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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:समयसार - गाथा 291

From जैनकोष



जह बंधे चिंतंतो बंधणबद्धौ ण पावइ विमोक्खं ।

तह बंधे चिंतंतो जीवोवि ण पावइ विमोक्खं ।।291।।

बंध के चिंतन मात्र से भी मोक्ष का अभाव―देखो, भैया जैसे बेड़ी से बंधा हुआ कोई पुरुष बंध से छूटने की चिंता करे तो क्या चिंता करने मात्र से वह छूट जायेगा । बेड़ी पड़ी हैं पैर में, हाथ में और ध्यान बना रहे हैं कि कब छूटे बेड़ी, यह बेड़ी छूटे, यह बेड़ी बड़ी दुःखदाई है ऐसा सोचने से बेड़ी टूट जायेगी क्या? ऐसे नहीं टूट सकती है । बेड़ी तो काटने से ही कटेगी, चिंता करने से बेड़ी न कटेगी । तो जैसे बेड़ी के बंधन में बंधा हुआ पुरुष बंध की चिंता करके वह मोक्ष को नहीं प्राप्त कर सकता । इसी प्रकार कर्मबंध की चिंता करके भी जीव कर्मों से कैसे छूटेगा । ऐसा विचार करके भी जीव मोक्ष को प्राप्त नहीं करता है । तो कैसे मोक्ष मिलेगा बंधन से बंधे हुए पुरुष को? उस बंधन को छेदने से, भेदने से, तोड़ने से मोक्ष मिलेगा ।

बंधन के छेदन, भेदन, मोचन से छुटकारा के उदाहरण―किसी के हाथ-पैर रस्सी से बांध दिये, तो उस रस्सी के बंधन को छेद करके ही वह बंधन से छूट सकेगा । केवल जाप करने से बंधन न छूट जायेगा कि मेरी रस्सी टूट जाये, छेद देगा, तोड़ देगा तो वह छूट जायेगी या कोई सांकर से बांध दे तो उस सांकर को यदि कोई भेद देगा तो वह छूट जायेगी । अथवा एक बेड़ी ऐसी होती है काठ की कि उसको फंसा दिया जाता है । अब हथकड़ी भी ऐसी आने लगी है कि एक बार बांध देने पर फिर हथकड़ी को तोड़कर छुटकारा नहीं कराना पड़ता किंतु उसमें पेंच हैं तो उन्हें अलग कर दिया । इसी तरह की पहिले काठ के बंधन की परंपरा थी । पैर में काठ डाल दिया और उसमें दूसरे काठ से बंद कर दिया, तो उस बेड़ी को छुटाने से बंधन मुक्त होगा । कोई बंधन छेद जाता है और कोई बंधन दो टूक किया जाता है, कोई बंधन अलग किया जाता है ।

बंधनत्रय से छुटकारा का उपाय―इसी तरह इस आत्मा में तीन तरह के बंधन हैं―द्रव्यकर्म, भावकर्म और नोकर्म । सो शरीर को तो छुड़ाना है और द्रव्यकर्म को छेदना है, अर्थात् स्थिति अनुभाग घटा-घटाकर उसे नष्ट करना है और भावकर्म को भेदना है । यह मैं आत्मा चैतन्यस्वभावी हूँ और ये कर्म जड़ हैं ऐसे आत्मस्वभाव को कर्म के दो टुकड़े करना है । ऐसे विज्ञानरूप पुरुषार्थ के बल से यह जीव मोक्ष को प्राप्त करता है । सारांश यह है कि संकटों से छूटना हो तो रागद्वेष मोह दूर करो । राग करते हो तो संकट आयेंगे । राग छोड़ना न चाहें और दूसरों से संकट मिटाने की आशा रखें यह न हो सकेगा । संकट मिटाना हो तो खुद को राग में फर्क डालना पड़ेगा तो संकट मिटेंगे, अन्य प्रकार से नहीं ।

बंधनच्छेद की मोक्षहेतुता―मोक्ष के संबंध में यह बताया गया है कि बंध के स्वरूप का मात्र ज्ञान होने से मोक्ष नहीं होता, किंतु अंतरंग ज्ञाता द्रष्टा रहने की वृत्ति के पुरुषार्थ से अर्थात् रागद्वेष न करने के उद्यम से मोक्ष की प्राप्ति होती है । जैसे कोई रस्सी से बंधा है कोई साँकल से बंधा है कोई काठ से बंधा है तो वह बंधन को अच्छी तरह जान जाये कि इस तरह की रस्सी है, इस तरह तेज बंधी है, उन बंधनों के स्वरूप को खूब जान जाये तो क्या स्वरूप जानने मात्र से उसका मोक्ष है । जब तक वह बंधन को छेदे नहीं, भेदे नहीं, छोड़े नहीं तब तक बंधन से छुटकारा नहीं होता है ।

