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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:समयसार - गाथा 232

From जैनकोष



जो हवइ असम्मूढो चेदा सव्वेसु कम्मभावेसु ।

सो खलु अमूढदिट्ठी सम्मादिट्ठी मुणेदव्वो ।।232।।

अमूढ़दृष्टि का स्वरूप―जो जीव सर्वभावों में अमूढ़ है, समीचीन दृष्टि रखता है वह ज्ञानी पुरुष निश्चय से अमूढ़दृष्टि सम्यग्दृष्टि जानना चाहिए । आत्मा का जो सहज अपने आपके सत्त्व के रस से जो परिणाम है उस असाधारण भाव के अतिरिक्त अन्य जो भी भाव हैं उनमें जो मुग्ध नहीं होता अर्थात् उन्हें आत्मरूप से नहीं अपनाता उसे अमूढ़दृष्टि समझना चाहिए । मैं क्या हूँ, इसके उत्तर में जिसकी दृष्टि अनादि अनंत ध्रुव ज्ञायकस्वभाव पर पहुंचती है और उस ध्रुव पारिणामिक भाव से भिन्न जो अन्य भाव हैं उन भावों में आत्मरूप से श्रद्धान नहीं होता है उसे अमूढ़दृष्टि कहते हैं । यह जीव बाहरी पदार्थों को अपना मानता है, यह व्यवहार कथन है । उन्हें नहीं मानता है किंतु जिस प्रकार का ज्ञान बना, ज्ञेयाकार परिणमन हुआ ऐसी परिणतिमय अपने आपको जानता है । अन्य पदार्थों का जानना व्यवहार से कहलाता है । अर्थात अन्य पदार्थों में यह जीव तन्मय नहीं हो सकता । यद्यपि अज्ञानी जीव के लिए यह कहा जाता है कि यह किसी अन्य पदार्थ से तन्मय हो रहा है, फिर भी वास्तव में वह अज्ञानी भी किसी परपदार्थ में तन्मय नहीं हो सकता । वह तो जिस प्रकार की रचना अपने आपमें बना रहा है उसमें ही तन्मय है ।

मूढ़दृष्टि के लक्ष्यस्थान―यह जीव किसे अपना मानता है? शरीर को आपारूप से श्रद्धान करता है । यह शरीर निज सहज चैतन्यभाव से अत्यंत विपरीत है । और इससे गहरे उतरें तो आगम से जैसा जाना है उस प्रकार से रचे हुए ज्ञानावरणादिक द्रव्यकर्मों को आपा मानता है । अथवा उन द्रव्यकर्मों के विपाक में होने वाली जो आत्मभूमि में परिणति है उसे ‘यह मैं हूँ’ ऐसा मानता है । तब कषाय करते हुए में विषय कषाय करते हुए ‘यही तो मैं हूँ’ ऐसा अभेद श्रद्धान करता है, रागादिक भावों से भिन्न मैं कुछ हूँ, ऐसी दृष्टि नहीं पहुंचती है, न निज ध्रुव पारिणामिक भावों से भिन्न रागादिक भावों को आत्मस्वरूप मानता है वह मूढ़दृष्टि है । उसे अन्य भावों में मोह हो गया है । अन्य भावों को आत्मरूप से ग्रहण करता है, और अंतर में चले तो क्षायोपशमिक विकल्प हो रहे हैं छुटपुट ज्ञान हो रहे हैं उन्हें यह जीव आत्मस्वरूप मानता है ।

ज्ञानविकल्पों में मूढ़दृष्टिता―क्षायोपशमिक ज्ञानविकल्पों को आत्मस्वरूप मानता है, इसका प्रमाण यह है कि किसी जानकारी के समय में जब परस्पर कोई विवाद हो जाता है तो अपना पक्ष गिरने पर वह अपनी बड़ी हानि अनुभव करता है, और ऐसी स्थिति में अपने में क्रोध मान कर लेता है । वह अपने को बरबाद-सा अनुभवने लगता है । यह है क्षायोपशमिक विकल्पों में आत्मस्वरूप मानने का फल । उस जीव ने निज स्वभाव से भिन्न ज्ञानादिक क्षायोपशमिक विकल्पों में आपा स्वीकार किया है । अभी इसके अन्य भावों में मोह है ।

