीं रह पा रहा है, कल्पनाएं करता है । जब तक विकल्प हैं तब तक संसार है । विकल्प दूर हों और ज्ञान से पदार्थों को मात्र जानो बस इस ही का नाम मोक्ष है । तो उस मोक्ष की प्राप्ति कैसे होती है, उसका उपाय बतला रहे हैं । ज्ञान, ज्ञान से मिलता है, क्रिया से ज्ञान नहीं मिलता है । तन, मन, धन, वचन की जो चेष्टा है वह तो जड़ का परिणमन है । यह यथार्थस्वरूप की बात कह रहे हैं । इस जड़ के परिणमन से इतना ही लाभ है कि जड़ का अस्तित्व कायम रहा, पर ज्ञान की प्राप्ति तो ज्ञानगुण से ही हो सकती है ।

ज्ञानी का लक्ष्य―ज्ञानी जीव पर जब राग का उदय छाता है तो क्रियाएँ उसे भी करनी पड़ती हैं और उसकी क्रियाएं शुभ होती है । भगवान की भक्ति करना, व्रत, तप करना आदि प्रवृत्तियां हैं पर ये समस्त शारीरिक जो प्रवृत्तियाँ हैं ये स्वयं ज्ञानरूप नहीं हैं । करना सब चाहिए पापों से बचने के लिए, विषयकषायों के हटाने के लिए यह सब करना चाहिए । जो श्रावकों के 6 कार्य बताये हैं देवपूजा, गुरु की उपासना, स्वाध्याय, संयम, तप और दान करना, ये कर्तव्य करना चाहिए, पर इन कर्तव्यों को करते हुए भी अपने ज्ञानस्वरूप का पता भी रहना चाहिए क्योंकि शांति जो मिलती है वह ज्ञान की अविनाभावी है ।

सुख दुःख की ज्ञानकला पर निर्भरता―भैया ! किसी की मान लो दिल्ली में दुकान हो और किसी तरह से उसे यह पता लग जाये कि दुकान में एक लाख की हानि हुई तो अब दु:खी हो रहा है । देखो यहाँ यह है दुकान वहाँ है, चाहे किसी ने झूठी ही खबर कर दी हो, पर यह यहाँ दु:खी हो रहा है और अगर ऐसी खबर आ जाये कि दुकान में कल के माल बिकने में 2 लाख का नफा हो गया, तो चाहे किसी ने झूठ ही खबर कर दी हो पर यह सुखी हो गया । तो धन की न वहाँ हानि हुई, न लाभ हुआ, ज्यों का त्यों काम है पर जैसी कल्पना हो गई वैसा ही सुखी और दुःखी हो गया । इस संसार में सुख और दुःख कल्पना पर ही निर्भर है । तो मोक्ष जैसा आनंद भी मिलना हमारे ज्ञान पर निर्भर है । जब ज्ञान बिगड़ा हुआ होता है तब वह जीव दु:खी होता है और जब ज्ञान स्वच्छ होता है तब यह जीव सुखी हो जाता है । इसलिए हमारा सुख दुःख ज्ञान पर निर्भर है । हमें अपना ज्ञान सही बनाने का यत्न करना चाहिए । यदि यह ज्ञान किया कि हमारे पास खूब धन आए तो यह सोचना तो दुःख का ही कारण है ।

प्रभु भक्ति में सही उद्देश्य―भैया ! प्रभु की भक्ति हम इसलिए करते हैं कि हमारा ज्ञान सही बना रहे । हम प्रभु की पूजा क्यों करते हैं, इसीलिए कि 23 घंटों में यदि हमारा मन विचलित हो गया है तो उस प्रभु के पास जाकर हम अपना उद्देश्य दृढ़ कर लें । हम प्रभु के निकट जाकर पूजा, दर्शन, स्वाध्याय से उनके गुणों का गान करते हुए अपने उद्देश्य को सही बनाया करते हैं । और कोई पुरुष अपना उद्देश्य कुछ रखे ही नहीं यथार्थ मोक्षमार्ग का और पूजन करे तो उसके मोक्षमार्ग की कोई दिशा न मिलेगी और कहो कि परिवार के सुखी रहने के उद्देश्य से पूजा कर रहे हो तो और पापबंध कर रहे हैं । सांसारिक सुख को कमाने की पूजा कर रहे हैं तो पापबंध कर रहे हैं, इसलिए उद्देश्य का सही होना यह उन्नति की जड़ है ।

