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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:समयसार - गाथा 342

From जैनकोष



अप्पा णिच्चोऽसंखेज्जपदेसो देसिदो दु समयम्हि।ण वि सो सक्कदि तत्तो हीणो अहियो य कादुं जे।।342।।

आत्मा में आत्मद्रव्य का ही कर्तृत्व क्या–आगम में आत्मा को नित्य असंख्यातप्रदेशी बताया गया है। तो यह आत्मा उस असंख्यात प्रदेश प्रमाण से न तो हीन किया जा सकता है और न अधिक किया जा सकता है। आत्मा आत्मा का कर्ता है। इस पक्ष के उत्तर में पहिली बात यह रखी जा रही है कि आत्मा आत्मा का करता क्या है ? क्या इसे घट बढ़ बना देता है ? सो असंख्यात प्रदेश से न यह हीन होता है और न अधिक होता है। एक बड़े शरीर वाला जीव भी असंख्यातप्रदेशी है और असंख्यात प्रदेश को घेरे हुए है और एक अत्यंत पतली बूंद से भी बहुत छोटा कोई जीव कीड़ा वह भी असंख्यातप्रदेशी है और असंख्यात प्रदेश से घिरा हुआ है और निगोद जीव जिसका शरीर आँखों दिख ही नहीं सकता उतना सूक्ष्म शरीरी जीव भी असंख्यात प्रदेशी है और आकाश के असंख्यात प्रदेश में फैला हुआ है और एक केवली समुद्​घात करने वाले केवली भगवान का जीव लोकपूरण समुद्​घात के समय असंख्यात प्रदेशी है और असंख्यात प्रदेशों को घेरे हुए है। शरीर से मुक्त होने के बाद सिद्ध भगवान का भी जीव असंख्यात प्रदेशी है और आकाश के असंख्यातवे प्रदेशों को घेरे हुए है।

नित्य आत्मद्रव्य का क्या करना―यह जीव सर्वदा असंख्यात प्रदेशी है और नित्य भी है। अब उसमें कार्यपना क्या आया? कार्य तो उसे कहते हैं कि पहिले न था और अब हुआ। जैसे यह ज्ञान जो ज्ञान के समय में चल रहा है वह ज्ञान पहिले न था, इस रूप में और अब हुआ है। लो कार्य बन गया। यहां तक भी परिणमन आत्मा में न हुआ तो अब आत्मा ने आत्मा को और क्या किया ? आत्मद्रव्य पहिले न हो और अब हो जाय तो आत्मा को किया हुआ समझिये। जो अवस्थित है, नित्य है, असंख्यात प्रदेशी है उसमें कुछ प्रदेश घट जायें, कुछ प्रदेश फीक जायें ऐसा भी नहीं हो सकता। पुद्​गल स्कंध की तरह कुछ प्रदेश आयें और कुछ प्रदेश चले जायें ऐसा तो होता नहीं, फिर कार्यपना क्या ?

प्रदेश विभाजन से द्रव्य के एकत्व का अभाव―यदि आत्मा के प्रदेशों में कुछ आ जाय, कुछ चला जाय तो फिर यह एक न रहा। इसमें एकत्व नहीं रहा। जैसे ये दिखने वाले पदार्थ भींत खंभा चौकी आदि एक नहीं हैं, इनमें से कुछ हिस्सा निकल जाता है, कुछ हिस्सा आ जाता है, ये एक नहीं हैं, ये अनेक है, मिले हुए हैं, इसलिए ये बिखर जाते हैं, जहां एक वस्तु का हिस्सा नहीं हो सकता, हो जाय हिस्सा तो समझलो कि वह एक न था, अनेक मिले थे।

स्वरूप विरूद्ध अपलाप―यहां जीव को परिणमने वाला सिद्ध कर रहे हैं। यहां जिज्ञासु ज्ञान पर, विभावों पर हाथ नहीं रखना चाहता, इसकी मान्यता में यह जीव न ज्ञानरूप परिणमता, न दर्शनरूप परिणमता, न विभावरूप परिणमता यह आत्मा तो आत्मा के करता है कोई विवाद करे, 10 दिन विवाद करे, 50 दिन विवाद करे, अपनी ही कहते रहे, विवाद नहीं छोड़ें तो वचन तो वह हैं ही अपनी-अपनी सिद्ध करते जायेंगे।

