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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:समयसार - गाथा 369

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ण वि तहिं पुग्गलदव्वस्स कोऽवि घाओ उ णिद्दिट्ठो।।369।।जीवस्स जे गुणा केई णत्थि खलु ते परेसु दव्वेसु।तम्हा सम्माइट्ठिस्स णत्थि रागो उ विसयेसु।।370।।रागो दोसो मोहो जीवस्सेव य अणण्णपरिणामा।एदेण कारणेण हु सद्दादिसु णत्थि रागादी।।371।।

चित्तस्थ विकार के त्याग का उपदेश―भगवान सर्वज्ञदेव ने ज्ञान, दर्शन और चारित्र का घात बताया है। शब्दादिक इंद्रिय के विषयों की अभिलाषा रूप से और शरीर में ममत्व के रूप से कर्म बंधो के निमित्त जो अनेक प्रकार के कषाय जगते हैं, मन में मिथ्याज्ञान भरा रहता है उस मिथ्याज्ञान का स्वरूप संभाल के द्वारा, निर्विकल्प समाधिभाव के प्रहार के द्वारा घात करना सर्वज्ञदेव ने बताया है कि तू अपने आपमें बनते हुए मिथ्यादर्शन, मिथ्याज्ञान, मिथ्याचारित्र का घात करो। अचेतन विषयों में, अचेतन कर्मों में, अचेतन शरीरों में किन्हीं भी पुद्​गलद्रव्यों में कोई घात करने का हुक्म नहीं दिया है।

अभिन्न आधार आधेय में एक के घात से दूसरे का घात―देखो जिस जगह जो बात होती है, उसका घात होने पर वह दूसरा भी घत जाता है। जैसे दीपक में प्रकाश होता है तो दीपक का विनाश कर देने से प्रकाश का भी विनाश हो जाता है या जो जहां होता है, उसका नाश होने पर उस दूसरे का भी विनाश हो जाता है। जैसे प्रकाश मिट जाए तो दीपक भी मिट गया, किंतु जो बात जहां नहीं होती है, वहां उसका घात होने पर भी आधारभूत वस्तु का घात नहीं होता है, जैसे घटप्रदीप। पहिले जमाने में मिट्टी का एक घरबूला बनाया जाता था, उसमें दिया रखा जाता है। उस घरबूले में दिया प्रकाश फैलाता हैं, उसका नाम घटप्रदीप है। जैसे लालटेन है, यह तो शोधित अविष्कार है और पहिले समय में मिट्टी का ही घरबूला बनाया जाता था याने छोटा सा लालटेन जैसा, उसमें दिया रखा जाता था। अब तो वैसा दिया काम में आता नहीं है। वह दिया बुझ जाने पर घरबूला तो नहीं मिट जाता हैं या दृष्टांत में लालटेन ले लो। लालटेन की दिया को ज्योति का नाम दिया है। तो दिया के बुझ जाने पर क्या लालटेन खत्म हो जाती है ? नहीं। वह तो बनी ही रहती है, क्योंकि ज्योति उस लालटेन में नहीं है। वास्तव में जो जिसमें नहीं होता है, उसका घात होने पर दूसरे का घात नहीं होता है। जैसे वह घरबूला कहीं थोड़ा सा टूट जाए तो कहीं दीपक नहीं टूट जाता।

भिन्न वस्तुवों में एक के घात से दूसरे का घात असंभव―भैया ! जो बात जहां नहीं है, उसके मिटने पर दूसरे का घात कैसे होगा ? जीव के कोई भी गुण परद्रव्य में नहीं होता है, फिर किसी परद्रव्य के घात होने पर जीव के गुणों का घात कैसे होगा या जीव के गुणों का घात होने पर किसी परद्रव्य का घात कैसे होगा ? किसी बच्चे को फुसला लें यह बात अलग है। जैसे खंभे से बच्चे का सिर टकरा गया तो मां उस खंभे को पीटती है और कहती है कि तूने हमारे राजा भैया को मारा है, जिससे वह बच्चा चुप हो जाता है कि हमारी मां ने इसे खूब सजा दी है, दंड दिया है। इस प्रकार बच्चे को भले ही बहका दिया जाए, पर किसी परद्रव्य के घात करने से आत्मा के विकारों का घात नहीं हो जाता। जैसे बताते हैं कि सूरदास ने अपनी आंखों में सूई चुभो ली थी और अंधे बन गए थे। क्या आंखें जो परद्रव्य हैं, उनके घात कर देने से आत्मा के विकारों का भी घात हो जाता है ? विकारों का घात आंखें फोड़ने से नहीं होगा, बल्कि ज्ञानबल से होगा। रागद्वेषरहित परिणाम से विकारों का विलय होगा।