शुद्ध परिणमन में भी आत्मद्रव्यत्व की अमुग्धता―इससे और अंतर में चलते हैं तो परिपूर्ण ज्ञान, परिपूर्ण विकास, शुद्ध परिणति, केवलज्ञान जैसे कि बांचा है, सुना है, जाना है । उसके महत्त्व को जानकर उस परिणति के लिए अपना उपयोग विकल्प बनाकर ऐसा ही मैं होऊँ, यह ही मैं हूँ, यद्यपि विकास की बात ठीक है किंतु जिसे निज ज्ञायकस्वरूप का परिचय नहीं है, वह केवलज्ञान आदिक शुद्ध भावों के पाने का भी विकल्प बनाए तो उसके लिए तो वह परिणाम ऐसा है जैसा किसी अन्य के प्रति परिणाम करता हो । वे केवलज्ञानादिक पर्यायें मेरी परिणति हैं, मेरे से प्रकट होती हैं, वह क्षण-क्षण का निरंतर अनंतकाल तक सदृश चलने वाला परिणमन है, मैं एक ध्रुव ज्ञायकस्वरूप हूँ, ऐसा जिसे बोध नहीं है वह पुरुष उनमें उपयोग लगाए और उपयोग लगाते समय वह अपने को वैसा ही अनुभव करे जैसा आत्मरूप अनुभव करता है । और आत्मद्रव्यरूप अनुभव करना सो ज्ञायकस्वरूप से अपरिचित पुरुष का एक काम है । एक टंकोत्कीर्णवत् निश्चल ज्ञायकस्वभावमय परमपारिणामिक भावरूप निज चैतन्यस्वभाव के अतिरिक्त अन्य भावों में आत्मरूप श्रद्धान करना, यह ही मैं समग्र आत्मद्रव्य हूँ, सो वे सब मोह की जातियाँ हैं ।

अमूढ़दृष्टि का ज्ञातृत्व―यह जीव सर्व भावों में असंबद्ध है, यथार्थ दृष्टि रखता है, उस ही पुरुष को सम्यग्दृष्टि जानो । सम्यग्दृष्टि सर्व पदार्थों का यथार्थस्वरूप जानता है, उसके रागद्वेष मोह का परिणाम नहीं है, अत: अयथार्थ दृष्टि नहीं है । चारित्र मोह के उदय से इष्ट अनिष्ट भाव उत्पन्न होते हैं, उनकी उदय की बलवत्ता जानकर उन भावों का कर्ता नहीं होता है । उन रूप अपने आपका श्रद्धान नहीं करता है । विशेष विह्वलता होने के कारण परभावों में आत्मस्वरूप का अनुभव करता है । जिस पदार्थविषयक राग है उस राग के अनुकूल पदार्थ का परिणमन न देखकर अपने आपमें खेद करने लगता है । विशेष विह्वलता इस कारण होती है कि उस रागपरिणमन में ही आपा के स्वरूप का श्रद्धान है । यदि उस काल में इस राग स्वरूप में आपा का श्रद्धान न हो तो वहाँ विह्वलता न हो सके । अपने आपके विनाश की शंका सर्व शंकाओं का मूल बनती है । और प्रधान शंका यही कहलाती है, ऐसी शंका, ऐसा व्यामोह सम्यग्दृष्टि पुरुष के नहीं होता है ।

