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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:समयसार - गाथा 310

From जैनकोष



ण कुदोचिवि उप्पण्णो जम्हा कज्जं ण तेण सो आदा।

उप्पादेदि ण किंचिवि कारणमवि तेण ण स होदि।।310।।

परिणमन ही अपने-अपने द्रव्य में तन्मयता के कारण कार्यकारणपने का अभाव―प्रत्येक पदार्थ अपने आपमें ही परिणमन करते हैं, इस कारण उनका जो भी परिणमन है वह उन्हीं पदार्थों में तन्मय है। आपका परिणमन चाहे शुद्ध हो चाहे अशुद्ध हो, वे सब आपसे अभिन्न हैं। तो जब सभी द्रव्यों का अपना-अपना परिणमन अपने अपने द्रव्य से अभिन्न है तब यह कैसे कहा जा सकता कि अमुक पदार्थ अमुक दूसरे से उत्पन्न हुआ है ? जब सर्व पदार्थों का परिणमन उन ही में निज में तन्मय है तो कौन सी ऐसी गुंजाइश है जो यह कहा जाय कि अमुक पदार्थ अमुक दूसरे से उत्पन्न होता है। यह उपादान की दृष्टि रखकर बात की जा रही है, किंतु सर्वविशुद्ध का निरूपण निश्चय दृष्टि से होता है, व्यवहार दृष्टि से सर्वविशुद्ध का निरूपण नहीं होता अर्थात् सबसे पृथक केवल अपने स्वरूप मात्र का वर्णन निश्चय दृष्टि से ही संभव है और निश्चय दृष्टि में पर की दृष्टिही नहीं है। सोवहां निमित्तनैमित्तिक भाव की दृष्टि ही नहीं है। एक पदार्थ ही देखा जा रहा है और उसके बारे में वर्णन किया जा रहा है कि ये पदार्थ अपने में ही अपना परिणमन करते है।

कार्यकारणपने के अभाव से कर्तृकर्मत्व का अभाव―भैया ! जब कोई पदार्थ किसी भी पदार्थ से उत्पन्न नहीं हुआ है तो वह कार्य कैसे हो सकता है ? यह बात आत्मा की है, तो आत्मा कार्यरूप नहीं है और कोई पदार्थ किसी दूसरे को उत्पन्न नहीं कर सकता है , फिर वह कारण कैसे हो सकता है ? इस कारण आत्मा कारण भी नहीं है और आत्मा कार्य भी नहीं है। जरा कोल्हू में बालू डालकर देखो तेल उत्पन्न होता है कि नहीं। तेल तिल से ही पैदा होता है, सरसों से तेल नहीं निकलता। तिल से ही तेल निकलता है । सरसों से जो निकलता है उसका नाम लोगों ने तेल रख लिया। तिल से जो उत्पन्न हो उसे तेल कहते हैं। पर तेल की समानता है, तिल से उत्पन्न होने वाली वस्तु की तरह वह परिणति है इसलिए सबका नाम तेल रख दिया। सरसों का नाम सरसौंल रख लो, बादाम का नाम बदौंल रख दो। रूढि़वश कितने ही नाम बोल दिए जाते कि जिनका नाम अर्थानुसार फिट नहीं बैठता मगर सब समझते है । तो बालू में तेल उत्पन्न नहीं होता, इसलिए बालू तेल का कारण नहीं है और तेल बालू का कार्य नहीं है। इसी तरह जीव की परिणति पुद्​गल से नहीं होती इसलिए जीव की परिणति पुद्​गल का कार्य नहीं है। और उनके परिणामों का कारण पुद्​गल नहीं है, इसलिए जीव और अजीव में कार्य कारण भाव नहीं है।

