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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:समयसार - गाथा 384

From जैनकोष



कम्मं जं सुहमसुहं जह्मि य भावह्मि वज्झइ भविस्सं।

तत्तो णियत्तये जो सो पच्चक्खाणं हवइ चेया।। 384।।

आगामी काल में शुभ अशुभ कर्म जिस भाव के होने पर बँधे, उस भाव से जो ज्ञानी निवृत्त होता है वह ज्ञानी प्रत्याख्यानस्वरूप है।

एक ही पुरुषार्थ में प्रतिक्रमण, प्रत्याख्यान व आलोचना की सिद्धि― हम को भावकर्म न बँधे, आगामीकाल में भी कर्मों का संयोग न जुटे ऐसी बात यदि चाहना है तो वर्तमान भाव जो कि कर्मबंध के कारण हैं उन भावों से निवृत्त होना चाहिए। भविष्य के कर्म न बँधे, यह वर्तमान भावों से पृथक् होकर ज्ञानस्वरूप में स्थिर होने पर निर्भर है। प्रतिक्रमण का जैसा एक ही प्रयत्न था कि पुद्गल कर्म के उदय से होने वाले वर्तमान भावों से पृथक् ज्ञानमात्र आत्मस्वरूप में स्थिर होना वै से ही यही है भविष्य के कर्मों से दूर होने का भी साधन। एक ही बात करने में प्रतिक्रमण और प्रत्याख्यान दोनों हो जाते हैं और आलोचना भी परमार्थत: निश्चयरूप हो जाती है। इन तीनों के लिए तीन प्रकार के यत्न नहीं करते हैं किंतु एक ही यत्न करना है कि पुद्गलकर्मोदयजनित वर्तमान भाव से पृथक् ज्ञानमात्र आत्मस्वरूप को दृष्टि में लेना है और उसमें स्थिर होना है।

एक यत्न में तीनों बात पा लेने पर एक लौकिक कथानक―एक कथानक है कि एक पुरुषने देवता की आरधना की तो देवता प्रसन्न होकर बोला कि मांग लो वर जो चाहते हो। उस पुरुषने कहा कि हम को दो चार घंटे की मोहलत दो, हम घर जाकर पूंछ आऐं तब तुम से वर मांगेंगे।.... अच्छा जावो पूछ आवो। उसने पिता से पूछा कि मैं देवता से क्या माँगू। तो पिताने कहा बेटा धन मॉंग लो क्योंकि बाप को धन की बड़ी अधिक तृष्णा है। यद्यपि मृत्यु के दिन निकट आए हैं। भोगेंगे वे लड़के ही, मगर फिर भी पिता का धन के प्रति बहुत भाव रहता है। बेटा धन मांग लो। अब मां के पास गया। मां थी अंधी। तो अंधा होने में बडा़ क्लेश मानते हैं। पुरुष ने पूछा क्या मांगू मां..... बेटा मेरी आंखें मांग लेना। स्त्री के पास गया बोला क्या मांगे देवता से? स्त्रीने कहा कि एक बेटा मांग लो। अब वह इस फ्रिक्र में पड़ गया कि तीनों ने तीन बातें कही। किस की चीज मांगे किस की न मांगे। आज का सा जमाना हो तो कहो मां बाप को ठुकरा दें और स्त्री की चीज मांग लें। अब वह इस विचार में था कि क्या करूँ? वह पेरशानी में आ गया। एक से ही पूछता तो भला था। अब तुरंत उसे अक्ल आयी। दूसरे दिन जब देवताने कहा, मांगो क्या मांगते हो? तो वह बोला कि मेरी मां अपने पोते को सोने के थाल में खीर खाते हुए देखले। एक ही बात मांगी ना। अरे तीनों बातें आ गई। देवता तीन बातें देने को तैयार न था। उसने एक ही बात में आंखें, बेटा और धन पा लिया।