शुद्धात्मभावना से अमूढ़ता एवं कापथ में अनास्था―जो ज्ञानी निज शुद्ध आत्मा में श्रद्धान, ज्ञान और अनुचरण के रूप से अर्थात् निश्चय रत्नत्रय की भावना के बल से शुभ अशुभकर्म जनित परिणामों में मुग्ध नहीं होता है उसे अमूढ़दृष्टि जानना । अपने ध्रुव पारिणामिक ज्ञानस्वभाव से भिन्न किसी भी परपदार्थ में मुग्ध न होना चाहिए । परिणतियों का व्यामोह क्षोभ का स्थान है, वह ज्ञानी जीव निश्चयकरि सम्यग्दृष्टि है । जिसके अध्रुव औपाधिक परभावों में ही जो कि जीव के स्वतत्त्व है अर्थात् आत्मा में परिणत होते हैं उनसे भी मोह न रखता हो वह सम्यग्दृष्टि पुरुष किन्हीं बाह्य पदार्थों में कैसे मोह रख सकता है? जिनके उपयोग में ऐसे स्वभाव की दृढ़ता है वे कदाचित् कुदेव, कुशास्त्र, कुगुरु, कुधर्म―इनमें कोई चमत्कार भी देखे तो वह उनमें व्यामोह नहीं करता है, और उन चमत्कारों के कारण उन कुपथों को यह सम्यक् सोच ले ऐसी प्रवृत्ति सम्यग्दृष्टि में नहीं होती है । एक दृष्टांत दिया गया है पुराणों में रेवती नामक रानी का । एक मुनिराज ने रेवती रानी के अमूढ़दृष्टि अंग का वर्णन किया, प्रशंसा की । तो सुनते हैं कि अभव्यसेन मुनि हो, या कोई हो, उसको यह जिज्ञासा हुई कि देखें तो सही कि कैसा इसका दृढ़ श्रद्धान है, या किसी देव ने परीक्षा की हो । ब्रह्मा का रूप रखकर बड़ा चमत्कार बताया । सारी दुनिया उसकी ओर झुके, पर रेवती रानी का चित्त न डिगा । और-और देवताओं ने जैसा उन पुराणों में वर्णन है, अपना आडंबर दिखाया बड़ी ऋद्धि-सिद्धि दिखाई पर उस रेवती रानी का चित्त न डिगा । अंत में एक तीर्थंकर जैसा कोई आडंबर दिखाया, रचना वैसी ही बनाया, वैसा ही सब किया जितना तक हो सकता था । लोगों ने कहा कि अब तो तीर्थंकर महाराज आए हैं, अब तो वंदना को चलना चाहिए । उस रेवती रानी का दृढ़ श्रद्धान था कि इस काल में तीर्थंकर होते ही नहीं है । चौबीस तीर्थंकर माने गए हैं, ये 25 वें तीर्थकर कहाँ से हो गए? कुछ ऐसी ही कथा है । जिसमें यह दिखावा है कि बड़े-बड़े चमत्कारों के दिखाये जाने पर भी जिसका चित्त चलित नहीं होता है, श्रद्धा से विचलित नहीं होता है उस ही आत्मा को अमूढ़दृष्टित्व कहते हैं ।

विभावरूप स्वतत्त्व में भी ज्ञानी के असम्मोह―इस सम्यग्दृष्टि के निज भूमिका में उत्पन्न होने वाले परभावों में भी मोह नहीं जगता । लोक में सबसे बड़ा वैभव है शुद्ध ज्ञायकस्वभाव की दृष्टि जगना । जितने भी जैनसिद्धांत के उपदेश है उनका मात्र प्रयोजन शुद्ध ज्ञानस्वभाव की दृष्टि कराना है । तुम तो चैतन्यस्वरूप मात्र हो । निश्चयनय से स्वरूप का वर्णन है कि अपने आपको ही करते हो, अपने आपको ही भोगते हो । तुम्हारा तुम्हारे से अतिरिक्त किसी अन्य पदार्थ में रंच भी संबंध नहीं है । तुम्हारा चतुष्टय तुम ही में है । अन्य वस्तुओं का चतुष्टय उन अन्य में ही है । ऐसा दिखाकर इस जिज्ञासु मुमुक्षु को एकत्वस्वरूप में उपयुक्त कराया गया है । इसे किसी पर का विकल्प न उठे और यह अपने शुद्ध ज्ञायकस्वरूप का अनुभव करले, इसके लिए निश्चयनय से ज्ञायकस्वभाव इसे पहिचानवाया गया है । जहाँ विज्ञान और व्यवहार दृष्टि में उपदेश चलता है कि यह जीव तो शुद्ध ज्ञायकस्वभावमय है । इसमें स्वरसत: रागादिक होते ही नहीं हैं । उसका रागादिक स्वभाव ही नहीं है । इसमें जो रागादिक की झलक होती है वह कर्मों के उदय का निमित्त पाकर होती है । जिसका उदय होने पर हो और उदय न होने पर न हो, इन रागादिक भावों का उससे ही अन्वय व्यतिरेक है । इन रागादिकों का आत्मा से अन्वय व्यतिरेक संबंध नहीं है । आत्मा के होने पर रागादिक हो तो आत्मा तो सतत है, फिर कभी रागादिक से मुक्त नहीं हो सकता है । ये औपाधिक भाव हैं, परभाव हैं, तेरा स्वरूप नहीं हैं । तू तो सबसे निराला शुद्ध ज्ञायकस्वभावी है । इस ज्ञायकस्वभावी की दृष्टि कराने के लिए ही व्यवहार का भी प्रयोजन है ।

