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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:समयसार - गाथा 35

From जैनकोष



जह णाम को वि पुरिसो परदव्वमिणं ति जाणिदुं चयदि ।

तह सव्वे परभावे णाऊण विमुंचदे णाणी ।। 35 ।।

894-सम्यग्ज्ञान में असत्य के प्रत्याख्यान का दृष्टांत—आत्मा का प्रत्याख्यान क्या है इस बात पर दृष्टांत दिया गया है। और, दृष्टांत देकर यह समझाया है कि ज्ञान होने का नाम ही प्रत्याख्यान है, यथार्थ ज्ञान हो जाने पर जो पर पदार्थों का ग्रहण करने की भावना नहीं रहती ऐसी ज्ञानावस्था का ही नाम प्रत्याख्यान है । फिर बाहरी चीजें छूट जाती हैं या छोड़ देते हैं, अर्थात् बाहरी चीजों का नाम लेकर व्यपदेश करता है वह कि इसने त्याग किया । किसी पुरुष ने किसी वस्तु का त्याग किया तो वस्तु का क्या त्याग किया? वह तो पहिले से ही जुदी थी, उसके संबंध में जो विकल्प किया जा रहा था उसका त्याग किया, इसी के मायने त्याग है । और, विकल्प का त्याग किया उसमें बात क्या आयी? कोई विधिरूप बात तो होना चाहिए । तो वह विधिरूप बात है केवल ज्ञान की । जैसे किसी पुरुष ने किसी दूसरे की चद्दर भूल से ओढ़ ली, करीब-करीब एक सी थी । अब दूसरा पुरुष यह जानकर कि मेरी चद्दर तो यह है, उस पुरुष को जगाता है और कहता है कि यह तो मेरी चद्दर है । लो उसे अपनी चद्दर के निशान न मिलने पर सही ज्ञान बन गया कि यह मेरी चद्दर नहीं है । देखो इस ही ज्ञान में यह बात समायी हुई है कि त्याग कर दिया । अब उस चद्दर को वह देवे कभी भी, पर ज्ञान की ओर से तो उसका त्याग हो गया । अब वह भीतर में उसे अपनाता नहीं है । इसी प्रकार इस जीव ने रागद्वेषादिक जो परभाव है उन्हें ओढ़ रखा है, उन्हें ग्रहण करने की बुद्धि रखी है तो गुरुजन समझाते हैं कि अरे ये परभाव हैं तू इनको ओढ़े हुए है । तू इनको ग्रहण किये हुए है, उन गुरुजनों की बात सुन ली पर उसे निकाल दिया । फिर अनेक गुरुओं ने बताया तो आखिर ज्ञानरूप तो यह था ही, अपने ज्ञानस्वरूप का प्रयोग करता है, वस्तुस्वरूप के अभ्यास से जान लेता है कि ये सब परकीय हैं, नैमित्तिक हैं, औपाधिक हैं, मेरे स्वरूप नहीं हैं, ऐसा जिसने वास्तविकरूप से जान लिया उसने उन परभावों का त्याग कर दिया । वे परभाव हो रहे हैं पर ज्ञान की ओर से त्याग की बात कही जा रही है । ज्ञान होते ही उन समस्त परभावों का त्याग हो गया । किसी कारण वश कदाचित उन बाह्य वस्तुओं का त्याग करने में उसे कुछ विलंब हो जाये लेकिन जहाँ यह जान लिया वास्तविकरूप से कि यह मेरा स्वरूप नहीं है, लो ज्ञान के ढंग से उनका त्याग तुरंत हो गया ।
