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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:समयसार - गाथा 207

From जैनकोष



को णाम भणिज्ज बुहो परदव्वं मम इमं हवदि दव्वं ।

अप्पाणमप्पणो परिगहं तु णियदं वियाणंतो ।।207।।

ज्ञानी के परद्रव्य में आत्मीयता के भ्रम का अभाव―ऐसा कौन ज्ञानी पंडित होगा जो ये परपदार्थ मेरे हैं―ऐसा कहे? ज्ञानी पंडित तो अपने आत्मा को ही अपना परिग्रह जानता हुआ रहता है । अथवा इस गाथा का दूसरा अर्थ यह है कि ऐसा कौन विद्वान होगा जो अपने आपको जानता हुआ भी परपदार्थों को ‘यह मेरा है’ इस प्रकार कहे । जब सही ज्ञान हो जाता है कि पदार्थमात्र अपने चतुष्टय से है तो किसी भी प्रकार यह भ्रम नहीं आ सकता है कि कोई परद्रव्य मेरा है । सब दुःखों की खान अज्ञान है । गृहस्थ धर्म में गृहस्थी रखें, व्यापार करें, घर में रहें, सबकी संभाल करें पर सच्चे ज्ञान से पीठ फेरे रहें यह तो किसी ने नहीं बताया । सब करते जाओ, घर में करना पड़ता है, धन कमाओ, आराम के साधन भी रहो, अपनी ढंग शान पोजीशन से रहो, कुछ हानि नहीं है गृहस्थधर्म में, किंतु सही बात क्या है, ये दृश्यमान पदार्थ क्या हैं, मैं क्या हूँ, इसका सही ज्ञान बनाए रहें तो मोक्षमार्ग मिलेगा, शाँति का उपाय मिलेगा । इसलिए किसी भी परिस्थिति में हो, पर यथार्थ ज्ञान की भावना होनी चाहिए । यथार्थ ज्ञान होने पर फिर कभी यह मोह नहीं हो सकता कि अमुक चीज मेरी है । जैसा स्वयं यह आत्मा है तैसा अनुभव में आ जाये फिर स्वप्न में भी यह भ्रम नहीं हो सकता कि यह तृणमात्र भी मेरा है और जिसके परपदार्थों में यह भ्रम न रहे कि यह मेरा है तो उसके समान वैभवमान और उत्कृष्ट पुरुष कौन हो सकता है?

यथार्थ ज्ञान होने पर भ्रम के होने की अशक्यता पर दृष्टांत―भैया ! यथार्थ ज्ञान होने पर किसी के समझाये जाने पर भी भ्रम नहीं आ सकता है । जैसे कुछ अंधेरे उजेले में किसी पड़ी हुई रस्सी को किसी ने देखा और यह भ्रम हो गया कि यह साँप है तो कल्पना में यह बात आते ही घबड़ाहट होने लगी । अब वह दौड़ता है, चिल्लाता है, लोगों को बुलाने लगा । उसके मारने तक का इरादा कर लिया, लाठी वगैरह तलाश किया, इतनी सब गड़बड़ियाँ कर डालीं, पर थोड़ी हिम्मत करके कुछ आगे बढ़ता है और कुछ देखता है तो ऐसा लगा कि यह तो जरा सा हिलता डुलता नहीं है । यह सांप कैसा है? और पास में पहुंचा तो देख लिया कि यह रस्सी है । अब उसके कुछ डर नहीं है । पास पहुंचकर उसने रस्सी को छू लिया ।

इतना जानने के बाद रस्सी को वहीं ही पड़ी रहने दिया । अब जिस जगह था उस जगह आकर बैठ गया । लो अब घबड़ाहट नहीं है, न कोई उद्यम है, न लोगों को बुलाता है, उसका भ्रम मिट गया, सही ज्ञान हो गया । अब कोई पुरुष उससे यह कहे कि जैसे तू 2 घंटा पहिले घबड़ा रहा था, लोगों को बुला रहा था वैसा 10 मिनट और करके दिखाओ तो कुछ नहीं वह कर सकता है क्योंकि वे सारी चेष्टाएं भ्रम के कारण हो रही थीं । अब भ्रम रहा नहीं तो कौन वैसी चेष्टाएं करें? कर ही नहीं सकता है । सही ज्ञान होने पर भ्रम की चेष्टा भी करे तो भी नहीं भ्रम कर सकता है ।

