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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:समयसार - गाथा 367

From जैनकोष



दंसणणाणचरित्तं किंचि वि णत्थिहु अचेयणे कम्मे।तम्हा किं घादयदे चेदयिदा तम्हि कम्मम्हि।।367।।

उद्दंडता की समस्या―दर्शन, ज्ञान और चारित्र―ये कुछ भी नहीं हैं अचेतन कर्म में। हे आत्मन् ! फिर तू कर्मों से क्या घात करता है, तू उन कर्मों के निमित्त अपना घात क्यों करता है, तू उन कर्मों के घात के हठ पर क्यों तुला हुआ है, उन कर्मों में उलझकर तू अपना घात क्यों कर रहा है ?

कर्म की झाँकी―देखो, ये पौद्​गलिक द्रव्यकर्म अचेतन हैं, सूक्ष्मस्कंध है। कोई ऐसा सूक्ष्म मूर्तिक वातावरण है कि जिस विजातीय परद्रव्य का निमित्त पाकर यह जीव उल्टा–उल्टा चल रहा है। कोई भला लड़का कल तक तो ठीक था और आज ही एकदम उद्दंड हो गया तो समझ लेना चाहिए कि किसी उद्दंड लड़के ने बहका दिया है। यह ज्ञानमात्र आत्मदेव जिसका स्वभाव शुद्ध स्वच्छ जाननमात्र है, किंतु यह विपरीत चल रहा है तो जानना चाहिए कि कोई विजातीय परद्रव्य का संसर्ग है, जिसके निमित्त से यह अपनी उल्टी चाल से चल रहा है। यह जीव जब कषाय भाव से परिणत होता है तो कर्म बनने के योग्य जो कार्माणवर्गणाएं हैं, उनका बंधन होता है और उसी समय उन स्कंधों में प्रकृति पड़ जाती है। प्रदेश तो उनमें है ही और फलदान शक्ति का निमित्तपना भी निश्चित हो जाता है। ये सब उसके एक साथ हो जाते हैं। कर्मस्वरूप निरूपण में भोजन परिणमन का एक दृष्टांत―जैसे अपन भोजन करते हैं तो भोजन करने पर भोजन का जितना स्कंध है, प्रमाण है, उसका संबंध हुआ और उसमें प्रकृति भी पड़ जाती है कि भोजन का यह अंश खून बनेगा, यह अंश पसीना बनेगा। पसीना दो घंटे तक रहेगा, खून दो-चार वर्ष तक रहेगा, यह मांस 10-20 वर्ष तक रहेगा, यह हड्डी 50-60 वर्ष तक रहेगी―ऐसी उसमें स्थिति भी पड़ जाती है और अनुभाग भी उसमें बन जाता है। खून इतनी शक्ति वाला है, पसीना सबसे कम शक्ति वाला है और-और धातु अमुक-अमुक अनुभाग वाली हैं-ऐसा उस में अनुभाग भी पड़ जाता है। ऐसा ही जिन कार्माणस्कंधों का बंध होता है, उसमें प्रकृति पड़ जाती है कि ये कर्म ज्ञान नहीं होने देंगे, ये कर्म सुख-दुःख के कारण बनेंगे। स्थिति पड़ जाती है कि यह कर्म इतने वर्ष रहेगा। वर्षों तक क्या, साग़रों रहा करता है अज्ञानियों के और उनमें अनुभाग भी पड़ जाता है। यह इतने दर्जे तक फल देने में निमित्त होगा, यों ये अचेतन कर्म हैं। हे आत्मन् ! इन कर्मों में उलझकर तू क्यों अपना घात करता है ?