स्वानुभव का मात्र एक कर्तव्य―भैया ! अपना यह एक ही कर्तव्य है जिस किसी भी उपाय से हम अपने आपको ज्ञानस्वरूपमात्र अनुभव कर सकें । स्वानुभव की शास्त्रों में बड़ी महिमा गाई है । उस स्वानुभव के होने की पद्धति है स्व का अनुभव होना । अनुभव का अर्थ जानना । जानने से और भी अंतर में चलें तो कहिए मानना । जानने और मानने की कला में भी तो द्वैतभाव रह जाता है―मैं इसे जानता हूँ, मैं इसे मानता हूँ, जब मानने की स्थिति और गहरी बन जाती है, अर्थात् जहाँ यह द्वैत भी नहीं रहता है उस स्थिति को कहते हैं अनुभवना । स्व का अनुभवना क्या है? स्व का जानन ही तो स्व का अनुभवना है । दृढ़ता से निश्चलता से अभेद विधि से जानने का नाम अनुभवना है । स्व का अनुभवना, स्व को किस प्रकार जानें तो बन सकता है । इस निज आत्मतत्त्व को क्या विविध संसारी पर्यायरूप देखते रहें तो स्व का अनुभव हो सकेगा? क्या उस जानन के साथ इस ज्ञाता के अभेद अनुभवन बन सकेंगे? अथवा उन व्यंजन पर्यायों को भी छोड़िये, विभाव गुण पर्यायोंरूप अपने आपको जानें तो क्या उनसे स्व का अनुभव हो सकेगा? अथवा भेदवृत्ति से जिसने स्वभावपर्याय को भी जाना तो क्या वहाँ स्व के अनुभव की स्थिति हो सकेगी ?

सहज ज्ञानानुभूति में स्वानुभूति―स्व को किस प्रकार जानें कि निज का अनुभव हो सके? अब द्रव्य, क्षेत्र, काल, भाव में से पिंडरूप द्रव्य, विस्ताररूप क्षेत्र और परिणतिरूप काल―इन तीनों की अपेक्षा न रखकर अर्थात् इसका आश्रय न लेकर अभेद में चलना । हैं तो वे सही, पर उनका आश्रय लेकर अर्थात् उन-उन रूप अपने आत्मा को निरखने पर इस ज्ञाता को अभेद वृत्ति नहीं होती है । उस चतुष्टय में से जीवद्रव्य के लिए भावों का बड़ा प्रधान स्थान है । वे भाव भेदरूप और अभेदरूप दो प्रकार से निरखे जाते हैं । भेदरूप भाव में तो शक्तियां और गुण दृष्टि में आते हैं । सो उन शक्तियों में से किसी भी शक्तिरूप किसी भी गुणरूप से आत्मा में निरखने पर चूंकि भेदवृत्ति से गुणों को देख रहा है तो वहाँ जानने वाला यह और जानने में आया हुआ यह, यों द्वैत दिखा ना, इस प्रकार अंश-अंशी का भेद रहता है । जिस काल में इससे भी और अंतर में उतरकर सर्वगुणों का प्रतिनिधिस्वरूप असाधारणरूप जो ज्ञायकस्वभाव है, चैतन्यस्वभाव है जिसका कि परिणमन ज्ञातृत्व है, वह ज्ञाता अपने ज्ञातृत्व परिणमन के स्रोतरूप ज्ञानस्वभाव के जानने में लग जाये तो इस पद्धति में जो जानने वाला है वही ज्ञेय बन जाता है और इस ज्ञान, ज्ञाता, ज्ञेय की अभेदानुभूति में इसके स्वानुभव जगता है । इसे सीधे शब्दों में यों कहना चाहिए कि जो सहज ज्ञान की अनुभूति है वही आत्मा की अनुभूति है ।

