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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:समयसार - गाथा 362

From जैनकोष



जह परदव्वं सेडदि हु सेडिया अप्पणो सहावेण।तह परदव्वं पस्साद जीवो वि सएण भावेण।।362।।

दर्शन के दृष्टांत में निश्चय के अविरोधपूर्वक व्यवहार का प्रदर्शन―जैसे सेटिका अपने स्वभाव से परद्रव्य को श्वेत करती है इसी प्रकार यह जीव भी अपने भाव से परद्रव्यों को देखता हे। यहां भी उसी पद्धति से सारे निर्णय देखना। जैसे यह खड़िया अपने सफेद गुण से भरी हुई अपने ही स्वभाव वाली है, यह खुद तो भींतादिक परद्रव्यों के परिणमन से परिणमती नहीं और यह अपने भी स्वभाव से भींतादिक परद्रव्यों को परिणमाती नहीं है किंतु भींतादिक परद्रव्यों का निमित्त पाकर यह सेटिका सफेदी गुण में फैलती हुई इस रूप में परिणम गयी और यह भींतादिक सेटिका का आधार पाकर, निमित्त पाकर अपनी स्वच्छता स्वभाव को तिरोहित करके केवल देखने में सफेद रूप से प्रतीत हो रही है। इस कलई के भीतर जैसी भींत थी वह तो वही है लेकिन एकगाह संयोग हो गया इसलिए अपने स्वभाव को उसने तिरोहित किया है। इतने पर भी सेटिका सेटिका की ही है, भींतादिक की नहीं है। फिर भी दोनों का संबंध भी यथार्थ है अर्थात् वे हमारे अत्यंत निकट में पड़े हुए हैं। क्या भींत न हो तो आप इस खड़िया को पतले रूप में फैला सकते हैं ? नहीं। भींत का निमित्त पाकर ही यह खड़िया इस रूप में फैली। यह संबंध गलत तो नहीं है ? नहीं। तो संबंधदृष्टि से देखा जाय तो यह व्यवहार उपयुक्त है कि सेटिका अपने स्वभाव से भींतादिक परद्रव्यों को श्वेत कर रही है। निश्चय के अविरोधपूर्वक दर्शन के व्यवहार का दर्शन―इसी तरह दिखने वाला यह आत्मा दिखने में आने वाले पदार्थ के रूप से नहीं परिणमता और यह दर्शक आत्मा अपने स्वभाव से इन दृश्य पदार्थों को नहीं परिणमाता, फिर भी यह बाह्य संबंध देख करके अपने दर्शन का आश्रय पाकर दर्शन गुण अपनी वृत्ति कर रहा है और दर्शन गुण की परिणति का निमित्त पाकर ये बाह्य दृश्य कहलाते हैं। निमित्तनैमित्तिक संबंधवश यह व्यवहार किया जाता है कि यह दर्शक आत्मा इस दृश्य पदार्थ को देखता है।

भिन्न वस्तुओं में मात्र निमित्तनैमित्तिक संबंध के व्यवहार की शक्यता―मास्टर लड़कों को पढ़ाता है, क्या यह बात गलत है ? गलत तो नहीं मालूम पड़ती, तो क्या यह बात बिल्कुल सही है कि मास्टर लड़कों को ज्ञान देता है ? अगर मास्टर लड़कों को ज्ञान वितरण करने लगे तो 10, 20, 50 लड़कों को ज्ञान वितरण करने के बाद फिर मास्टर कोरे रह जायेंगे। जो ज्ञान था वह तो 10, 20, 50 लड़कों को दे दिया। हुआ क्या कि मास्टर के उस श्रम का वचनों का आश्रय करके वचनों से अपने ज्ञान के व्यवसाय से अपने में ज्ञान