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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:समयसार - गाथा 344

From जैनकोष



अह जाणगो दुभावो णाणसहावेण अच्छदे त्ति मदं।तम्हा ण वि अप्पा अप्पयं तु सयमप्पणो कुणदि।।344।।

मौलिक शंका समाधान―हे शिष्य ! यदि तेरा यह मत बने कि ज्ञायकस्वरूप यह आत्मपदार्थ ज्ञानरूप से पहिले से ही है सो यह ज्ञानरूप रहता है। यह निर्मल आनंदमय एक ज्ञानस्वरूपी शुद्ध आत्मा पहिले से ही है, वह तो ज्ञानस्वभावरूप रहता ही है, तो ऐसा कहने में यह बात फिर कहां रही कि आत्मा ने आत्मा के द्वारा आत्मा में आत्मा को स्वयं किया। हां यह बात है कि जो निर्विकार परम तत्त्वज्ञानी पुरूष है वह चूंकि शुद्ध स्वभाव का अनुभव करता है। अंत: वह विभावों का कर्ता नहीं है। निष्कर्ष क्या निकालना कि यह ज्ञायकभाव ज्ञायकस्वरूप सामान्य अपेक्षा से अपने ज्ञानस्वभाव में ही रहा करता है, सामान्यदृष्टि में परिणमन नहीं है फिर भी कर्मों के उदय का निमित्त पाकर उत्पन्न होने वाले मिथ्यात्व आदिक भावों के ज्ञान के समय में चूंकि यह जीव अनादि काल से ज्ञेय और ज्ञान के भेदविज्ञान से शून्य है इसलिए पर को आत्मा जान रहा है। सो अब विशेष की अपेक्षा से अज्ञान रूप जो ज्ञान का परिणमन है उसका करने वाला बना, सो कर्ता हो गया।

अज्ञान अवस्था में कर्तृत्व―भैया ! इस अज्ञानी मोही आत्मा की बात कही जा रही है कि यह आत्मा भी सामान्य अपेक्षा से ज्ञानस्वभाव में ही अवस्थित है, सो ऐसा होने पर भी यहां कर्मों के उदय का निमित्त पाकर रागादिक भाव हो रहे हैं, सो वे तो इसके लिए ज्ञेय बनने चाहिये। सो उस ज्ञेय में और इस ज्ञान में चूंकि उसे भेदविज्ञान नहीं रहा, सो अब विशेष अपेक्षा से यह अज्ञान रूप परिणमने लगा। ज्ञान सामान्य का ग्रहण तो नहीं रहा, इसलिए कर्ता मानना चाहिए।

ज्ञान का ज्ञेय―भैया ! हम और आपका ज्ञेय वास्तव में ये बाह्य पदार्थ नहीं है। हम चौकी को, भींत को, आपको, घंटा को किसी को नहीं जान रहे हैं सब कोई अपने आपके ज्ञानगुण का जो ग्रहण रूप परिणमन हो रहा है उस परिणमन को जान रहे हैं तो आप क्या धन वैभव परिवार को जान रहे हैं ? नहीं। तद्​विषयक राग को जान रहे हैं। सो राग जानते रहने में कुछ आपत्ति नहीं, पर ज्ञेयरूप जो राग है और जाननहार जो ज्ञान है सो चूंकि वह उस ही एक निज की बात है, भूल हो गयी, भ्रम हो गया। भेदविज्ञान न रहा सो अब राग का ही करने वाला हो गया। आप अगर राग को ग्रहण करना अच्छा मानते हैं तो राग को करना। यदि उपयोग राग को ग्रहण न करे तो परिणमन होते हुए भी उसमें करने का व्यपदेश नहीं होता। सो जब तक अज्ञान अवस्था है, इस ज्ञेय और ज्ञान में भेदज्ञान नहीं हो रहा है तब तक उसे कर्ता मानना चाहिए और जब ज्ञेय और ज्ञान में भेदविज्ञान हो जाय तब से यह आत्मा आत्मा को ही आत्मा रूप से जानने लगता है और विशेष अपेक्षा का भी फिर ज्ञानरूप से ही ज्ञान का परिणमन बना है तब केवल ज्ञाता रहता है और उसे साक्षात् अकर्ता मानना।

ज्ञानकला―इस आत्मा में एक ज्ञान गुण ही प्रधान और साधारण ऐसा गुण है कि जिसके द्वारा ही समस्त व्यवस्था और काम चलता है। अभी आपका ध्यान यदि यहां सुनने में न हो, कहीं किसी परवस्तु का विकल्प करते हो तो हम पूछ सकते हैं कि आप इस समय हैं कहां और आप भी कह बैठते है कि हम इस समय लश्कर में हैं। शरीर से और प्रदेश से तो यहां बैठे हो और कहते हो कि लश्कर में हैं। इसका कारण यह है कि उपयोग ने लश्कर को घेर लिया। तो उपयोग जहां है वहीं हम है। उपयोग अपने आत्मा में है तो हम अपने आत्मा में हैं। यद्यपि यह जीव शरीर के विकट बंधन में है, इस समय ऐसा तो नहीं हो सकता कि हम तुमसे कहें कि शरीर तो वहीं बैठा रहने दो और आपका जीव जरा सरक कर हमारे पास आ जावे। आप कहेंगे कि भीड़ बहुत है, यहां से निकलने का रास्ता नहीं है। अरे नहीं है तो शरीर वहीं बना रहने दो और आप जीव यहां आ जावो, तो ऐसा तो नहीं किया जा सकता। फिर भी शरीर का उपयोग न रखें यह कुछ हो सकता है।