वृत्ति आशय की अनुयायिका―जैसा उद्देश्य होगा वैसी ही मेरी चेष्टा होती । तन, मन, धन की चेष्टा से हम दूसरों का परिणाम परख लिया करते हैं । परिणाम आंखों तो दिखता नहीं है कि अमुक मनुष्य का क्या परिणाम है, क्या भाव है? उसकी जो चेष्टा होती है उससे अनुमान होता है कि यह विशुद्ध परिणाम वाला है या संक्लेश परिणाम वाला है, या खुदगर्ज है या पर के बिगाड़ वाली भावना वाला है । ये सुख दुःख ज्ञान की दशा पर निर्भर हैं । जब ज्ञान शुद्ध हो जाता है रागद्वेष से रहित ज्ञाता द्रष्टा मात्र हो जाता है उसे कहते हैं मोक्षपद । मोक्षपद ज्ञान से ही प्राप्त होता है, क्रियाकांडों से नहीं प्राप्त होता है । पर क्रियाकांड क्यों किए जाते हैं कि उन क्रियाकांडों में जो शुभ परिणाम रखता है उस प्रयोग द्वारा कोई शुभ उपयोग किया जाये तो अशुभ उपयोग को काटने के लिए शुभ क्रियाएं की जाती हैं । और उन शुभ क्रियाओं के करने वाले इस योग्य पात्र रहते हैं कि वे मोक्षमार्ग को निभा सकें । पापमय रहकर कोई पुरुष मोक्षमार्ग के योग्य हो सकता है क्या? पापों से पहिले दूर हो, फिर शुभ से भी दूर हो पड़ता है, इसलिए शुभ कामों का निषेध नहीं है । शुभ काम तो मोक्षमार्ग का रास्ता ही है । पर शुभ काम से मुझे मुक्ति मिलेगी, शुभ परिणाम ही मुझे मोक्ष पहुंचायेगा ऐसी जो श्रद्धा है वह श्रद्धा एक अटक है । मोक्ष पहुंचाने वाला तो कोई ज्ञान का यथार्थ विलास है । ज्ञान का सही परिणमन हो तो मोक्ष हो सकता है । ज्ञान की उपलब्धि ज्ञान से ही होती है । कितने भी बाह्य काम कर डाले जायें पर कर्मों के द्वारा ज्ञान की प्राप्ति नहीं होती । ज्ञान के ही द्वारा ज्ञान में ही ज्ञान का विकास है । इस कारण ज्ञान से ही ज्ञान की प्राप्ति होती है ।

ज्ञानशून्य तप से आत्मसिद्धि का अभाव―बहुत से लोग दुर्धर तप करते है पर यदि वे ज्ञानशून्य हों तो उन क्रियाओं और तपस्याओं से यह आनंद का निधान ज्ञानानुभव का पद उन्हें नहीं मिल सकता है । यह ज्ञानानुभव ज्ञान द्वारा ही होगा । व्रत तपस्या क्रियाकांडों का तो यह प्रताप है कि अशुभ विषयकषाय पहिले हट जायें । जिस-जिस क्षण ज्ञानमात्र आत्मा की दृष्टि होती है, सिद्ध प्रभु के गुणगान के प्रसंग में उन ही सरीखा मेरा स्वरूप है ऐसी दृष्टि करके जब-जब ज्ञानमात्र आत्मा की दृष्टि होती है तब-तब मेरा मोक्षमार्ग खुलता है, शांति का उपाय मिलता है । तो ज्ञानशून्य पुरुष बहुत प्रकार के कार्य भी कर लें तो वे इस ज्ञानस्वरूप को, मोक्ष पद को नहीं प्राप्त होते हैं । और इस ज्ञानस्वभाव को न प्राप्त करते हुए वे प्राणी कर्मों से छूट भी नहीं सकते ।

