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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:समयसार - गाथा 235

From जैनकोष



जो कुणदि वच्छलत्तं तिण्हं साहूण मोक्खमग्गम्हि ।

सो वच्छलभावजुदो सम्मादिट्ठी मुणेदव्वो ।।235।।

वात्सल्य भाव―जो जीव मोक्षमार्ग में स्थित तीनों साधुओं आचार्य, उपाध्याय और साधुओं का जो वात्सल्य करता है वह वात्सल्यभाव सहित सम्यग्दृष्टि जानना चाहिए । मोक्षमार्ग में स्थित हैं आचार्य, उपाध्याय और साधुजन । मोक्षमार्ग कहलाता है मोक्षस्वरूप शुद्ध ज्ञानस्वभाव का आलंबन करना । इस ज्ञानस्वभाव के आलंबन में स्थित हैं साधुजन । यद्यपि गृहस्थ भी अपनी योग्यता माफिक मोक्षमार्ग में स्थित हैं पर उनके ज्ञानस्वभाव की दृष्टि स्थिर नहीं रह पाती । कारण यह है कि आरंभ परिग्रह का संबंध गृहस्थों के लगा है । उसकी व्यवस्था में उनका चित्त बसा रहता है । सो यद्यपि कभी-कभी अवसर पाकर उन विकल्पों से मुख मोड़कर वे निज ज्ञानस्वभाव का आश्रय करते हैं तो भी यह अवसर एक तो कम आता है और पूर्व वासना के कारण वास्तव में गृहस्थ पद में ऐसी ही परिस्थिति है सो विकल्प उठ आते हैं और यह अस्थिरता मोक्षमार्ग के आलंबन में शिथिल बना देती है । इस कारण जो जन आरंभ परिग्रह से विरक्त हैं आत्मतत्त्व की साधना में रत हैं उन पर वात्सल्य वत्सल आत्मा करते हैं ।

समता के पुंज―शत्रु और मित्र में साधु का समतापरिणाम है, प्रशंसा और निंदा को एक शब्दमय ही जानकर अपने स्वरूप को पृथक् समझ कर अथवा दोनों में जो समता परिणाम करता है, यश और अपयश में जिसकी यह बुद्धि है कि यह यश और अपयश चीज है क्या, दूसरे जीवों की एक परिणति । मेरे संबंध में किन्हीं पुरुषों ने यह जान लिया कि यह बहुत अच्छा है, इसी का नाम तो यश कहा जाता है । तो यह बहुत अच्छा है ऐसा जो विकल्प है वह तो दूसरे जीवों का परिणमन है । दूसरे जीव चाहे यशविषयक विकल्प करें और चाहे अपयशविषयक विकल्प करें, उनके किसी भी परिणमन से इस मुझ विविक्त आत्मा का सुधार अथवा बिगाड़ नहीं हो सकता । आत्मा का सुधार और बिगाड़ अपने आत्मा के ही भावों के अनुसार है । ऐसा जान कर साधुजनों को यश और अपयश में भी समानता रहती है ।

यदि कोई साधु का भेष रखकर समतापरिणाम को धारण न करे और प्रशंसा, निंदा, यश, अपयश, अपनी महत्ता जानना इत्यादि में दृष्टि गड़ाता है तो उस जीव को साधु नहीं कहा जा सकता । साधु तो वह है जो केवल निज ज्ञायकस्वभाव में ही रुचि रखता हो, बाहरी लोगों की परिणति में रुचि न रखता हो, ऐसा जीव ही उन साधुओं में अपना वात्सल्य रखता है । यह है व्यवहार से वात्सल्य अंग । यह ग्रंथ मुख्यतया साधुओं के लिए कहा गया है । इसलिए साधुओं के संबंध में वात्सल्य भाव बताया है ।