स्वरूप परिचय बिना मनचाही कल्पना―जब तक निज ज्ञायकस्वरूप का परिचय और अनुभव नहीं होता है तब तक यह जीव भिन्न-भिन्न प्रकार के परभावों में आत्मरूप का श्रद्धान करता है―यह मैं हूँ । जिसकी समझ में जो अपने निकट में आया उसे ही आपारूप मानने लगता है । इस पिंड के अंतर में अमूर्त चैतन्यस्वभावमात्र चेतन पदार्थ है ऐसा जगत के प्राणियों को पता नहीं है । जिन्हें पता है उन्हें अंतरात्मा कहते हैं । निज स्वभाव का परिचय न होने से पग-पग में छोटी-छोटी घटनाओं में भी यह जीव अपने आपका विश्वास पर्याय में है, इस मुद्रा से बात करता है । लो यह मैं आया, अजी इसे मैं कर दूंगा, आप क्यों तकलीफ करते हैं? यह तो सब मेरी लीलामात्र में हो जायेगा । अपनी विभावरूप परिणतियों में, कलाओं में अहंकार, कर्तृत्व, मोह ये सब बना रहे हैं ।

अमूढ़दृष्टित्व का प्रताप―यह सम्यग्दृष्टि जीव एक निज टंकोत्कीर्णवत् निश्चल स्वतःसिद्ध, अनादि सिद्ध अविनाशी ज्ञानस्वभाव में ही अपने आपका श्रद्धान करता है और इसके अतिरिक्त अन्य जितने भी भाव हैं वे चाहे स्व में अनुभवरूप हों, अन्य क्षेत्र में अन्य रूप हों उन सबमें आपा का श्रद्धान नहीं करता वह पुरुष अमूढ़दृष्टि जानना चाहिए । ऐसे पावन आत्मा के बाह्य विषयों में मूढ़ता होने रूप भावकृतबंध नहीं होता है । अथवा पर समयों में मूढ़ताकृत बंध नहीं होता है, अथवा संवर का निधान जो संवर स्वरूप है, सुरक्षित दृढ़ दुर्ग है उसके उपयोग में स्थित है । यह आत्मद्रव्य स्वयं संवर स्वरूप है । इसमें किसी दूसरे का प्रवेश नहीं है । इस बात का इस ज्ञायकस्वभाव का जब परिचय होता है तो बाह्य संबंधों में भी वह सम्वृत ही रहता है । इस संवर तत्त्व का वहाँ विलास होने से परिणामों में इतनी निष्पृहता, स्वोन्मुखता और परपराङ्मुखता है कि पूर्वबद्ध कर्मों की वहाँ निर्जरा ही होती है ।

अमूढ़दृष्टि की मोक्षमार्ग में प्रगति―इस तरह यह अमूढ़दृष्टि अंग का धारी सम्यग्दृष्टि न तो किन्हीं कुदेव, कुगुरुओं में मुग्ध होता है, न उनके किसी चमत्कार में मुग्ध होता है, न अन्य बाह्य विषयों में मुग्ध होता है और न अपने में उत्पन्न हुए रागादिक परिणामों में मुग्ध होता है । वह तो निरंतर आनंद झराने वाले शुद्ध चैतन्यस्वभाव में ही अपने आपका श्रद्धान करता है । ऐसा सम्यग्दृष्टि जीव अमूढ़दृष्टि है । मोक्ष के मार्ग में उसके निरंतर तीव्र प्रगति होती रहती है ।