बंधन में भी स्वातंत्र्यदृष्टि―एक पुरूष ने अपने मित्र को निमंत्रण दिया-भाई कल 10 बजे हमारे यहां भोजन करना। पर देखो आप अकेले आना क्योंकि एक के अलावा दो को खिलाने की हमारे पास गुंजाइश नहीं है। वह मित्र दूसरे दिन 10 बजे पहुंच गया अकेला तो वह कहता है कि वाह हमने तो आपसे कहा था अकेले आने को। अरे तो अकेले ही तो आए है। अरे अकेले कहां आए, यह शरीर का बंडल अथवा बिस्तर तो साथ में लपेट लाये हो, विस्तर या विषतर किसे कहते है ? एक तो विष और दूसरा विष से ज्यादा विष, उसका नाम है विस्तर, विषतर याने इसमें यह अपेक्षा समझना कि विस्तर वही पुरूष रखता है जिसके गृहस्थी है, जिसके और कुछ हैं। तो विस्तर और विष कुछ नहीं है, यह तो अंदाज कराता है कि इनका जीवन विषमय वातावरण में रहता है। इसलिए उसका नाम धरा गया विस्तर। तो यह शरीर पिंडोला तो तुम लपेटकर लाये हो। हमने तो तुम्हें अकेले आने को कहा था। सो वह अकेले कैसे आता, बंधन में है, लेकिन इस जीव में ऐसी ज्ञानकला है कि शरीर में रहता हुआ भी शरीर का भान न करे और केवल ज्ञानस्वरूप अपने ज्ञान को लेता रहे तो भैया ! जब यह ज्ञेय और ज्ञान में भेदविज्ञान करता हैं, राग भाव में और ज्ञान में भेदविज्ञान करता है तो अकर्ता होता है।

आत्मा का बाह्य में सर्वथा अकर्तृत्व―बाह्य पदार्थ ज्ञेय नहीं है, यह तो ज्ञेय के विषयभूत है, आश्रयभूत है। बड़े हैं, बेचारे गरीब हैं ये बाह्य पदार्थ। उन्हीं को सुधारते और बिगाड़ते हैं। जिन बेचारों ने कोई अपराध नहीं किया। न सुधार करें, न बिगाड़ते करें। परम अपेक्षा से रहित उदासीन पड़े हैं, उन पर हम आप नाराज होते है, स्नेह करते है। वे तो हमारे जानने में कभी आ ही नहीं सकते। मेरा ज्ञान गुण मेरे आत्मा के प्रदेशों को छोड़कर क्या दूर जा सकता है ? एक परमाणुमात्र भी, प्रदेश मात्र भी मेरे से बाहर ज्ञान की कला नहीं खिल सकती। तो ज्ञान जो कुछ करेगा वह अपने में करेगा। ज्ञान क्या करेगा ? जानन। वह कहां जावेगा ? अपने में । तो ज्ञान का प्रयोग किस पर हुआ ? अपने पर। तो जाना किसको एक अपने को।

अज्ञान परिस्थिति―जिसको अज्ञानी जान रहा वह अपना यह स्वयं कैसा बन रहा है ? रागरूप द्वेष रूप। ये ज्ञेय हो गए। इस ज्ञेय में और निज ज्ञान में भेद जब नहीं पड़ा था तब वह उस ज्ञेय को, उस अज्ञान रूप करने वाला हो गया था और जब इस ज्ञेय और ज्ञान में भेदविज्ञान हुआ तो अब जब जान लिया कि यह कपटी मित्र है तो उस मित्र का आकर्षण तो नहीं रहता। जब जान लिया कि यह अहित भाव है तो उसकी ओर आकर्षण नहीं रहा। तब उस ज्ञेयरूप नहीं परिणमा, अज्ञानरूप नहीं परिणमा, किंतु ज्ञानरूप से ही परिणम गया। ऐसी स्थिति में यह ज्ञानी जीव अकर्ता हो जाता है। आत्मधर्म―भैया ! क्या करना है अपने को ? धर्म करना है, मोक्ष जाना है। क्या करना है ? अरे जिन अरहंतदेव के चरणों में सारे लोक आए उनकी ही तरह बनना है। इतना बड़ा काम करना है। यह कितना बड़ा काम है ? आप जान जावो। जहां लाखों आदमी झुकते हैं, जिसका स्तवन करते हैं, जिनकी भक्ति करते हैं, उनकी जो स्थिति है वह बड़ी स्थिति है। वह बड़ी स्थिति है कि यहां नोट जोड़ लेना बड़ी स्थिति है ? खूब देख लो। तो तुम्हें क्या चाहिए ? तुम्हें बड़ी स्थिति चाहिए। तब फिर क्या करना है इतना महान् बनने के लिए ? अरे भीतर ही भीतर ज्ञेय और ज्ञान में भेदविज्ञान करना है, जिसको करते हुए न आफत आयेगी, न खटपट होगी, न दूसरे जानेंगे, न बाहर हल्ला मचेगा। गुप्त ही गुप्त एक अपने आपमें अपना गुप्त काम कर लें। इसके फल में इतना महान् पद प्राप्त होता है।