वस्तुस्वरूप का यथार्थ निर्णय होने पर भ्रम होने की अशक्यता―इसी प्रकार जब पदार्थों के स्वरूप का यथार्थ निर्णय हो गया कि प्रत्येक पदार्थ अपने अस्तित्व में है, अपने प्रदेशों से बाहर कोई पदार्थ अपनी गुण या पर्याय कुछ भी नहीं चला सकता है―ऐसा दृढ़ निर्णय होने पर वह गृहस्थ वही तो दुकान करता है जो पहिले करता था, जैसे घर में रहता था वैसे ही घर में रहता है, फिर भी इस ज्ञानी गृहस्थ को चित्त में आकुलता नहीं है । वह जानता है कि जो होता है वह ठीक है, होने दो, पर का परिणमन मेरे अधीन नहीं है और पर किसी भी प्रकार परिणमे उससे मेरा सुधार बिगाड़ नहीं है । यदि पर के परिणमन को अपनी शान का साधक मान लूं तो उसमें मुझे खेद हो । पर मेरी आत्मा को तो कोई जानता ही नहीं है, पहिचानता भी नहीं है । मुझे किसे शान बताना है?

निर्मोहता ही आत्मा की वास्तविक शान―मेरी शान तो असली यह है कि किसी भी परपदार्थ में भ्रम न हो, आसक्ति न हो किंतु स्वयं जैसा हूँ वैसा ही अपने आपमें उपयोग लिए रहूँ तो उसमें ही मेरी शान है जिसके कारण सर्वसंकट दूर होते हैं । यह ज्ञानी पुरुष इसी ज्ञान के कारण परद्रव्यों को यह मेरा है ऐसा नहीं कह सकता है क्योंकि जो ज्ञानी है वह ज्ञानी ही है जो जिसका भाव है वह उसका स्व है और वही मेरा स्वामी है । स्व के स्वामी का नाम स्वामी है । आत्मा का स्व धन जानने का स्वभाव है । आत्मा स्वतंत्र है । सो यह आत्मा आत्मा का ही स्वामी है, अन्य किसी पदार्थ का स्वामी नहीं है ।

जीवन में भी सदा अकेला―इस जीवन में भी आपने खूब देख लिया होगा कि किसी दूसरे पर आपका अधिकार पूर्ण बर्ताव नहीं चल पाता है । जगत में जितने जीव हैं सब अपनी-अपनी कषाय लिए हुए हैं । आप जिन्हें मानते हैं कि ये मेरे हैं वे आपके रंच भी नहीं हैं । वे अपने कषाय में मग्न हैं । उनको जिस प्रकार अपने स्वार्थ की पूर्ति हो, जिस प्रकार उनका विषय साधन ठीक बन सके उस प्रकार ही वे बर्ताव करेंगे । आपके वे कुछ नहीं लगते और इसी कारण एक भी जीव पर आपका अधिकार नहीं जम सकता, क्योंकि वे हैं नहीं तुम्हारे । वे पर हैं । इन जड़ पदार्थों पर आपका अधिकार नहीं जम सकता । रक्षा करते-करते भी वे वैभव आपके पास रहा नहीं करते हैं । कितनी ही स्थितियां बन जाती हैं ।

