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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:समयसार - गाथा 399

From जैनकोष



णाणमधम्मो ण हवइ जम्हाऽधम्मो ण याणए किंचि।

तम्हा अण्णं णाणं अण्णमधम्मं जिणा विंति।।399।।

धम्माधम्म ―यह धम्माधम्म की चर्चा है। लड़ के ऊधम करते हैं तो कहते हैं कि देखो इन लड़को ने धम्माधम्म मचाया। धम्माधम्म उठने और ठहरने के बिना नहीं होता। यहाँ धर्मद्रव्य का काम है उठने में, चलने में निमित्त होना और अधर्मद्रव्य का काम है ठहरने में निमित्त होना।

पदार्थों की सन्मात्रता ―भैया ! जरा सर्वव्यापी एक सिद्धांत को मानने वालों के दोस्त बनकर थोड़ा उनकी ही सिफारिश करते हुएएक इस तत्त्व के बाबत सोचो और इस रूप से सोचो कि आखिरकार वे ऋषि भी तो जानते हैं, बुद्धिमान हैं, उन को यह बुद्धि क्यों हुई कि ये समस्त पदार्थ एक ब्रह्ममात्र हैं, दूसरे कुछ भी नहीं हैं। अब इसके बारे में सोचिए जितने जो कुछ पदार्थ हैं उन सब पदार्थों में सामान्य रूप से पाया जाने वाला धर्म एक अस्तित्व है, जिस अस्तित्व की रक्षा करने वाले वस्तुत्व आदिक शेष गुण हैं। उस अस्तित्व साधारणगुण की अपेक्षा सर्व विश्व सद्भावरूप है और उस सत्त्व के नाते चैतन्य व परमाणु में भी रंच अंतर नहीं है किसी पदार्थ में परस्पर में रंच अंतर नहीं है। क्योंकि सर्व सन्मात्र है। इस तत्त्व को दृष्टि में रखकर जब देखो तो सब कुछ एक सत्स्वरूप प्रतीत हुआ। उस सत् का नाम ब्रह्मा रख लो।

अर्थक्रियाकारिता की दृष्टि से भेद ―यों सद्भाव की दृष्टि से सब कुछ एक ब्रह्म है, यहाँ तक तो यह दृष्टि चली। अब जैन सिद्धांत तो अर्थक्रियाकारिता की दृष्टि से सत् के भेद करता है, पर सद्ब्रह्मवादिवों की मित्रता निभानी हो तो थोड़ा अर्थक्रियाकारिता के विषय को न रखकर इस दृष्टि से भेद करो कि जगत् में जो कुछ होता है वह षडात्मक होता है, नामात्मक, स्थापनात्मक, द्रव्यात्मक, क्षेत्रात्मक, कालात्मक और भावात्मक।

तत्त्व की षडात्मकता ―जैसे सामायिक 6 प्रकार की है―नाम सामायिक, स्थापना सामायिक, द्रव्यसामायिक, क्षेत्र सामायिक, कालसामायिक और भाव सामायिक। सामायिक का नियम है बैठ गये सामायिक करने, बच्चे भी पास बैठे हैं बच्चे ऊधम मचा रहे हैं सो बच्चों को भी बैठाते जाते और माला भी फेरते जाते हैं―तो यह सब है नाम सामायिक। चलो नाम सामायिक तो किया। स्थापना सामायिक वह है कि सामायिक करते बने अथवा न बने, ऐसी बुद्धि हो कि मैं सामायिक कर रहा हूँ। नाम सामायिक वाले को कुछ फिक्र नहीं रहती, उन्हें तो केवल सामायिक का नाम पूरा करना है। पर स्थापना सामायिक वाले को अपनी पोजीशन का कुछ ध्यान रहता है। अगर टेढ़े-मेढ़े रद्दी आसन से सामायिक में बैठे हों, दो आदमी पास में आ जायें तो कमर जरूर थोड़ी ऊँची हो जायेगी, और आँखे बंद हो जायेंगी क्योंकि उन्हें स्थापनासामायिक करना है। द्रव्य सामायिक माला आदि लेकर करना अथवा सामायिक की विशेष तैयारी बनाना सो द्रव्यसामायिक है। क्षेत्रसामायिक―सामायिक की जगह में, क्षेत्र में सामायिक करना अथवा योग्य क्षेत्र में बैठने के भाव से सामायिक की बात बोलना, सो क्षेत्रसामायिक है, और समय पर सामायिक होना और समय का सामायिक के भाव से सामायिक बनाना, सो कालसामायिक है और भावपूर्ण सामायिक, समतापूर्ण सामायिक करना सो भाव सामायिक है।