हठ की क्या चिकित्सा―एक देहाती पंचायत थी, उसमें एक पटेल जी बैठे थे। तो ऐसी बात सामने आयी कि किसी का मामला था, सो पूछा गया कि 30 और 30 कितने होते हैं ? तो पटेल को बोल आया कि 50 होते है। लोगों ने कहा कि 30 और 30 मिलाकर 60 होते हैं। चाहे अंगुलि पर गिन लो या कंकड़ रखकर गिन लो। उसने कहा, नहीं 50 ही होते है। औरों ने कहा कि 50 नहीं होते है। पटेल बोला कि अच्छा अगर 50 नहीं होते हैं तो हमारी चार भैंसे हैं, बारह-बारह सेर दूध देती है, यदि 50 न होते होंगे तो हम चारों भैंसें पंचायत को देंगे। तो लोग बड़े खुश हुए कि कल चारों भैंसें मिलेंगी। अपनी समाज के बच्चे खूब दूध पीयेंगे। यह कथा पटेल जी ने जान ली तो वह रोवे, बड़ी उदास थे कि कल भैंसें चली जायगी, अपने बच्चे अब क्या खावें पीवेंगे ? पटेल घर में आकर स्त्री से बोला कि क्यों उदास हो ? स्त्री बोली कि तुम्हारी करतूत से दु:खी हैं। तुमने ऐसा कर दिया कि कल भैंसें चली जायेगी। पटेल बोला कि तू तो कुछ जानती नहीं है। अरे भैंसें तो तभी जावेंगी जब हम अपने मुख से कह देंगे कि 30 और 30 मिलकर 60 होते हैं। सो कोई कुछ कहे इसने तो जो तत्त्व माना, जो पक्ष माना वही कहता है। अब क्या कर लेंगे ?

संकोच विस्तार होने पर भी असंख्यातप्रदेशित्व में अबाधा―शंकाकार कहता है आत्मा न ज्ञानरूप परिणमता, न रागादिक रूप परिणमता, ये तो सब प्रकृति के कार्य हैं। आत्मा तो आत्मा को करता है। अरे भाई तो कहने से क्या है ? कुछ बात तो सामने लावो कि सब आत्मा आत्मा को करते किस रूप है ? आत्मा असंख्यातप्रदेशी है, वहां घट बढ़ तो होता नहीं। हां नहीं होता है, अरे घट बढ़ तो महाराज नहीं होता, पर प्रदेशों में संकोच और विस्तार तो होता रहता है, सो यहां आत्मा ने आत्मा को किया। तो समाधान में कहते हैं कि भाई आत्मा का प्रदेश नित्य अवस्थित है। आत्मा के प्रदेशों के बिछुड़ने मिलने से तो एकत्व मिट जाता है इसलिए प्रदेश का तो कुछ नहीं किया।

दृष्टांत पूर्वक नियतता की सिद्धि―अब रहा कि जो छोटे बड़े नियत शरीर है उन शरीरों के अनुसार आत्मा में संकोच और विस्तार होता है। इससे आत्मा में एकत्व भी आ गया और करना भी हो गया, सो कहते हैं कि यह कहना भी ठीक नहीं है क्योंकि संकोच और विस्तार भी हो जाय पर निश्चित असंख्यात प्रदेश में कमीवेशी तो नहीं हुई। जैसे गर्मी में चमड़ा सुख जाता है और उसके प्रदेश सिकुड़ जाते है और बरसात में चमड़ा फैल जाता है उसके प्रदेश का विस्तृत हो जाता है, ऐसा संकोच विस्तार होकर भी प्रदेश वे ही हैं। ऐसे ही आत्मा में संकोच और विस्तार होकर भी आत्मद्रव्य में प्रदेश वे ही हैं, वहां अपूर्व कुछ नहीं हुआ। इस कारण आत्मा ने आत्मा को द्रव्य में प्रदेश में कुछ नहीं किया।