पर में व्यर्थ का उद्यम विकल्प―ज्ञान, दर्शन और चारित्र अचेतन विषयों में नहीं हैं। यह बताने का प्रयोजन यह है कि हे मुमुक्षु जीव ! तू दर्शन, ज्ञान, चारित्र के विकार का विनाश करना चाहता है ना तो तू परद्रव्यों में कुछ विनाश करने की मत सोच। परद्रव्यों में दर्शन, ज्ञान, चारित्र के विकार नहीं हुआ करते है। जीवों को भ्रांति इन तीनों जगह है अपने सुधार और बिगाड़ में―विषय में, कर्म में और देह में। सो इनमें संहार उद्धार का विकल्प करके यह मोही अपना संहार कर रहा है। विषयों में भ्रांति का कारण―विषयों में यों भ्रांति हो गई है कि रागद्वेष परिणाम जो उत्पन्न होते है, वे किसी परविषयक विकल्प करते हुए होते हैं। जिन परद्रव्यों का आश्रय करके ये रागादिक भाव होते है, उन विषयों में अज्ञानी जनों को यह भ्रांति हो गई है कि ये विकार इन विषयों से उत्पन्न हुए हैं और जब अपने विकार का विनाश करने के लिए धर्मबुद्धि करता है तो इस भ्रांति के कारण परद्रव्यों में घात, त्याग, विकल्प करना चाहता है।

कर्मों में भ्रांति का कारण―कर्मों में अपने विकार की भ्रांति इसलिए हो गई है कि चूंकि कर्मों का उदय आदि का निमित्त पाकर ये विकार हुआ करते है। इस कारण इनको उन कर्मों में यह भ्रांति होती है कि ये विकार कर्मों से हुआ करते है। कभी आत्मा के शुद्ध सहजस्वरूप का वर्णन सुन लिया तो भ्रांति के उपादान वाले जीवों को फिर यह भ्रांति होती है कि रागद्वेष तो कर्मों की ही चीज हैं, कर्मों में ही होते हैं। सो कर्मों का घात करना चाहिए अथवा खूब चद्दर तानकर सोना। फिक्र क्या है ? रागद्वेष तो कर्म में होते हैं। इस प्रकरण के बताने का प्रयोजन यह है कि ये विकार रागद्वेषादिक जब तक उदित होते हैं, तब तक ज्ञान ज्ञानरूप नहीं होता और ज्ञेय को ज्ञेयरूप नहीं रहने दिया जाता। जैसे कोई पुरूष किसी भ्रम में आकर अपना बड़ा नुकसान कर रहा हो तो उसे देखकर लोग यह कहते हैं कि बेचारा क्या करे, भ्रम होने की बात तो थी ही ? इसी तरह अज्ञानी जनों को अपना कर उनकी बात देखी जाए तो यह कहा जाएगा कि ये बेचारे भोले प्राणी क्या करें, भ्रम के लायक तो उनकी बात ही थी। जरा और बढ़ गए, भ्रम पक्का बना लिया। भ्रम के लायक बात यों थी कि रागद्वेष के निमित्तभूत कर्म भी ऐसी अपनी बड़ी तैयारी के साथ परिणमना करके कि देखो जब कर्म आता है तो प्रदेशबंध हो जाता है और उसी समय उन प्रदेशों में प्रकृतिबंध हो जाता है। इतना प्रदेश सुख-दुःख के उत्पन्न करने में इतने ज्ञान का आवरण आदि में निमित्त होगा। ऐसा विभाग बन जाता है, उनकी स्थितियाँ बन जाती है। ये स्कंध इतने सागर तक रहेंगे और उनमें अनुभाग बन जाते है―ऐसी जो विकट तैयारी से परिणमे और कर्म उदय में आए, उसमें यह विचार करेंगे कि कुछ भ्रम में पड़ गया और भ्रम बढ़ा लिया। अपना बिगाड़ कर लिया तो क्या करे बेचारा ? यों देखा जा सकता है उन अज्ञानी जनों को कुछ अपने बंधुत्व का नाता रखकर।