अंतर्वृत्ति द्वारा धर्माश्रय―भैया ! धर्म करने के लिए हाथ पैर नहीं पीटना पड़ता है, वह तो ज्ञान साध्य बात है, इस ही ज्ञान द्वारा जो कि ज्ञेय और ज्ञान में मिश्रण कर रहा था, स्वाद ले रहा था, राग और ज्ञान को एक मिलाकर चबाकर ग्रास बनाकर जो एक स्वाद ले रहा था वह तो था अज्ञान का परिणाम और ज्ञेय से ज्ञान को जुदा जान लिया यह राग परिणाम है, यह मेरे स्वरूप में नहीं है, यह आ टपका है, मैं ज्ञानमात्र हूँ―ऐसी वृत्ति जगह तब की बात है। जिसकी यह वृत्ति जगती है उसके कषाय व्यक्त रूप में नहीं रहती है या अधिक नहीं रहती है। वह किसी भी बाह्य प्रकरण में आसक्त नहीं होता है, ऐसा ज्ञानरूचिक पुरूष जब ज्ञान को ज्ञानरूप से ही परिणमाता है तब वह साक्षात विभाव का अकर्ता बनता है।

व्यक्त प्रभुत्व से पहिले की परिस्थिति―अब पदवी अनुसार नीचे थोड़ा आते जाइए परिणमन होता है मगर अकर्तापन है, ऐसा अकर्तापन अंतरात्मावों के है। और परिणमता भी है व कर्ता भी है, एकमेक बना डालता है, यह है अज्ञान की अवस्था। जैसे हाथी के सामने हलुवा धर दो, चाहे कितना ही बढ़िया हो, शुद्ध हो; कितना ही घी पड़ा हो उसे धर दो और घास धर दो तो क्या उस हाथी में इतना विवेक ही नहीं है। वह तो घास और हलुवा दोनों को मिला करके अपने मुँह में डाल लेता है। उसके कोई विवेक नहीं है। इसी तरह इस रागभाव को और इस ज्ञानभाव को, राग की घास को और ज्ञान की मिठाई को यह अज्ञानी जीव कभी यह न सोचेगा कि यार, विभाव घास छोड़कर खाली ज्ञान मिठाई का स्वाद लें। उसे पता ही नहीं है। राग और ज्ञान मिला जुलाकर उनमें एक रस मानकर भोगे जा रहा है। अपने ज्ञान को खबर ही नहीं है।

कर्तृत्व का स्याद्वाद द्वारा निर्णय―यह जीव जब भेदविज्ञान कर लेता है तब उस ज्ञान के प्रताप से अकर्ता बन जाता है। जब अज्ञानी रहता है तब कर्ता बनता है। यह जीव ज्ञान सामान्य रूप से तो ज्ञान रूप है मगर विशेषरूप से भी यह ज्ञानरूप बने, परिणमे तो जीव फिर अकर्ता होता है। निश्चयनय और व्यवहार नय इन दोनों का समन्वय होता है तब तीर्थ प्रवृत्ति होती है।

जीव से प्राण की भिन्नता या अभिन्नता―इस प्रकरण में एक प्रश्न और किया जा सकता है कि बतावो जीव के प्राण जीव से भिन्न है कि अभिन्न है ? अगर प्राण भिन्न हैं तो प्राणघात होने पर भी जीव का क्या बिगड़ा। और प्राण जीव से अभिन्न है तो जीव अमर है सो प्राण भी अमर हुए क्या बिगड़ा, हिंसा न होनी चाहिए। तो वहां उत्तर यह है कि निश्चय से तो जीव के प्राण जीव से भिन्न है और व्यवहार से जीव के प्राण जीव से अभिन्न है। अच्छा तो व्यवहार से अभिन्न हैं तो व्यवहार से हिंसा लगे, निश्चय से न हिंसा लगे। कहते है कि यह बात ठीक है। निश्चय से तो हिंसा लगती ही नहीं। व्यवहार से ही लगती है। तब तो हम बड़े अच्छे रहे। अरे अच्छे कहां रहे ? व्यवहार से हिंसा लगी और व्यवहार से ही नरक का दु:ख भोगा, सो यदि तो तुम्हें व्यवहार से नरक का दु:ख भोगना पसंद है तो व्यवहार की हिंसा करते जाइए। अगर नहीं पसंद है व्यवहार से नरक का दु:ख भोगना तो व्यवहार हिंसा भी छोड़ो। तो सर्वकथन निश्चय और व्यवहार दृष्टि से समन्वय करके जानते रहना और जो अपने प्रयोजन की बात है उस दृष्टि को मुख्य बनाइए।

आत्मप्रयोजन–यहां प्रयोजन की बात इतनी है कि जाननस्वरूप में और रागस्वरूप में भेदविज्ञान हो जाय, तथा राग का ग्रहण न करो, ज्ञानस्वरूप का ग्रहण करो। उस स्थिति में यह जीव सर्वबाधावों से हटकर मोक्षमार्गी होता है।

प्रकरण का स्पष्टीकरण―इस प्रकरण में कौनसी मान्यता में जिज्ञासु चल रहा था और उसका समाधान किया गया है ? इस बात को फिर एक बार दुहरा लें। बात यह थी कि ऐसा श्रमण जो सांख्य आशय के अनुसार आत्मा को ज्ञान का अकर्ता, राग का अकर्ता मान रहा था और कर्म प्रकृतिको सबका कर्ता मान रहा था, उसके आशय का यहां निराकरण किया गया है।

