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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:समयसार - गाथा 359

From जैनकोष



जह सेडिया दु ण परस्स सेडिया सेडिया य सा होइ।तह दंसणं दु ण परस्स दंसणं दंसणं तं तु।।359।।

जैसे सेटिका परद्रव्य की कुछ नहीं होती है। सेटिका सेटिका ही है, इस ही प्रकार यह सम्यग्दर्शन परद्रव्य का कुछ नहीं है। सम्यग्दर्शन तो सम्यग्दर्शन ही है।

सेटिका का परद्रव्य से असंबंध का दृष्टांत―इस ही बात को दृष्टांत द्वारा स्पष्ट यों जानिये कि सेटिका कोई सफेद गुणकर भरी हुई एक वस्तु है ? जिसे खड़िया कहो चूना कहो या कलई कहो। उस सेटिका का व्यवहार से ये सफेद की जाने योग्य भींत आदिक परद्रव्य हैं। अब ये भींत आदिक परद्रव्यों का जो कि श्वेत करने योग्य हुई उसके सफेद करने वाली यह सेटिका कुछ होती है अथवा नहीं होती है इस संबंध में जरा विचार करें। यदि यह सेटिका भींतादिक परद्रव्यों की होती है तो जिसका जो होता है वह वह ही होता है। जैसे आत्मा का ज्ञान होता है तो ज्ञान आत्मा ही कहलाया ऐसा स्वस्वामी का अभिन्न तात्त्विक संबंध है। जब सेटिका भींत आदिक की हो जायेगी तो भींत आदिक ही रहेंगे सेटिका का नाम निशान न रहेगा। परंतु कोई भी द्रव्य किसी दूसरे द्रव्य में संक्रमण नहीं करता है। इसलिए किसी भी द्रव्य का विनाश नहीं होता है। सेटिका का विनाश संभव नहीं है। दोनों स्वतंत्र द्रव्य है। भींत अपने स्वरूप में भींत के ढंग से है और यह सफेदी अपने स्वरूप में अपने ढंग से भरी है। चीजें दोनों अलग-अलग हैं। किसी का कोई नहीं हुआ।

सेटिका का स्वामित्व―यदि सेटिका भींत आदिक परद्रव्यों की नहीं है तो फिर किसकी है ? तो उत्तर होगा कि सेटिका की ही सेटिका है। वह दूसरी सेटिका कौन सी है ? जिसकी यह सेटिका बन जाय ? तो कोई दूसरी सेटिका अलग नहीं है। किंतु समझने के लिए उसमें स्वस्वामी अंश माना गया है। कहते हैं कि ऐसा निर्बल स्वस्वामी संबंध मानने से क्या फायदा है कि जिसका कोई अर्थ ही न निकले। कहते हैं कि कुछ फायदा नहीं है। तब यह निर्णय हुआ कि सेटिका सेटिका ही है। उसमें यह मत खोजो कि सेटिका किसकी है ? जो-जो है उसको जानते जावो। वैसे यह देखने की गुंजाइश ही नहीं है कि कौन किसका है ? तुम कहते हो कि भींत की सफेदी है तो हम कहते हैं कि सफेदी की भींत है। तो अंतर क्या आ गया ? स्वरूपदृष्टि करने वाले जानते हैं कि कोर्इ किसी का नहीं है। सब हैं, अपने स्वरूप में हैं।

श्रद्धाता व श्रद्धेय परद्रव्य का असंबंध―इसी प्रकार जरा श्रद्धा के संबंध में विचार करें, श्रद्धान करने वाला यह आत्मा श्रद्धान किए जाने वाले जीवादिक 6 द्रव्य 7 तत्त्व 9 पदार्थ इनका यहां श्रद्धान करने वाला कुछ है क्या ? द्रव्य द्रव्य में द्रव्य के ढंग से देखो तो कुछ नहीं है और इस विधि से भी देखो कि क्या यह आत्मा किसी परद्रव्य का श्रद्धान करता है। तो यह भी बात नहीं है कि यह आत्मा परद्रव्य का श्रद्धान करता है। अपने से बाहर अपने श्रद्धा गुण का परिणमन यह जीव कर नहीं सकता, अर्थात् श्रद्धेय जो बहिर्भूत जीवादिक पदार्थ हैं उनका निश्चय से श्रद्धान करने वाला आत्मा नहीं है। यदि निश्चय से श्रद्धान करने वाला होता तो उसका अर्थ यह हुआ कि यह आत्मा परद्रव्य में तन्मय हो गया। निश्चय से परिणाम और परिणामी एक होता है। श्रद्धाता व श्रद्धेय परद्रव्य में निमित्तनैमित्तिक संबंध का भी अभाव―व्यवहार से जो निमित्तनैमित्तिक संबंध निरखा जाता है यहां तो वह निमित्तनैमित्तिक संबंध भी नहीं है कि आत्मश्रद्धान करे सो हो गया कार्य और बाह्य पदार्थों की श्रद्धा करे सो बाह्यपदार्थ हो गए निमित्त। इतनी भी बात नहीं है किंतु श्रद्धारूप से परिणत हुए आत्मा के श्रद्धान कार्य के लिए आश्रयभूत हैं जीवादिक पदार्थ।