विशुद्धता का भाव परविविक्तता―यहाँ सर्वविशुद्ध तत्व निरखा जा रहा है। सर्वविशुद्ध तत्व तब ही निरखा जा सकता है जब किसी भी पर की ओर दृष्टि न हो। केवल उस ही स्वरूप की दृष्टि हो जिस स्वरूप को देखना है और वर्णन करना है। क्रम क्रम से होने वाली जितनी भी अवस्थाएँ हैं उन अवस्थावों से उत्पन्न होता हुआ यह जीव-जीव ही है, अजीव नहीं है। जीव की अवस्थावों पर दृष्टि बिल्कुल न दें तो जीव को यहां कौन पहिचान सकता है ? मनुष्य, पशु, तिर्यंच, नारकी मुक्त जीव इन सबके सहारे ही हम जीव की चर्चा किया करते हैं। तो ये जितने भी जीव के परिणमन हैं वे सब जीवमय है अजीव नहीं है। इसी प्रकार अजीव को भी निरखना जो उनका परिणमन है उन परिणमनों से उत्पन्न होते हुए वे सब कुछ अजीव ही हैं, जीव नहीं हो सकते हैं, क्योंकि समस्त द्रव्य अपने ही परिणमन के साथ तादात्म्य रखते हैं, दूसरे के परिणमन से उनका तादात्म्य नहीं है।

पर के द्वारा पर के परिणमन की अशक्यता―कोई मनुष्य किसी भाई को समझाता है, भाई हमारी बात तो तुम मान ही लो, तो उसके कहने से क्या वह बात मान लेता है ? उसके मन में आए तो मानता है। कहता है भाई हमने बात तुम्हारी पूरी मानी है, अरे वहां उसने उसकी बात रत्ती भर भी नहीं मानी। कोई किसी की बात सीधा नहीं मानता है। बात मानना तो उनका परिणमन है और उन परिणमनों का तादात्म्य उस मानने वाले के साथ है, दूसरे के साथ नहीं हो सकता है, इसलिए एक जीव का किसी दूसरे जीव के साथ कोई कार्य-कारण संबंध नहीं। और न किसी जीव के साथ इसका कार्य-कारण संबंध है। जीव अपने परिणामों से उत्पन्न होता है। उसका अजीव के साथ कारण कार्य कैसे होगा? जैसे सोने का गहना बनाना है तो भाई चाँदी ले जावो तो क्या क्या बन जायेगा? चाँदी की ही चीज बन जायेगी। सोने से वास्तविक सोने की चीज बनेगी ? सोने के आभूषण का चाँदी के साथ कोई कार्य-कारण भाव नहीं है। इसी प्रकार जीव के परिणाम का अजीव के साथ कोई कार्य-कारण भाव नहीं है?

विवेकी के भुलावा क्यों ?―भाई ! बच्चा हो तो भूल कर ले। भीत में यदि सिर लग जाय तो उसकी मां भींत में 3-4 थप्पड़ मार दे तो शांत हो गया। इस भींत ने मुझे मारा था तो देखो अम्मा ने भींत को कैसा मारा ? तो बच्चा हो तो भले ही भूल कर जाय, मगर जो बुद्धि रखता हो और ऐसी भूल करे कि मुझे अमुक अजीव ने सुख दिया, अमुक अजीव ने वह दु:ख दिया तो वह उसका विवेक नहीं है। यह उसकी मौलिक भूल है। वह संसार में रूलता चला जा रहा है। समस्त द्रव्यों का किसी भी अन्य द्रव्य के साथ उत्पाद्य-उत्पादक भाव नहीं है। हालांकि निमित्तनैमित्तिक भाव बिना कोई विभाव का कार्य नहीं होता। फिर भी पदार्थ का परिणमन उस ही पदार्थ से निकलता है, किसी दूसरे पदार्थ से नहीं निकलता है।

परका पर में अकर्तृकर्मत्व–भैया ! रोटी आटे से ही बनती है, धूल से नहीं बन सकती हे, यह कितना विश्वास है। वैसे ही हाथ जरा धूल पर चलावो और इटावा की धूल तो आटे के ही बराबर चिकनी है, रूंदने में आ जायेगी, बेलने में आ जायेगी। (हँसी) तो जैसे रोटी आटे से ही बनती है, उपादान उसका अन्न है, धूल आदिक नहीं है, इसी प्रकार कोर्इ भी कार्य हो, मान आए, लोभ आए, कोर्इ परिणमन हो, उसका उपादान मैं ही हूँ , मेरे क्रोध दूसरों से नहीं आता, मेरे से ही बनता है। मेरे विषय कषाय, मेरे सुख दु:ख मेरे से ही बनते हैं, किसी दूसरें से नहीं बनते है। यदि कोई पदार्थ किसी दूसरे से पैदा होने लगे तो संसार में अंधेर मच जाय। फिर तो कोई पदार्थ नहीं रह सकता है। यह पूर्ण वैज्ञानिक बात वस्तुस्वरूप के बारे में कही जा रही है। वैज्ञानिक लोग भी यह मानते हैं कि जो जो पदार्थ सत् है उसका कभी विनाश नहीं होता। उसका परिणमन चलता रहता है। और उन दो पदार्थों के संबंध में भी, निमित्तनैमित्तिक भाव में भी जो बात बनती है उन दो की दशा उन दो में अलग अलग बनती है। तो जब एक द्रव्य का दूसरे द्रव्य के साथ कार्य-कारण भाव सिद्ध नहीं होता तो तुम यह कैसे कह सकते हो कि यह अजीव जीव का कर्म है। यह जीव का परिणाम अजीव का फल है, यह बात सिद्ध नहीं होती ।