प्रकृति द्वारा ज्ञान, अज्ञान, निद्रा, जागरण की चर्चा का स्मरण अथवा जिज्ञासु ने कहा था कि देखो आत्मा को कर्म ही तो अज्ञानी बनाते हैं क्योंकि ज्ञानावरण नामक कर्म के उदय बिना अज्ञान की उत्पत्ति नहीं होती। देखो कर्म ही जीव को ज्ञानी बनाते हैं क्योंकि ज्ञानावरण कर्म के क्षयोपशम बिना ज्ञान की उत्पत्ति नहीं होती। कर्म ही तो इस जीव को सुलाता है क्योंकि निद्रा नामक दर्शनावरण कर्म के उदय के बिना नींद तो आती नहीं और कर्म ही इस जीव को जगाता है क्योंकि निद्रा नामक दर्शनावरण के क्षयोपशम बिना जीव जगता नहीं है। कर्म ही सुखी करे इस जीव को ऐसा कहने में भी इतना ही मात्र भाव उसका नहीं है किंतु सुखरूप परिणमन कर्म ही करता है और जीव उसको आत्मरूप से अंगीकार करता है, इस आशय को लेते हुए जिज्ञासु कह रहा है।

कर्म द्वारा सुख, दु:ख, मिथ्यात्व, असंयम से होने की चर्चा का स्मरण–देखो साता वेदनीय कर्म के उदय बिना जीव सुखी तो नहीं होता, इसलिए इस सुख का भी करने वाला कर्म है। असाता वेदनीय के उदय बिना जीव को दु:ख नहीं होता। इस कारण ये कर्म ही जीव को दु:खी करने वाले है और एक बात ही क्या, सभी देखते जाओ। जीव में मिथ्यात्व भाव आता है, आता क्या है, यह जीव अपने में झलकाता है। उस मिथ्यात्व को कर्म ने ही किया क्योंकि मिथ्यात्व कर्म के उदय के बिना जीव मिथ्यादृष्टि नहीं हुआ करते। असंयमी भी बनता है तो यह कर्म ही बनाता है क्योंकि चारित्रमोह नामक कर्म के उदय बिना असंयमी नहीं होता।

कर्म द्वारा भ्रमण, शुभ, अशुभ भाव होने की चर्चा का स्मरण―भव की भी बात देखिये, मरने के बाद जन्मता है, तो कर्म ही इसको तीनों लोकों में भ्रमाता है क्योंकि आनुपूर्वी नामक कर्म के उदय के बिना इस जीव का भ्रमण नहीं होता है और यहां भी चलता है जिंदावस्था में तो ये कर्म ही चलाते हैं क्योंकि विहायोगति नामक कर्म के उदय के बिना यह चल नहीं सकता। तथा जितने भी शुभ परिणाम अथवा अशुभ परिणाम है उन सब का कर्म ही कर्ता है क्योंकि शुभ अथवा अशुभ रागद्वेषादिक कर्म के उदय के बिना शुभ अशुभ भाव नहीं होते। सारी बातों को कर्म ही स्वतंत्र होता हुआ करता है, कर्म ही करता है, कर्म ही देता है, कर्म ही हरता है, इस कारण हमको तो यह निश्चय होता है कि जीव नित्य ही एकांत से अकर्ता ही है। ऐसा अध्यात्मवाद अबसे 20, 30 साल पहिले चल रहा था और आचार्यों के समय में तो चल ही रहा था, नहीं तो खंडन किसका किया ?

बुद्धि का प्रकृति विकार मानने का रहस्य―इस जिज्ञासु का मंतव्य यह है कि राग, द्वेष, ज्ञान, अज्ञान ये सब कर्म के परिणमन हैं। निमित्त कर्ता की बात नहीं कही जा रही है, किंतु कर्म ही इस रूप से परिणमता है और जीव है चैतन्यस्वरूप, सो बुद्धि का जो निश्चय कराया जाय उस तरह से यह अपने को झलकाता है। अब पूछें कि वह बुद्धि अलग से क्या है जिसने कि इसको इस प्रकार का निश्चय करा डाला तो बुद्धि को जीव की चीज मानने लगे तो जितनी भी शंका उठेगी वह सब बेकार हो जायेगी सो ऐसी बुद्धि को भी प्रकृति का कार्य माना गया है।

कर्म द्वारा अब्रह्म होने की चर्चा का स्मरण―और भी आगे जिज्ञासु कहता जा रहा है कि आगमों में भी खूब लिखा है कि पुरूष वेद नामक कर्म स्त्री की अभिलाषा करता है, और स्त्री वेद नामक कर्म पुरूष की अभिलाषा करता है तो कर्म ने कर्म की ही अभिलाषा की। इसका समर्थन हुआ ना आगम से, तो जीव तो अब्रह्म का भी कर्ता नहीं।

जीव के शाश्वत शुद्धता की मान्यता―जीव में ऐब नहीं है, दोष नहीं है, नित्य शाश्वत शुद्ध स्वच्छ है ऐसा इस शंकाकार ने कहा है और उसके द्वारा यह दृष्टांत भी दिया जा सकता है कि जैसे स्फटिक है, स्वच्छ मणि है, उसमें कोई रंग लाल पीला नहीं है पर लाल पीला रंग सामने आ जाय तो स्फटिक में लाल पीला रंग प्रतिभासता है। वहां पूछो कि लाल पीला रंग स्फटिक में प्रतिभासता है या उस समय में वह रंगरूप परिणमन भी है कि नहीं ? तो उसका उत्तर मिलेगा कि नहीं है और प्राय: यहीं भी सब से पूछ लो, यही कह देंगे कि नहीं रंगरूप परिणमा। वह तो सफेद का सफेद ही है। बड़े ध्यान से सुनने की बात है।