दृष्टांतपूर्वक श्रद्धाता व श्रद्धेय परपदार्थ के निमित्तनैमित्तिक संबंध के अभाव का समर्थन―जैसे कोई पुरूष कुटुंब से राग करता है तो उस पुरूष के राग के निमित्त कुटुंब नहीं है किंतु रागरूप से परिणत हुए पुरूष का आश्रयभूत है वह कुटुंब। जैसे कोई द्वेष करता है किसी अन्य पुरूष से तो वह अन्य पुरूष द्वेष का परिणाम का निमित्त नहीं है। निमित्त तो द्वेष परिणाम का क्रोधादिक कषाय का उदय है। पर वह अन्य पुरूष द्वेष रूप परिणत हुए पुरूष के द्वेषरूप कार्य का आश्रयभूत है अर्थात् किसका लक्ष्य करके, किसको उपयोग में लेकर वह द्वेषरूप परिणमन बना रहा है ? उसका उत्तर है वह परपदार्थ। इसी तरह यह आत्मा जीवादिक का पदार्थों का श्रद्धान करता है तो जीवादिक पदार्थ श्रद्धान के निमित्तभूत नहीं हैं, श्रद्धान के निमित्तभूत तो श्रद्धान के आवरक जो 7 प्रकृतियां हैं उन 7 प्रकृतियों का उपशम, क्षय अथवा क्षयोपशम है। श्रद्धाता व आश्रयभूत श्रद्धेय परपदार्थ का संबंध मानने पर अनिष्टापत्ति―ये जीवादिक पदार्थ श्रद्धानरूप से परिणत हुए जीव के श्रद्धान कार्य के आश्रयभूत हैं। इन आश्रयभूत जीवादिक पदार्थों का और श्रद्धानरूप परिणत आत्मा का कोई संबंध नहीं है, अर्थात् स्वस्वामी संबंध नहीं है। यह श्रद्धाता परद्रव्य है या परद्रव्य का कुछ बने, ऐसा वहां संबंध नहीं है। यदि संबंध माना जाय तो विचार करो कि तत्त्वार्थ श्रद्धानरूप से परिणत यह आत्मा और इस आत्मा के व्यवहार से श्रद्धान में आ गए जीवादिक का कुछ होता तो स्वामी ही मुख्य रहता है, स्वविलीन होता है। जैसे व्यवहार में स्वामी की प्रधानता है स्व की नहीं है, इसी तरह भिन्न वस्तुओं में स्वस्वामी संबंध न मानना होता तो जिसको संबंधी माना गया वह तो हो जायेगा प्रधान और जो स्व माना गया वह हो गया गौण। तो यह श्रद्धान करने वाला यदि जीवादिक पदार्थों का है तो जीवादिक पदार्थ तो अपनी सत्ता रखेंगे और यह श्रद्धान करने वाला विनिष्ट होगा किंतु कोई भी द्रव्य किसी अन्य द्रव्यरूप परिणम ही नहीं सकता, किसी का उच्छेद हो ही नहीं सकता। इस कारण यह श्रद्धाता जीवादिक पदार्थों का नहीं है।