साधुजनों का धर्मरुचियों में वात्सल्य―साधुजन साधुओं में ही वात्सल्य रखते हैं ऐसा नहीं है । उनसे तो वात्सल्य रखते ही हैं किंतु जो धर्म के रुचिया हैं, विरक्त हैं, धर्मात्मा हैं ऐसे गृहस्थ जनों में भी वे साधु यथायोग्य वात्सल्य रखते हैं । यदि साधु के गृहस्थ जनों पर वात्सल्य न हो तो वे उपदेश कैसे करें? क्या उपदेश प्रेम बिना किया जा सकता है? जो मुमुक्षु श्रावक उपदेश सुनने आएँ और साधु उनको उपदेश दें तो यह बात वात्सल्य बिना नहीं हो सकती । एक प्रभु अरहंत ही ऐसे हैं जिनकी ध्वनि प्रत्येक जीव पर अनुराग हुए बिना होती रहती है, पर आचार्य, उपाध्याय, साधु ये अभी मोक्षमार्ग में चल रहे हैं । इनके अभी मोक्षमार्ग चल रहा है, इनके अभी रागभाव नहीं समाप्त हुआ, सो ये धर्मात्मा जनों में निश्छल वात्सल्य करते हैं ।

निश्छल वात्सल्य―निश्छल वात्सल्य का अर्थ यह है कि वात्सल्य करके, उनका उपकार करके उसके एवज में अपने लिए कुछ नहीं चाहते । इसके लिए गाय और बछड़े की उपमा दी गई है । जैसे गाय का बछड़े पर निश्छल प्रेम रहता है, निःस्वार्थ प्रेम रहता है, गाय बछड़े से कुछ आशा नहीं रखती है कि यह बछड़ा मेरे बुढ़ापे में कुछ मदद करेगा, यहाँ वहाँ से घास उठाकर मेरे मुंह में धर देगा । कोई आशा नहीं रखती है पर प्रकृत्या ही गाय का बछड़े पर वात्सल्य उमड़ता है । इसी प्रकार एक साधर्मी पुरुष दूसरे साधर्मी पुरुष की सेवा शुश्रूषा करके वात्सल्य भाव से उसका उपकार करके भी उसके एवज में कुछ नहीं चाहता है कि मेरा भी यह कभी उपकार करे या मेरी विपत्ति में काम आए । ऐसा निश्छल प्रेम साधर्मी जनों का साधर्मी जनों से होता है । यह है व्यवहारमार्ग का वात्सल्य अंग ।

निश्चय वात्सल्य―निश्चय मार्ग का वात्सल्य क्या है? तो इस ही गाथा में केवल साधु शब्द का अर्थ दूसरा लेने से निकल आता है । साधु कहते उसे हैं कि जो आत्मा के कल्याण को साधे । मेरी आत्मा के कल्याण को साधने वाला रत्नत्रयरूप धर्म है । निश्चय से सम्यग्ज्ञान सम्यग्दर्शन और सम्यक्चारित्र रूप परिणमन ही मेरे कल्याण का साधक है । सो मोक्षमार्ग में लग रहे हुए सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्र का, अपने इन निर्मल परिणामों का जो वात्सल्य करते हैं, प्रेम करते हैं, उतनी साधना बनाते हैं उन सम्यग्दृष्टि जीवों को वात्सल्य भाव युक्त जानना चाहिए ।

वात्सल्य का अर्थ―वात्सल्य शब्द भी वत्सल शब्द से बना है, और वत्स शब्द की प्रसिद्धि धर्मदृष्टि का नाता जिनसे लगा हुआ है उनमें है । जैसे घर के पुत्र आदिक को पुत्र आदिरूप से कहने का ही व्यवहार है, पर शिष्यों को मुमुक्षु बनकर आत्मसाधना के लिए आए हुए कल्याणार्थियों को वत्स शब्द का संबोधन करने की प्रथा है और गाय के बछड़े को भी वत्स शब्द से अधिक कहा जाता है । तो उन वत्सों में जो स्नेह लाया जाता है ऐसे स्नेह का नाम है वात्सल्य । वह वात्सल्य भाव युक्त सम्यग्दृष्टि कहा जाता है जो मोक्षमार्ग के साधक का अर्थात् निज दर्शन ज्ञान चारित्र का वात्सल्य करता है अथवा उनके आधारभूत साधुओं का वात्सल्य करता है उसे सम्यग्दृष्टि कहना चाहिए । जिसका जिससे प्रेम होता है वह प्रेमी अपना कुछ बिगाड़ और विनाश करके भी दूसरों का उपकार करता है ।