उपादान में परिणमन का समर्थन―अच्छा लो भाई उस स्फटिक में तो रंग नहीं आया किंतु एक विदित मात्र ही हुआ है, ठीक है। अच्छा बतावो स्फटिक तो स्वच्छ है, इसलिए थोड़ी शंका हो सकती है पर दर्पण है, जो आरपार से स्वच्छ नहीं दिख रहा है, जिसके पीछे लाल मसाला है उस दर्पण में जब हम देखते हैं तो उसका छाया परिणमन होता है। वह छाया परिणमन उस दर्पण का हुआ है या वह भी केवल दिखने मात्र की बात की बात है। अब इसमें कुछ लगता होगा कि इसमें दिखने मात्र की बात नहीं है, छाया रूप दर्पण में परिणमन हुआ। कुछ लगा होगा अभी। और चूना में हल्दी डाल दी जाय तो सफेद चूना लालरूप जो परिणम गया है वह भी दिखने भर की बात है या परिणम गयी है ? यह स्पष्ट मान लेंगे कि परिणम गया। तो जैसे यह चूना लाल रूप परिणम गया है इसी प्रकार और पास स्वच्छ स्फटिक भी उस काल में रंगरूप परिणम गया, पर ये परिणमन सब औपाधिक हैं। सो उपाधि के सान्निध्य में तो इस रूप परिणमता है और उपाधिक अभाव में इस रूप नहीं परिणमता।

मालिन्य की औपाधिकता―भैया ! उस स्फटिक के सामने जितने काल उपाधि है उतने काल वहां उस रूप परिणमन है। उपाधि हटो कि वह परिणमन मिट गया। तो चूंकि उपाधि के शीघ्र हटा देने पर शीघ्र परिणमन मिटता है और शीघ्र सामने लाने पर शीघ्र परिणमन होता है इस कारण यह बात लोगों को जल्दी मालूम होती है कि स्फटिक में केवल रंग दिखता है, रंगरूप परिणमता नहीं है। इसी प्रकार इस ज्ञायक स्वभावमय स्वच्छ आत्मा में कर्म उपाधि सामने है जैसा तैसा परिणम गया, न रहा तो मिट गया, इतनी बात देखकर यह आशय बना लिया गया कि आत्मा में राग परिणमन होता नहीं है किंतु मालूम देता है और इससे बढ़कर चले तो आत्मा में ज्ञानपरिणमन भी होता नहीं है किंतु मालूम देता है ऐसा जिज्ञासु मंतव्य था।

समस्त भावों का प्रकृति के कर्तृत्व―जितने भी भाव कर्म हैं उन सबका करने वाला पुद्​​गल कर्म है। देखो ना कर्म ने ही कर्म की अभिलाषा की। अब जीव अब्रह्म कैसे हो गया, अब्रह्म का कर्ता जीव नहीं होता, अब्रह्म का कुशील का दोषी होने का सर्वथा निषेध है। जीव तो शाश्वत शुद्ध है और भी देखो जिज्ञासु प्रमाण पर प्रमाण दे रहा है जो दूसरे को मारता है, दूसरे के द्वारा मारा जाता है उसे बोलते हैं परघात कर्म इस वाक्य से कर्म ही कर्म को करता है इसका समर्थक हुआ। जीव तो हिंसा का करने वाला नहीं रहा। सो जीव सर्वथा अकर्ता है। इस प्रकार अपनी प्रज्ञा के अपराध से शास्त्र का सूत्रों का अर्थ न जानता हुआ कोई श्रमणाभास ऐसा वर्णन कर रहा है, प्रकृति को ही एकांत से कर्ता मान रहा है। सब जीव एकांत से अकर्ता हुए-ऐसा मानने पर समाधानरूप में आक्षेप दिया जा रहा है। तो इस तरह आगम में यह भी तो लिखा है कि जीव वस्तु है और वस्तु उसे कहते है जो अर्थक्रिया करे और अर्थक्रिया करने के ही मायने कर्ता है तो जीव कर्ता है यह बात तो फिर दूर हो जायगी।

भावपरिणमन के अभाव में आत्मा के अकर्तृत्व की सिद्धि―यदि तुम इसके उत्तर में यह बोलो कि नहीं जी, कर्म तो आत्मा के अज्ञान आदिक कहां समस्त पर्यायों को करता है और आत्मा अपने को द्रव्यरूप करता है। दृष्टि दी इस जिज्ञासु ने आत्मा द्रव्यपर्यायात्मक है या ना है। तो उसमें जितना पर्यायपना है उसका करने वाला कर्म है और जितना द्रव्यपना है उसका करने वाला आत्मा है। आत्मा तो एक आत्मा को द्रव्य रूप किया करता है। सो देखो जीव कर्ता भी बन गया और पर्यायों को करने वाला भी नहीं रहा। द्रव्य का करने वाला हुआ। कहते हैं कि यह बात भी तुम्हारी मिथ्या है। क्योंकि जीव तो द्रव्यरूप से नित्य है, असंख्यातप्रदेशी है, लोकप्रमाण है। अब उस नित्य जीवद्रव्य में कार्यपना क्या आया क्योंकि कार्यपना यदि आयेगा, तो नित्यपना न रहेगा क्योंकि कृतकत्व का और नित्यत्व का एकांतत: विरोध है। जो बनाई गयी चीज है वह हमेशा नहीं रहा करती, जो हमेशा रहता है वह बनाया हुआ नहीं होता है। तो उसका अर्थ है कि आत्मा नित्य नहीं रहा। क्या वह तुम्हें इष्ट है ? तो जिज्ञासु को तो यह इष्ट है ही नहीं। इस कारण इस जीव ने आत्मा द्रव्य को कुछ नहीं किया।