परमार्थत: श्रद्धान के श्रद्धान का स्वामित्व―जब यह श्रद्धातौ जीवादिक पदार्थों का नहीं है तो पूछा गया कि यह श्रद्धान फिर किसका है ? तो यह श्रद्धान श्रद्धान का है। जैसे निश्चय से आत्मा पर को जानता नहीं है किंतु अपने आपके परिणमन को जानता है। इसी प्रकार निश्चय से यह आत्मा परद्रव्य का श्रद्धान नहीं करता किंतु श्रद्धागुण का जो परिणमन है उस परिणमनरूप से यह श्रद्धाता हुआ करता है। यहां यह बात स्पष्ट जान लेना चाहिए कि यह आत्मा निश्चय से आत्मा का ज्ञाता है और व्यवहार से पर का ज्ञाता है। इसका अर्थ यह नहीं करना। आत्मा को जानता है यह तो सच है और पर को जानता है यह झूठ है, यह अर्थ नहीं है, किंतु अर्थ यह है कि पर का जाननरूप ग्रहण ज्ञान विकल्परूप से हुआ करता है। यह पर से तन्मय नहीं हो जाता। यह जानता हुआ अपने आपकी वृत्ति से ही तन्मय होता है। सोदाहरण श्रद्धा की अपने में तन्मयता का वर्णन―जैसे हम यहीं जो कुछ अपने ज्ञान का परिणमन कर रहे हैं इसको हम बताना चाहें कि हम क्या कर रहे हैं, तो हम बाह्य वस्तु का नाम लेकर ही कह सकेंगे कि हम कमरा खंभा घंटा ये सब जान रहे हैं, पर निश्चय से मेरा ज्ञान मेरे आत्मप्रदेश को छोड़कर इन बाह्य घंटा खंभा आदि में तन्मय नहीं हो गया। तब निश्चय से मैंने अपने को जाना और व्यवहार से इन परद्रव्यों को जाना। ये परद्रव्य मेरी समझ में आये नहीं हैं यह बात नहीं है। आयें हैं, परद्रव्य का जानना झूठ नहीं है, पर परद्रव्य का जानना स्व के किसी परिणमन से जानने में होता है। सीधा परद्रव्य में यह ज्ञान अपना उपयोग करता हुआ परद्रव्य में तन्मय होता हो ऐसा वहां नहीं है। इसी तरह श्रद्धा करने वाला यह आत्मा श्रद्धेय जीवादिक पदार्थों का कुछ नहीं है। उन जीवादिक पदार्थों में यह श्रद्धा नामक गुण व पर्याय तन्मय नहीं है। यह तो अपने आपके गुण में ही तन्मय है। सम्यग्दर्शन सम्यग्दर्शन ही है और वह अपने स्वरूप में ही अपना परिणमन कर रहा है। इस प्रकरण का प्रयोजन―यहां यह चर्चा जो कई दिनों से चल रही है उसका प्रयोजन इतना है कि भाई वस्तु की स्वतंत्रता को देखो―वस्तु की स्वतंत्रता को समझे बिना जीव का मोह हट नहीं सकता और मोह हो हटाने से ही जीव का कल्याण है। जीव तो परिपूर्ण अपने गुण स्वरूप शाश्वत विराजमान है। उसका कहीं अधूरापन नहीं है, पर मान्यता में अयथार्थ बात है वह मान लिया इससे उसे कष्ट है। यह संसार विडंबना यह अपने आत्मा का जैसा स्वरूप है, उससे पृथक् है, वैसा मान लें और बाह्य में सभी पदार्थ जैसे अपने स्वरूप में हैं उन्हें वैसा जान लें तो इसके मोह रह नहीं सकता।

जबरदस्त व्यामोह―भैया ! अनंत जीवों में से सभी को छोड़कर जो दो एक जीवों में यह मेरा है ऐसी मान्यता की है यह मोह का, मूढ़ता का ही तो प्रसाद है अन्यथा बतावो अनंत जीवों में से दो एक जीवों में कौन सी बड़ी विशेषता आयी ? क्या स्वरूप भी सब जीवों से इन दो जीवों का अद्​भुत है ? या किसी अन्य जीव की परिणति से मेरे में कोई परिणमन हुआ क्या, अन्य जीवों की भांति ऐसी इस परिजन के जीव की हालत नहीं है क्या ? इसके परिणमन से क्या मुझमें कोई परिणमन हो जाता है। सारी बात ज्यों की त्यों है। जैसा अन्य जीव के साथ इसका निर्णय है वही निर्णय इन दो एक जीवों के साथ भी है, पर अनंत जीवों में से उन दो एक जीवों को अपना मान लेना यह जबरदस्त व्यामोह है और संसार में रूलते रहने का एक साधन है। जैसे कि अनादि से अब तक करते चले आए है वही बात है।

अपनी यथार्थ सूझ―तो विलक्षण कहिए, अपना विलक्षण परिणमन कहिए एक यही है निर्मोहता प्रकट होना। इस मोह ने इस आत्मा को अपने आपमें नहीं ठहरने दिया। और यहां से भाग-भागकर अर्थात् इस उपयोग से बहिर्दृष्टि रूप करा कर बेचैन कर रहा है यह मोह। मोह रागद्वेष ये ही मात्र हमारे दु:ख के कारण हैं। दूसरा कोई पुरूष हमारे दु:ख का कारण नहीं है। कोई कुछ वर्तो, कोई कुछ करो, कोई किसी तरह रहे उससे यहां सुख दु:ख नहीं है, किंतु अपनी कल्पना बना उस कल्पना से सुख मान लेता है और उस ही कल्पना से दु:ख मान लेता है। मुझे सुखी दु:खी करने वाला दूसरा नहीं है। साथ ही मैं भी किसी को सुखी अथवा दु:खी करने वाला नहीं हूँ। जिसका जैसा पुण्योदय है उसके अनुसार उसको वैसा ही साधन मिल जाता है। उन्हीं साधनों में से अपने आपको समझ लीजिए।