त्रिविध बंधच्छेद के दृष्टांत―पूज्य श्री जयसेनाचार्यजी ने दृष्टांत में यहाँं तीन बातें रखी हैं । रस्सी के बंधन को तो छेदता है, लोहे का बंधन भेदा जाता है और काठ के बंधन को छोड़ा जाता है । छेदने के मायने उसको तोड़ करके टूक कर दें, भेद के मायने हैं छैनी और हथौड़े की चोट से भेदकर इसको अलग कर दिया जाये । और काठ की जो बेड़ियां होती हैं उनमें दोनों ओर छेद होते हैं, उन छेदों में कोई लकड़ी फंसा दी जाती है तो वह बंध गया, तो काठ के बंधन को छोड़ा जाता है मायने वह लकड़ी छोड़ दी जाती, निकाल दी जाती तो वह काठ का बंधन छूट जाता है ।

त्रिविध बंधच्छेद―दृष्टांत के अनुसार यहाँ भी तो तीन प्रकार के बंधन हैं जीवों के । द्रव्यकर्म का बंधन है, भावकर्म का बंधन है और शरीर का बंधन है । तो इनमें से छेदा कौन जायेगा, भेदा कौन जायेगा और छोड़ा कौन जायेगा? तो द्रव्यकर्म को तो छेदने की उपमा है, क्योंकि जैसे रस्सी छेद-छेदकर तोड़ने से धीरे-धीरे शिथिल होकर कई जगह से टूटती है इसी तरह बंधे हुए द्रव्यकर्मों में, करण परिणामों के द्वारा गुणश्रेणी निर्जरा के रूप से बहुत लंबी स्थिति में पड़े हुए कर्मों में से कुछ वर्गणायें निकलकर नीचे की स्थिति में आती हैं । कुछ अनुभाग ऊपर से निकलकर नीचे आते । इस तरह धीरे-धीरे छिद-छिदकर द्रव्य कर्म का बंधन समाप्त होता है । इसलिये द्रव्यकर्म के बंधन में तो छेदने की उपमा होनी चाहिए, भावकर्म के बंधन में भेदने की उपमा होनी चाहिए । भावबंध भेदा जाता है और देहबंधन छोड़ा जाता है ।

भावकर्म का व नोकर्म का बंधच्छेद―जैसे लोहे की साँकल छैनी और हथौड़े के प्रहार से दो टूक कर दिये जाते हैं इसी प्रकार भावकर्म अर्थात् विकार भाव और आत्मा का सहज स्वभाव इसकी सीमा में प्रज्ञा की छेनी और प्रज्ञा के हथौड़े का प्रहार करके स्वरूप परिचय द्वारा उपयोग में इन दोनों का भेदन कर दिया जाता है, भिन्न कर दिया जाता है ये जुदे हैं यों जानकर उपयोग द्वारा भिन्न किया फिर सर्वथा भी भिन्न हो जाता है । शरीर का छेदन नहीं होता, भेदन नहीं होता, किंतु छोड़ना होता है । जैसे काठ की बेड़ी के अवयव निकाल देने से छुटकारा होता है । यहाँ से बना बनाया शरीर छोड़कर आत्मा चला जाता है अर्थात् द्रव्यकर्म होता है छिन्न, भावकर्म होता है भिन्न और शरीर होता है मुक्त । तो इस तरह यह बंधन छूट निकलें, टूटे, भिदे तो जीव मुक्त होता है।

बंध के छेदन भेदन मोचन से मुक्ति―भैया ! मात्र बंध का स्वरूप जानने मात्र से मुक्ति नहीं होती है । जान लिया कि प्रकृतिबंध एक स्वभाव को कहते हैं । कर्मों में स्वभाव पड़ गया है । प्रकृति कहो या कुदरत कहो । जैसे लोग कहते हैं कि प्राकृतिक दृश्य कितने अच्छे हैं । वे प्राकृतिक दृश्य हैं क्या? कर्म प्रकृति के उदय से जो एकेंद्रिय वनस्पति, पत्थर की रचना होती है, उसी रचना को प्राकृतिक दृश्य कहते हैं । प्रकृति से बना हुआ यह सब निर्माण है । जैसे जंगल में पहाड़ होते हैं झरना झरता है चित्र विचित्र पेड़ होते हैं, चित्र विचित्र फल फूल होते हैं, वे सुहावने लगते हैं, उनको लोग कहते हैं कि ये प्राकृतिक दृश्य हैं । बनाये गये नहीं हैं । ऐसी यह प्राकृतिक स्वभाव बनाया नहीं जाता । इन दो के बीच की चीज है, वह सारी वनस्पतियों का, जल और पत्थरों का जो दृश्य है वह बनाया गया भी नहीं है और पदार्थों के स्वभाव से भी नहीं है किंतु वह प्राकृतिक है । अर्थात् कर्म प्रकृति के उदय से उत्पन्न हुए हैं । सो ये प्रकृति कर्म छिन्न होते हैं और ये रागादिक विकार भिन्न होते हैं और शरीर मुक्त होता है तो जीव को मोक्ष प्राप्त होता है अन्य गप्पों से नहीं ।