फिर जिज्ञासु कहता है कि जीव ने द्रव्य में तो समूचे को नहीं बनाया पर देखा जा असंख्यातप्रदेशी है उन प्रदेशों को यह करता है। कहते हैं कि प्रदेशों को क्या करेगा ? क्या कोई प्रदेश कम होते है ? क्या कोई प्रदेश ज्यादा होते है ? यदि कम और ज्यादा होने लगे पुद्​गल स्कंध की भांति इसका अर्थ यह हुआ कि यह आत्मा एक ही न रहा, एकत्वरूप नहीं रहा। इसलिए आत्मा ने आत्मा को द्रव्यरूप क्या किया ? इसके बाद फिर यह जिज्ञासु कहता है कि यों तो प्रदेश का कर्ता नहीं है और प्रदेश कहीं फैलता है, कहीं संकुचित होता है तो उसको संकोच और विस्तार को करने वाला तो आत्मा हुआ ना। कहते हैं कि इस प्रकार से वह आत्मा कर्ता नहीं बन सकता क्योंकि प्रदेश का संकोच भी हुआ, विस्तार भी हुआ तो भी हीनाधिक तो नहीं किए गये। लो कितनी बार अभी मुठभेड़ हुई ?

ज्ञायकत्व व कर्तृत्व के विरोधपूर्वक भावपरिणाम के प्रकृतिकर्तृत्व का समर्थन―इसके बाद आखिरी बात और कहता है यह जिज्ञासु कि भाई और बात तो जाने दो, पर यह तो बतलावो कि जो वस्तु का स्वभाव है वह कभी दूर किया जा सकता है क्या ? नहीं दूर नहीं किया जा सकता है। तो यह ज्ञायक स्वभावी आत्मा ज्ञानस्वभाव से सहित ही ठहरता है और इस प्रकार ठहरना हुआ जब नित्य रहता है तो अब यह विचार कर लीजिए कि जो ज्ञायक है वह क्या कर्ता होता है ? जो कर्ता है वह ज्ञायक नहीं, जो ज्ञायक है वह कर्ता नहीं और आत्मा सदा ज्ञायक स्वभाव से रहता ही है तब इसके मायने यही हुआ ना कि यह जीव मिथ्यात्व आदिक भावकर्मों को नहीं करता, हुआ ना ठीक।

समस्त भावपरिणमनों का प्रकृति द्वारा किये जाने का पूर्व जिज्ञासु द्वारा युक्तिपूर्वकसमर्थन―और भी देखिये जैसे कि यह प्रश्न किये जाने पर कि मुक्त तो हो जाता है जीव, लौटता तो है नहीं, तो कभी संसार खाली हो जायगा, उसके समाधान में जिस तरह यह युक्ति दी जाती है कि देखो जो जीव मुक्त हो गए हैं अर्थात् पूर्ण निर्दोष हो गए हैं, अब उनके उपादान में अशुद्धता की योग्यता ही नहीं है तो कारण बतावो कि किस वजह से फिर वह संसार में आता है ? आ तो नहीं सकता। उपादान ही ऐसा नहीं है और मुक्ति सो होती है, इससे यह जानना चाहिए कि जीव राशि इतनी अनंत है कि उसमें से अनंत जीव भी मुक्ति चले जायें तब भी अनंतें जीव रहते हैं। तो जिज्ञासु कह रहा है कि महाराज आत्मा तो सदा ज्ञायकस्वभाव में ही ठहरता है, नहीं तो आप बता दें कि कभी यह ज्ञानस्वभाव में नहीं भी रहता है क्या, बोलो मुख से, रहना चाहिए ना, सदा ज्ञानस्वभाव में रहता है और जो सदा ज्ञानस्वभाव में ही ठहरता है वह कर्ता कैसे ? क्योंकि ज्ञान का और कर्ता का विरोध है लेकिन मिथ्यात्व रागादिक भाव होना जरूरी है। तब इसका किसे कर्ता मानेंगे ? सीधी बात है कि कर्म कर्ता है। समस्त भाव कर्मों का कर्ता प्रकृति है, आत्मा नहीं है ऐसा जिज्ञासु ने युक्तिपूर्वक अपना अंतिम आशय बताया।

समाधान की प्रस्तावना―इस पर यह समाधान दिया जा रहा है कि यह भी तुम्हारा केवल ख्याल ही है। जैसे किसी बच्चे को तेज नींद आ रही हो और तेज नींद में उस बच्चे को झकझोर कर जगा दो कि चलो घर, तो उसने तनिक आँखें खोलीं और फिर बंद करलीं, फिर डटकर पैर फैलाकर वह सो गया। फिर जगाया चलो-चलो उठो, फिर उसने आँखें खोली, तो उसका आँखें खोलना उन्मेष मात्र है। न उसे कुछ दिखता है और न उतनी आंखें खुलने पर भी कुछ चेत है, उसके तो बेहोशी है। वह तो जगाने वाली माता की जबरदस्ती है, सो एक आधा सेकेंड को पलक खुल गई, फिर गिर गये। इसी तरह ये तुम्हारे केवल ख्याल-ख्याल के ही पलक उठ रहे हैं पर इसमें जगना तुम्हारा कहीं नहीं होता। यह तो हम तुम्हारे आक्षेप लगाते थे कि जीव कर्ता नहीं रहा सो जबरदस्ती कर्ता सिद्ध कर रहे हो। सिद्ध होता नहीं है तुम्हारे मंतव्य में तब निर्णय क्या है ? महाराज आप ही समाधान करें तो निष्कर्ष रूप में निम्नांकित समाधान किया जा रहा है।