मूढ़ता का द्वैविध्य―अमूढ़दृष्टि अंग में जो यथार्थ है उसे यथार्थ भान किया जाता है । अयथार्थ को यथार्थ मानना मूढ़ता है, इसी प्रकार यथार्थ को अयथार्थ मानना मूढ़ता है । जो वस्तु का वास्तविक स्वरूप है उसको मिथ्या समझना भी मूढ़ता है । चैतन्यस्वभाव के अतिरिक्त अन्य भावों में ‘यह मैं हूँ’ इस प्रकार की बुद्धि होना भी मूढ़ता है । यद्यपि रागादिक भावों का कर्ता आत्मा को अशुद्ध निश्चयनय से बताया है किंतु वहाँ जीव के स्वरसत: स्वभाव से रागादिक भावों को जीव करता है ऐसी दृष्टि नहीं है, पर इस कर्तृत्ववादी की जो कि रागादिक को करने वाला आत्मा को कहते हैं वे स्वभाव से करने वाला मानते हैं, और इनकी दृष्टि में रागादिक कभी छूट नहीं सकते । रागादिक का मंद हो जाना इनके मंतव्य में बैकुंठ है, मोक्ष है, और इसी कारण जब उस उपशांत रागादिक भावों की व्यक्ति होती है तब उसे बैकुंठ से आना पड़ता है, फिर संसार में जन्म-मरण लेता है । इस कर्तृत्ववादी की दृष्टि में आत्मा कदाचित् सर्वथा सर्वदा के लिए रागरहित हो सकता है, यह दृष्टि में नहीं है, यह यथार्थ को अयथार्थ मानता है और अवास्तविक को वास्तविक माना है, किंतु ऐसी मूढ़ता जिन अंतर-आत्माओं में नहीं है वे अंतरात्मा अपने को शुद्ध केवल ज्ञायकस्वरूप ही अनुभवते हैं ।

नयचक्र की गहनता―भैया ! नयवादों का प्रकरण बहुत गहन है । इस नयचक्र के गहन वन में उलझे हुए मंतव्य कभी अपने सम्मान की ओर नहीं आ पाते । जीव में परिणतियां होती हैं, और किन्हीं का मंतव्य है कि जीव में परिणतियां नहीं भी होती हैं । ये दो पक्ष सामने है, और दृष्टिभेद से ये दोनों पक्ष सही हैं । जीव में परिणतियां होती हैं यह देखा जाता है स्वभाव से दूर दृष्टि रखने पर, और जीव में परिणतियां होती ही नहीं हैं यह देखा जाता है जीव के स्वभाव को लक्ष्य में लेने पर । इन रागादिकों का करने वाला जीव है तो एक पक्ष में रागादिकों का करने वाला जीव नहीं है । जीव रागादिकों का कर्ता है―यह परिज्ञान अद्वैत दृष्टि से होता है । एक अद्वैत वस्तु को देखते आए और उसके परिणमन को निरखते हुए में जब यह प्रश्न उठता है कि इन रागादिकों का कर्ता कौन है, जब उसे अन्य वस्तु दृष्ट नहीं होती है तब अभेद षट्कारक के प्रयोग से रागादिक का कर्ता जीव को बताता है, और जब जीव के सुरक्षित स्वभाव में कुछ भंग न डालने का आशय है और रागादिक का कर्ता बताना है तब निमित्तदृष्टि को प्रधान करके उत्तर आता है कि रागादिकों के करने वाले कर्म हैं ।

पर्यायों के नियतपने व अनियतपने में नयविभाग―ये जीव में रागादिक पर्यायें जब जो होनी होती हैं तब ही होती हैं । यह जीव में नियत है, बद्ध है ऐसा भी परिज्ञान होता है और जीव में रागादिक पर्यायें नियत नहीं हैं, बद्ध नहीं हैं, अनियत हैं ऐसा भी परिज्ञात होता है ।

पर्यायों में नियतपने की दृष्टि―जब काललब्धि और सर्वज्ञ ज्ञान को दृष्टि में लेते हैं तब वहाँ यह विदित होता है कि जीव में अदल-बदल करना, पुरुषार्थ करना, किसी भी प्रकार जो कुछ भावीकाल में होगा जीव करेगा वह सब सर्वज्ञ के ज्ञान में विदित है । अथवा अवधिज्ञानी जीव भी जान जाता है तो उस समय वह होगा इसमें शक नहीं है । उस ज्ञान की ओर से देखते हैं तो जगत में सब कुछ नियत है, अथवा कुछ भी हो कल या परसों, जो कुछ भी होगा उस समय में वह उस समय में है, ऐसा काल की दृष्टि से देखते हैं तो पर्याय नियत है, बद्ध है, पर वस्तु की ओर से जब देखते हैं जो कि वास्तविक दृष्टि है उस वस्तु में तो प्रत्येक समय एक ही पर्याय बद्ध होती है, तन्मय होती है ।