धर्म के अर्थ एक काम▬भैया ! धर्म के अर्थ एक काम करो, ज्यादा मत करो। वह एक काम कौनसा हो जिस के प्रसाद से सर्व अपराधों के दूर करने में समर्थ प्रतिक्रमण भी बन जाता है, प्रत्याख्यान भी बन जाता है और आलोचना भी बन जाती है। ऐसा कार्य केवल एक यही है कि पुद्गल कर्म के विपाक से होने वाले भावों से अपने आत्मा को निवृत्त कर लो। इसमें 3 बातें आ गयीं। पूर्वकृत कर्मों से भी जुदा हो गया, भविष्यत् कर्मों से भी जुदा हो गया और वर्तमान कर्मों से जुदा भावना में है ही। संसार के प्राणी जितना भविष्य की वांछा में मग्न हैं उतना अतीत की याद नहीं रखते हैं। यद्यपि मोहमें दुतर्फा ही दौड़ चलती है फिर भी अधिकतर भविष्य की वांछावों की ओर इसकी ज्यादा दौड़ है। अब यह करेंगे, अब यह होगा, फिर यह होगा, मारे आकांक्षावों के कभी चैन ही नहीं मिलती है। अच्छा कर लो आकांक्षा और जवाब भी देते जावो, फिर क्या होगा? लखपति बन गये। फिर क्या होगा? संतान समर्थ हो गए अच्छे पढ़े लिखे बन गये। फिर क्या होगा? वृद्धावस्था आ जावेगी। फिर क्या होगा? सब छोड़कर चले जायेंगे। फिर क्या होगा? आखिर मरेंगे ही। फिर क्या होगा? करनी का फल भोगेंगे।

शेखचिल्लीपन▬ भविष्य की आकांक्षवों में शेखचिल्ली की उपाधि दी जाती है कि शेख चिल्ली बन रहे हैं। बचपन में और तरह के भाव भविष्य के लिए और जैसे-जैसे बड़े होते जाते हैं वै से ही आकांक्षावों का ढ़ेर विभिन्न होता जाता है। एक सेठजी घी का घड़ा लिए हुए जा रहे थे। सेठने एक मजदूर को बुलाया और कहा कि यह घड़ा ले चलो। क्या मजदूरी लोगे? चार आने लो। वह मजदूर सिर पर घड़ा रखे हुए चला जा रहा है। सोचता जाता है कि आज तो चार आने मिल गये। चार आने के चने खरीदेंगे। फिर खोंचा लगायेंगे, 8 आने हो जायेंगे, फिर 8 आने का खोंचा लगायेंगे दो रुपया हो जायेगा, फिर दो चार खोंचा लगायेंगे तो 5 रु. हो जायेगे। फिर 5 रु. की बकरी खरीदेंगे, घी दूध बेचेंगे, फिर गाय हो जायेगी, फिर भैंस हो जायेगी, चला जा रहा है ठुमक ठुमक और ऐसा सोचता जा रहा है, फिर दुमंजला मकान बनवायेंगे, फिर शादी करेंगे। बच्चे होंगे। कोई बच्चा बुलाने आयेगा कहेगा कि चलो दद्दा रोटी खाने मां ने बुलाया है, कहेंगे कि अभी नहीं जायेंगे, फिर दुबारा कहेगा तो मना कर देंगे, फिर तिबारा कहेगा तो जोर से सिर हिला कर लात पटककर कहता कि चल हट अभी नहीं जायेंगे तो इतने में वह गगरी सिर से गिर गयी और फूट गई। सेठने भी दो चार डंडे जमाये। ऐसे ही विचारों में रहकर यह जीव अपने जीवन को खो देता है। मिलता कुछ नहीं है। जैसे वह पहिले था वै से ही अब है। मानने की बात अलग है। उस से क्या सहारा होता है? गुजर गये फिर तो एक मिनट बाद दूसरा फैसला हो जाता है।

