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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:समयसार - गाथा 412

From जैनकोष



मोक्खपहे अप्पाणं हवेहि तं चेव झाहि तं चेव।

तत्थेव विहर णिच्चं मा विहरसु अण्णदव्वेसु ।।412।।

आचार्यदेव का मूल उपदेश ― हे भव्य पुरूषों ! आत्मा का तत्त्वदर्शन, ज्ञान, चारित्ररूप रत्नत्रय ही आत्मा है। इस कारण मोक्षमार्ग के प्रयोग के लिये एक इस मोक्षमार्गस्वरूप आत्मा की सदा सेवा करनी चाहिये। यह आत्मा अनादिकाल से रागद्वेषादिक परद्रव्यों में, परभावों में अपनी ही प्रज्ञा के दोष से ठहराते हुआ चला आ रहा है,फिर भी संकटों से दूर होना है तो अपनी ही प्रज्ञा के गुण से उन रागद्वेषादिक भावों से अपने को हटाकर दर्शन ज्ञान चारित्र स्वरूप में अपने इस आत्मा को अतिनिश्चलरूप से अवस्थित करो ।

मुक्ति के उपाय में एकमात्र निर्णय ― यह जीव संसार में रुलता है तो अपनी प्रज्ञा के दोष से और संसार के समस्त संकटों से छूटता है तो अपने ही प्रज्ञा के गुणों से। सो प्रज्ञा के दोष से अब तक रुलता आया। अब प्रज्ञा में ऐसा गुण प्रकट करें, ऐसा उत्कर्ष हो कि इन सर्वविषयक बाधावों से निवृत्त होकर अपने आप में अपने को लगा सकें। यह केवल अंतर में भावात्मक प्रज्ञा की बात है। इसमें किसी परद्रव्य की अपेक्षा न चाहिए। मेरे पास इतना धन हो तो मैं इस धर्म को कर सकूँ, ऐसी धर्म करने में धन की अपेक्षा नहीं है, मेरे कुटुंब परिजन के लिए इतना हो तो धर्म कर सकूँ, ऐसी आत्मा को कुटुंब परिवार की अपेक्षा नहीं है। धर्म तो इस ज्ञानस्वभाव के दर्शन के आश्रय से अपने आप में ज्ञानात्मक होता है। इस कारण एक ही निर्णय रखो, अपने इस आत्मतत्त्व को अपने आप में अति निश्चलरूप से ठहरावो और समस्त अन्य चिंतावों का निरोध करके एक उपयोगमय इस आत्मा में ही एकाग्रचित्त होकर इस दर्शन ज्ञान चारित्र स्वरूप आत्मा को ही ध्यावो।

परमार्थ शरण- हे भव्य ! तेरे आनंद के लिए, तेरे कल्याण के लिए तुझे संकटों से बचने के लिए मात्र एक तेरे सहज अंतस्तत्त्व का आलंबन शरण है। इस शरण को छोड़कर जगत में कहीं भी भटक कर देख लो, खोज लो, परमाणु मात्र भी अन्य पदार्थ कुछ भी शरण नहीं हो सकते। कैसे शरण हों? प्रत्येक पदार्थ अपने स्वरूप रूप रहते हैं। इस कारण तेरा इस लोक में अन्य कोई आत्मा शरण नहीं है। देखो इस ज्ञानामृत का पान करते रहोगे तो तुझे कोई संकट न होगा। और इस ज्ञानामृत को छोड़कर अज्ञान कल्पना विष का पान करोगे तो खुद ही बरबाद होओगे, संसार में रुलोगे। जो बन सकता हो सो करो और जो न बन सकता हो तो करने की प्रतीति तो दृढ़ रखो कि मेरा आत्मा ही मेरे को शरण है, इस आत्मा की सहजवृत्तिरूप से हमें परिणति करना है। मुझसे सर्व परिजन मित्रजन उतने ही जुदे हैं जितने जुदे संसार के अन्य समस्त जीव हैं। न अन्य जीवों से मुझे कुछ मिलेगा और न इन परिजनों से मुझे कुछ मिलेगा। बल्कि अन्य जनों से बिगाड़ तो न होगा, परिजनों के राग से एक बिगाड़ ही हाथ रह जायेगा, लाभ कुछ न होगा।

