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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:समयसार - गाथा 396

From जैनकोष



फासो ण हवइ णाणं जम्हा फासो ण याणए किंचि।

तम्हा अण्णां णाणं फासं अण्णं जिणा विंति।।396।।

स्पर्श और ज्ञान में व्यतिरेक ―स्पर्श ज्ञान नहीं है, क्योंकि स्पर्श कुछ जानता नहीं है। इस कारण ज्ञान अन्य है और स्पर्श अन्य है, ऐसा जैन आगम में बताया है। इस प्रकरण में इन पांच इंद्रियों के 5 विषयों में सबसे पहिले शब्द का वर्णन किया था कि शब्द ज्ञान नहीं है और सबसे अंत में स्पर्श का वर्णन कर रहे हैं कि स्पर्श ज्ञान नहीं है। शब्द तो इस जीव के किसी उलझन में आने के लिये एक पहिला धंधा है। मनुष्यों को समझाया जा रहा है, इसलिए पंचइंद्रियों को बात कही है, उनमें सबसे पहिले शब्द की बात रखी है और अंत में स्पर्श की बात कही है। यह जीव सबसे अधिक आसक्ति स्पर्श में रखता है और यह स्पर्श विषय बड़ी निकटता को लेकर सोता है। आग पड़ी है आंखों दिख रही है। कोई यह कह दे कि आग गरम नहीं है आग तो ठंडी हुआ करती है, उसे कितना ही समझावो समझ में नहीं आता? और समझ में न आये तो आग का एक तिलगा उठाकर हथेली में धर दो, फिर तो तुरंत कहेगा कि अरे रे रे, हाँ आग गरम है। कैसा बढ़िया स्पष्ट बोध होता है? कसर रही हो तो और ज्ञान करा दो कि पूरी गरम है।

स्पर्शविषयक सर्वचेष्टाओं में ज्ञान का अत्यंताभाव ―स्पर्श का अलंकार अनुभव को दिया जाता है। आत्मा का स्पर्श करना अर्थात् आत्मा का अनुभव करना। जिस आत्मा के अनुभव में बड़ी निकटता का बोध होता है, ऐसे ही इन बाह्य बोधों में स्पर्श का बोध बड़ी निकटता से होता है और इस स्पर्श के विषय में ठंडा गरम आदि के छूने की ही बात नहीं कही गयी किंतु इसमें काम भोग की भी बात गर्भित है। उन सब में जो ज्ञान होता है उस ज्ञान के समय में यह जीव अपने ज्ञान से अपने को न्यारा नहीं समझ सकता है। यह स्पर्शविषयक जितना भी ज्ञान है वह ज्ञान भी ज्ञान नहीं है परमार्थ से और स्पर्श तो प्रकट अचेतन है। वह अचेतन स्पर्श ज्ञान कैसे होगा? स्पर्श भिन्न चीज है और ज्ञान भिन्न चीज है। अब पंचइंद्रियों के विषय का वर्णन कर के द्रव्यों के संबंध में कह रहे हैं कि यह ज्ञान अन्य द्रव्योंरूप भी नहीं है।


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