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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:समयसार - गाथा 37

From जैनकोष



णत्थि मम धम्म आदि बुज्झदि उवऔग एव अहमिक्को ।

तं धमणिम्ममत्तं समयस्स वियाणया विंति ।।37।।

938-ज्ञेयनिर्ममत्व का विधान—ज्ञेय पदार्थों के संबंध में ज्ञानी ऐसा चिंतन कर रहा कि ये धर्मादिक पदार्थ मेरे नहीं हैं । मैं तो उपयोगमात्र हूँ और ऐसा एक हूँ, अब आपको एक उपयोगमात्र चिंतन करने में वे सब विवेक फलित हो जाते हैं, जो कुछ। करने चाहिए । को पुरुष कहे कि मैं बहुत सी विद्या नहीं पढ़ा हूँ, कुछ जानता नहीं हूँ, तो मेरे लिये धर्मपालन का सीधा संक्षिप्त तरीका क्या है, तो इससे सीधा और संक्षिप्त क्या तरीका हो सकता है । मैं एक हूँ ऐसा कहने अन्य सबसे विविक्त निराला हूँ यह बात अपने आप आ जाती है । मैं ज्ञानमात्र हूँ, ऐसा निर्णय रखने कर्तृत्व भोक्तृत्व आदिक भाव ये सब दूषण उसके टल जाते हैं । मैं एक हूँ और उपयोग मात्र हूँ, धर्मादि मेरे कुछ नहीं हैं । यह ज्ञेय पदार्थों का विवेक कर रहा है ज्ञानी । उसको रहेंगे कि यह ज्ञेय निर्ममत्व है पदार्थ जानने में आते हैं और फिर भी उसे नहीं मानते । यहाँ एक आशंका की जा सकती है कि अन्य पदार्थों के संबंध में विचार करना कि यह मेरा नहीं है यह बात तो ठीक जंचती है, परंतु धर्म अधर्मद्रव्य, आकाश द्रव्य काल द्रव्य जो अमूर्त पदार्थ हैं और पर हैं उनके बारे में कौन सोचता है ऐसा कि अधर्मद्रव्य मेरा है, और जब नहीं सोच पाता तो मना करने की जरूरत क्योंकि धर्मद्रव्य मेरा नहीं है आकाश के बारे में अधर्म के बारे में, काल के बारे में इन द्रव्यों के संबंध में कौन कहता है कि यह मेरा है । कभी-कभी कह तो बैठते हैं जैसे काल के बारे में लोग कह देते हैं कि यह तो समय मेरा है । उसका अर्थ कि यह अवसर मेरा है, मैं जो चाहूँ, इस अवसर में कर सकता हूँ, तो समय कहकर भी उसमें समय की बात नहीं कहा किंतु अपनी योग्यता की बात अन्य सब बात कही हैं । और फिर उस समय का नाम है पर्याय, जिसकी बात कर रहा है । काल द्रव्य में कौन कहता है कि यह मेरा है । कभी लोग आपके बारे में कह बैठते कि यह मेरा है, तो उसका अर्थ आकाश से नहीं है किंतु एक पौद्गलिक किसी चीज की सीमा बाँधकर बात कही गई है । और उपचार से कहा है ऐसा । कोई यह नहीं कहता कि धर्म द्रव्य मेरा है और ऐसा भी कहने की आवश्यकता नहीं होती है कि धर्मद्रव्य मेरा नहीं है । उसका उत्तर यह समझना चाहिये कि धर्मद्रव्य मेरा है, अधर्मद्रव्य मेरा है आदिक द्रव्यों की ममता में तो कोई पढें लिखे व्यक्ति इतना उलझ जाते हैं कि उनमें झगड़ा हो जाता है, फिर समाचार पत्र रंगे जाते हैं, धर्मद्रव्य के संबंध में जो