षडात्मकता का तथ्य व अलंकार ―हर एक पदार्थ में 6 बातें लगती हैं नाम भगवान, स्थापना भगवान, द्रव्यभगवान, क्षेत्र भगवान, काल भगवान और भाव भगवान। यों ही मान लो सारा विश्व सद्ब्रह्म है। यद्यपि यह सद्ब्रह्म तिर्यक्सामान्य की अपेक्षा है, जाति में है, निगम रूप है, फिर भी एक उस साधारणजाति से बढ़ कर पहिले तो बनाया व्यक्ति का अलंकार फिर धीरे धीरे अलंकार की बात भूलकर व्यक्तिरूप ही बन गया। जैसे हम आप कुछ एक एक हैं इस तरह से उस सिद्धांत में एक सद्ब्रह्मपरिपूर्ण एक व्यक्ति है, जो सर्वत्र व्यापक है। लो वह भी अब 6 रूप हो गया। नामसत, स्थापनासत, द्रव्यसत, क्षेत्रसत, कालसत, भावसत।

सद्ब्रह्म के षडात्मकपद्धति से विकल्प ―नाम ब्रह्म क्या हुआ? इस प्रकरण के रहस्य को खोज के लिए समझना है। इसमें कुछ ठीक है, कुछ गैर ठीक भी है। नाम होता है चलाने वाला। कहते भी हैं लोग कि हमारा नाम चला दो। जब बुढ़िया मरती है और घर में धन हो तो मरते समय कह जाती है कि भाई ऐसा कार्य करना कि हमारा नाम चले। तो नाम चला करता है। नाम न हो तो चहलपहल सब खत्म। इतने भाई बैठे हैं, नाम किसी का न हो तो आप क्या कहेंगे? कैसे व्यवहार चलेगा, कैसे बुलावोगे? ओ ए करते रहोगे क्या? ओ ए यहाँ आवो? तो नाम जो है वह चलाने वाला होता है और चलाने का निमित्त है धर्मद्रव्य। तो उस एक व्यापक सद्ब्रह्म में नामब्रह्म, स्थापनाब्रह्म, द्रव्यब्रह्म, क्षेत्रब्रह्म, कालब्रह्म और भावब्रह्म निकला। यहाँ उस एकांतवाद में और अनेकांतवाद में यह समन्वय और संधि का फैसला किया जा रहा है। कुछ अपन गम खा रहे हैं, कुछ अपनी ओर उसे ला रहे हैं। संधि में पूरी बात एक की नहीं हो सकती। यहाँ नाम ब्रह्म धर्मद्रव्य का हुआ।

स्थापना में क्या होता है? उसमें किसी चीज को बैठाला जाता है। जैसे मूर्ति में भावना से पार्श्वनाथ को फिट कर दिया, इसही का नाम स्थापना है ना। अपनी भावना द्वारा किन्हीं पदार्थों में अन्य पदार्थों को फिट कर ले सोई तो स्थापना है। ऐसी स्थापना का काम यह अधर्मद्रव्य करता है। इस जीव पुद्गल को एक जगह फिट कर देता है। ठहर जावो। स्थापना भी ठहराता है और अधर्मद्रव्य ने भी ठहरा दिया। यों यह अधर्मद्रव्य स्थापनासत या स्थापनाब्रह्म हुआ।