वात्सल्य अंग के पालक श्री विष्णु ऋषिराज―इस अंग के पालने में प्रसिद्ध विष्णुकुमार मुनि हुए हैं । कैसा था उनका वात्सल्य कि अकंपानाचार्य आदिक साधु संघ पर जब बलि आदिक मंत्रियों ने घोर उपसर्ग किया था―वह दिन था श्रावण सुदी तेरस या चौदश का । उपसर्ग ऐसा किया वे मुनि महाराज तो अपने ध्यान में लीन बैठे थे, और उन्हें एक बाड़ी से उन मंत्रियों ने घेर दिया । उनके चारों ओर कूड़ा करकट, अनेक दुर्गंध देने वाली चीजें चारों ओर से लगा दीं जिनमें आग जल्दी लग जाये । और आग लगा दी । देखो तो इतना भयानक मुनियों पर उपसर्ग करने का मूल कारण अपमान की ठेस थी । पूर्व समय में उन मुनियों में से एक मुनिराज के द्वारा उन बलि आदिक को शास्त्रार्थ में हारना पड़ा था, उसकी इतनी चोट थी कि उस समय उन्होंने अपना बदला चुकाने का निश्चय कर लिया था । किसी पुरुष को अपमानित कर देना श्रेय के लिए नहीं होता । यद्यपि वहाँ उन श्रुतसागर मुनि ने उन्हें अपमानित करने की दृष्टि से शास्त्रार्थ में नहीं जीता किंतु एक धर्म को अक्षुण्ण बनाने के लिए कि राजा यह न कह सके कि जैन सिद्धांत में कुछ तत्त्व नहीं है । इस दृष्टि से शास्त्रार्थ किया था । पर हुआ क्या सो बहुत खतरनाक परिणाम हुआ ।

क्या कोई जनता का आदमी ऐसा उपद्रव देखकर सह सकता है, पर विवश थी जनता । बलि के हाथ में राज्य था, घोर उपसर्ग किया, और इतना ही नहीं किंतु इस खुशी में धर्म का ढोंग बनाकर एक अलग यज्ञ रचकर याचकों को किमिच्छिक दान देने लगा । आओ ब्राहमणों, जो चाहो दान ले जाओ । उसका 7 दिन का तो राज्य था । सारा धन बिगड़ जाये तो उसका क्या बिगड़ा? ऐसी परिस्थिति में विष्णुकुमार मुनि ने अपनी तपस्या में भी कमी करके उन मुनियों का दु:ख दूर किया था । धर्म का जब अनुराग जगता है तब रहा नहीं जाता । दूसरों का उपद्रव टालना ही चाहिए ।

शुभ अनुराग में वृत्ति―आप जब सामायिक में बैठे हों, जाप दे रहे हों और आपने यह देखा कि इस भींत पर कीड़ा बैठा है और यह छिपकली उस कीड़े को खाना चाहती है तो प्रकृत्या आपका ऐसा यत्न होगा कि पहिले तो वहीं बैठे-बैठे छू-छू करके हाथ हिलायेंगे, जाप सामायिक तो आप कर रहे हैं पर यह दृश्य जब सामने आता है कि अमुक जीव बैठा है और यह छिपकली उसे खाना चाहती है तो अपने ही दिल से बतलाओ कि आप उस जाप की गुरिया फेरते हुए या मंत्र जपते हुए आराम से बैठे रह सकते हैं क्या? नहीं । दया का ऐसा अनुराग जगता है कि आप बैठे नहीं रह सकते हैं । यहाँ कोई प्रश्न करे तो क्या सामायिक की प्रतिज्ञा लेकर अथवा जाप में बैठकर यह क्रिया करना चाहिए? वहाँ तो मन, वचन, काय की क्रियाओं को बंद ही करना चाहिए । हाँ भाई उस जाप देने वाले को इसका पता है और ऐसा करते हुए में अंतर से वह खेद भी मानता है और यत्न भी करता है कि मैं छू-छू करूँ या थप्पड़ी बजाऊं, या थोड़ा झुककर कुछ उसमें घबड़ाहट पैदा कर दूँ ताकि वह कीड़ा बच जाये । ऐसा यत्न करते हुए वह अपने आपमें ऐसा विषाद भी कर रहा है और यह अनुराग का कार्य भी कर रहा है । अपना ही प्रेक्टिकल करके देख लो ।