परसेवा में पुण्योदय की निमित्तता―भैया ! कोई किसी दूसरे का कुछ करता नहीं है किंतु दूसरे के पुण्योदय का निमित्त है इसलिए सेवक बनना पड़ता है। करता कोई कुछ नहीं है। सब चाकरी कर रहे हैं। जैसे मालिक का पुण्योदय है तो हज़ारों लोग चाकरी कर रहे हैं, तो हज़ारों नौकरों के भी पुण्योदय का उदय है कि मालिक को भी उनकी चाकरी करनी पड़ती है, उनका ढंग जुदा-जुदा है। कोई किसी ढंग से चाकरी करता है कोई किसी ढंग से चाकरी करता है। तो ऐसी वस्तु की स्वतंत्रता का जब अपने आपमें परिज्ञान होता है तब इस जीव को मोक्षमार्ग मिलता है, उससे पहिले मोक्षमार्ग नहीं मिलता है। इस प्रकार इन चार गुणों के संबंध में ज्ञानगुण, दर्शनगुण, चारित्रगुण और श्रद्धागुण―इन चार गुणों का आश्रय लेकर यह बात बतायी गयी है कि यह जीव निश्चय से परद्रव्य का कुछ नहीं लगता।

परकर्तृत्व के भ्रम की संभावित बुनियाद―व्यवहार से पर का ज्ञाता है, ऐसा मानकर धीरे-धीरे इससे और बढ़कर लोगों ने यह समझ लिया है कि यह पर का कुछ करने वाला है। जैसे कुछ लोग कहते हैं कि ईश्वर की मर्जी बिना पत्ता भी नहीं हिलता। इसको क्या इस तरह नहीं कहा जा सकता कि प्रभु के ज्ञान में जो आया है वही होता है। यद्यपि इस प्रसंग में प्रभु का जानन कारण नहीं है वस्तु के उस प्रकार होने में, बल्कि प्रभु के जानन में आश्रयभूत पदार्थ का परिणमन होता है। परपदार्थ के परिणमन में आश्रयभूत प्रभु का ज्ञान नहीं है लेकिन जब एक ज्ञात अवस्था ज्ञानी ने मानो जान ली कि अमुक बात होगी तो अब यह कहा जा सकता है कि ज्ञान में आए बिना नहीं हुई। यहां से जोर दे दिया और फिर अज्ञान से लौकिक पुरूषों ने मर्जी के रूप में यह समझा।

भ्रम की तरक्की―ये भैया ! मर्जी से तन्मय फंसे-फंसे यहां के ये समझदार जीव हैं, सो इस जीव ने ज्ञान को एक मर्जी और इष्ट के रूप में ही ज्ञान का स्वरूप माना है। सो ज्ञान से बढ़ बढ़कर मर्जी इसके आई क्योंकि मर्जी से रहित रागद्वेष से रहित ज्ञान का क्या स्वरूप है, यह संसारी जीव को कुछ विदित नहीं है, इस कारण लौकिक पुरूषों ने यह लगा दिया कि मर्जी हो प्रभु की तो परिणमन होता है और इस तरह बढ़कर यह कहा जाने लगा कि प्रभु की मर्जी बिना कुछ भी नहीं होता है। तो इस भ्रम में दौड़ जाने की गुंजाइश जो इसे मिली उसकी खोज करते-करते मूल में बात पकड़ी गयी तो यह विदित हुआ कि इसने अपने आत्मा को पर का ज्ञाता माना। पर का ज्ञाता मानने की बुनियाद पर धीरे-धीरे बढ़कर लौकिक पुरूषों में बात यहां तक फैल गयी कि प्रभु की मर्जी बिना कोई काम नहीं होता।