बंध विज्ञानमात्र से मुक्ति का अभाव―प्रकृतियों के जान लेने मात्र से क्या बंध छूट जाता है? अथवा उसकी स्थितियां जान ली गईं कि अमुक कर्म इस स्थिति का है उनके प्रदेश जान लिया, उनका अनुभाग समझ लिया तो इतने से मात्र से मुक्ति नहीं होती है या शास्त्र के आधार से तीन लोक की रचना जान लिया, इतिहास जान लिया अथवा औपाधिक बातें कहां कैसी होती हैं यह भी समझ लिया तो आचार्य देव कहते हैं कि ये सब ज्ञान हैं तो मोक्षमार्ग के सहकारी, पर इतने से मोक्ष नहीं होता है । ज्ञायकस्वरूप भगवान का उपयोग करें, रागादिक भावों को दूर करें तो मोक्ष का मार्ग प्राप्त होता है ।

धर्म ध्यानांधबुद्धिता―बंध कैसे छूटें, रागादिक कैसे मिटें ऐसे बंध के चिंतन से मोक्ष नहीं होता है । कर्मबद्ध जीव बंध का चिंतन करे अथवा उपायविचयनामक धर्मध्यान करे, अथवा ये रागादिक कैसे दूर हों, यह भावजगत कैसे दूर हो, जन्म मरण कैसे मिटे, नाना धर्मध्यान रूप चिंतन भी चले तो भी इस धर्मध्यान में ही जिनकी बुद्धि अंध हो गई है धर्मध्यान अच्छी चीज है मगर इससे आगे हमारी कुछ कृतार्थता है यह बोध जिनके नहीं है, विशुद्ध, मात्र, केवल, सिर्फ धर्मध्यान, उस ही में जो अटक गए हैं ऐसे जीवों को समझाया गया है कि कर्मबंध के विषय में चिंता करने रूप परिणाम से भी मोक्ष नहीं होता है । जैसे कोई बेड़ी से बंधा हुआ पुरुष है और वह बेड़ी के विषय में चिंता करे कि बेड़ी छूट जाये तो ऐसी चिंता करने मात्र से बेड़ी नहीं छूट जाती । इसी तरह अपने आपके बंधन के संबंध में चिंता करें, कब छूटे, कैसे छूटे तो इतना मात्र चिंतन करने से बंधन नहीं छूट पाता है । वह तो बंधन के छेदने भेदने काटने से ही छूट सकता है ।

भाव बंध भेदनवशता―उन तीनों में भी न अपना छेदने पर अधिकार है और न शरीर को निकालने का अधिकार है केवल भावबंध को भेदने का अधिकार है क्योंकि भाव का और स्वभाव का भेदना प्रज्ञा अर्थात् विवेक से होता है और विवेक कर लेना हमारे अधिकार की बात है, करें, जैसे हम चाहें कि इन 8 कर्म शत्रुओं को छेद दें, निकाल दे, तो उन शत्रुओं का ध्यान रखने से या ऐसा अपना उद्देश्य बनाने से कहीं वे कर्म दूर नहीं हो जाते । वे कर्म तो स्वतः ही दूर होते हैं जब इसके उतने उत्कृष्ट परिणाम बन जाते हैं । शरीर के छुटकारा की भी बात अपने अधिकार की नहीं है, छूटना है तो स्वयं छूटता है, मात्र विभावों को भेदने पर अपना वश हैं । यद्यपि अनादि से अब तक विभावों से छूट नहीं सके, इसका प्रमाण यह है कि हम आप भव धारण कर रहे हैं, नहीं भेद सकते मगर पुरुषार्थ पूर्वक यह देख लें कि द्रव्यकर्म को भेदने में हमारा वश है या भावकर्म को भेदने में हमारा वश है ।

भावबंधभेदनवशता का कारण―भावकर्म को भेदने में हमारा वश यों है कि द्रव्यकर्म और शरीर तो परद्रव्य हैं, उन पर हमारा अधिकार नहीं है । और, भाव हमारे परिणमन हैं, वे हमारे ज्ञान में आते हैं, तथा स्वभाव मेरा स्वरूप है, वह भी ज्ञान में आता है । तो स्वभाव और विभाव जो कुछ हमारे ज्ञान में आते हैं, जिनके लक्षण को हम समझते हैं, उनका भेद कर दें, जुदा-जुदा स्वरूप पहिचान लें, इस पर हमारा वश है । और, इस ही आधार पर हमारा मोक्षमार्ग हमें मिलता है ।

मोक्षहेतु की जिज्ञासा―जो लोग कहते हैं कि बंध की चिंता का प्रबंध मोक्ष का कारण हुआ सो बात असत्य है । यद्यपि मोक्ष के कारण में चलने वाले जीवों के बंध के चिंतन का अवसर आता है फिर भी बंध के चिंतन मात्र से मोक्ष नहीं मिलता । मोक्ष तो बंध के खोलने से मिलता है । इतनी बात सुनने के पश्चात् जिज्ञासु प्रश्न करता है―तो फिर मोक्ष का कारण क्या है? न तो बंध के स्वरूप का ज्ञान मोक्ष का कारण है और न बंध के विनाश का चिंतन मोक्ष का कारण है तब है क्या मोक्ष का कारण? ऐसी जिज्ञासा सुनने पर आचार्यदेव उत्तर देते हैं―


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