भावपरिणमनों का जीव द्वारा किये जाने के संबंध में वस्तुगत निर्णय―ज्ञायकस्वभाव आत्मा सामान्य अपेक्षा से तो ज्ञानस्वभाव अवस्थित है सो तो ठीक है पर अनादि काल से जो निमित्त-नैमित्तिक संबंध चल रहा है और वहां कर्म के उदय से उत्पन्न हुए रागद्वेषादिक भावpage no 57 missing

मना कर देता है, पर आचार्यदेव यह सिद्धांत बता रहे हैं कि जब तक रागादिक होते हैं तब तक यह जीव रागरूप परिणमता है कर्म रागरूप नहीं परिणमता, पर हां जब भेदविज्ञान हो गया तो समझ लो कि मैं ज्ञानस्वरूप होने से रागादिक को अपनी हिम्मत से नहीं करता, होते हैं उदय वश, ये परभाव हैं ऐसा जाना तब अकर्तृत्व आ गया, पर परिणमन है अभी। सो हे अरहंतों ! इस आत्मा को भेदविज्ञान से पहिले रागादिक का कर्ता मानो, भेदविज्ञान के बाद रागादिक का अकर्ता मानो।

कर्तृत्व और अकर्तृत्व का स्पष्ट विश्लेषण―यहां तक स्पष्ट शब्दों में यह बता चुके हैं कि भेदविज्ञान होने से पहिले इस जीव को तुम कर्ता समझो। यहां पर के कर्तापन के विकल्प की बात कही जा रही है। पर का कर्ता तो कोई हो ही नहीं सकता। चाहे कैसा ही अज्ञानी हो। यदि अज्ञानी जीव पर का कर्ता बन जाय तो उसमें भगवान से भी अधिक सामर्थ्य आ गयी। भगवान किसी पर को नहीं कर सकता। ताकत ही नहीं है। और इसके मंतव्य में इस अज्ञानी में इतनी ताकत आ गयी कि वह पर को करने लगा। अपने आप में जो रागादिक भाव परिणमन होता हैं उसका और अपने स्वरूप का जिसे भेदविज्ञान नहीं है ऐसा अज्ञानी जीव अपने ज्ञानस्वरूप के आलंबन को छोड़कर यह मानता है कि मैं रागादिक का करता हूँ और वह रागादिक का कर्ता है, किंतु ज्यों ही इस जीव को भेदविज्ञान होता है मेरा तो मात्र ज्ञायकस्वरूप है, ये रागादिक परिणमन हो तो रहे है-पर उपाधि का त्यों ही, इस ज्ञान के होते ही जीव उनका अकर्ता हो जाता है, फिर भी कुछ काल तक ये होते है।

ज्ञानस्थिति के दर्शन की प्रेरणा―भैया ! जैसे दर्पण में सामने रखी हुई चीज का प्रतिबिंब पड़ता है तो उस प्रतिबिंब का करने वाला कौन है ? कोई नहीं है और होता तो है। तब यह निर्णय करना कि उपाधि का निमित्त पाकर यह दर्पण स्वयं की परिणति से प्रतिबिंब रूप परिणम गया। निमित्तनैमित्तिक संबंध होना बताना तो वस्तु के स्वभाव की रक्षा करना है, उसको मना न करना। यह अज्ञानी जीव निमित्तनैमित्तिक संबंध को नहीं समझता है इसलिए पर का पर को कर्ता मानता है। जब भेदविज्ञान हुआ, मैं अपने सत्त्व के कारण जिस स्वरूप हूँ उस स्वरूप मात्र हूँ और उस स्वरूप का सहज अपने ही द्रव्यत्व गुण के कारण जो परिणमन होता है वह तो मेरी चीज है और जो पर-उपाधि का निमित्त पाकर रागादिक परिणमन होते है, वे मेरे नहीं हैं, उनका मैं कर्ता नहीं हूँ। इस कारण हे जिज्ञासु पुरूष ! भेदविज्ञान के पश्चात् जो ज्ञाता के उपयोग की स्थिति बनती है उसे अपनी दृष्टि में लो और यह देखो कि कर्ता भाव से च्युत अचल एक यह ज्ञाता मात्र ही है।

अपरिणामवाद का तेज जवाब देने के उमंग में एक नया पक्ष―यहां तक अपरिणामवाद के निराकरण में यह सिद्ध किया गया कि जीव के रागादिक भाव कर्म के करने वाली कर्म प्रकृति नहीं हैं, किंतु कर्म प्रकृति का निमित्त पाकर यह अशुद्ध उपादान वाला जीव अपनी परिणति से रागादिक रूप परिणमता है। अब इसके बाद एक दूसरी समस्या आकर उपस्थित होती है कि जो करने वाला है वही जीव भोगने वाला नहीं है। एक जिज्ञासु जो यह देख रहा है कि करने के समय भाव और होते है, भोगने के समय भाव और होते हैं। करने वाला और है, भोगने वाला और है। जैसे मोटे रूप में मनुष्य ने तो तपस्या की और देव ने सुख भोगा, मनुष्य ने तो पाप किया और नारकी ने उसका दु:ख भोगा। करता तो मनुष्य है पर मनुष्य भोगता नहीं है। भोगता देव या नारकी है। सो जिज्ञासु कह रहा है कि हम तो यह मानते हैं कि करने वाला और है भोगने वाला और है। यह तो एक मोटा दृष्टांत है पर स्पष्ट बात यह है कि ये आत्मा अपने भावों को लेकर उत्पन्न होते हैं और दूसरे समय में वे समाप्त हो जाते हैं। फिर अपने भावों को लेकर दूसरा आत्मा उत्पन्न होता है। यह अपरिणामवाद के विरूद्ध तेज परिणामवाद उसको ही द्रव्य मान रहा है।