एक शेखचिल्ली का दृष्टांत▬एक लकड़हारा था। वह लकड़ी का गट्ठा लिए हुए अपने कुछ साथियों के साथ जा रहा था। गरमी के दिन थे। बरगद का एक पेड़ मिला, सो सबने सोचा कि जरा एक आध मिनट आराम कर लें। उस पेड़ के नीचे लकड़ी धर दिया और सब सो गए। सो नींद आयी ही थी कि उनमें से जो सिरताज था वह एक स्वप्न देखता है कि मैं राजा बन गया हूँ, सभा लग रही है। छोटे-छोटे राजा आ रहे हैं, अगवानी कर रहे हैं, नमस्कार कर रहे हैं और बड़ी प्रसन्नता से उन से बातें हो रही हैं। वह खूब आनंद में मग्न हो गया। स्वप्न की बात है। सोते सोते दो घंटे व्यतीत हो गए। तो एक लकड़हारेने उसे जगाया, अरे चलो देर हो गयी। जब जगा तो देखा कि राजपाट अब कुछ नहीं रहा। अब तो वह उस जगाने वाले से लडा़ई लड़ने लगा, दो चार तमाचे भी मारे। कहा कि तूने मेरा राज्य छीन लिया। सब लोग दंग रह गये कि यह मेरा सिरताज क्या कह रहा है? जैसे उसका कुछ नहीं छिना, केवल कल्पना में ही मान लिया था, सो दु:खी हो रहा था। इसी तरह ये समस्त समागम छिदो, भिदो, छूट जावो तो भी कुछ नहीं छिना किंतु कल्पना में जो मान रखे थे, मिथ्यात्व की प्रबलता है। इस कारण यह सदैव दु:खी रहता है।

ज्ञानी आत्मा की प्रत्याख्यान स्वरूपता▬ जो पुरुष अनेक प्रकार के विस्तार प्राप्त शुभअशुभ भविष्य के कर्मों से जो कि रागादिक प्राप्त होने पर बँधा करते हैं उन से जो अपने आप को जुदा कर लेते हैं वे पुरुष स्वयं प्रत्याख्यान स्वरूप हैं। ऐसा करने का उपाय क्या है? ज्ञानादिकस्वरूपमय निज तत्त्व का सम्यक् श्रद्धान और ज्ञान तथा उसमें ही स्थिर होना यही है परमसमतापरिणाम। उस समतापरिणाम में स्थित होने के उपाय द्वारा जो भविष्यवत् कर्मों से भी निवृत्त होता है उस पुरुष का नाम प्रत्याख्यान है, उस पुरुष के भाव का नाम प्रत्याख्यान है। बहुत बडा़ काम है यह कि जो उदय आ रहा है, विभाव बन रहा है उस के बारे में ऐसा ध्यान रहे कि यह मेरा स्वरूप नहीं है। यह मुझे बरबाद करने के लिए होता है। औपाधिकभाव है, मलिनता है इससे हमारा अहित है ऐसा जाने और अपने शुद्ध सहज ज्ञानस्वरूप को परमहितरूप माने ऐसा परिणाम दुर्लभ और अनुपम परिणाम है। इस ही परिणाम के बल पर यह जीव प्रत्याख्यान करता है।

प्रत्याख्यान अथवा भविष्य की उज्ज्वलता▬ व्यवहार में प्रत्याख्यान नाम है भावों को मलिन करने के आश्रयभूत बाह्य पदार्थों का त्याग करना। बाह्य पदार्थों के त्याग करने का प्रयोजन निश्चय प्रत्याख्यान है। इस निश्चय प्रत्याख्यान द्वारा यह जीव अपने भविष्य के क्षणों को साफ बनाता है। जैसे लाइन क्लियर हो तो गाड़ी नि:शंक आगे बढ़ती है, इसी तरह यह ज्ञानी संत पुरुष भविष्य की लाइन को क्लियर कर रहा है। आगामी कर्म न रहें, वासना न रहें, संस्कार न रहें तो यह जीव मोक्षमार्ग में सुगमतया बढ़ेगा। मोक्षमार्ग के साधन में प्रधान अंगभूत प्रत्याख्यान का वर्णन कर के अब आलोचना का वर्णन करते हैं।


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