पर में आत्मीयता की मान्यतारूप उन्मत्त चेष्टा―हम आपका आत्मा के अतिरिक्त किसी भी पदार्थ से रंच भी संबंध नहीं है किंतु यह मोही जीव विकल्प बनाकर, वहमी बनकर किसी भी पदार्थ को अपना मान लेता है और दु:खी होता है । जैसे कोई पागल पुरुष सड़क के किनारे कुएं के निकट बैठा हो, वहाँ से मोटर निकलती है, तांगा, साइकिल निकलती है तो वे मुसाफिर अपनी मोटर, साइकिल आदि छोड़कर पानी पीने आते हैं । यह पागल चूँकि मान लेता है कि यह मोटर मेरी है, यह साइकिल मेरी है सो कुछ खुश होता है और वे लोग पानी पीकर अपनी सवारियों पर बैठकर चले जाते हैं तब वह दुःखी होता है, हाय मेरी मोटर चली गई, हाय मेरी साइकिल चली गई, इस प्रकार की कल्पनाएँ बनाकर वह दुःखी होता रहता है । इसी प्रकार यह मोही जीव जिस चाहे पदार्थ को यह मेरा है ऐसी कल्पना करके मौज मान लेता है और उसके वियोग में दुखी होता है जिसका कि अत्यंताभाव है ।

कल्पना के अर्थकारित्व का अभाव―भैया ! परद्रव्य से रंच संबंध नहीं है, मानने भर की बात है, उनमें यह मेरा है ऐसी कल्पना की मान्यता कर लेता है उन सबका उसमें अत्यंताभाव है । जिसे आप पिता समझते हो, पुत्र समझते हो, स्त्री समझते हो रंच भी वे तुम्हारे से चिपटे नहीं हैं, बिल्कुल न्यारे हैं, जैसे कि जगत के सभी जीव न्यारे हैं । कोई संबंध हो तो बतलाओ । यह वस्तु की ओर से बात कही जा रही है । पर कल्पना में ऐसा बसा रखा है कि यह मेरा है, यही मेरा सर्व कुछ है । मेरा जो सर्व कुछ है वह तो ज्ञान और आनंद है, उसकी तो दृष्टि नहीं करते और जिनका मुझ में अत्यंताभाव है उनको अपना मानते हैं । बस यह अज्ञान ही दुःख देने वाला है, अन्यथा कुछ भी नहीं है ।

भैया ! हम आप संसार में इस मनुष्यभव में जन्मे हैं तो अब भी सभी के सभी पूरे फक्कड़ हैं । फक्कड़ मायने अकिंचन । मेरा कुछ नहीं है, इस प्रकार के सब हैं । चाहे करोड़पति हो, चाहे हजारपति हो, चाहे गरीब हो सबके सब अकिंचन हैं । यह आत्मा शरीर तक को भी नहीं अपना पाता तो और की चर्चा ही क्या करना है? जरा समाज व्यवस्था में मान लिया गया है कि मेरा महल है, मेरा वैभव है, मेरा धन है, समाजव्यवस्था में ऐसा मान लिया है पर वस्तुत: देखो तो मेरे आत्मा का मेरे आत्मस्वरूप के अतिरिक्त अन्य कुछ नहीं है । सब फक्कड़ हैं और इसी कारण मरने के बाद यह फक्कड़ अकेले ही जाता है । ऐसे सबसे न्यारे ज्ञानानंदमय प्रभु के उत्कृष्ट स्वरूप की तरह अपना स्वरूप है । उसकी दृष्टि नहीं करते सो दु:खी हो रहे हैं ।