परद्रव्य के घात से कषायों के घात का अभाव―कभी कोई लड़ाई हो गई पुरूष व स्त्री में या सास व बहू में या देवरानी व जेठानी में। उनमें किसी के हाथ में घी का डब्बा हो और जब गुस्सा न संभला तो उस घी से भरे हुए डब्बे को पटक दिया। डब्बा फूट गया और घी बह गया। क्या उस घी के बह जाने से अथवा डब्बे के फूट जाने से क्रोध भी खत्म हो जाएगा ? नहीं, अभी क्रोध नहीं जाएगा। अपनी संभाल के लिए परद्रव्यों के संग्रह-विग्रह पर दृष्टि न रखें, अपने मन में जो रागभाव ठहर रहा है उसका घात करें।

सम्यग्दृष्टि के विषयराग न होने का कारण--पुद्​गलद्रव्य का और जीवद्रव्य का परस्पर में संबंध नहीं है, एक दूसरे का आपस में अत्यंताभाव है। जीव के कोई भी गुण शब्दादिक परविषयों में नहीं है, इस कारण सम्यग्दृष्टि जीव के विषयों में राग नहीं होता है। यदि जीव के गुण पुद्​गल में होते अथवा पुद्​गल के गुण जीव में होते तो जीवद्रव्य का घात होने से पुद्​गल के गुण का घात होता और पुद्​गलद्रव्य का घात होने से जीव के गुण का घात होता, किंतु ऐसा तो है ही नहीं। प्रत्येक द्रव्य का अपने आपके अपने आपका उत्पादव्यय होता है।

परमार्थदृष्टि में राग का असद्​भाव―जब ऐसी वस्तुस्थिति है कि अपने आप में ही अपनी सब बात है तो फिर क्यों सम्यग्दृष्टि पुरूष का विषयों में राग होता है ? एक यह भी प्रश्न है कि क्यों होता है सम्यग्दृष्टि जीव के विषयों में राग ? उत्तर देते है कि किसी भी कारण से नहीं हो रहा है। लोग कहते हैं कि होता है सम्यग्दृष्टि पुरूष के राग। क्योंकि राग है कहां ? रागद्वेष तो मोही जीवों के अज्ञान के परिणमन हैं, कल्पनावों की बातें हैं। वस्तुत: वे रागद्वेष कहीं नहीं होते हैं। विषय तो परद्रव्य है। विषयों में तो राग होता नहीं है और सम्यग्दृष्टि के अज्ञान का अभाव है तथा राग को अज्ञानी ही सम्मानित करते हैं। राग का आधार न तो अब जीव रहा, क्योंकि अज्ञान मिट गया। विषय तो हैं ही नहीं, इसलिए विषयों में वे होते नहीं हैं। सम्यग्दृष्टि होते नहीं, इसलिए ये रागादिक होते नहीं हैं। यह किस प्रसंग की बात चल रही है ? जो जीव ज्ञानमात्रभाव में रूचि रखता है और ज्ञानमात्रभाव में ही लीन रहने का उत्साह बनाए हुए हैं, लीन भी हुआ करता है-ऐसे ज्ञानी पुरूष के राग नहीं होता है और यदि होता है तो जैसे दिलफटे लोगों की दोस्ती। यों ही उसका अंतर में स्थान नहीं है। इस तरह राग असहाय, निराधार, जबरदस्ती के उदय की प्रेरणा के कारण हो रहा है, उसे ज्ञानीजीव अपनाता नहीं है।