उत्पन्न किया। इतना निमित्तनैमित्तिक संबंध है अत: वह व्यवहार भी ठीक है और चूँकि किसी द्रव्य का गुण पर्याय किसी अन्य द्रव्य में नहीं पहुंचता, इसी प्रकार दर्शक और दृश्य परपदार्थ का कोई संबंध नहीं है, फिर भी व्यवहार से संबंध जिस दृष्टि से देखो वैसा ही दिखा करता है। अब यह अपना चुनाव है कि कौनसी दृष्टि से देखने में हमारी भलाई है, किस दृष्टि से देखते रहने में हमारा समय व्यर्थ जाता है। यह एक अपने चुनाव की बात है, पर जिस दृष्टि में जो ज्ञात हो रहा है वह सत्य है। दर्शन की चतुर्विधता में नेत्र का दृष्टांत―जैसे मनुष्य के दो आँखें हैं। तीन भी आँखें होती होंगी ? त्रिनेत्री तो महादेव को कहते है ना। महादेव मायने बड़ा देव। जिसके देह की भी दो आँखें हों और ज्ञान का नेत्र भी चमक उठा है उसे कहते हैं त्रिनेत्री। तो बाहर से तो दो ही आँखें हैं। अब इन ही आंखों का कुछ भी निमित्त करके हम चार तरह से देख सकते हैं। कभी हम दाहिनी आँख को बंद करके दाईं आँख से देख सकते हैं, कभी हम बायीं आँख को बंद करके दायीं आँख से देख सकते हैं और दोनों आंखों को खोल करके भी देख सकते हैं और दोनों आंखों को बंद करके भी देख सकते हैं। दोनों आंखें बंद करके दिखता है या नहीं ?कोई कहेगा हां दिखता तो है थोड़ा सा उजेला सा और थोड़ा अँधेरा सा। कोई कहेगा कि न अँधेरा दिखता, न उजेला दिखता, किंतु एक ज्ञानप्रकाश दिखता है। ज्ञाता को वस्तुधर्म का चार प्रकार से दर्शन―इसी प्रकार दो आंखें हैं आगम में, एक द्रव्यार्थिकनय की आँख और एक पर्यायार्थिकनय की आँख। द्रव्यार्थिकनय की आँख बंद करके हम पर्यायार्थिकनय से देखते हैं और उस समय हमें यों दिखता रहता है। जग में जो कुछ है सब क्षणिक है, क्षण-क्षण में नष्ट होने वाला है। जो कुछ है सो एक नहीं है। इस प्रकार देखा करते हैं सब कुछ। जिससे हमें अनित्य भावना में मदद मिलती है। जो कुछ समागम है वह नष्ट हो जाने वाला है, यह पर्यायार्थिकनय से देखा जा रहा है। किंतु जब पर्यायार्थिकनय को बंद करके द्रव्यार्थिकनय के नेत्र से देखेंगे तो इसे कहेंगे यह पदार्थ नित्य ध्रुव अहेतुक सहज स्वरूपमात्र है। प्रगति में नयों का सहयोग―भैया ! नय दोनों सहायक हैं अपने आप में प्रगति में बढ़ने के लिए। द्रव्यार्थिकनय तो इस जीव को ज्ञान में बढ़ने के लिए पहिला अवलंबन है और जो उपादेयभूत है, जिसका आलंबन करके हम और आगे बढ़े वह द्रव्यार्थिकनय है। अनित्य भावना भाने का प्रयोजन है नित्य को तक ले जाना, तब अनित्य भावना प्रयोजनवान् है। और यह ही तकते रहे कि जो कुछ है सब मिटता है। सब नष्ट होता है, दल बल देवी देवता और नाम लेते जावो और जिनसे दुश्मनी हो वे मर जाते है, इससे फायदा क्या निकला ? यह तो एक बकवाद सा हुआ। यदि प्रयोजनभूत नित्य तत्त्व का