पर्यायों के समुदाय में द्रव्यपने की दृष्टि―हाँ, इस दृष्टि से कि चूंकि पदार्थ है तो वह किसी भी समय में परिणमन बिना नहीं रहता । कोई काल ऐसा नहीं आयेगा जिस समय में वस्तु का परिणमन न रहे । अनंतकाल है, तो अनंत समयों में अनंत परिणमन हैं ही इस पदार्थ के । कोई-सा भी परिणमन बीच में टूटता नहीं है कि वस्तु परिणमती रहे और किसी मिनट परिणमन बंद कर दे, बाद में फिर परिणमने लगे, ऐसी टूट परिणमन परंपरा में नहीं है । इस कारण यह कह दिया जाता है कि द्रव्य त्रिकालवर्ती अनंत पर्यायों का पिंड है । इस कारण पदार्थों में वे सब पर्यायें नियत साबित होती हैं, पर इस दृष्टि से पर्यायों का नियतपना सिद्ध नहीं होता । किंतु परिणमन सामान्य कुछ भी हो, परिणमन शून्य द्रव्य नहीं हुआ करता है । सो उन पर्यायों का समुदाय द्रव्य है यह बात घोषित होती है ।

पर्यायों के अनियतपने व नियतपने की दृष्टि―पदार्थ में तो प्रत्येक समय एक पर्यायबद्ध है, तन्मय है । उस उपादान में जितनी योग्यताएं बसी हैं उन योग्यताओं में से किसी भी योग्यता के अनुकूल जैसा सहज निमित्त का योग होता है यह उपादान अपनी स्वतंत्रता से अपने में परिणमन करता है । इसमें भावी काल में अमुक पर्याय होगी, ऐसी बद्धता द्रव्य के अंदर नहीं है । इस दृष्टि से पदार्थों में विभावपरिणमन अनियत है । जो शुद्ध आत्मा हुए हैं उनमें अवश्यंभावी अनंत पर्यायें नियत हैं, और वे नियत इस कारण हैं कि वे शुद्ध आत्मा हो चुके हैं और आगामी काल में किसी भी समय अशुद्ध नहीं हो सकते हैं । तो शुद्ध का परिणमन का तो एकरूप चलता रहता है सो एक रूप ही चला करता है, अपने आप ही यह नियत शुद्ध हो जाता है । यह नयचक्र बहुत गहन है, इसमें प्रत्येक तत्त्व स्याद्वाद की दृष्टि से सुलझता है ।

अनुभव की निर्विकल्पता―हां अनुभव अवश्य ऐसा है कि उसमें स्याद्वाद का प्रयोग नहीं होता है क्योंकि अनुभव एक अभेद अवस्था है । वहाँ किसी भी नय-विकल्प का अवकाश नहीं है । और नय-विकल्प का ही अवकाश नहीं है ऐसा नहीं है किंतु प्रमाण, निक्षेप और-और भी उपाय जो वस्तु के परिज्ञान के हैं उन सबका भी प्रयोग अनुभव दशा में नहीं होता है ।

अमूढ़ सुदृष्टि का प्रताप―भैया ऐसे अलौकिक स्वानुभव को प्राप्त कर चुकने वाला सम्यग्दृष्टि पुरुष किन्हीं पदार्थों में कैसे मोह को प्राप्त हो सकता है? जैसे किसी घटना से पूर्ण परिचित है ऐसा मनुष्य किसी भी वाद संवाद में भी च्युत नहीं हो सकता है, और जो घटना से अपरिचित है, किसी की सिखाई हुई बातें वह बोलता है तो किसी भी प्रकरण में उसे च्युत कर दिया जा सकता है । यह चैतन्यस्वभाव का रुचिया ज्ञानस्वभाव से उत्पन्न हुए आनंद को भोगने वाला सम्यग्दृष्टि मूढ़दृष्टिकृत बंध को नहीं प्राप्त होता, किंतु किसी पदार्थ में मोह नहीं है, अज्ञान नहीं है, यथार्थ-अयथार्थ ज्ञाता है इस कारण निर्जरा ही होती है । इस प्रकार अमूढ़दृष्टि अंग का वर्णन करके उपगूहन अंग का वर्णन करते हैं ।


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