क्षणस्थायित्व के व्यवहारिक उदाहरण―जैसे जो मनुष्य था ना वह मरकर देव बन गया तो मनुष्य तो नहीं रहा, इस तरह और वृत्तिमान मानकर यह कहा जा रहा है कि क्षण-क्षण में आत्मा नया-नया उत्पन्न होता है। तभी तो देख लो यह विश्वास नहीं है कि आज हमारी मित्रता है तो कल भी रहेगी। आज दूसरा आत्मा है कल कोई दूसरा आत्मा होगा। तो क्या विश्वास है कि कल का आत्मा मित्रता रखेगा या नहीं। क्षण-क्षण में आत्मा नया-नया उत्पन्न होता है। इसलिए करने वाला और है, भोगने वाला और है। यह है क्षणिकवाद का सिद्धांत। सुनते ही यह सोच रहे होंगे कि यह कैसा लचर सिद्धांत है, पर जरा उनके आशय को समझो।

क्षणिकवाद में संभव आक्षेप का उत्तर―जैसे दीपक में नई-नई बूंदें प्रत्येक सेकेंड में जल रही हैं, सेकेंड में नहीं, सेकेंड से भी हल्का जो टाइम हो, एक-एक बूंद क्षण-क्षण में जल रही है, मानो एक मिनट में हजार क्षण होते हैं तो एक मिनट में हजार बूंदें जली। और एक-एक बूंद का एक एक दिया रहा, किंतु उन हज़ारों दियों का संतान एक है इसलिए जरा भी यह अंतर नहीं होता कि लो अभी यह दिया था अब यह हो गया, जैसे वहां हज़ारों दीपक जल उठे एक बाती के आश्रय में, एक मिनट में, पर लगातार एक बूंद के बाद दूसरी बूंद दीपक के रूप में आई फिर तीसरी बूंद दीपक के रूप में आई, इसलिए वहां भेद नहीं मालूम पड़ता।

क्षणक्षयी के संतान में एकत्व के भ्रम का वर्णन―जब बिजली का पंखा हाई स्पीड से चलता हो तो उसकी पंखुडि़यां दिखती हैं क्या ? नहीं दिखती। यद्यपि उन पंखुडि़यों में 8-10 अंगुल का अंतर है। बड़ा पंखा हो तो और अधिक अंतर रहता है पर वहां भी पंखुडि़यां अलग-अलग नहीं मालूम होती। इसी तरह एक आत्मा के बाद दूसरा आत्मा होता है, पहिले वाला आत्मा चला जाता है किंतु निरंतर होता है इस कारण वहां अंतर नहीं मालूम होता, यह लगता है कि वाह ! वही तो आत्मा है। यह कह रहे हैं क्षणिकवाद की ओर से। बीच में यह ध्यान रखे रहना चाहिए।

क्षणक्षयी के पूर्व आत्मा द्वारा उत्तर आत्मा को स्वाधिकार समर्पण―जैसे मजदूर लोग एक जगह से मान लो 50 हाथ दूर तक कुछ ऊपर तक उन्हें ईटें ले जाना है तो समझदार मजदूर सिर पर ढोकर ईटें नहीं ले जाते। बीच में 10 मज़दूरों को पाँच पाँच हाथ दूर एक लाइन में खड़ा कर लेते हैं, एक ने ईंट उठाकर दूसरे को दिया, दूसरे ने तीसरे को दिया, इस तरह से जरा सी देर में वे ईटें 50 हाथ दूर पहुंच जाती हैं। तो इस तरह से वे ईटें कितनी जल्दी पहुंच गयी। इसी तरह से यह आत्मा मरकर अपना चार्ज दूसरे आत्मा को दे जाता है, नष्ट होकर दूसरे को चार्ज दे जाता है। इस तरह से उस चार्ज में और व्यवहार के काम में फर्क नहीं आता है। यह कह रहे हैं क्षणिकवाद की बात। इस सिद्धांत से करने वाला और है, भोगने वाला और है। ऐसी मान्यता वाले इस मान्यता से अपना अस्तित्व खोकर बेहोश हो गए हैं सो ज्ञानरूपी अमृत का सिंचन करके उनकी बेहोशी को दूर करना है और उनको यह देखने का यत्न कराना है कि यह सद्​भूत चैतन्य एक पदार्थ है और वह परिणमनशील है अंत: नई-नई वृत्तियों को वह उत्पन्न करते है, सो वृत्ति के अंशों के भेद से वृत्तिमान का नाश मत मान लो और यह भ्रम मत करो कि करने वाला और है और भोगने वाला और है। इस ही विषय को अनेकांत द्वारा चार गाथावों में एक साथ कह कर प्रकट करते हैं।


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