स्पर्श न हो तो अनित्य भावना प्रयोजनवान् नहीं है। जब अंतर में नित्य भावना भी भरी हो तब अनित्य भावना प्रयोजनवान है। दृष्टांतपूर्वक अंतमर्म की दृष्टि पर बल―भैया ! ये तो सब अनित्य है। पर नित्य भी है कुछ कि नहीं ? इन सब अनित्यों का आधारभूत स्रोतरूप जो कुछ गुणपुंज है, वह है नित्य। ये सब मिट जानेवाले हैं और मैं भी मिट जाने वाला हूँ। तो मिट जानेवाला जो मैं हूँ उस मिट जाने वाले की भावना भाने से कौनसा प्रयोजन निकलेगा ? अजी नहीं, ये सब पर्यायें तो मिट जाने वाली हैं, परंतु द्रव्य तो शाश्वत अव्याबाधस्वरूप है, उनमें कोई परिवर्तन नहीं होता। ऐसे अविनाशी नित्य तत्त्व का आश्रय बने तो अनित्य भावना भाना सफल हो जायेगा। इस प्रकार पर्यायार्थिकनय का सही ज्ञान करते हुए फिर हम द्रव्य का बोध करें, दृष्टि करें तो हमारा यह प्रयास प्रयोजन पर पहुंचाने वाला हो सकता है। नय नयन―यहां निश्चय और व्यवहार की बात कही जा रही है, यही नेत्र है। नयन कहो, नय कहो, चक्षु कहो एक ही बात है। नेत्र का काम है जो ले जाय उसी का नाम नयन है उसी का नाम नय है। हम जब जा रहे हों तो हमारा ले जानेवाला कौन है ? यदि कोई अंधा पुरूष है तो उसको ले जाने वाला कोई दूसरा है जो उसकी लाठी पकड़े हुए है, और जो अंधा नहीं है उसे ले जाने वाला कौन है ? आँख। तो जो ले जाय उसको आँख कहते हैं। नय भी हमको मायने हमारे उपयोग को ले जाता है। यदि हम हठी हैं, रिसाये हुए हैं तो जानबूझकर गड्​ढे में गिर जायेंगे। उसमें आंखों का क्या दोष है। इसी प्रकार कोई मोही है, हठी है तो वह किसी नय का हठ करके अकल्याण के गड्ढे में गिर जायेगा, पर नय ने तो अपना ठीक स्वरूप बताया ही है। उसका दोष कुछ नहीं है। अपेक्षा से यथार्थता―भैया ! क्षणिकवाद जो सुगतमत है, यदि उसकी आँख से देखें, अपरिणामवाद है, स्वभाववाद हैं उसकी आँख से देखें उसके वाद कहने में कहीं कोई गड़बड़ है ही नहीं, पर जितनी उसकी एक आँख है उतना ही तो तत्त्व नहीं और भी तो तत्त्व है। नय की गौणमुख्यता में सरणीसरण का दृष्टांत―जब आप सीढ़ियों पर चढ़ते हैं तो आप यह बतावो कि आप किसी एक ही सीढ़ी को देखते हैं क्या ? नहीं किसी सीढ़ी को मुख्यता से देखते हैं तो किसी को गौणरूप से देखते हैं, पर एक ही सीढ़ी को देखकर कोई नहीं चढ़ता है। उसकी सरसरी निगाह से सब सीढ़ी दिख रही हैं, और प्रसंग में आयी हुई दो तीन सीढ़ियाँ बहुत साफ दिख रही हैं। उनमें से पहली सीढ़ी पर पैर रख लिया तो अब वह गौण हो गयी, वह बिल्कुल हल्की नजर में रह गयी और जिस सीढ़ी पर चढ़ते हैं वह बहुत स्पष्ट दिखने लगी। इसी तरह वस्तुस्वरूप के महल में जाने वाले ज्ञानी पुरूष को नयों की सारी सीढ़ियाँ दिखती हैं। सरसरी निगाह से सब दिखती हैं और प्रकरण को प्राप्त जितने मंतव्यों से