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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:समयसार - गाथा 219

From जैनकोष



अण्णाणी पुण रत्तो सव्वदव्वेसु कम्ममज्झगदो ।

लिप्पदि कंपरएण दु कद्दममज्झे जहा लोहं ।।219।।

अज्ञानी की रागरसनिर्भरता―जैसे लोहा कर्दम के मध्य में पड़ा हुआ कर्दम से लिप्त हो जाता है, जंग चढ़ जाती है, इसी प्रकार अज्ञानी जीव कर्मों के मध्य में पड़ा हुआ अर्थात् मन, वचन, काय की प्रवृत्तियों में लगा हुआ सर्व द्रव्यों में अनुरक्त होने के कारण कर्म रंग से लिप्त हो जाता है । जैसे कि स्वर्ण का स्वभाव कीचड़ से अलिप्त रहने का है, कीचड़ में जंग न अपना लेने का है, यहाँ कर्दम को अपना लेने के स्वभाव वाला लोहा है । सो लोहा कर्दम के बीच में पड़ा हुआ कर्दम से लिप्त हो जाता है इसी प्रकार समस्त परद्रव्यों में किए जाने वाले राग के ग्रहण करने का स्वभाव होने से अज्ञानी जीव कर्मों के मध्य में पड़ा हुआ कर्मों से बंध जाता है, क्योंकि अज्ञानी का कर्मों से बंध जाने का स्वभाव ही है । ज्ञानप्रकाश की ही ऐसी महत्ता है कि यथार्थ ज्ञानज्योति प्रकट हो जाये फिर संसार के संकट, बंधन नहीं रहते ।

बरबादी का कारण पर्यायबुद्धि―इस पर्याय के अहंकार ने जगत के जीवों का विनाश किया है । क्या है यह शरीर? अंत में मिट्टी में ही तो मिलेगा, राख ही तो बनेगा । इसको जो यह मोह किया जा रहा है, यह मैं हूँ । और इसको ही निरखकर मान अपमान महसूस किया जा रहा है, इसने मेरा यों सम्मान या अपमान किया । दुनिया जाने कि मैं सन्मान के लायक हूँ । किसमें सोचा जा रहा है? इस नाक कान हड्डी में सोचा जा रहा है । उसमें ही अहंबुद्धि की जा रही है, इस प्रकार पर्याय में अहंबुद्धि करने वाले जीव अज्ञानी हैं । उस अज्ञानी का कर्मों से लिपट जाने का स्वभाव है । यह अज्ञानी समस्त पदार्थों में राग ग्रहण करने का स्वभाव रखता है । सो कर्म रज से बंधता चला जाता है । इस लोक में जो जिस स्वभाववाला है वह वैसा ही बनता चला जाता है । प्रकृति होने से उस वस्तु में वैसे ही परिणमन की बात होती है कोई किसी के स्वभाव को बदल नहीं सकता । अज्ञानी के अज्ञान स्वभाव को न आचार्य बदल सकते, न भगवान बदल सकता, न उपदेश बदल सकते । और बदल जायें तो वह अज्ञानी ही बदल गया । ज्ञानी हो गया जब वह ज्ञानस्वभाव प्रकट हुआ । किसी रिश्तेदार पर कोई भ्रम का संकट हो जाये या इष्टवियोग का क्लेश हो जाये तो समझाने वाले रिश्तेदार परेशान हो जाते हैं । किसी इष्ट का दिमाग फेल हो जाये, अट्टसट्ट बकने लगे तो उसके हितु रिश्तेदार समझाने में प्यार करते-करते परेशान हो जाते हैं और सोचते हैं कि यह मेरा भतीजा है और मैं ही इसे ठीक नहीं कर सका । मेरा ही यह साला बहनोई है और मैं चाहता हूँ कि सारा धन खर्च हो जाये, सब कुछ इसके लिए है लेकिन इसे हम कुछ कर नहीं पा रहे हैं । कोई पुरुष किसी दूसरे का कुछ कर नहीं सकता । कोई किसी का स्वभाव बदल नहीं सकता ।

अपनी सावधानी में ही अपनी रक्षा―भैया ! जो खुद न्याय और सदाचार से रहेगा वह सो सुखी रहेगा । जो अपने न्याय ज्ञान, सदाचार को छोड़ दे, पुण्य के उदय की ठसक में आकर अपने को स्वच्छंद बना ले तो उसका सहाय कोई नहीं है । जो जितना ऊपर से गिरता है उसके उतनी अधिक चोट लगती है, जो ऊंची स्थिति पाकर फिर निंद्य आचरण को करता है उसको उतना भी अधिक क्लेश होता है । कोई किसी के स्वभाव को बदल नहीं सकता । किसी के स्वभाव को किसी अन्य के स्वभाव की तरह करना चाहे तो कर नहीं सकता । इससे क्या सिद्ध हुआ कि ज्ञान तो निरंतर ज्ञानरूप रहता है और अज्ञान निरंतर अज्ञानरूप रहता है । जब तक अज्ञानी है तब तक इस अज्ञानी जीव के अज्ञान का ही बंधन है । हे ज्ञानी जीव ! तू ज्ञानमात्र रह, कर्मोदयजनित उपभोग को भोग, पर अपने ज्ञानस्वरूप की दृष्टि को न छोड़ ।

बंधन और क्लेश का मूल स्वयं का अपराध―देख भैया ! तेरा बंधन तेरे अपराध से ही होता है । परद्रव्य मिल गए, पर का उपभोग हो गया इससे बंधन नहीं होता । पर के अपराध से किसी को बंधन नहीं होता । जिसको बंधन होता है उसको अपने ही अपराध से होता है । अपराध करने का अज्ञानी के स्वभाव पड़ा हुआ है । वह अपराध पर अपराध किए जा रहा है और दोष देता है अन्य पदार्थों को कि अमुक पदार्थ ने ऐसा कर दिया । अमुक न होता तो मेरा बिगाड़ न होता । दूसरे पदार्थ के होने न होने से इसका बिगाड़ नहीं है । इसका बिगाड़ तो इसके स्वयं के अपराध से है । उपभोग से बंधन नहीं होता । बंधन राग से होता है । इस ही बात को अब आगे की 4 गाथाओं में समझाते हैं ।


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