सद्ब्रह्म में द्रव्य क्षेत्र काल भाव के विकल्प ―अब चलो―द्रव्य, क्षेत्र, काल, भाव। तो द्रव्यरूप तो पुद्गल में प्रसिद्ध ही है। ये पिंडरूप नजर आते हैं, इसे धरो, फैंको, यह द्रव्य की मुख्यता से नजर आ रहा है और क्षेत्र की मुख्यता से नजर आता है आकाश। वह क्षेत्रात्मक है और काल रूप से देखा जाता हैं कालद्रव्य और भाव की मुख्यता से देखा जाता है जीव। इसलिए इसे भावब्रह्म में ले जाइए।

भावप्रधानता से जीव का परिज्ञान ―जीव का ग्रहण, परिज्ञान, द्रव्य, क्षेत्र काल के उपाय से नहीं होता है। यह जीव कैसा है? यह जीव दो चार हाथ का लंबा चौड़ा है कि नहीं? अरे आदमी तीन चार हाथ का तो लंबा है और देखो एक पौन हाथ का चौड़ा भी है। तो जीव का प्रदेश इतना बड़ा है कि नहीं? है। यही जीव की लंबाई समझिए। समझ गए आप? अभी नहीं समझ पाये। जीव कुछ ग्रहण में नहीं आया। भले ही 3.5 हाथ का लंबा है, ऐसे मूर्तरूप में भी दृष्टि डालकर निहारें, 3.5 हाथ तक के आकार का फैलाव होता है, यह जीव है। लो अब भी ग्रहण में नहीं आया तो फिर ये जीव कैसा है? अरे यह जीव क्रोधी है, घमंडी है, लोभी है, इतना बताने पर भी ध्यान में नहीं आया, क्योंकि जानने वाला तो ज्ञान है और जानन में आ रहे हैं ज्ञान के दुश्मन क्रोध मन आदिक तो अब ये विकल्प कैसे ज्ञान बनेंगे? अच्छा तो यों समझलो, यह जीव कैसा है? अनंत पर्याय अनंत गुणों का पिंड है। इतने कहने पर भी जीव ग्रहण में नहीं आया। जब यह बताया जाय कि जीव तो ज्ञानमात्र है, जाननमात्र है, जानन स्वरूप है। हाँ कोशिश करो। जानन कि से कहते हैं केवल जानन में राग द्वेष की बात नहीं होती, ऐसा जाननमात्र जीव है? ऐसा जब भावों की प्रधानता से जीव का स्वरूप बताया जाता है तो समझ में आता है कि ओह, यह मैं जीव हूँ।

द्रव्य क्षेत्र काल भाव की प्रधानता में विशिष्ट अर्थ जाति का सुगम परिज्ञान- यह जीव भावप्रधान है और पुद्गल द्रव्यप्रधान है, आकाश क्षेत्रप्रधान है और काल कालप्रधान है। अब धर्म और अधर्म द्रव्य बचे सो ये अन्य चारों की अपेक्षा भी बहुत देर में समझ में आते हैं। सबसे पहले झट समझ में आता है पुद्गल। यह धरा है, सब आ गया समझ में और उस से कुछ देर में समझ में आता है जीव, और कुछ और श्रम कर के समझ में आता है आकाश। उस के बाद और श्रम करें तो काल भी समझ में आ जाता है, किंतु ये धर्म और अधर्म बहुत युक्ति और श्रम से श्रद्धा से ज्ञान में आते हैं। इन धर्म और अधर्म रूप भी मैं नहीं हूँ। ज्ञान भिन्न है और यह धर्मद्रव्य और अधर्मद्रव्य भिन्न है। ऐसा जैन शासन में कहा है। अब काल के संबंध में भेदविज्ञान बताते हैं।


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