प्रज्ञापूर्ण दृष्टि में विकार की निराधारता―भैया ! अपनी प्रज्ञापूर्ण बात तो यह है कि जो अवस्था जिस वस्तु में पाई जाती है, उस वस्तु में उसको तकें। ये रागद्वेष आत्मा में पाये जाते हैं। आत्मा में दर्शन, चारित्र के विकार हैं उसमें देखो जरा और विवेक करो तो ये रागद्वेष कहीं नहीं पाये जाते हैं―न आत्मा में पाये जाते हैं, न कर्मों में पाये जाते हैं। जैसे दर्पण में परपदार्थ का जो प्रतिबिंब हो गया है, वह प्रतिबिंब किसका है ? अनभिज्ञतापूर्ण जवाब तो यह है कि परपदार्थ का है और कुछ थोड़े विवेक का जवाब यह है कि दर्पण का है और सूक्ष्मदृष्टि वाले पुरूष का जवाब यह है कि प्रतिबिंब कहीं है ही नहीं, न दर्पण में है, न परपदार्थ में है, परंतु उस काल ऐसा ही योग मिला। निमित्त सन्निधान है कि यह दर्पण में यह बिंब झलक बैठा। कर्मों के आस्रव के साक्षात् कारण के संबंध में विचार―कर्म के आस्रव का साक्षात् कारण क्या है ? निमित्त की बात कह रहे हैं। जो नवीन कर्म आस्रव को प्राप्त होते हैं, उनका साक्षात् निमित्त क्या है ? क्या रागद्वेष परिणाम है ? रागद्वेष परिणाम नवीन कर्मों के आस्रव के साक्षात् कारण नहीं हैं, किंतु नवीन कर्मों के साक्षात् निमित्त हैं उदयागत पुद्​गल। उदय में आये हुए कर्म नवीन कर्मों के आस्रव के साक्षात् निमित्तभूत हैं। बात कुछ नई सी लगेगी, पर यह बात सिद्धांत में लिखी है। बहुत सूक्ष्म बात होने से सिद्धांत में हर एक जगह नहीं लिखा है। हर जगह यही देखने को मिलेगा कि रागद्वेष भावों का निमित्त पाकर नवीन कर्मों का आस्रव होता है, किंतु वहां बिल्कुल यथार्थ बात यह है कि उदय में आये हुए पुद्​गल कर्म का निमित्त पाकर नवीन कर्मों का आस्रव होता है और उदय में आये हुए कर्मों में नवीन कर्मों के आस्रव का निमित्तपना आ सके, इस बात के लिए निमित्त होता है रागद्वेष भाव। तब नवीन कर्म के आस्रव के निमित्तभूत उदयागत पुद्​गल कर्मों में निमित्तत्व के निमित्तभूत रागद्वेष परिणाम में उपचार से सीधा यों कहा जाता है कि रागद्वेष भाव का निमित्त पाकर नवीन कर्मों का आस्रवण हुआ। दृष्टांतपूर्वक निमित्तत्व के निमित्त होने का स्पष्टीकरण―अच्छा अब एक मोटी बात लो-एक आदमी अपने पालतू कुत्ते के साथ जा रहा था। दूसरा पुरूष जो इस कुत्ते वाले का अनिष्ट था, उसके प्रति मालिक ने कुत्ते को सैन कर दी छू-छू, वह कुत्ता उस पर झपट पड़ा। अब यह बतावो कि उस अनिष्ट पुरूष पर साक्षात् आक्रमण किसने किया ? साक्षात् आक्रमण कुत्ते ने किया और कुत्ते में आक्रमण करने की दम आई, ऐसी सैन किसकी मिली ? मालिक की। जैसे मालिक की सैन पाकर कुत्ते में आक्रमण करने का बल हो जाता है, इसी प्रकार रागद्वेष परिणाम की सैन पाकर उदयागत पुद्​गल कर्मों में नवीन कर्मों के आस्रव का निमित्तपना आ जाता है। इस संबंध में समयसार के आस्रवाधिकार की प्रथम गाथावों को देखने और उन पर ऊहापोह करने से इसकी झलक मिलेगी। तब