औपाधिक जाल की वास्तविकता का अभाव―भैया ! ज्ञान ही शांतरूप से परिणमन करता है और ज्ञान ही अज्ञान के अभाव से रागद्वेषरूप उपस्थित होता है। वस्तुस्वरूप में दृष्टि लगाकर देखो तो दिखने वाले ये रागद्वेष कुछ नहीं हैं। जैसे बढ़े कोपरा में पानी रखा हो, रात्रि के समय चाँदनी छिटक रही हो। उस कोपरा में चंद्रमा का प्रतिबिंब बन रहा हो तो बच्चे उस प्रतिबिंब को चंदा मामा ही कहते है। अब उसको देखकर बच्चे उसे पकड़ना चाहते हैं, उससे मिलना चाहते हैं। क्या वे मिल लेंगे, उसे पकड़ लेंगे ? नहीं। क्यों नहीं ? क्योंकि वस्तुस्वरूप में दृष्टि लगाकर देखो तो वहां वह चीज नहीं है। जिसे बालक पकड़ना चाहता है, उस पानी में तो चंदा है नहीं और आसमान में जो चंदा है, उसमें भी यह चंदा मामा नहीं है। जो चंदा कोपरा में दिख रहा है, वह कहीं नहीं है, केवल वह एक माया प्रतिबिंब है अर्थात् औपाधिक परिणमन है, किसी भी एक वस्तु में नहीं पाया जाता है। केवल वस्तुस्वरूप को देखने वाले यह भी कहेंगे कि रागादिक है ही नहीं। जो निज शुद्ध आत्मा की भावना से उत्पन्न हुए सुख में तृप्त है-ऐसे सम्यग्दृष्टि जीव के विषयों में राग नहीं होता है। ज्ञानसंवेदन के अभाव में ही रागद्वेष का उदय―राग, द्वेष, मोह परिणाम तो अज्ञानी जीव के अशुद्ध निश्चय से अभिन्न परिणाम हैं। वे विषयों में कहां जायेंगे ? इस कारण चाहे मनोज्ञ विषय हो, चाहे अमनोज्ञ विषय हो, सर्व प्रकार के अचेतन विषयों में अज्ञानी जीव भ्रांति से भले ही रागादिक को आरोपित करे किंतु शब्दादिक में रागादिक नहीं होते हैं क्योंकि शब्दादिक अचेतन हैं, इस कारण यही सिद्ध हुआ कि राग और द्वेष ये दोनों तब तक प्रेरित होते हैं जब तक स्वसम्वेदन ज्ञान इस जीव के नहीं होता। ज्ञानी जीव अर्थात् जहां सम्यक्त्व उत्पन्न हो गया है ऐसा जीव भी जब अपने ज्ञान सम्वेदन के उपयोग से च्युत है तब भी रागद्वेष होते हैं। पर श्रद्धा और प्रतीति में इस जीव के रागद्वेष नहीं है, ऐसी ज्ञानी को दृढ़ श्रद्धा होती हैं। तत्त्वदृष्टि से देखकर हे भव्यपुरूषों ! इन रागादिकों का क्षय करो।