कुछ चाहने में पाप कोयला हाथ―भैया ! जो अपने को कुछ वाला मानता है उसके हाथ कुछ नहीं लगता और जो अपने को सबसे निराला मानता है उसको विलक्षण अलौकिक आनंद प्रात होता है । एक सेठ जी थे वे बहमी थे, डरपोक थे । एक दिन नाई हजामत बनाने लगा । जब गले के पास के बाल बनाने लगा तो सेठ जी कहते हैं कि देखो अच्छी तरह बनाना हम तुम्हें कुछ देंगे । जब हजामत बन गई तो सेठ जी अठन्नी देने लगे । नाई ने कहा हम अठन्नी नहीं लेंगे, हम तो कुछ लेंगे । आपने कुछ देने का वायदा किया है । 5 रुपये का नोट देने लगे, न लिया, एक मोहर देने लगे, न लिया, बोला हमें तो कुछ चाहिए । बड़ा परेशान हो गया कि कुछ किसका नाम है, मैं कहाँ से दूँ, थक गया बेचारा । सो यों ही सहज बोल गया कि भैया ! उस आले में दूध का गिलास रखा है जरा ला दो, कुछ पी लें । सो वह दूध का गिलास उठाने गया तो एकाएक बोला―सेठ जी इसमें कुछ पड़ा है । सेठजी बोले कि अगर कुछ पड़ा है तो तू ले ले क्योंकि तू कुछ को ही तो झगड़ रहा था । सो नाई ने उसे उठाया तो क्या निकला? कोयला । देखो अभी अशर्फी मिल रही थी जो 80-90 रुपये की थी ।

ज्ञातृत्व की उदारता―सो जो कुछ है यह मेरा कुछ नहीं है । अन्य पदार्थों में अपनी आत्मीयता की वासना लगी है । उनसे क्या पूरा पड़ेगा? उनके फल में पाप, कोयला, कलंक ही मिलेगा । अपना परिणाम मलिन किया, मिथ्यात्व किया । सो ज्ञानी संत जहाँ भी रहते हैं वे कुछ परवाह नहीं करते हैं । गृहस्थी में कहीं कुछ बिगड़ जाये तो उसके भी वे ज्ञाता-द्रष्टा रहते हैं, बिगड़ गया, ठीक है, पर पदार्थ है, उसका यों परिणमन हो गया । इतना बल होता है ज्ञानी के, फिर उसके अज्ञानभाव कहां से आ सकता है?

जिनमार्गानुसारिता में प्रभुभक्ति―प्रभु का परमार्थ से भक्त वह है जो प्रभु के बताए हुए मार्ग पर चले । ज्ञानी पुरुष के कोई टीका नहीं लगा रहता है या उसे बाहर में कुछ अपना आडंबर नहीं बनाना पड़ता है, वह तो भीतर में प्रकाशसाध्य बात है । बैठे हैं, वही शकल है, वही स्थिति है भीतर में एक ज्ञान बना लिया, अपने सत्यस्वरूप का भान कर लिया, लो, आनंद मिल गया । आनंदमय यह आत्मा स्वयं है । कहीं से आनंद लाना नहीं है किंतु आनंद में बाधा डालने वाला जो अज्ञानजन्य विकल्प है, व्यर्थ की कल्पनाएं हैं, जो वस्तुस्वरूप की विरोधी हैं उनको दूर करना है ।

किसी एक का दूसरे में अत्यंताभाव―भैया ! कौन किसका स्वामी है? प्रत्येक पदार्थ अपने स्वरूप का स्वामी है । वस्तुस्वरूप की दृष्टि का फल है कि वह ज्ञानी पुरुष अपना परिग्रह अपने को ही जानता है । मेरे साथ मैं ही लगा हुआ हूँ, कोई मेरे साथ नहीं लगा है । इस कारण ये समस्त बाह्य परपदार्थ धन हो, घर हो, परिवार कुटुंब हो, अन्य जीव हो, ये सब मेरे कुछ नहीं हैं । मैं इनका स्वामी नहीं हूँ । इस प्रकार का अंतर में जानने का नाम ही परद्रव्य का ग्रहण न करना कहलाता है । परद्रव्यों को तो अज्ञानी भी ग्रहण नहीं कर सकता । क्या ज्ञानी के अमूर्त आत्मा में एक नया पैसा भी चिपक सकता है । क्या दमड़ी छदाम भी अज्ञानी अपने में चिपका सकता है? नहीं । अज्ञानी भी पर को ग्रहण नहीं कर सकता किंतु अज्ञानी अपनी कल्पना में ऐसा मानता है कि यह मेरा है ।