संसारमार्ग व मोक्षमार्ग का परस्पर विरोध―रागद्वेष करना, विषयों का परिणाम करना, ये कर्म हों और शुद्ध ज्ञान और आनंद का अनुभव हो ये दो बातें एक साथ नहीं हो सकती हैं । जैसे एक म्यान में दो तलवार नहीं जा सकती हैं इसी प्रकार एक उपयोग में संसारमार्ग और मोक्षमार्ग ये दो बातें एक साथ नहीं आ सकती हैं । इस कारण कर्मों से मुक्ति चाहने वाले पुरुष को रागादिक विकारों से छूटकर केवल ज्ञानस्वरूप का आश्रय लेना चाहिए और उस ज्ञानस्वभाव के आश्रय के द्वारा नियत इस एक पद को ग्रहण करना चाहिए, वह पद है ज्ञानमात्र ज्ञानस्वरूप । यह पद तपस्याओं से, क्रियाओं से प्राप्त नहीं हो सकता ।

सहज ज्ञान की कला से ज्ञान की उपलब्धि―भैया ! ज्ञानपद तो सहज ज्ञान की कला से ही सुलभ है । ज्ञान का अनुभव करना है, अपने ज्ञानस्वरूप को जानना है । जाननमात्र, ज्योतिस्वरूप केवल उस ज्ञान का स्वरूप जानें तो उस जानन में ज्ञान का आनंद मिलेगा । वह आनंद सहज ज्ञान की कला से ही सुलभ है । इस कारण हे जगत के प्राणियों! अपने ज्ञान की कला के बल से निरंतर इस ज्ञान का ही अर्जन कर सकने के लिए प्रयत्नशील बने रहो । इस प्रकार से ज्ञानस्वरूप का दर्शन हो तो अनुपम आनंद प्रकट होता है ।

लौकिक संपदा शांति का अकारण―आज भी बड़े-बड़े धनिक हैं, वे भी क्या धन के कारण संतोष का अनुभव कर रहे हैं? इनको भी चैन नहीं है । सरकार जुदे जाल डाले हुए है । इनको लोगों के देखने में सुख है और उनके पास दौड़कर लोग प्रेम के वचन बोलने को जाते हैं, इस आशा से कि कुछ इनसे मिलेगा । वे धन देना यदि छोड़ दें तो लोग उनके पास जाना छोड़ दें, बल्कि उनको गालियां दें । बड़े कंजूस हैं ये, लोगो का धन चूसकर ये धनी बने आदि अनेक गालियां देंगे । लोग उनके पास पहुंचते हैं और उनकी वाहवाही करते हैं । और किसी को 2 लाख दे भी दिया तो वह प्रत्यक्ष में तो वाहवाही करता है पर परोक्ष में आलोचना करेगा । अरे दे दिया लाख दो लाख तो क्या हुआ? कितना ही लोगों से धन चूसा है । तो काहे का सुख है? और मान लो कुछ लोग अच्छा भी कहें तो उनके अच्छा कहने से यहाँ लाभ क्या होता है भैया ! अपने निज सहज ज्ञान के अतिरिक्त अन्य किसी दूसरे के उपयोग से हमारा कोई प्रयोजन नहीं है । अत: शुद्ध ज्ञानस्वरूप के अनुभव का यत्न करो उससे आनंद प्रकट होता है यही शांति का उपाय है ।

