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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:समयसार - गाथा 26

From जैनकोष



जदि जीवो ण सरीरं तित्थयरायरिय संथुदी चेव ।

सव्वा वि हवदि मिच्छा तेण हु आदा हवदि देहो ।।26।।

787-देह में ही जीवत्व सिद्ध करने का अज्ञानी का प्रयास—यहाँ अज्ञानी का प्रश्न है कि शरीर ही जीव है हमें यहाँ समझाया जा रहा है कि जीव शरीर नहीं कहलाता, शरीर अलग है जीव वस्तु अलग है लेकिन ग्रंथों में भी ऐसा वर्णन आता है भक्ति में, स्तवन में । जैसे कि तीर्थंकर वंदनीय हैं, जिन्होंने अपनी कांति से एक स्वच्छ प्रकाश से दशों दिशाओं को व्याप लिया है अर्थात् तीर्थकर महाराज से ऐसी कांति निकल रही थी जैसे कि दर्पण में से कांति निकलती है । दीपक में से कांति निकलती है ऐसा स्वच्छ प्रकाश निकला तीर्थकर महाराज से कि वह प्रकाश दशों दिशाओं में व्याप गया । तो फिर यह किसका वर्णन है, जीव का कि शरीर का ? तो शरीर ही जीव है । बहुत जगह वर्णन आता है कि दो भगवान तो सफेद हैं दो भगवान हरे हैं, दो भगवान नीले हैं, दो भगवान लाल हैं और 16 भगवान स्वर्ण की तरह पीले हैं । तो शरीर ही तो जीव रहा शरीर से निराला क्या जीव? दिव्यध्वनि का वर्णन होता है । भगवान की ऐसी दिव्यध्वनि निकलती है कि सबके कानों को सुख देती है । इस अमूर्त निराले चैतन्यमात्र आत्मा को कह रहे हो, उसमें से दिव्यध्वनि निकलती है । शरीर ही जीव है और तीर्थकर का स्तवन किया, गुरुवों का भी स्तवन करते हैं और कहते हैं कि ये गुरु महाराज शुद्ध देश वाले हैं, ये शुद्ध-जाति शुद्ध कुल वाले हैं, तो फिर शरीर ही तो जीव रहा । यदि शरीर को जीव न माना जाय तो फिर ये स्तुतियां जो की गई हैं ऐसे भी जो वाक्य लिखे हैं वे मिथ्या हो जायेंगे । इससे हम तो यह जानते हैं कि शरीर ही जीव है । यह अज्ञानी प्रश्न कर रहा है ।
788-कुछ दार्शनिकों का जीव को भूतचतुष्टय-संयोगमय मानने का मंतव्य—अनात्मत्व की पुष्टि में जो दार्शनिक ग्रंथ हैं उनमें तो इस तरह वर्णन किया है कि पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु के सिवाय और जीव है क्या? ये चार तत्त्व इकट्ठे हो गए तो जीव हो गया । ये चारों तत्त्व बिखर गये जो जीव मिट गया । जैसे जमीन है उसमें शक्ति न रही तो पृथ्वी पृथ्वी में गई; जल जल में गया; अग्नि अग्नि में गई; वायु वायु में गई, इसी को लोग कह देते हैं कि जीव मर गया । जीव और है कहाँ? सिवाय शरीर के जीव है कहां? किन्हीं दार्शनिकों ने यह कहा कि जब तक तुम मानते रहोगे कि मैं जीव हूँ, मैं आत्मा हूँ तब तक तो संसार में रह लोगे और जिस दिन तुम को यह ज्ञान हो जायेगा कि मैं आत्मा नहीं हूं? बस शीघ्र ही निर्वाण हो जायगा । युक्तियां दी हैं कि देखो आत्मा अलग कुछ नही, वस्तु केवल ज्ञानमात्र है और ज्ञान होता है क्षणिक। क्षण में हुआ और मिट गया । अब ज्ञान होते जाते हैं, नये-नये ज्ञान चलते जाते हैं और अज्ञानी जीव उनमें यह मानते कि मैं आत्मा हूँ । मैं वह हूँ जो पहिले था । मैं सदा रहने वाला हूँ । जब यों मानेंगे तो फिर विकल्प उठेंगे, ममता जगेगी, आगे पीछे की बात समझेंगे, जन्म मरण करेंगे, संसार में रुलेंगे और जिस दिन यह जान लिया कि मैं आत्मा नहीं हूँ यह तो क्षणिक ज्ञान है, ये नवीन-नवीन ज्ञान है तब फिर अपना संस्कार न बनायेंगे, कर्म बंध न होगा, अपने को नाम से न मानेंगे । तो नित्यरूप मानने में और आत्मा स्वीकार करने में संसार के सारे झगड़े खडे हो जाते हैं । जब यह जान जाये कि आत्मा कुछ नहीं है तब मुक्ति होती है । ये नाना प्रकार के दार्शनिक लोग इस युक्ति का ढंग निकाल रहे हैं कि किस तरह से निर्वाण होता है । इस अध्यात्म प्रकरण में एक जब स्थूल रूप से यों कहा गया कि शरीर जीव कैसे हो सकता है । जीव तो उपयोगस्वरूप है, शरीर अनुपयोगरूप है । जैसे प्रकाश अंधकार ये दोनों चीजें एक जगह रह सकेगी क्या? न रह सकेगी क्योंकि परस्पर विरोधी है । चेतन और जड़ ये दो धर्म क्या एक वस्तु में रह सकते है? नहीं । इससे जीव जुदा है, पुद्गल जुदा है, ऐसे कथन पर यह अज्ञानी जीव कह रहा है कि हम को तो शरीर ही जीव मालूम होता है, इससे अलग और कुछ नहीं है । अब इसका उत्तर देते हैं—


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