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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:समयसार - गाथा 392

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रूवं णाणं ण हवइ जम्हा रूवं ण जाणये किंचिं।

तम्हा अण्णं णाणं अण्णं रूवं जिणा विंति।।392।।

रूप और ज्ञान में व्यतिरेक – रूप वर्ण नहीं है। यहाँ रूप से मतलब रंग से न लेना, किंतु रूप रस गंध स्पर्शमयी जो मूर्तता है उस मूर्तस्वरूप को ग्रहण करना अर्थात् मूर्तिकता का ज्ञान नहीं है क्योंकि वह मूर्तिकता कुछ भी नहीं जानती। इसलिए ज्ञान अन्य है और रूपीपना अन्य है, ऐसा जिनेंद्रदेव ने भाषित किया है। मोही जीवों को जो कुछ यह दिख रहा है जिस से इसने अपना निकट संबंध बनाया है, उनमें यह आपा मानता है।

स्वपर के एकत्व की अज्ञानमयी कल्पना ― इन बाह्य पदार्थों में आत्मा के साथ मानी गई एकमेकता दो रूपों में फूटती है। एक तो बाह्य को मैं माना और मैं को बाह्य माना। यद्यपि यह बात कुछ थोड़ी सी ऐसी है कि जैसे कोई कहे दाल में शाक मिलाया, यद्यपि वहाँ एक ढंग हो गया फिर भी पद्धति में अंतर है। ऐसे ही कोई पुरुष समस्त विश्व को आत्मारूप मानता है। एक मंतव्य में स्वरूप का अस्तित्व नहीं माना गया है और एक मंतव्य में पररूप से नास्ति नहीं माना गया है। ऐसे एकमेक हो रहे हैं। मुग्ध प्राणियों के प्रति कहा जा रहा है कि ये सब रूप रंग नहीं;किंतु यह सब मूर्तिकता ज्ञान नहीं है। ज्ञान अन्य है और यह रूपीपना अन्य है। आत्मा अपने द्रव्यरूप है और यह रूपी पदार्थ अपने द्रव्य रूप है। आत्मा के गुण अन्य हैं, इन रूपी पदार्थों के गुण अन्य हैं। आत्मा अपने गुणों में ही समवायी बनकर परिणमता रहता है और ये रूपी पदार्थ अपने गुणों में ही समवायी रहकर परिणमते रहते हैं।

ज्ञेयभूत विश्व से ज्ञान का पार्थक्य ― सभी संसारी जीव द्रव्येंद्रिय के द्वारा इन रूपी पदार्थों को जानते हैं। इतने मात्र से रूपी पदार्थ और यह ज्ञान आत्मा एक नहीं हो सकता। वह द्रव्येंद्रिय भी तो अचेतन है। जिस साधन से ज्ञान किया गया है और द्रव्येंद्रियों के साधनों से जो भावेंद्रिय रूप परिणमन हुआ है अर्थात् बाह्यवस्तुविषयक ज्ञान होता है वह ज्ञान ही तो औपाधिक है, विनाशीक है, एकांगी है, आंशिक है। मेरा ज्ञानस्वरूप तो ऐसा नहीं है। मैं ज्ञानमय निरुपाधि हूँ, ज्ञानस्वरूप हूँ, अखंड हूँ, परिपूर्ण हूँ, इस नाते से भी यह रूपी पदार्थ मैं नहीं हूँ और फिर केवलरूपी पदार्थ ही तो ज्ञान में नहीं आते । ज्ञान में सर्व विदित होता है। फिर भी ज्ञान सर्वरूप नहीं होता, ज्ञान तो ज्ञानरूप है। ये सर्व भौतिक पदार्थ, रूपी पदार्थ, रूप मूर्तिकता मैं नहीं हूँ। मैं तो ज्ञान मात्र हूँ। ज्ञान अन्य है और रूप अन्य है।

रूपी पदार्थों में शरीर से भेदविज्ञान की कठिनाई – भैया ! सबसे अधिक अड़चन पड़ती है शरीर को अपने से भिन्न परखने में, क्योंकि यदि थोड़ा फोड़ा हो, बुखार हो, सिर की नस चढ़ गयी हो तो भी यह क्षुब्ध हो जाता है। भेदविज्ञान करना यहाँ कुछ कठिन मालूम होता है, पर मोही जीव को तो इससे भी और बाहर का भेदविज्ञान करना कठिन लग रहा है। किसी का कोई इष्ट गुजर जाय तो यह आत्मा अपने प्राण गंवा देता है, आत्महत्या कर डालता है। वहाँ भी यह धैर्य नहीं रख सकता, भेदविज्ञान नहीं कर सकता और शरीर से यदि भेद की बात समझ में आये तो बाहर के भेद की बात सुगमतया समझ में आ जाती है। जब मेरा इस शरीर के साथ भी संबंध नहीं है तो अन्य पदार्थों के साथ मेरा संबंध कैसा? तो शरीररूप है, रूपी है। इस रूपी पदार्थ से यह मैं ज्ञान भिन्न हूँ। रूपी पदार्थ को जानते तो हैं पर जाननहार यह ज्ञान इस रूपी से अलग है और ये रूपी पदार्थ भिन्न हैं। अब इन रूपी पदार्थों के एक–एक गुणों को लेकर आगे भेद बताते हैं कि मैं वर्णादिक रूप भी नहीं हूँ।


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