हमने ख्याल किया, जो विकल्प बनाया उन विकल्पों में ममता है या नहीं । वहाँ तो ममता है, कभी दूसरे को हम बड़े विरोधरूप में देखते हैं । यह मानता ही नहीं मेरी बात, विरोधी बन जाते हैं । संसार में विकल्प के नाते से विरोधी बहुत हैं और उपद्रव के नाते से विरोधी कम हैं । जितने जिसके जो विरोधी हैं, या विरोधी माना है वे ही शरीर पर उपद्रव नहीं कर रहे । मेरा कुछ घात नहीं कर रहे हैं किंतु जैसी हमारी मंसा है, जैसा हमारा विकल है वैसा जो न करे और उससे प्रतिकूल करे उसे विरोधी मानते हैं । सो जैसी ममता इन बाह्य पदार्थों में लगी है वैसी बल्कि उससे घनिष्ट ममता विकल्पों में रहा कराती है । बाह्य पदार्थों की ममता को तो चारित्र मोहनीय का दोष कह सकते हैं, पर विकल्पों की ममता को तो दर्शन मोहनीय का दोष कहा है । तब फिर उन पदार्थों की ममता से अपने विकल्प विकारों की ममता बहुत कठिन और निंदनीय है । तो धर्मादिक पदार्थों के संबंध में जो विकल्प किये गए उनमें ममता हुई ये मेरे है, इसी का अर्थ है धर्मादिक द्रव्य मेरे है, सो ज्ञानी जीव यहाँ विवेक कर रहा है कि मेरे आत्मा के सिवाय और मेरे आत्मा में भी सहजस्वरूप ज्ञायकभाव के सिवाय अन्य जितने परभाव है और परद्रव्य हैं वे सब मेरे कुछ नहीं हैं ।
939-आत्मकल्याण की तैयारी का विधान—भैया ! आत्मकल्याण करना है तो जो उसकी विधि है उस विधि से चलकर ही कल्याण किया जा सकता है । बुद्धि में मुख्य बात तो तत्त्वज्ञान की है । तत्त्वज्ञान की चर्चा हो, तत्त्वज्ञान में उपयोग रमे, प्रिय लगे यह तो प्रधान बात है लेकिन साथ में विषयों की आकांक्षा न हो और क्रोध, मान माया, लोभादिक कषायें मद हों, यह भी धर्मसाधन का एक महत्त्वशाली वातावरण है । जहाँ हजार-हजार मुनि भी एक साथ रहते थे और रंच भी वहाँ व्यवस्था न करना होता था । स्वयं सहज सब कल्याण के अभिलाषी होने के कारण व्यवस्थित थे, तो यह है धर्म की रूचि का एक व्यावहारिक रूप हम तत्त्वज्ञान के अभिलाषी हो, जिज्ञासा बने अध्ययन करें, स्वाध्याय करें, चर्चा करें मनन करे और विषयों की आकांक्षा का लोभ न करे । पर में जैसा होता है ठीक है, कषायों को मंदकर । क्रोध कषाय कर लिया तो उसके फल में मिला क्या? तुरंत दुःख आगे भी दुःख । और पहिले भी दुःख किया था तभी तो उसने क्रोध करने की जरूरत समझी थी । तो जिसके प्रारंभ में, वर्तमान में भावीकाल में क्लेश ही मिलते हैं उस कषाय से लाभ क्या? जैसी क्रोध कषाय की बात है वैसी ही मानकषाय की बात है । मान कषाय में पहिले भी क्लेश, वर्तमान में भी क्लेश, भावी काल में भी क्लेश । माया, लोभ आदिक कषायों की भी यही हालत है । तो कषाय मद हो, विषयों की आकांक्षा न हो तत्त्वज्ञान में रुचि हो, ये तीन बातें चलें, इनमें बढ़े तो वे सब बातें अपने आप आ सकती हैं जो कि स्वयं स्वत: आनी चाहिये । जिसने आत्मा के सहज ज्ञान स्वरूप का परिचय पाया उसको ये सब कुछ करने में कठिनता नहीं है ।