ऐसा है कि नवीन कर्मों के उदय का निमित्त पुद्​गल कर्म है। तो यह कहना चाहिये कि कर्मोदय होने से नवीन कर्मों का आस्रव होता है, किंतु कर्मोदय में नवीन कर्मों का आस्रव का निमित्तपना आये, इसके लिए निमित्त है रागद्वेष परिणाम। तब यह कहा जाएगा कि केवल उदय से कर्म का आस्रव नहीं होता, किंतु रागद्वेष हो तो आस्रव होता है। कर्मोदय होने पर भी बंध न होने के वर्णन का प्रथम रहस्य―जयसेनाचार्यजी की टीका में जहां यह वर्णन आया है कि उदयमात्र से कर्मबंध नहीं होता है, यदि कर्मोदय मात्र से बंध होता है तो फिर मुक्ति का अभाव हो जाएगा। उस शब्द के दो-तीन अर्थ निकलते है, केवल एक ही भाव नहीं है। एक तो रहस्यभूत यह बात है कि चूंकि नवीन कर्मों के बंध में निमित्त कर्मोदय है और कर्मोदय में नवीन कर्मों के बंध का निमित्तपना आ सके, इसके लिए निमित्त होता है रागद्वेष परिणाम। तब यही बात निकली ना कि रागद्वेष परिणाम हो तो कर्मों का बंध होता है। केवल उदयमात्र कर्मों का बंध नहीं होता है, पहिला भाव तो यह लगाना। कर्मोदय होने पर भी बंध न होने के वर्णन का द्वितीय रहस्य―दूसरा भाव यह लगाना कि जहां निमित्तभूत विभाव का अत्यंत जघन्य भाव प्राप्त है, ऐसे दसवें गुणस्थान में जहां सूक्ष्म दृष्टिगत स्पर्द्धकों का उदय है और सूक्ष्मदृष्टि से लोभकषाय का परिणमन है, उस जगह कर्मों का उदय है, फिर भी कर्मों के बंध का कारण नहीं हो रहा है, इसलिए कर्म के उदयमात्र से बंध नहीं होता। कर्मोदय होने पर भी बंध न होने के वर्णन का तृतीय रहस्य की भूमिका―तीसरा भाव यह लेना कि कर्मों के उदय का आना दो प्रकार से देखा जाता है। एक उदयावाली में वे स्पर्धक आ गए, इसका भी नाम उदय है और उदयावली होती है असंख्यात समयों की, उन असंख्यात समयों में जो निषेक है, जहां एक समय में उदय को प्राप्त होता है, उस एक समय में आने का नाम उदय है। जैसे कर्मों की विचित्र अवस्था हुआ करती है, इन दोनों में परस्पर निमित्तनैमित्तिक संबंध है। जहां नाना प्रकार के विभाव हों, वहां कर्मों की अवस्था निमित्त है। कर्मों की नाना दशाएँ बनाने में जीव के परिणाम निमित्त हैं। इस जीव के जो एक समय में कर्मबंध हुआ, जितनी स्थिति को लेकर उसमें से अबाधाकाल को छोड़कर शेष स्थानों में निषेक पसर जाते हैं और वे निर्णीत हो जाते हैं एक समय में बँधें हुए कर्मों से। जैसे कि मानों हज़ारों वर्षों तक उदय रहता है। तो पहिले समय में उस समयप्रबद्ध में से जितने परमाणु उदय में प्राप्त होंगे, उससे कम दूसरे समय में, उससे कम तीसरे समय में, इस तरह कम-कम चलते-चलते अंत में हजारवें वर्ष के आखिरी समय में उस समय के बाँधे हुए कर्मवर्गणावों में अत्यंत कम प्रमाण में कर्म परमाणु उदय में मिलेंगे, किंतु अनुभाग का हिसाब इससे उल्टा है। जहां बहुत से परमाणुवों का उदय है, वहां अनुभाग शक्ति कम है और अगले-अगले समय में अनुभागशक्ति विशेष बढ़ी हुई है और अंत में जो खिरेगा, उसमें अनुभागशक्ति विशेष है।