पर की ममता ही पर का ग्रहण―यह मेरा है ऐसे विश्वास और उपयोग को ही पर का ग्रहण करना कहते हैं । सब काम वही है, बात वही है पर प्रभु की एक बात मान लो जो उन्होंने वस्तु का स्वरूप कहा है किसी वस्तु का किसी अन्य के स्वरूप में प्रवेश नहीं है । अपने-अपने स्वरूपास्तित्व में रहते हुए प्रवर्तते रहते हैं । इतनी बात मान भर लो कि सारा आनंद ही आनंद है । तीनों लोक में श्रेष्ठ पदार्थ यह ज्ञानस्वरूप का अवलंबन है । जो ज्ञानस्वरूप रागद्वेष परिणाम से रहित है, जिस ज्ञानस्वरूप में रंच भी अन्य तरंग नहीं है, जहाँ केवल जानन-जानन का ही स्वच्छ प्रकाश है, ऐसा यह ज्ञानमय मैं आत्मा स्वयं आनंदनिधान हूँ । इस प्रकार की स्वीकृति तो कीजिए । सब संकट दूर हो जायेंगे ।

संकट मात्र कल्पना―भैया ! संकट क्या दूर करना है? संकट तो इस जीव के साथ ही नहीं है, किंतु संकट जो मान रखा है वह खराबी करता है । यह जगत अनजानों का मेला है । कोई किसी से यहाँ परिचित नहीं है । जैसे स्वप्न में स्वप्न देखने वाला कितनी ही चीजों का परिचय कर लेता है, जो देखता है घर देखा, मित्र देखा जो भी वह स्वप्न में देखता है वह उन सबको परिचित मानता है । पर क्या वास्तव में वे परिचित हैं? नहीं । क्या उन पर उसका अधिकार है? नहीं । जैसे स्वप्न की बातों का परिचय केवल भ्रम माना जाता है, परिचय नहीं माना जाता है इसी प्रकार मोह की नींद में जो स्वप्न आ रहा है सोच रहे हैं, जान रहे हैं, ये फलाने भैया हैं, ये अमुक मेरे हैं, इनमें हमारी शान है, इस तरह का जो भी परिचय में मान रहे हैं वह केवल मोह की नींद का परिचय है।

मोहनिद्राविनाश से कल्पना संकट का विनाश―जैसे आंखें खुलने के बाद स्वप्न का परिचय समाप्त हो जाता है इसी प्रकार आत्मज्ञान जगने के बाद यह सब परिचय समाप्त हो जाता है । जो चीज सरस लगती थी वह नीरस लगती है । जो चीज वास्तविक मालूम होती थी वह मायारूप लगती है और उसे केवल शुद्ध चित्स्वरूप ही परमार्थ लगता है । ज्ञान से बढ़कर लोक में कोई वैभव नहीं हैं । जीवन के क्षण दमादम गुजरे चले जा रहे हैं । हम सब मृत्यु के निकट पहुंचते चले जा रहे हैं । समय बीतने का और परिणाम क्या होगा? मृत्यु के निकट पहुंच रहे हैं । अब करने योग्य काम क्या है सो सोचिए । धन से, और-और संचय बढ़ाने से क्या भला होने को है? बुढ़ापा आयेगा, मृत्यु के निकट होंगे, फिर यह धन किस काम आयेगा?

भैया ! यह वैभव है जब तक, तब तक भी इसके द्वारा शांति नहीं मिलती है । ज्ञान जितना जिसके साथ है वह उतने ज्ञान द्वारा शांति प्राप्त कर लेता है । सो बाह्य परिग्रहों का चित्त में ममत्व न रखकर गृहस्थ का कर्तव्य इतना ही है कि व्यापार कीजिए, रक्षा कीजिए पर अंतरंग में ममता परिणाम न रखिये । जो ममता रखेगा सो वह दु:खी होगा ।