940-ज्ञेयों की ज्ञेयता व ज्ञेयों के ज्ञान से विलक्षण स्वरूप—ज्ञानी इन पदार्थों के संबंध में चिंतन कर रहा है कि मेरा सहज ज्ञान स्वरूप है, तो इन ज्ञानस्वभाव के कारण मुझ में ये समस्त ज्ञेय अवश होकर अनिवार्यरूप से सबके सब मुझ में मग्न होते हैं, इस तरह प्रकाशमान हो रहे हैं, जैसे दर्पण स्वच्छ है और उसके ऊपर आवरण कुछ न पडा हो, सामने की चीज विवश होकर उसमें मग्न होने की तरह छायारूप बन जाती है । एक छाया का रूप बनता है । वह बाह्य पदार्थ नहीं बन गया छायारूप बना वह दर्पण किंतु स्वच्छता के कारण उपाधि संपर्क में ऐसा ही होना पड़ा इसी तरह मेरे आत्मा को ज्ञानस्वरूप में ये समस्त पदार्थ मुझ में विवश होकर आ गिरते हैं, लेकिन ये मुझ से अत्यंत भिन्न हैं, वे मेरे स्वरूप नहीं ।जैसे कि दर्पण में प्रतिबिंब छाया दर्पण के स्वच्छ स्वभाव से अत्यंत जुदी है, तद्रूप नहीं है अतएव जैसे दर्पण का यह बाह्य कुछ नहीं है इसी तरह मेरे भी धर्मादिक सभी पदार्थ मूर्त अमूर्त एवं नैमित्तिक भाव सब मेरे कुछ नहीं हैं । ये तो अवश होकर ज्ञेय में आ रहे हैं । जैसे बाह्य पदार्थ हमारे ज्ञान में आये और राग होने के कारण फिर हम उसकी पकड़ रखने लगे, इस तरह कर्मों के उदय का निमित्त पाकर ये रागादिकभाव मेरे में आये, ज्ञेय हुए, उन ज्ञेयों से यह ज्ञेय जर आंतरिक हैं क्योंकि मेरे आत्मा के गुणों के विपरीत परिणमन हैं, किंतु वह है सब अचेतन । रागादिक भावों में चेतने का स्वभाव नहीं पड़ा हुआ है, उनका स्वरूप चैतन्य से शन्य हैं, चेतन में आया है । जैसे दर्पण में जो परपदार्थों का छायारूप प्रतिबिंब है वह छाया दर्पण का तो परिणमन है पर उस स्वच्छता से अलग है दर्पण का स्वभाव स्वच्छता है और स्वच्छता के कारण भी वह प्रतिबिंब बन पाया है फिर भी वह छाया, वह प्रतिबिंब स्वच्छता से न्यारा है, इसी प्रकार ये रागादिक विकार मेरे परिणमन हैं, मुझ में हो रहे हैं किंतु इनका स्वयं का स्वरूप तको तो ये चैतन्य से जुदा है । इस तरह इन परद्रव्यों को इन परभावों को अपने स्वरूप से निराला निरखना यह ज्ञानी का महान उद्यम चलता है । ये ज्ञेय सब वहिस्तत्त्व हैं । ये बाह्यपना छोड़ दे और मेरे स्वरूप बन जायें तो उनके वश की बात नहीं है, और, मैं भी उन्हें जानकर उस अंतस्तत्त्व उन बहिस्तत्त्वरूप बन जाऊँ, उनका स्वरूप बन जाऊं यह भी मेरे वश की बात नहीं है ।