श्री विष्णु ऋषिराज के दया की उमड़―तो विष्णुकुमार मुनिराज जिनको विक्रियाऋद्धि सिद्ध थी, जब उन्हें यह समाचार विदित हुआ कि अहो मुनिसंघ पर इतना घोर उपसर्ग हो रहा है, तो उनके यह इच्छा हुई कि यह उपसर्ग दूर किया जाये । किंतु उन्हें अपनी ही ऋद्धि का पता न था । देखो―ऐसे समय पर विष्णुकुमार मुनिराज ने सोचा कि क्या ऐसा किया जा सकता है कि अपने ध्यान का लक्ष्य कर इस उपसर्ग को दूर कर सकें? लेकिन जब पता हुआ, जिसने समाचार दिया था उन क्षुल्लकजी ने कि विक्रियाऋद्धि सिद्ध हुई है―अपना हाथ बढ़ाया तो बढ़ता ही चला गया पर्वत तक । जान लिया कि विक्रियाऋद्धि हुई है । तो विष्णुकुमार मुनि ने उस विक्रियाऋद्धि की सिद्धि के बल से उपसर्ग को दूर करने की ठान ली ।

जैसे घर का बच्चा बीमार हो और आपका उससे प्रेम हो तो सारा धन खर्च करके भी आप उस बच्चे को बचाना चाहते हैं । जिस धन को आपने बड़े कष्ट से कमाया, बहुत दिनों में कमाया, वह धन हजारों लाखों का बच्चे की बीमारी में दो तीन दिन में ही खर्च होने को है, और खर्च करते जाना आवश्यक है, बड़ा खर्च करना पड़ता है, सो सारा खर्च कर देता है । तो विष्णुकुमार मुनि को बड़ी साधना के फल से विक्रिया ऋद्धि सिद्ध हुई थी, उस ऋद्धि संपत्ति के खर्च करने के लिए अर्थात् विकल्प करके उस अनुपम साधना से कुछ गिर गए । गिर जाने दो, गिरते हुए भी जान रहे हैं कि उठना किस तरह से होता है? उनको ज्ञान है ।

श्रीविष्णु द्वारा करुणासंपादन की प्रस्तावना―वे झट गए, जहाँ बलि यज्ञ का ढोंग रच रहा था एक बामन स्वरूप रखकर । वहाँ किमिच्छक दान देने वाले बलि के आगे मंत्र और बड़ी ध्वनि से यज्ञ की बातें भी कर लीं । उस समय संतुष्ट होकर बलि कहता है कि जो तुम्हें माँगना हो मांग लो । एक तो अन्याय कर रहा है बलि और पिछला बदला चुकाने के आशय से खुश हो रहा है । और दूसरे का धन है सो खूब लुटा रहा है । ऐसी हालत में संतुष्ट होकर बलि यों कहता कि ले लो जो तुम चाहते हो । विष्णु जी बोले कि मुझे तो केवल तीन पग जमीन चाहिए । विष्णु जी मायने विष्णुकुमार मुनि । आज यह प्रसिद्ध हुआ है कि विष्णु जी ने ही तीन पैर भूमि मांगी थी । विप्र लोग जब राखी बाँधते हैं तो यह श्लोक पढ़ते हैं कि जैनराज बली बध्यो । वहां जैन नहीं है, येन है । क्योंकि ये की जगह जै कर देने से श्लोक अशुद्ध हो जाता है । जिसने बलि राजा को बाँध लिया वह हम सबकी रक्षा करें ।

श्री विष्णु ऋषिराज की विक्रिया व साधुओं का उपसर्ग निवारण―तो तीन पग जमीन विष्णु ने माँगी । बलि राजा बोला कि तीन पग जमीन में क्या होता है, अरे कोई महल माँगो, सोना चाँदी माँगो, कोशों की जमीन माँगो । विष्णु बोले कि हमें तो तीन पग ही जमीन चाहिए । इसका उन्होंने संकल्प किया । कहा अच्छा ले लो । विष्णु ने एक टांग को तो मध्य में रखा, मानो सुमेर में, चारों ओर टांग को घुमाया, सारा मनुष्यलोक घेर लिया । विष्णु ने कहा कि अब तीसरा पग दो । इतना ही देखकर राजा बलि भय से कांप गया और कहने लगा कि महाराज अब मेरे पास और जमीन कहाँ है? उस समय का दृश्य कई दृष्टियों से बड़ा रंजक था । अंत में बलि से विष्णु ने कहा कि इन सब मुनियों का उपसर्ग इसी समय दूर करो । उपसर्ग को बलि ने दूर कर दिया । तो विष्णुकुमार मुनिराज ने अपनी साधना में शिथिलता भी करके अनेक मुनियों के प्राण बचाए । उन पर वात्सल्य भाव प्रदर्शित किया ।