895-सम्यग्ज्ञान में असम्यक् के प्रत्याख्यान की अनुभूतियों से परख—न हम आप अनेक वस्तुओं के संबंध में ज्ञान किया करते हैं और इसे अच्छी तरह पहिचान सकते हैं कि ज्ञान होते ही भीतर में फैसला हो जाता है । फिर यदि उन्हें ग्रहण किए हुए हैं उनका प्रयोग करता है, उनके प्रसंग में रहता है तो फिर वे चीजें रुचेगी नहीं । उनमें उसे एक फीकापन सा प्रतीत होता है । चूँकि भीतर में ज्ञान की ओर से उनका त्याग बना हुआ है इस कारण व्यवहार में भी फीकापन रहता है । सम्यग्दृष्टि जीव ने समस्त पर-जीवों का यथार्थ निर्णय कर रखा है पर वस्तुओं का सही परिचय प्राप्त किया है, ये मेरे से अत्यंत भिन्न हैं, ये मेरे स्वभावरूप नहीं हैं । जब ऐसी भीतर में अनुभूति जगी है तो फीकापन तो अपने आप आयेगा । ज्ञानी पुरुष घर में भी जल से भिन्न कमल की नाई रहता है । उसे समस्त चीजें भिन्न असार दिखती हैं । उसे समस्त कार्यों में मन नहीं लगता तो इसका कारण क्या है कि अपना अमृततत्त्व अपने को पीने को मिल गया । ज्ञानस्वरूप जो निज तत्त्व है उसका उपयोग बने, अनुभव बने आनंद जगे जिसके प्रताप से अब इस जीव को कोई खराब बात सुहाती नहीं है । जैसे सुनते हैं कि किसी कोयल के बच्चे को कौवा ने पाल लिया । कौवा का बच्चा और कोयल का बच्चा ये दोनों एक जैसे मालूम होते हैं । तो वह कौवा उस कोयल के बच्चे को अपना बच्चा समझकर पालता रहता है लेकिन कुछ और बड़ा होने पर जब वह यह जान लेता है कि अरे यह तो मेरा बच्चा नहीं है तो झट उस कोयल के बच्चे को वह अपने चित्त से उतार देता है और उसे मारने भी लगता है । बेचारा कोयल का बच्चा भाग निकलता है, इसी तरह अज्ञानी जीव जिन्होंने अपनी पृथक् सत्ता कुछ समझ नहीं पाया, शरीर को ही यह मैं हूँ यह माना, और यहाँ जो प्राणी दिखे, शरीर वाले दिखे उनको निरख करके ये ही मेरी इज्जत के आश्रय-भूत हैं ऐसा माना और इन्हीं इंद्रिय के विषयों में अपना लाभ समझा, इन सब बाधाओं के कारण ये जीव बाह्य में भटके हुए हैं, बाह्य में प्रीति बनाये हुए हैं अब यह बाह्य प्रीति कब मिटे? तब ही मिट जायगी जब समझ में आये कि इन बाह्य पदार्थों से मेरा रंच भी संबंध नहीं है ।
896-मोहोदय में यथार्थ की अप्रतीति—मोह के उदय में प्राणियो को यथार्थ बात ज्ञान में नहीं आती । वे तो ऐसा सचमुच के ढंग से मान रहे हैं कि ये सब बाह्य पदार्थ मेरे हैं, यह जो इतना बड़ा घर है वह मेरा ही तो है, इसमें कोई दूसरा कब्जा तो नहीं कर रहा । अरे यहाँ कब्जा न कर सकने की बात तो मोही मोहियों की सम्मति का परिणाम है कि एक दूसरे का जायदाद पर कब्जा नहीं कर रहा है पर तत्त्व की बात यह है कि जिसे जीव ने अपनी जायदाद समझा है उस पर ही कब्जा नहीं है मरण होता है, छोड़कर चला जाता है तो कहाँ रहा कब्जा? जिंदा रहते ही किसी-किसी ढंग से वियोग हो जाता है । अन्य की तो बात क्या, इस देह पर भी तो कब्जा नहीं है । जिस किसी भी क्षण मरणकाल आता है, इसे