941-अंतर की निधि का ज्ञान न होने से विडंबना—कोई किसी पर रूप नहीं हो सकता इस न्याय से यद्यपि मिथ्यादृष्टि अज्ञानी भी किसी परपदार्थरूप नहीं बन रहा, नहीं बन पा रहा लेकिन अज्ञान है ना तो भी ज्ञान की विपरीतता में अज्ञान से कल्पना करके इन सब रूप बन रहा है और उन सबको अपना मान रहा है, लेकिन यह आत्मा तो नित्य उपयोगरूप है । ऐसा ज्ञानी समझता है और ज्ञानी निरायुक्त अपने आत्मा का संकलन करता है प्रतीति करता है, उसे ही ग्रहण करता है । वह जानता है कि यह भगवान आत्मा ही यह मात्र मैं हूँ। हूँ मैं एक किंतु ज्ञानस्वभाव होने के कारण मुझ में ये सारे ज्ञेय प्रतिबिंबित होते हैं, दर्पण रखा हो तो सब चीजें झलकेगी ही, उसमें दर्पण क्या मना करेगा? हाँ दर्पण के बीच में यदि कोई आवरण पड़ जाय तो फिर दर्पण में वे सब चीजें न झलक सकेगी । वे चीजें तो न झलकेगी पर वह आवरण उस दर्पण में झलकेगा । यों ही आत्मा जान स्वभावी है तो इस आत्मा में समस्त ज्ञेय पदार्थ झलकने ही पड़ेंगे । हाँ बीच में यदि विषयकषाय, विकल्प रागद्वेषादिक का आवरण पड़ा हो तो ये सब आवरण झलकेंगे । और, इनसे आगे एक अपराध और आत्मा करेगा जो अपराध दर्पण नहीं कर सकता दर्पण की स्वच्छता के कारण ज्ञेय झलक गये यह भी बन गया । दर्पण पर आवरण पड़ा है, कपड़ा पड़ा है तो वह भी झलक गया, यह भी बन गया, इसी तरह इस चेतन में ले ज्ञेयपदार्थ झलक गए यह भी एक काम हो गया, और यदि आवरण पड़ा है रागादिक विकारों का तो ये झलक गये यह दूसरा काम है ।अब तीसरा काम करता है अज्ञानी यह कि उन रागादिक विकारों को अपना लेता है । यह मैं हूँ इस प्रकार बुद्धि कर लेता है । पदार्थ को देखो तो बिल्कुल स्पष्ट है । प्रत्येक जीव अपने ही सत्त्व से हैं पर के तत्त्व से नहीं हैं, दूसरे का इसमें प्रवेश नहीं है । पर इस प्रकार ज्ञानी निरख पाता है अज्ञानी नहीं है सब ये विविक्त, पर जिनको खबर नहीं वे तो विविक्त नहीं है । जैसे गठरी में लाल बंधा है, बाँध दिया मानो, गठरी लिये वह चल रहा है उसे यदि उस लाल का पता नहीं है तो वह गरीब है और उस पर प्रभाव हर जगह यही पड़ेगा जैसा कि गरीब लोगों पर पड़ता है । उसे उस लाल की कुछ सुध ही नहीं है, किसी के घर में आंगन में धन गड़ा है, उसे कुछ पता नहीं है तो उस पर तो उन गरीबों जैसा ही प्रभाव पड़ेगा, और कदाचित् उसे ख्याल आ गया विश्वास हो गया कि मेरे घर में संपदा गड़ी है, वर्तमान में गरीब है गरीबी से चल रहा है तब भी उसके मन में कुछ फर्क पड़ ही जाता है, कुछ गौरवता आ ही जाती है, तो अब ऐसी ही बात आत्मा के साथ है कि है तो यह अनंत चतुष्टय का धनी, ज्ञान साम्राज्य का अधिकारी किंतु पता नहीं है इसे अपनी निधि का तो यह तो बाह्य पदार्थों का दास बनकर उनके लिये ही सब कुछ करता हुआ रहेगा इस मर्म को ज्ञानी जन समझते हैं सो वे निरायुक्त रहते हैं ।


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