व्यर्थ की परेशानी―अहो व्यर्थ परेशान हैं यह जीवलोक इन रागादिक कल्पनाओं के कारण। रागादिक कल्पनाओं की आफत में कुछ प्रयत्न किया, उसके पश्चात् फिर यह रीता का रीता ही मिलता है। इसके साथ कोई शरण नहीं रहता है, कैसी विचित्र लीला है, कैसी तरंगें उठती हैं ? इसको इंद्रजाल बोलते हैं। इंद्र अर्थात् आत्मा, उसका जाल है यह । अथवा जैसे इंद्रजाल वास्तविक मायने में कुछ नहीं है, देखते हैं तो दिखता है, इतना तो सही है ना, पर है नहीं वहां ऐसा, इसलिए इंद्रजाल कहलाता है। ये रागद्वेषादिक कल्पनाएं इंद्रजाल हैं। बिल्कुल व्यर्थ का काम है, जिसमें जीव का कोई हित नहीं दिखता है। किंतु जैसे स्वप्न में देखी हुई बात को झूठ नहीं माना जा सकता, वह तो सच ही मानते हैं, इस ही प्रकार इस अज्ञान कल्पना से देखी हुई बात को यह झूठ नहीं मान सकता है। मेरा ही है यह सब प्रयोजन, मेरा ही है यह सब वैभव। मुझे इसमें ही सुख है। कैसा व्यर्थ का अज्ञान छाया हुआ है। अज्ञान की कुश्ती में लड़भिड़ने के बाद अंत में पछतावा ही रह जाता है। सुगम और स्वाधीन हितोपाय न कर सकने का विषाद―हे ज्ञानमय आत्मावों ! ज्ञान तो तुम्हारा स्वरूप ही है। इस ज्ञानस्वरूप की ओर दृष्टि क्यों नहीं दी जा रही है ? जैसे बूढ़े की एक खांसी की आवाज में ही जब चोर भाग सकते है ? और फिर भी बूढ़ा खांसने का भी साहस न करे और आंखों देखे, चीजें लूट जाने दे तो इससे बड़ी विपदा की बात और क्या है ? जब हमारा रक्षक प्रभु हमारे अत्यंत निकट है, कुछ थोड़ा सरकना भी नहीं है ऐसे आत्मतत्त्व की ओर ज्ञानस्वरूप की ओर दृष्टि करने मात्र से जब सारे संकट टल सकते हैं और फिर भी इतना सुगम स्वाधीन काम न किया जा सके और आंखों देखे, अपनी समझ में भी है और फिर भी अपना ज्ञान और आनंद धन लुटाए चले जा रहे हैं इन विषय चोरों के हाथ तो इससे बढ़कर और विषाद की बात क्या होगी इस मनुष्य पर्याय में ?

अब गंवाने लायक समय कहां―भैया ! अब इतना कहां समय है कि और देख लें थोड़ा कुछ, इन परिग्रह विषयों में कुछ मिल जाय थोड़ा बहुत, तो अब समय गंवाने के लायक समय कहां है ? प्रथम तो इस मनुष्य भव के ये 40-60-80 वर्ष इस अनंत काल के समक्ष गिनती ही क्या रखते हैं और फिर लूट पिट कर आधा समय मान लो खो दिया है, बाकी बचे खुचे समय का भी सदुपयोग करने का साहस नहीं जगता