वात्सल्य की नींव निर्मोहता―वात्सल्य परिवार जनों पर करो तो उससे ज्ञानदृष्टि नहीं मिलती है । परिवार के जनों का भी स्मरण रहे, कुछ भी करो किंतु उनके साथ कुछ मोह और राग का संबंध है तो दु:ख ही है । इस कारण परिवारजनों से मोह न करो । अन्य धर्मात्माओं पर, जिनसे कोई अपना स्वार्थ नहीं निकल रहा है ऐसे धर्मात्मा जनों पर वात्सल्य करो और अपने सन्मार्ग में प्रगतिशील बनो ।

वास्तव में सगुन और असगुन―भैया ! धर्मात्मा जनों के प्रति जो वात्सल्य वृत्ति होती है वह ज्ञानस्वभाव का स्मरण कराने वाली होती है । यही सगुन है । अन्य जीवों से अनुराग बढ़ना जिनसे विषय साधनों का कुछ मतलब नहीं है, यही एक सगुन है और जिन जीवों से मोहभाव बना हुआ है उनसे स्नेह बनाए रहें यही असगुन है । सगुन वह कहलाता है जो निज ज्ञानस्वभाव की दृष्टि में सहायक है और असगुन वह कहलाता है जो निज ज्ञानस्वभाव की भक्ति में बाधक है । धर्मात्मा जनों से निश्छल होकर कुछ न चाहकर वात्सल्य करना चाहिए, उसी से निर्मलता प्रकट होती है जिस निर्मलता के प्रभाव से भव-भव के बाँधे गए कर्म क्षीण हो जाते हैं ।

निज अभेदस्वरूप का वात्सल्य―चूंकि सम्यग्दृष्टि टंकोत्कीर्णवत् निश्चल एक ज्ञायकस्वभाव रूप है इस कारण वह सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, सम्यक्चारित्र―इन तीनों गुणों से अपने को अभेद बुद्धि से देखता है । उत्तम वात्सल्य वह है जिसमें दूसरा अभेद साधु को दिख जाये, प्रीति में भी यही होता कि दूसरे को भी अपना मान लिया जाये । यहाँ निश्चय के वात्सल्य में यह बतला रहे हैं कि सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्र इन तीनों गुणों से अपने को अभेदबुद्धि से देखना अर्थात् इस रूप ही मैं हूं―इस प्रकार रत्नत्रय स्वरूप अपने आपको देखना सो ही वास्तव में रत्नत्रय का वात्सल्य है । जिसने अपने आपको रत्नत्रय स्वरूप देखा अर्थात् मोक्षमार्ग में वात्सल्य भाव हुआ तो उसको मोक्षमार्ग मिल ही गया ।

मार्गावात्सल्यकृत बंध का अभाव―अब इसके मार्ग न मिलने के द्वारा जो पहिले बंध चल रहा था अब वह बंध नहीं रह गया, और चूँकि मार्ग मिल गया है, शुद्ध ज्ञायकस्वरूप अपने आपके आत्मतत्त्व का अनुभव चल रहा है तो इसका मार्ग मिलने के कारण पूर्वबद्ध कर्मों की निर्जरा ही होती है । यही वास्तविक वात्सल्य है । इसके अवात्सल्य तो है नहीं, फिर बंध किस बात का? बंध उन जीवों के होता है जो अपने आपके ज्ञान, दर्शन, चारित्र स्वभाव में श्रद्धान न करे, रुचि न करे, इसकी खबर ही नहीं रखे, विमुख रहे और इतना ही नहीं बल्कि इसके प्रतिकूल जो मिथ्यादर्शन, मिथ्याज्ञान और मिथ्याचारित्र भाव हैं इन भावों की रुचि रखे, उनका ही तो बंध होता है । सम्यग्दृष्टि के बंध के कारण मुख्य जो मिथ्यात्व है उस मिथ्यात्व का अभाव हो गया इस कारण अब उसके बंध नहीं चलता । उसके मार्ग का वात्सल्य है, उससे निर्जरा ही होती है । इस प्रकार वात्सल्य अंग का वर्णन करके अब अष्टम अंग जो प्रभावना अंग है उसका वर्णन कर रहे हैं ।


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