ज्ञानानुभव के स्वाद की एकरसता―एक मनुष्य गरीब है और बड़े प्रसिद्ध किसी चौबे औबे की दुकान में जाये और एक छटांक पेड़ा लेकर खाये और एक पुरुष धनी है वह उसी दुकान में आए और 4 रुपये के एक सेर पेड़ा खाये तो उस धनी का पेट भर गया और उस गरीब का नहीं भरा, पर स्वाद तो उस गरीब को वही मिल गया । ये वीतराग अरहंत सिद्ध बड़े आत्मा हैं, सो ये छककर आनंद लूटते हैं, वे सर्वज्ञ हैं, वीतराग हैं, उनका पेट (निज-क्षेत्र) आनंद से भर जाता है । और हम गरीब हैं, सो हम आनंद छककर नहीं भोग पाते । पर ज्ञानस्वरूप का जब अनुभव करते हैं तो वहाँ यह झलक हो ही जाती है कि उस सत्यस्वरूप का कैसा आनंद है जिसके बल पर हम अनंत काल तक स्वच्छ और निर्मल रहते हैं । ज्ञान के अनुभव से बढ़कर जगत में कुछ वैभव नहीं है ।

ज्ञान के लिये मोहियों का अयत्न―लोग अपने परिवार के लिए तन, मन, धन लगाते पर अपने ज्ञान के विकास के लिये जो कि अपने वास्तविक आनंद का मार्ग बताया गया, जो संसार से छूटने का उपाय बताया गया उस ज्ञान के लिए न तन लगाते, न मन लगाते, न धन लगाते । कर्तव्य तो यह होना चाहिए कि हमारा प्रधान उद्देश्य हो ज्ञान का, सारा तन, मन, धन लग जाये ज्ञानप्राप्ति में और ज्ञान मिले तो कुछ नहीं लगाया और दुर्लभ लाभ लिया । मोही प्राणियों में तो तन, मन, धन खूब लगाते हैं, परिवार को खुश रखने में मिलता क्या है सो बतलाओ । मोही जीव तो लुटकर जाता है, कुछ लाभ लेकर नहीं जाता है । किसी ज्ञानी पुरुष के विचार में, उसके स्मरण में, प्रभु के शुद्ध स्वरूप के स्मरण में तन, मन, धन नहीं लगता है और हमारा भैया मजे में रहे, लड़के बच्चे मजे में रहे, ऐसा विचार करने में कितना तन, मन, धन लगता है? रात दिन ऐसा ही सोचते रहते हैं ।

ज्ञानोपलब्धि का लक्ष्य आवश्यक―भैया ! अगर 500 रु0 मासिक की आय है तो सारे घर के लोगों के ऊपर ही मोह में खर्च कर देना चाहते हैं । स्त्री सजधज कर निकले, बढ़िया से बढ़िया भोजन बने, बच्चों का स्टेंडर्ड लोगों को ऊंचा लगे, उनके ही पीछे अपना सारा सर्वस्व लगा देते हैं और खुद के ज्ञानविकास के लिए 500 का दसवाँ हिस्सा 50 रुपये भी नहीं लगाना चाहते । जब कि यह चाहिए कि मेरा सब कुछ ज्ञानविकास के लिए है । खाने का खर्च तो जितने में चलाना चाहे उतने में हो सकता है । गरीब आदमी, 100 रुपये मासिक आमदनी वाला जिसके खर्च 10 प्राणियों का लगा है उसका भी तो पालन-पोषण होता है ।

सद्बुद्धि की प्राप्ति में बुद्धिमानी―बुद्धिमान आदमी वह है जो खाया-खोया में कम खर्च करे और ज्ञानविकास की चीजों में ज्यादा खर्च करे । चाहिए तो यह और जो विवेकी हैं वे ऐसा कर रहे हैं । वे चाहे किसी नगर में रहते हों या गाँव में रहते हों, अपने ज्ञान की रक्षा करते रहते हैं । भैया ! यह ज्ञान ही परमशरण है । इस ज्ञानविकास के बिना हमारा कहीं पूरा नहीं पड़ सकता । सो खुद प्रयत्न इस बात का करें कि खुद ज्ञानी बनें । हमारा साथी ज्ञान ही है ज्ञान की ही निरंतर चर्चा रहा करे । ऐसी कोशिश से आत्मा का लाभ है सो उसका ही प्रयत्न होना योग्य है ।


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