रीता छोड़कर जाता है, तो फिर अन्य क्या चीज उसकी होगी? परवस्तुवों में ममता करने से दु:ख होता है । दुःख मेटना है तो क्या करना चाहिये और क्या करते हैं लोग? लोग तो अपने घर वालों से मिलकर, उनसे रमकर दुःख मेटना चाहते हैं, तो भला बताओ जिस मोह के करने के कारण दु:ख हुआ है उसी मोह को करके कोई दुःख मिटाना चाहे तो कैसे वह दुःख मिट सकता है? तो फिर मोह करने से लाभ क्या मिलता? अरे यह अज्ञान है कि यहाँ के लोग कुछ हमें समझे कि यह भी कुछ जानदार है, द्रव्यवान हैं, बड़े लोग हैं, अरे उनके समझ लेने से तेरे को क्या लाभ मिल जायगा? यह दुनिया तो स्वप्नवत् असार है जैसे स्वप्न झूठा है ऐसे ही यहाँ के ख्याल झूठे हैं । स्वप्न में माना कि यह मेरा है लेकिन वह झूठ है, रहता कहा है? इसी तरह मोह में माना कि यह मेरा है । लेकिन यह है झूठ, रहता कहाँ है? मेरा जगत में कहीं कुछ भी नहीं है । तो व्यर्थ रहा ना मोह? किसका कौन लड़का है? अरे जगत में अनंत जीव हैं, एक जीव वह भी है उसी तरह का तो । जैसे अनंत जीव मेरे कुछ नहीं लगते इसी तरह यह भी मेरा कुछ नहीं लगता । रंचमात्र भी संबंध नहीं, लेकिन मोह में उसी के लिये मरे जा रहे, उसी के लिये रात दिन बेचैन रहते, दुःखी होते रहते, खुद में कंजूसी बनाये, खुद में लोभ बनाये, पर ये बच्चे खूब धन वाले बने, इनका कुछ बिगाड़ न हो, ऐसी मन की वृत्ति रहती है तो बतलाओ इससे खुद को क्या लाभ मिला? लाभ कुछ नहीं मिला बल्कि हानि सारी हुई । तो मोह में हानि ही हानि है ।
897-मोहविघात के उद्यम की विधि—मोह की कठोरता ज्ञान की रस्सी से ही कट सकती है । है कठोर मोह पाषाण की तरह पर ज्ञान जैसी नरम रस्सी इस मोह पत्थर पर रोज-रोज चलती रहे तो वह पत्थर भी वह मोह भी कट सकता है पर इसके लिये चाहिए लंबा समय सत्संग के लिए । तो यहाँ एक तत्त्वज्ञान की बात है । जहाँ यह समझ में आया कि ये जड़ हैं, मैं चेतन हूँ बस त्याग तो उन सबका उसके भीतर में हो ही गया । यदि न हो ज्ञान की ओर से त्याग स्वरूप तो त्याग में वह बढ़ भी नहीं सकता । मैं ज्ञानमात्र हूँ, ऐसा ज्ञान करना ऐसी श्रद्धा रखना इसही पर तुल कर रहना, ऐसा अनुभव करने के लिए विषय कषायों की प्रीति तजना और कितने ही उपद्रव उपसर्ग आयें वे कुछ भी नहीं हैं पर मुझे अपने आपके आंतरिक स्वरूप का परिचय मिले यह तो सब कुछ है, ऐसी दृढ़तम भावना जिस ज्ञानी के रहती है उसके त्याग तो चलता रहता है । भीतर से उपेक्षा हो गयी है, विकल्परूप फंसना नहीं चाहता है । तो प्रत्याख्यान कहो, त्याग कहो वस्तुत: क्या है? एक ज्ञानभाव । क्योंकि त्याग भी जानकर ही तो छोड़ा जाता है, ये हेय हैं मेरी बरबादी के हेतु हैं, मेरे स्वरूप नहीं हैं ऐसा जाने और निरंतर ऐसा जानते जावें तो उसे अपने ज्ञानमात्र का अनुभव होगा और उससे जो विशिष्ट आनंद प्राप्त होगा उससे कर्मों की निर्जरा होगी, मोक्षमार्ग बढ़ेगा । तो जिसको ज्ञान होने पर आत्मा का अनुभव हो जाता है उसे किस प्रकार से पर भावों का विवेक हुआ उसकी बात सुनो ।