समयप्रबद्ध का निषेक विस्तार―जैसे मानों पहिले मिनट में बंध हुआ, कर्मों का उसका फैलाव हुआ एक हजार वर्ष तक में, तो दूसरे मिनट में बंध हुए कर्म का उसी तरह फैलाव हुआ, तीसरे मिनट में भी बँधें हुए कर्म का इसी तरह फैलाव हुआ तो समझो कि एक समय में जितने निषेकों का उदय आता है। वह हज़ारों, लाखों, करोड़ों, अरबों साल पहिले के बँधें हुए कर्मों के बहुत वर्षों के बँधें हुए कर्मों के हिसाब से आए हुए एक समय में उदय होता है। तब उनकी इस अनुकृष्टि रचना से जैसा अनुभाग जिस समय में जैसे अनुभाग का लिए हुए कर्मों का उदय होता है। ऐसी दशा में किसी समय कर्म भार थोड़ा उदित है, किसी समय अधिक उदित है ऐसा विचित्र कर्मभार कर्मों की ही वजह से उनके ही सत्त्व और अनुभाग के बँटवारे के कारण हीनाधिक शक्तिवाला कर्म उदय में आता है। यह तो है कर्मों की दशा और यहां जीव के विभावों की भी ऐसी विचित्र दशा है कि प्रथम तो जैसा कर्मों का उदय हुआ―कभी मंद, कभी तीव्र, अनुभाग वाला, उस प्रकार वहां परिणमन हुआ और फिर भी भावस्थान अनंतगुणे हैं, उदयस्थान, भावस्थान से कम है।

उदयस्थानों से भावस्थानों की अधिकता―जैसे 1-1 पैसा मिलकर एक आना हुआ और एक-एक आना मिलकर 16 आने हुए, तब जाकर रूपया बना। फिर इसके बाद एक एक पैसा मिलाया तो एक आना हुआ और उससे एक-एक आना मिलाया तो 16 आने हुए, तब जाकर 1 रू हुआ। इस तरह से आप लगाते जावो तो रूपये का स्थान कम रहा और पैसों का स्थान अधिक रहा। जब जाकर 64 पैसे हुए तब 1 रूपये का स्थान हुआ। तो जैसे रूपये का स्थान कम है पैसे का स्थान अधिक है इसी तरह उदय स्थान कम होता है और भावस्थान अधिक होता है। उदय स्थान में जो एक यूनिट है, उदयस्थान का एकत्व है जो एक उदय स्थान में अनगिनते भावस्थान पड़े हुए हैं तब द्रव्य, क्षेत्र, काल, भाव के अनुसार वहां यह अवसर है कि एक उदयस्थान के होते हुए भी उसमें जितने भावस्थान गर्भित हैं उनमें से जघन्य भावस्थान बनाया मध्यम भावस्थान बना या उत्कृष्ट भावस्थान बना। ऐसे दोनों निमित्तों में जीवभाव और कर्मदशा दोनों निमित्तों में इस तरह का संतुलन और असंतुलन होने के कारण कभी कभी विचित्र विचित्र घटनाएं बन जाती हैं। स्तिबुक संक्रमण―इस प्रक्रिया में चलते हुए कोई ऐसी भी घटना बनती है कि उस जाति के स्पर्द्धक उदयावली में आए पर जैसे कोई जवान, शत्रु के सिर पर चढ़ आने पर भी सावधानी वर्त सकता है इसी प्रकार कोई ज्ञानी उदयावली में कर्मों के आने पर भी सावधानी वर्त सकता है। ऐसा साहस ज्ञानी में पड़ा हुआ है। और इस सावधानी के प्रताप से विशुद्ध परिणामों का निमित्त पाकर उदयक्षण से पहिले उदयावली में आये हुए भी कर्म संक्रमण को प्राप्त हो जाते हैं। इसका नाम करणानुयोग में है-स्तिबुक संक्रमण। भवस्थितिवश संक्रमण―कितने ही स्तिबुक संक्रमण तो इस जीव की परिस्थिति वश हुआ करते हैं। जैसे इस समय हम और आप