रोने का मूल कारण ममता―एक जंगल में साधु महाराज थे । सो राजा ने दर्शन किया, गर्मी के दिन थे । राजा ने कहा महाराज आप गर्मी में बड़े व्याकुल हो रहे हैं कहो तो मैं आपको एक छतरी दे जाऊं । कहा बहुत ठीक है, ले आना, पर नीचे तो पैर जलेंगे । राजा ने कहा महाराज रेशम के जूते मंगवा देंगे । कहा ठीक है । पर शरीर खुला है, इसमें तो धूप की लपटे लगेंगी । तो महाराज हमें अच्छे-अच्छे कपड़े बनवा देंगे । जब कपड़े हो जायेंगे, जूते हो जायेंगे, छाता हो जायेगा तो पैदल चलने में आलस्य आयेगा । तो महाराज मोटर दे देंगे और उसके खर्च के लिए 5 गांव लगा देंगे । जब यह सब कुछ हो जायेगा तो मुझे पड़गाहेगा कौन, खिलायेगा कौन? तो महाराज आपकी शादी करवा देंगे । सो स्त्री खिलायेगी और खर्च के लिए 10 गाँव लगा देंगे । कहा यह भी ठीक है, पर बच्चे होंगे तो उनकी परवरिश कैसे होगी? तो 5 गाँव और लगा देंगे । और उनमें से कोई लड़का-लड़की मर गई सो रोना भी तो पड़ेगा । तो राजा बोला―महाराज लड़का-लड़की मरने पर तो रोना तुम्हें ही पड़ेगा, हम नहीं रो सकते । हम आपको गांव लगा देंगे, सब काम कर देंगे, पर रोयेगा वही जिसके ममता होगी ।

ममता धनसंचय का अकारण―सो भैया ! इन बाह्य परिग्रहों से हमारा आपका कोई संबंध नहीं है । किंतु जिसके ममता परिणाम है उसे क्लेश होता है और ममता परिणाम नहीं है तो क्लेश नहीं होता है । कोई यह सोचे कि ममता करेंगे तो धन बढ़ जायेगा और ममता न करेंगे तो धन कैसे आयेगा? सो देख लो―ज्ञानी चक्रवर्ती हुए हैं उनके परमाणुमात्र भी ममता नहीं है, मगर 6 खंड का वैभव टूट पड़ता है । ममता करने से क्या धन का संचय होता है? पूर्व समय में पुण्य किया, शुभ बंध हुआ उसका फल है ।

ममता आनंदबाधिनी―भैया ! ममता से तो अशांति बढ़ती है । सो वस्तु का यथार्थ ज्ञान करके हम आपका कर्तव्य है कि ज्ञाता द्रष्टा रहें और करना भी पड़े कर्तव्य तो करते हुए भी यह जानें कि मैं तो ज्ञानस्वरूप हूँ । ज्ञान के अतिरिक्त और कुछ नहीं कर रहा हूँ । मैं मात्र ज्ञान का ही परिणमन कर रहा हूँ । किसी बाह्य पदार्थों का मैं कुछ नहीं कर रहा हूँ । ऐसा ज्ञानमय अपने को निहारें । ज्ञान को ही कर्ता, ज्ञान को ही भोक्ता, ज्ञान को ही स्वामी, ज्ञानमय ही अपने आपको देखें तो मोक्षमार्ग बराबर चल रहा है । जो इस मार्ग पर चलेगा वह उत्कृष्ट अलौकिक आनंद को प्राप्त करेगा ।

ज्ञानी पुरुष यह जानता है कि मेरा परिग्रह तो मेरा आत्मा है, अन्य कोई दूसरा पदार्थ मेरा परिग्रह नहीं है । शरीर तक भी मेरा नहीं है, फिर और मेरे कैसे होंगे? इस कारण मेरे से अतिरिक्त जब मेरा कुछ नहीं है, मैं परद्रव्य का स्वामी नहीं हूँ, तो अब परद्रव्यों को मैंने ग्रहण नहीं किया, उसी परद्रव्य के त्याग के संकल्प को दृढ़ करने वाली गाथा को अब आचार्यदेव कहते हैं ।


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