है। काल के प्रेरे चाहे यों जबरदस्ती वहां से हट जायें पर अपने आपकी ओर से कुछ भी हटना नहीं चाहता। लड़के समर्थ हो गए, पोते समर्थ हो गए और फिर भी चूंकि खुद के लड़के होना बंद हो जायें तो लड़के पोतों के तो होंगे। यह मोह बनाए हुए चले जा रहे हैं। रंच भी निवृत्त नहीं होते। अंतर में क्लेश है कहां―हे ज्ञानी पुरूषों ! तुम किसी के आधीन नहीं हो, केवल अज्ञान भाव में उठ रहे अपने आपके इंद्रजाल के आधीन हो। जो कि व्यर्थ हैं और अंत में जिसके प्रसंग में रहता भी कुछ नहीं है, ऐसे इंद्रजाल के आधीन होकर अपने उस वैभव को जो परमात्मा के समकक्ष ही लुटाये जा रहे हैं। अपने अंतर में प्रकाशमान सहज ज्ञानज्योति को तो देखो, जिसकी किरणें पूर्ण हैं, अचल हैं। यहां तो कुछ भी गरीबी नहीं है, पर गरीब मान रखा है पूरा। यहां तो कुछ भी क्लेश नहीं है, बड़ा साफ स्वच्छ मैदान पड़ा हुआ है। पर क्लेश का पहाड़ अपने पर मान रखा है। यहां तो रंच भी मलिनता नहीं है। पर अपनी व्यक्ति में ऐसा मलिन बन रहे हैं कि प्रत्यय भी नहीं करते कि मैं सहज ज्ञानस्वरूप हूँ। ये रागद्वेष तब तक ही उदित हो रहे हैं अपने आपमें जब तक यह ज्ञानी आत्मा अपने आपको ज्ञानमात्र अनुभवने में न लग सके। विषय की खोज में उत्तम अवसर का दुरूपयोग―अहा; इतनी बात भीतर में मानने में कितना कष्ट हो रहा है कि मैं अमूर्त ज्ञानमात्र हूँ। जैसा है तैसा मानने में भी संकट छा रहे हैं और जो अपना नहीं है, असार है, भिन्न है, अचेतन है, उन सबसे इतना अधिक मोह कर रहा है कि जिसके कारण लोक में भी विवाद, विपत्तियां, अपमान और अनेक विडंबनाएँ हो जाती हैं। जैसे कोई खुजैला, अंधा, गरीब तीनों ही रोग जिसमें हों, वह किसी नगरी में प्रवेश करना चाहता है जिस नगरी के चारों ओर कोट लगा हुआ है, जिसमें मानो केवल एक ही दरवाजा है। तो कोट को हाथों से टटोलता जा रहा है, मिल जाये कहीं दरवाजा तो नगरी में प्रवेश कर जाये। सो इतना तो परिश्रम किया, पर जब दरवाजा आया तब सिर की खाज खुजलाने लगा और पैरों से चलना चालू किए रहा। यदि वहीं खड़े ही खड़े अपनी खाज खुजला लेता तो भी विडंबना न होती तो खाज खुजलाने में ही वह दरवाजा निकल जाता है, फिर उस कोट को टटोलकर चक्कर लगाता रहता है। होनी जिसकी खराब होती है उसके उसी जगह खाज उठती है जहां उसके छूटने का मौका मिलता है।