प्रयोजन है वह दिखता हैं और वहां भी जिस सीढ़ी का अवलंबन कर रहा है वह मुख्यरूप से दिखती है और अन्य सीढ़ियाँ जिनका आलंबन कर चुका था वे गौणरूप से दिखती हैं, इसी तरह बहुमुखी स्वभाव की योग्यता वाला ज्ञानी पुरूष वस्तुस्वरूप के महल में पहुंचता है। आत्मा का दर्शकत्व―यह आत्मा परद्रव्यों का दर्शक है, परद्रव्यों के विषय में ज्ञान किया इस आत्मा ने और उन सब परद्रव्यों के ज्ञान करने वाले आत्मा को देखा दर्शन ने, सो इस परंपरा से दर्शन परपदार्थों को देखा। दर्शन के स्वरूप के संबंध में दो तीन प्रकार से वर्णन आता है। कहीं लिखा है कि समस्त पदार्थों का सामान्य सत्ता का प्रतिभास होना दर्शन है, कहीं लिखा है पदार्थ का आकार न ग्रहण करके, पदार्थ में विशेषता न जान करके उनका जो सामान्य ग्रहण है उसे दर्शन कहते हैं। तो कहीं लिखा है कि आत्मप्रकाश को दर्शन कहते हैं, आत्माभिमुख चित्तप्रकाश को दर्शन कहते हैं। इन तीनों प्रकार के लक्षणों का ध्येय एक हैं। और अंत में इस निष्कर्ष में पहुंचेंगे कि आत्माभिमुख चित्प्रकाश को दर्शन कहते हैं। सामान्य सत्ता प्रतिभास में आत्माभिमुख चित्प्रकाश―जैसे कहें कि समस्त पदार्थों के सामान्य सत् के प्रतिभास को दर्शन कहते हैं। जरा इस प्रकार यत्न तो कीजिए कि पदार्थ विशेष सत् का प्रतिभास न रहे। यदि उपयोग में कोई परपदार्थ आए तो विशेष ही प्रतिभास हो गया। विशेष सत् का प्रतिभास न करें, सभी पदार्थों के विशेष सत् का प्रतिभास छोड़ दें, छोड़ दें लेकिन अब क्या दिखा ? क्या पदार्थ का सामान्य सत् का प्रतिभास हुआ ? अरे जहां पदार्थों का इतना शब्द लगा बैठेंगे तो विशेष प्रतिभास आ ही जायेगा। विशेष प्रतिभास करने का यह व्यवसाय किया जा रहा है, तो पदार्थ का सामान्य सत् परपदार्थरूप हो गया तो वह विशेष सत् बन जायेगा। इस कारण उस दृष्टि में जहां सामान्य सत् का प्रतिभास किया जा रहा है वहां प्रतिभास में केवल चित्प्रकाश ग्रहण में रहेगा।

निराकार ग्रहण में आत्माभिमुख चित्प्रकाश―चित्प्रकाश वाली यही बात दूसरे लक्षण में है। पदार्थ का आकार ग्रहण न करें, अच्छा भाई, नहीं किया। ऐसी स्थिति में क्या हुआ यह कुछ ढीला सा बनकर बैठ गया। क्योंकि अंत: की कड़ाई में विशेष प्रतिभास आती है। जब किसी पदार्थ का विशेष ग्रहण न करें, आकार ग्रहण न करें उस समय जो सामान्यरूप प्रतिभास होता है वह पदार्थ का नहीं होता है, किंतु वह चित्प्रकाश रूप प्रतिभास होता है। चित्प्रकाश का अवगम―तीसरे लक्षण को तो सीधा ही कहा गया है। आत्माभिमुख चित्प्रकाश को दर्शन कहते हैं। सुनने में ऐसा लगता होगा कि आज कुछ कठिन बोल रहे हैं। आत्मा आत्मा आपने सुना नहीं है क्या ? प्रकाश, चैतन्य, प्रतिभास इन शब्दों को कई बार सुना है और कई प्रकरणों में सुना