आत्मक्रांति से आत्मभ्रांति की हानि―सब बातों का निर्णय करके अंत में जब यह बात निरखी जाती है कि ओह यह आत्मा तो परमार्थ से पर का ज्ञाता भी नहीं है। यह तो अपने ज्ञानगुण के परिणमन का परिणमाने वाला ही है, इसी का नाम ज्ञाता है, तब उन सब भ्रांतियों की भी गुंजाइश नहीं रही। तब इस ज्ञातृत्व से यह जीव निर्विकल्प समाधि पाने के योग्य हो जाता है। जब यह उपयोग चारों तरफ भ्रमा रहता है, दौड़ता कूदता है तब इस आत्मा का संतुलन बिगड़ जाता है। जहां गंभीरता धीरता नहीं रही वहां योग्यता ही नहीं रहती कि यह आत्मा अपने आपमें विलीन होकर शांत हो जाय। तरंगों की विलीनता―भैया ! तेज लहरों के कारण एक बड़ा भंयकर रूप रखे हुए, समुद्र के किनारे खड़े होकर देखने में भी डर लगता है क्योंकि उसकी लहर बड़े भयानकरूप से चल रही है। वही समुद्र जब शांत होता है तो कोर्इ नई चीज नहीं बनती है, किंतु अपनी ही उन लहरों को अपने ही जल के उन अंगों को जो नाना रूप से दौड़ रही थीं, परिणम रही थीं, वह परिणमन विलीन हो जाता तो वह समुद्र शांत हो जाता है। वहां पूछो कि वह लहर अब कहां गयी जबकि समुद्र से शांत हो गयी ? गयी कहां, समझो कि कहीं बाहर तो गयी नहीं, जैसे समझ लीजिए कि समुद्र की लहर देखो अमुक दिशा को चली गयी सो शांत हो गयी क्या ? तो समुद्र की लहर बाहर तो कहीं गयी नहीं। तो वह लहर समुद्र के भीतर पड़ी है क्या ? नहीं। वह लहर समुद्र के भीतर भी नहीं मिलती है। तो यह विलीन होना क्या कहलाया ? यह विलीन हुई पूर्व पर्याय का विलीन होना उत्तर पर्याय रूप से हो जाने का नाम है। यह विलीनता विलक्षण है। इस विलीनता में पूर्व पर्याय न बाहर जाकर विलीन हुई, न भीतर पड़ी है किंतु उस पूर्वपर्याय का अब नाम ही नहीं है। वह तो निस्तरंग पर्यायरूप हो गया, सो वह शांत है।

विकार की विलीनता―इसी तरह भ्रम की अवस्था में व्यवहार को ही परमार्थ मानने की अवस्था से यह जीव विह्वल व्याकुल हो रहा है। जहां इसकी भ्रमरूप अवस्था मिटी कि यह आत्मा शांत हो जाता है। पर का मैं ज्ञाता हूँ, पर का दृष्टा हूँ, पर का त्यागी हूँ, पर का श्रद्धान करने वाला हूँ, ये सब आशय पर का कर्ता हूँ। इस आशय के छोटे छोटे नाती पोते हैं। इन्हीं आशयों से बढ़-बढ़कर यह जीव कर्तृत्व पर अपना राज्य बिछा देता है। इस कारण यहां मूलतत्त्व को समझ लीजिये, ताकि किसी के कर्तृत्व भाव की गुंजाइश न रहे, इस आशय से इस प्रकरण में अब तक निश्चय दृष्टि से यह कहा गया है कि यह जीव न पर का ज्ञायक है, न पर का दर्शक है, न पर का त्यागी है और न पर का श्रद्धान करने वाला है। वस्तु के सभी गुण पर्यायों का परवस्तु से असंबंध―यह चातुष्क एक उपलक्षण रूप कथन है, अनेक बातें भी इसके साथ लगाते जावो। यह पर का आनंद करने वाला भी नहीं है, यह जीव अपना ही आनंद करने वाला है। यह भोजन का आनंद नहीं लूट सकता, यह वैभव संपत्ति क आनंद नहीं लूट सकता क्योंकि आनंद नामक गुण तो इस आत्मा के प्रदेश में है और उसका परिणमन आनंद गुण में ही हुआ। तो अपने में ही आनंद गुण का परिणमन किया, अपना ही इसने मौज लिया। पर का यह जीव मौज भी नहीं ले सकता। किंतु देखो लौकिक जीवों में यह आशय खूब भरा हुआ है कि मुझे घर का सुख है, कुटुंब का सुख है, धन का सुख है, किंतु भैया ! इसको किसी भी परवस्तु से सुख आ ही नहीं सकता है। जितना जो कुछ हर्ष और विषाद आता है वह अपने ही गुण के परिणमन रूप है ऐसी वस्तु की स्वतंत्रता ज्ञात होने से यह जीव मोक्षमार्ग में चलता है और शांति लाभ प्राप्त करता है।


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