विषय खाज का प्रसंग परीक्षा का अवसर―फोड़े का कोई खूब इलाज करे तो कितना धीरे-धीरे उसे पोषते हैं। यदि जोर से पोषें तो घबड़ाहट हो जाय। बड़े प्रेमपूर्वक दवा कर रहे हैं और जब फूट गया, मानो ठीक होने को हो गया तो फिर खुजलाने लगा। फिर उसे खुजलाने का मंशा होती है। यदि खुजलाये नहीं तो ठीक हो जाता है परंतु खुजला देता है यदि तो फिर फोड़ा तैयार हो जाता है। तो जैसे उस अंधे, खुजैले, गरीब पुरूष ने जहां ही दरवाजा मिलता है वहां ही सिर खुजलाने लगता है इसी प्रकार इन संसारी गरीब अज्ञान के अंधे विषयों के खुजैले जीवों ने बहुत घूम-घूम करके इस मनुष्य भव का द्वार प्राप्त कर पाया है, किंतु इस ही द्वार के आगे वह विषयों की खाज तेजी से खुजलाने लगा। तेजी से विषय सेवने लगा, जितना कि पशु पक्षी भी नहीं कर पाते हैं, कितनी तरह के भोजन, किस-किस ढंग से बनावें ऐसा तो पशु पक्षी भी नहीं कर पाते हैं। इस मनुष्य को ज्ञान मिला है, बुद्धि मिली है, उस बुद्धि का उपयोग कलात्मक ढंग से विषयों के सेवन में किये जा रहा है। सो आज विषयों के खुजैले विषयों को खुजलाने लगते हैं और अपने पैरों से चलते जा रहे हैं अर्थात् जीवन का समय गुजरता जा रहा है। ये पैर न चलें तो भी भला है। विषयों की खाज खुजलाते जा रहे हैं और पैर भी चलते जा रहे हैं, इतने में आ जायेगी वृद्धावस्था, मरणकाल। लो फिर उस कोट को टटोलते-टटोलते फिर रहे हैं, अनेक कुयोनियों में भ्रमण कर रहे हैं। ऐसे सुंदर अवसर से कुछ लाभ नहीं उठा पाते हैं। अज्ञानी का व्यवहार―भैया ! यही हाल होता है पढ़ाये, सिखाये गए तोते का। तोते को खूब सिखाया पिंजड़ा से मत भगना, भगना तो दूर न उड़ जाना, उड़ जाना तो नलनी पर न बैठना, बैठ जाना तो दाने न चुगना, दाने चुगना तो लटक न जाना, लटक जाना तो छोड़कर भाग जाना―ये सब बातें खूब रट ली, पर जहां मौका देखा कि हमारा मालिक पिंजड़े का दरवाजा बंद करना भूल गया है, सो ही पिंजड़े से उड़कर दूर भग गया, नलनी पर जाकर बैठ गया, दाने चुगने लगा, पाठ वही रटता जा रहा है, जैसे अपन लोगों को खूब पाठ याद है विनतियां भी खूब याद हैं वैसे ही उस तोते ने भी खूब अपना पाठ याद कर लिया है। वह उस नलनी पर लटक भी गया, पाठ वही पढ़ता जा रहा है―कभी पिंजड़े से बाहर भगना नहीं, भगना तो दूर न भग जाना, दूर भी भग जाना तो नलनी पर जाकर न बैठना, नलनी पर बैठ भी जाना तो दाने चुगने की कोशिश न करना, दाने चुगना तो उसमें लटक न जाना, लटक जाना तो उसे छोड़कर भग जाना। ऐसा पाठ भी वह पढ़ता रहता है। उस तोते जैसा ही पाठ हम आप सबने भी याद कर रखा है। आत्मा का शुद्धकार्य ज्ञान की वर्तना―पढ़ते जायें मोह राग द्वेष करना संसार में रूलने का उपाय है। और बच्चे को घना घना छाती से लगाते जाते हैं तो शायद यह तो उपदेश करने की विधि होगी। मोह न करो क्योंकि यह मनुष्य जीवन पाना बड़ा दुर्लभ है, ऐसा पाठ पढ़ते जायें और पास में खड़े हुए पुजारी से लड़ते भी जायें। तो यह तो शायद पूजा करने की विधि होगी ? अहो अज्ञान में इतना सर्व प्रवर्तन चल रहा है और अंतर में देखो तो सही तो तू मात्र ज्ञानस्वरूप है और तेरा शुद्ध काम एक ज्ञान की वर्तना है, उसको अपने लक्ष्य में न लेकर इन असार भिन्न, अशरण पदार्थों को अपना रहा है और दुःखी हो रहा है। तत्त्वदृष्टि से देखो तो इसमें न रागादिक विराज रहे हैं, न विषय विराज रहे हैं। यह ज्ञानी की दृष्टि की बात कही जा रही है। जो स्वसंवेदन ज्ञान का रूचिया है, जो शुद्ध स्वच्छ ज्ञान के दर्शन जब चाहे कर रहा है। वस्तुस्वातंत्र्यदर्शन से स्वात्मदृष्टि के विधान की शिक्षा―ऐसी इस ज्ञानज्योति को प्रकट करो और संसार के समस्त संकटों से मुक्त होने का उपाय बनाओ अन्यथा इस भव में भी केवल दुःखी ही रहकर कष्ट से मरण कर आकुलतावों के साथ परलोक जाना होगा और फिर आगे का तो हाल ही क्या है? जब संभाली हुई अवस्था है तब न चेते तो आगे कहां संभालने का मौका मिलेगा, इसका तो कोई ठिकाना ही नहीं है। सो देखो―इस तरह आत्मा के गुण आत्मा में हैं और उस ही प्रकार से इसका परिणमन चलता है। पुद्​गल के गुण पुद्​गलरूप हैं, उनका वहां परिणमन चलता है। ऐसा वस्तुस्वातंत्र्य निरखकर अपने आपके स्वरूप की दृष्टि करो जिस के प्रताप से ये समस्त संसार के संकट टल जायें।

*समयसार प्रवचन चतुर्दशतम भाग समाप्त*


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