होगा, किंतु जिसके बारे में कहा जा रहा है उसका ज्ञान हो जाने पर इन शब्दों का अर्थ स्पष्ट आता है और ज्ञान न होने पर कुछ ऐसा लगता है कि कायदे के मुताबिक बात कही जा रही है और क्या कही जा रही है यह ध्यान में नहीं बैठता। जैसे बाहुबली स्वामी की मूर्ति का वर्णन करें कोई जो श्रवणबेलगोला में है कि भाई उनकी अंगुलि इतनी लंबी हैं, अंगूठा इतना बड़ा है, पैर का अंगूठा इतना लंबा है यह समस्त वर्णन वह करता है, किंतु जिसने मूर्ति नहीं देखी है, सुनने वाले यही सोचेंगे कि कायदे से बोला जा रहा है, जिसने मूर्ति देखी है उसे ऐसा लगता है कि उसको कह रहे हैं। इसी तरह कुछ थोड़ा अपने आप पर दयाकर विषयकषायों से मुख मोड़कर कुछ आत्मज्ञान की दिशा में बढ़ें और सत्य का आग्रह करें और असत्य का असहयोग करें। तो यदि एक बार भी अंतर में विराजमान इस ध्रुव प्रभु के दर्शन हो गए तो ये सब बातें समझ में आयेंगी कि उसकी बात कही जा रही है। परिचित के अवगम की विशदता―जैसे कोई पुरूष किसी युवक के बारे में कुछ कह रहा है, जो लोग उस युवक से परिचित नहीं हैं वे तो यों जानेंगे कि यह कहा जा रहा है। और जो युवक से परिचित हैं वह सीधा यों जानता है कि उसकी बात है यह। इसी प्रकार इस ज्ञानदर्शनात्मक चैतन्य तत्त्वार्थ का जिसको दर्शन हुआ है, जिसके उपयोग की भेंट इस प्रभु से हुई है वह कुछ ही शब्द सुनकर यों समझेगा कि बात इस तरह से कही जा रही है। तो स्पष्ट समझने के लिए किसी क्षण ऐसा यत्न तो करें, गद्दी पर बैठे हों तो क्या, खाट में लेटे हों तो क्या, कहीं बैठे हों तो क्या, किसी क्षण तो इंद्रियों को संयत करके सबको असार और बरबादी का हेतु जानकर उनके विकल्प तोड़ करके विश्राम से बैठ जावो, या ऐसी हठ करके बैठ जावो कि जो मेरा सच्चा स्वरूप है उसे यह मैं ही बताऊँगा तो सुनूंगा, मैं दूसरे की न सुनूंगा। क्रांति के दो रूप―भैया ! सत्य का आग्रह करके बैठ जावो। और असत्य भिन्न जो पर हैं उनका पूर्णरूप से असहयोग कर जावो अर्थात् उन्हें अपने मनमंदिर में स्थान मत दो। तो यही है अन्याय को मिटा सकने वाला यथार्थ आंदोलन। इस आत्मा पर क्या अन्याय हो रहा है ? इस अन्याय का मुकाबला करना है तो अपने में क्रांति उत्पन्न करें और उस क्रांति के दो उपाय करें-सत्य का आग्रह और असत्य का असहयोग इन्हीं उपायों से एक बार अपने आत्मप्रभु की झलक हो जाय तो यही सब वचन ऐसे लेगेंगे कि यह अमुक की बात कही जा रही है।

जिस प्रकार ज्ञायक का ज्ञेय के साथ व्यवहार से संबंध है और दर्शक का दृश्य परपदार्थ के साथ व्यवहार से संबंध है, इसी प्रकार इस त्यागी का त्याज्य परपदार्थों के साथ व्यवहार से संबंध है। उस ही व्यवहार का वचन इस गाथा में कहा जा रहा है।


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