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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:समयसार - गाथा 339

From जैनकोष



तम्हा ण को वि जीवो वघादेयो अत्थि अम्ह उवदेसे।जम्हा कम्मं चेव हि कम्मं घादेदि इवि भणिदं।।339।।

प्रकृति कर्तत्व का निष्कर्ष―इसलिए कोई भी जीव हमारी दृष्टि में घात करने वाला नहीं है, हिंसक नहीं है। हिंसक है कर्म प्रकृति, क्योंकि कर्म ने ही कर्म द्याता है, जहां यह कह रहे हैं कि कर्म हिंसा करता है और यह कह दें कि जीव का घात करता है। बात तो नहीं बनेगी क्योंकि जीव को अपरिणामी रख रहा है यहां शंकाकार। तो कर्म ने कर्म को मारा इस कारण हम यह जानते हैं कि जीव हिंसक नहीं होता। इस तरह सांख्यानुयायी शिष्य शंकारूप में अपना पूर्व पक्ष रख रहा है। हम तो जानते है कि आत्मा अकर्ता ही है।

पूर्वा पर विरूद्ध तत्त्वों का भी स्याद्वाद से निर्णय―भैया ! इससे पहले क्या बात आई थी कि आत्मा कर्ता ही है। जैसे लौकिक जन ऐसा मानते हैं कि कोई प्रभु इस सारे विश्व का कर्ता है, जीव नहीं करता है। ऐसा ही तुमने माना था कि सारे विश्व का यह आत्मा कर्ता ही है। तो उसके एवज में यह शिष्य कहता है कि जीव तो अकर्ता ही है, कुछ करने वाला नहीं है, इस सबको प्रकृति करती है। सो जीव अकर्ता भी है, इसे अपरिणामी भी सिद्ध किया है, किंतु स्याद्वाद का सहारा लिए बिना कोई झगड़ा नहीं निपटता, शांति नहीं मिलती। इस प्रसंग में यदि यह कहा जाय कि आत्मा कर्ता ही है तो दूषण आता है। यह कहा जाय कि आत्मा अकर्ता ही है तो दूषण आता है और पर उपाधि का निमित्त पाकर आत्मा विभाव परिणमन का कर्ता होता है। अंत: आत्मा कथंचित् कर्ता है इसमें मार्ग मिलता है और कथंचित् अकर्ता है।

स्याद्वाद के स्वरूप के अवगम का एक उदाहरण―बनारस के एक ब्राह्मण थे उन्हें कुछ जैन विद्यार्थियों को जैन दर्शन पढ़ाने का मौका मिला। उसे स्याद्वाद दर्शन में बड़ी श्रद्धा हो गई। कुछ लोगों ने यह कहा कि जैनियों के मंदिर में न जाना चाहिए, न जैनियों के शास्त्र पढ़ना चाहिए। तो उनका यह कहना था कि आप का कहना बिल्कुल ठीक है। जैनियों के मंदिर में न जाना चाहिए क्योंकि एक बार भी आ जायेंगे और प्रभु की इस शांत मुद्रा को निरखेंगे तो फिर वहीं रह जायेंगे। या जैन दर्शन के ग्रंथों को यदि देखेंगे जिनमें स्वरूप का वर्णन है मन गढ़ंत कथायें नहीं हैं, चरित्र और गुण का वर्णन है। तो पढ़ने के बाद वे उसी के श्रद्धालु बन जायेंगे इसलिए उनके छोर ही न जाना चाहिए तो अपना बचाव करने के लिए वे ठीक रहते हैं। हां तो काशी के इन पंडितजी की प्रतिभा समझाने की बतावेंगे।

धर्म की श्रद्धा व धुन―एक भाई मेरठ में मिले थे सत्यदेव उनका नाम था। वे आर्य समाज में बहुत दिनों तक रहे। एक दिन मेरे पास आए। बड़े विद्वान थे वे और दो तीन दिन रहने के बाद बोले कि हमको तो जैन दर्शन से बड़ी श्रद्धा है और साथ ही यह भी कहा कि मैं आपको गुरु मानकर मैं गुप्त रहकर कहीं भी विचरूंगा और इस जैन शासन की सेवा करूंगा। वहां से जाने के बाद हमें केवल एक बार मिला जबलपुर में, अब तक नहीं मिले किंतु खबर जरूर मिलती रहती है कि वह अपने धर्म में अब तक अडिग है। एक खबर हमें देहरादून में मिली थी। एक छपा हुआ बड़ा पर्चा आया जिसमें कुछ समाचार प्रकाशित था, राजस्थान में एक जैनियों के खिलाफ बड़ी सभा बनायी हुई हैं, बड़ी प्रसिद्ध है, राजस्थान वाले सब जानते हैं। तो उस पत्र में यह आया कि कमेटी वालों ने कमेटी तोड़ दी है कहने से। और भी विशेष धर्म प्रभावना की बातें लिखी थीं, और नीचे हमारा नाम देकर लिखा था, कुछ कृतज्ञता जाहिर करके कि उनके ही प्रसाद से हमने ऐसा किया है। तब हमने समझा कि यह वही सत्यदेव है जो मेरठ में मिले थे। तो धुनि की बात है, किसी की ऐसी धुनि हो, जिसे कहते हैं हार्दिक रूचि बताना नहीं चाहते और अपने अंतर में धर्म श्रद्धा बराबर अडिग बनाये रहता है।

ब्राह्मण पंडित की स्याद्वाद प्ररूपक एक सुगम सूझ―तो यह ब्राह्मण पंडित जैन छात्रों को पढ़ाता था, पढ़ाने के बाद उसकी श्रद्धा अडिग हो गई कि वस्तु का अडिग निर्णय स्याद्वाद के द्वारा ही होता है और उसने सब साथियों से यह बात कही कि स्याद्वाद ही एक ऐसा उपाय है कि वस्तु के सही स्वरूप पर ले जाता है। एक आदमी और बोला कि हमें पंडित जी जरा आप स्याद्वाद बतलावे तो सही। अच्छा भाई बैठो घंटा डेढ़ घंटा में समझा देंगे। कहा कि इतनी फुरसत नहीं है हमें 10 मिनट में समझा दो। कहा कि अच्छा 10 मिनट में नहीं हम सवा मिनट में समझा देंगे अच्छा बैठो। बैठाल दिया। उस पंडित के पास चार फोटो रखी थी उसके घर की एक पीछे से चित्र लिया हुआ एक आगे से चित्र लिया हुआ एक अगल से और एक बगल से। चार फोटो क्रम से दिखाया। पूछा कि ये किसकी फोटो है। कहा कि ये आपके घर की फोटो हैं जो कि पीछे से खींची गयी है। अच्छा यह भी आपके घर की है पूरब की तरफ से खींची गयी है। इसी तरह बता दिया कि यह उत्तर दिशा से और यह दक्षिण दिशा से खींची फोटो है। तो पंडितजी ने कहा कि बस यही तो स्याद्वाद है। वस्तु में जो धर्म की निरूपणता होती है वह सब अपेक्षा से होती है। द्रव्य अपेक्षा से नित्य, पर्याय अपेक्षा से अनित्य, इस प्रकार सब वर्णन होता है। बतलावो स्याद्वाद के बिना व्यवहार में भी गुजारा होता है क्या ? व्यवहार में भी गुजारा नहीं होता, यह सब निर्णय आगे किया जायगा।


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