ज्ञातृत्व कर्तृत्व के विरोध का जिज्ञासु द्वारा समर्थन―यदि इस दृष्टि द्वारा अवगमन हो कि वस्तु का स्वभाव तो सर्वथा दूर किया ही नहीं जा सकता, सो ज्ञायकभाव आत्मा ज्ञानस्वभाव सहित ही ठहरता है। तनिक और अब बढ़े समाधानदाता की ओर पर शंका ज्यों की त्यों रखनी है कि भाई आत्मा का जो ज्ञायकस्वरूप है वह अभी तो था चैतन्यस्वरूप, इसको अब ज्ञायक नाम लेकर कहा जा रहा है कि वह तो ज्ञानस्वभाव से ही सदा ठहरता है और ज्ञानस्वभाव के रूप से सदा जो ठहर रहा हो उसमें ज्ञायकपना और कर्तापना―इन दोनों का अत्यंत विरोध है। तुम भी तो कहते हो। जो ज्ञाता है सो कर्ता नहीं है, जो कर्ता है सो ज्ञाता नहीं है। सो आत्मा तो सदा ज्ञायकस्वभाव से ही ठहरा है। वह मिथ्यात्व रागद्वेष आदि भावों का कर्ता नहीं होता।

आत्मा के अपरिणामित्व की सिद्धि―शंकाकार का प्रयोजन इस समय ऐसा डटा हुआ है कि वह किसी भी विभाव को आत्मा का परिणमन नहीं मानता। उन सबको प्रकृति का परिणमन कह रहा है क्या ? कि ज्ञायकपने का और कर्तापने का अत्यंत विरोध है। सो विभावों का वह कर्ता नहीं और होता जरूर विभाव है, इसलिए हम तो यही जानते हैं कि उन विभावों को करने वाले कर्म ही हैं। यहां निमित्त दृष्टि नहीं रखी जा रही है। शंकाकार के अभिप्राय में कर्म ही रागरूप परिणमते है, आत्मा तो सदा ज्ञानस्वभाव से ही ठहरा रहता है। अरे भाई इस मंतव्य में तो आत्मा आत्मा को करता है, यह बात तो बिल्कुल ही नहीं बनी। जैसे कहने लगते हैं कि पंचों का हुकुम सिर माथे, पर पनाला यहीं से निकलेगा। यही एक परम शुद्ध निश्चयनय का दृष्टांत है।

नयों के कार्य―नय अपना विषय बतलाते हैं, उनका काम दूसरे नयों के विषय का खंडन करना नहीं है। यह प्रकरण करने वाले की कला है कि उस समय उस नय को जान लिया, एक को मुख्य कर लिया, एक को गौण कर लिया। जो कोई कुछ कह रहा है उसका मंतव्य और दृष्टि जैसी अपनी दृष्टि बनाकर सुना जाय तो उसका कहना सही है, पर इतनी क्षमता कल्याणार्थी पुरूष में ही हो सकती है, हठी पुरूष में नहीं हो सकती है। जब हम नैयायिक, मीमांसक, वैशेषिक, बौद्ध आदि अनेक सिद्धांतों का स्याद्वाद द्वारा समन्वय कर सकते हैं तो जैन-जैन में ही परस्पर विपरीत कहे जा रहे हुए वचनों का समन्वय करने की क्या स्याद्वाद में क्षमता नहीं है ? हां यह बात अवश्य है कि उन सब बातों को जानकर कल्याण के लिए हमें कौन सी बात मुख्य करना है, उसको हम मुख्य करें और उसका आश्रय करें।

निर्णय और आश्रय―भैया ! विवाद में विसम्वाद में रहकर कोई सफल नहीं होता है। हां कह दो भाई, आपकी बात ठीक है, इस दृष्टि से ठीक है। निपट गये। पक्ष कोई पड़ेगा नहीं। विवाद शांत हो गया। तो जिसका आश्रय, जिसका आलंबन, जिसकी दृष्टि हमें अशांति से हटाती है, शांति में ले जाती है उसका आलंबन करें यह तो ठीक बात है, पर निश्चय, व्यवहार, द्रव्य, गुण, पर्याय, निमित्त, उपादान वाली बात भी तो सही है। उनकी भी दृष्टियां बना लें। हां इस दृष्टि से तो ठीक है, तो यहां यह प्रकरण जो चल रहा है कि कर्म आत्मा के अज्ञान आदिक सर्व भावों को करते हैं, ऐसा जो एक पक्ष रखा है उस पक्ष में उपादेय रूप से कर्म में कर्तृत्व सिद्ध नहीं होता। ऐसी बात कह चुकने के बाद अब स्याद्वाद प्रणाली से संक्षेप में यह बात बतायेंगे कि आत्मा कर्ता यों है और आत्मा अकर्ता यों है।


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