898-मैं शुद्ध चैतन्यमात्र हूँ—आत्मा जो चैतन्यमात्र है अमूर्त है, अखंड है, जो भावों में बसता है; वह न स्त्री है, न पुरुष है; न तिर्यंच है, न देव-नारकी है; न कीड़े मकोड़े चिउंटी आदि है । आत्मा तो एक अखंड सत् है, वह आत्मा यह कुछ नहीं है । आत्मा उन भावों को भूल जाए, जितने वह अपने चित्त में बसाये रखता है कि मैं धनी हूँ, मैं त्यागी हूँ, मैं पंडित हूँ ऐसा ध्यान बनाये तो वह विवेकी है । यह (पर्याय) कुछ नहीं है, सब नाटक है, इन नाटकों में मत अटको, इनको छोड़ दो । मैं चैतन्यमात्र हूँ, मैं ज्ञायकभाव हूँ ऐसा अनुभवन होने से कर्मों की निर्जरा होगी । कर्मों का मूलत: विनाश इस आत्मा के अनुभव से होता है । अत: ज्ञान ही सर्वश्रेष्ठ है । स्व का अनुभव भी ज्ञान ही है । परंतु वह स्वानुभूति सम्यक्त्व की अविनाभावी है । अर्थात् वह आत्मानुभव सम्यक्त्व के होने पर होता है, यदि सम्यक्त्व न हो तो वह स्वानुभव नहीं होता है । सम्यग्दर्शन और स्वानुभूति में परस्पर में अविनाभावी संबंध होने से स्वानुभूति के द्वारा सम्यग्दर्शन का बोध करा दिया जाता है । वह स्वानुभूति ही सम्यक्त्व कहलाती है । स्वानुभूति एक साधारण शब्द है । स्व की कैसी अनुभूति होती है? स्वानुभूति दो प्रकार की है:—(1) अशुद्धनयात्मक स्वानुभूति और (2) शुद्धनयात्मक स्वानुभूति । मैं व्यापारी हूँ, पंडित हूँ, त्यागी हूँ, धनी हूँ—यह भी स्वानुभूति है; परंतु यह अशुद्धनयात्मक स्वानुभूति है । और मैं ज्ञानमात्र हूँ मैं चित्स्वभाव हूँ यह अनुभूति भी स्वानुभूति है; परंतु यह शुद्धनयात्मक स्वानुभूति है । अशुद्धनयात्मक स्वानुभूति से संसार बढ़ता है और शुद्धनयात्मक स्वानुभूति से मोक्ष मिलता है ।
सम्यक्त्व होने के बाद स्वानुभूति रहे, यह आवश्यक नहीं है । सम्यक्त्व होने पर स्वानुभूति रहती भी है, नहीं भी रहती है । जैसे अंग्रेजी, हिंदी, उर्दू, संस्कृत, मराठी आदि भाषायें पढ़ लेने के बाद सब में उपयोग नहीं रहता है, जिसमें हमारा उपयोग है, उसी में उपयोग रहता है । इसी प्रकार सम्यग्दर्शन के होने पर स्वानुभूति रहती भी है, नहीं भी रहती । परंतु जब सम्यग्दर्शन हुआ था स्वानुभूति को लेकर हुआ था । जब स्वानुभूति नहीं होती तब आत्मा अंत: निरंतर स्वरूप प्रतीति का काम करता रहता है, सम्यग्दर्शन तो रहता ही है । शंका:—स्वानुभूति के द्वारा परभाव का विवेक कैसे होता है? समाधान:—भावक भाव का विवेक बताते हुए यही बात श्रीमत्कुंदकुंदाचार्य 36 वीं गाथा में कहते है—


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