मनुष्य हैं, भोग में आ रहा है मनुष्यगति का उदय और उदयावली में चल रहे हैं चारों गतियों के उदय। हम और आपकी बात है यह। हम और आपके नरकगति का भी उदय आ रहा होगा, तिर्यंच गति का भी उदय आ रहा होगा, देवगति का भी उदय आ रहा होगा और मनुष्यगति का तो उदय स्पष्ट ही है। लेकिन द्रव्य, क्षेत्र, काल, भाव की परिस्थितिवश वे तीन गति के उदय उदयावली में आकर भी उदय क्षण से पहिले मनुष्यगतिरूप संक्रमण करके ये खिर जाया करते हैं। तो कोई ऐसा स्तिबुक संक्रमण सेनापति जैसा शासन कहीं तो परिस्थितिवश होता है और कहीं ज्ञानबल के वश होता है, इतना अंतर है। ज्ञानसाध्य संक्रमण―इन सब मनुष्यों की परिस्थितिवश हो रहा है ऐसा अन्यगतियों का संक्रमण और ज्ञानी संत पुरूषों के ज्ञानबल से कषायादिक प्रकृतियों का संक्रमण ऐसा हो जाया करता है। यदि उस स्थिति को देखो तो उदयावली में कर्म आए इसलिए उदय कहलाया, पर उदय में आकर भी कर्म के आस्रव करने का निमित्त नहीं बन सका वह उदयागत कर्म। इस कारण यह बात यथार्थ है कि केवल उदय में आने से कर्मों का आस्रव नहीं होता, किंतु रागद्वेष परिणाम हों तो आस्रव होता है। विभावों में निमित्तनैमित्तिकता–एक विशेषता और है। चेतन अचेतन पदार्थों का परस्पर में निमित्तनैमित्तिक भाव प्रतिबंधक का अभाव रहे तो अनुरूप कार्य होना अटल है। जैसे चूल्हा जल रहा है, चूल्हे पर पानी भरी बटलोही रख दी, अब यहां माला रखकर जपते जावो कि हे भगवान पानी न गरम हो, पानी न गरम हो तो इससे वहां कुछ भी असर नहीं है। वहां चेतन अचेतन का परस्पर में निमित्तनैमित्तिक चल रहा है। इसी तरह अचेतक श्रद्धागुण में, अचेतक चारित्रगुण में अचेतक कर्मों का निमित्तनैमित्तिक चल रहा है। वहां प्रतिबंधक है ज्ञानबल। प्रतिबंधक ज्ञानबल के अभाव में वह निमित्तनैमित्तिक भाव बनना एकदम आम खुली बात है। हां प्रतिबंधक ज्ञानबल आगे आ जायेगा तो उदयक्षण से एक समय पहिले वे मिटा भी दिये जा सकते हैं। इस तरह कर्म का और चेतन का युद्ध चलता है। ज्ञानीपुरूष इस युद्ध में सफल हो जाते हैं, अज्ञानीजन इस युद्ध में हार जाते हैं, और संसार के जन्म मरण के चक्कर बढ़ाते रहते हैं। घनिष्ट संपर्क होने पर भी कर्म में आत्मगुण का अत्यंत अभाव―कर्मों का आत्मपरिणमन के साथ एक निमित्तनैमित्तिक रूप में घनिष्ट संबंध है और इसी कारण अनेक पुरूषों ने ये इन विभाव परिणमनों को इस तरह देखा है कि जैसे मानो सर्व नाच ये कर्म ही कर रहे हैं और यह आत्मा तो केवल उनके कृत्यों को अपना रहा है। यहां तक भी अनेक पुरूषों की दृष्टि चली जाती है। ऐसे भी घनिष्ट संबंध वाले कर्मों में हे आत्मन् ! तेरे दर्शन ज्ञान और चारित्र नहीं हैं, फिर उन अचेतन कर्मों में तू क्या घात करता है ? इस प्रकार कर्मों के संग्रह विग्रह आकर्षण दृष्टि गुणगान आदिक श्रमों को दूर करके अब अचेतन शरीर के संबंध में कहा जा रहा है।


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