छायापरिणत की छाया―अच्छा देखिये जितनी जगह में यह छाया हो रही है यह छाया किसकी हो रही है ? यह भींत की छाया है ? नहीं। जहां आप बैठे हैं यह छाया इस जगह की छाया हैं और भींत उस उस में निमित्त है। अगर भींत की छाया होती तो भींत में रहती।

जिसकी जो चीज होती है वह उसमेंरहती है। भींत का रूप है, भींत का जो कुछ है वह भींत में मिलेगा, भींत से बाहर न मिलेगा, पर भींत उसमें निमित्त है। और छाया जमीन की है। इस तरह व्यवहार में यह छाया हाथ की हो गयी, बीच में छाया बिल्कुल नहीं है। आप लोगों को भ्रम भले ही हो जाय कि जमीन पर भी छाया हैं और जमीन से चार हाथ ऊपर भी छाया है। पर जमीन से एक सूत भी ऊपर छाया नहीं है। अरे है तो छाया जमीन की। ऊपर कोई पुद्​गल चीज रखी हो तो छाया है, नहीं तो नहीं है। जैसे तख्त पर छाया है वह तख्त की है, जो जमीन पर छाया है वह जमीन की छाया है और जहां कुछ न हो वहां कुछ नहीं है।

प्रकाशपरिणत का प्रकाश―भैया ! उजाला भी उजेले में है। उस पुद्​गल का ही उजाला है। कभी देखा होगा कि जब अंधेरी रात में आप टार्च जलाते हैं तो उस भींत पर तो उजेला मिलेगा पर उस भींत और टार्च के बीच में उजाला न मिलेगा। आप कहेंगे कि मिलता है, थोड़ी-थोड़ी किरणें मिलती हैं। तो उस बीच में जो सूक्ष्म पुद्​गल फिर रहे हैं, जो आपको कूड़े की तरह नजर आ रहा है वह उसका ही उजाला है, आकाश में जरा नहीं है जब कि बीच में कोई चीज खड़ी कर दें तो उस चीज पर तेज उजाला हो जाता है और कुछ चीज न हो तो एक मामूली उजाला रहता है, सो वह मामूली उजाला भी वहां के फिरने वाले सूक्ष्म मैटर का है। कोई उजाला नाम की अलग से चीज नहीं है। जिस पुद्​गल का उजाला है उसकी वह चीज है।

उत्पाद्य उत्पादक संबंध न होने पर भी निमित्तनैमित्तिक संबंध का प्रसार―सो भैया ! जब ऐसी स्थिति है कि जिसका जो परिणमन है वह उससे ही निकलता है, उसमें ही तन्मय है। तब यह ख्याल बनाया कि मेरा धन है, मेरा वैभव है, मेरा घर है, मेरा परिवार है, यह सब इतना कठिन भ्रम है कि जिसका फल संसार में रुलना ही रहता है तो यह निश्चय करो कि जितने पदार्थ हैं-जीव हों, परमाणु हों, प्रत्येक पदार्थ अपने में अनंत शक्ति रखते हैं ओर जितनी शक्तियाँ हैं उतनी उनकी अवस्थाएं बन रही हैं। तो वे पदार्थ अपने गुणों में और अपनी अवस्थावों में ही तन्मय हैं फिर यह प्रश्न होता है तो फिर यह संसार बन कैसे गया ? जब किसी पदार्थ का किसी अन्य पदार्थ के साथ कोई संबंध नहीं है तो फिर वह बन कैसे गया ? उत्तर देते हैं।


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