ज्ञानसंचेतन का उद्यमन - भैया ! अन्य सर्वचिंतावों को छोड़ो और समस्त चिंतावों का निरोध करके, अपने आत्मा में एकाग्र होकर एक दर्शन ज्ञान चारित्रात्मक आत्मा को ही ध्यावो और चेतो तो इस रत्नत्रय स्वरूप आत्मा को ही। एक इस ज्ञानचेतना के अतिरिक्त अन्य सर्व चेतना दो भागों में विभक्त है- कर्म चेतना और कर्मफल चेतना। इसका वर्णन बहुत विस्तारपूर्वक किया गया है। अज्ञान को छोड़ कर अन्य भावों में अन्य पदार्थों में मैं इसे करता हूँ, इस प्रकार की भावना का नाम कर्मचेतना है। ज्ञान के अतिरिक्त अन्य भावों में, अन्य द्रव्यों में मैं इसे भोगता हूँ ऐसी चेतना का नाम कर्मफलचेतना है। इन दोनों चेतनावों का संन्यास करके शुद्धज्ञान चेतनामय होकर इस रत्नत्रयस्वरूप आत्मा को ही चेतो।

कर्तव्य की जीवन में करणीयता- जब कभी परिजनों की ओर से, मित्र जनों से धोखा होता है तो हैरान होकर उन से अलग होकर रूसे से बैठ जाते हैं। यदि ज्ञानबल से पहिले ही समस्त पदार्थों को भिन्न अहित असार जानकर उन की उपेक्षा करके अपने में विश्राम कर लें तो इसका कुछ सुफल भी है। जैसे लोग मरते समय सब कुछ छोड़ जाते हैं, उन्हें छोड़ना ही पड़ता है। यदि जीवन में कुछ संन्यास करें तो इसे कुछ सुफल भी मिले अथवा जैसे मरते समय हजारों लाखों का दान किया जाता है, यदि जीवन में ही थोड़ा ही थोड़ा दान करने की प्रकृति बनाए तो उसे कुछ विशिष्ट सुफल भी मिलता है। मरते समय तो यह सब कुछ नजर आ रहा है कि छूट तो रहा ही है, इस द्रव्य को ऐसी जगह लगा दें जिस से हमारा नाम चले। जान रहे हैं कि छूट तो रहा ही है, जरा कुछ भले भी बन जायें लोगों के। यह तो रिपट परे की हर गंगा जैसा हुआ। विवेक पूर्वक प्रज्ञा के गुणों से अपने जीवन में वे सब बातें की जाती रहें जो धर्म बुद्धि वाले पुरुष मरते समय सोचते हैं तो उन्हें कुछ मार्ग भी मिलता है।

चिद्ब्रह्मविहार का संदेश- अज्ञानी जीव कहां-कहां भटक रहा है, किन-किन क्षेत्रों में विहारकर, मरकर, जीकर किन-किन समयों में इसने अपना रंग बदला, किन-किन भावों में यह विहार करता रहा, रुलता रहा, घूमता रहा? अरे उन सब घटनावों को त्यागकर उन की ओर दृष्टि न कर इसको दर्शनज्ञानचारित्रमयरूप आत्मतत्त्व में विहार करा। देख, द्रव्य के स्वभाववश से यह दर्शनज्ञानचारित्रमय गुण बढ़ते रहते हैं। इस आत्मा का नाम ब्रह्म है, अर्थात् जिस के गुणों के बढ़ने का स्वभाव हो उसे ब्रह्म कहते हैं। जैसे कोई किवाड़ ऐसे होते हैं कि लगे ही रहते हैं, खोलने के लिए श्रम करना पड़ता है। उसमें ऐसा ही एक स्प्रिंग वाला पेंच लगा होता है कि वह अपने आप लगने के लिए तैयार बना रहता है। यों ही आत्मा का यह ब्रह्मगुण चैतन्यस्वभाव अपने उत्कृष्ट विकास से बढ़ने का ही स्वभाव रखता है। ये विषय कषाय, ये कर्मों के उदय निमित्तरूप से, साक्षात् रूप से आक्रामक किए हुए हैं, दबाये हुए हैं। इस कारण ये दबे पड़े हैं। जरासा आक्रामक हटे तो, इसके बढ़ने का ही स्वभाव है और यह बढ़ता ही है। इसी कारण इस चैतन्य को चित्ब्रह्म कहते हैं।

परद्रव्यों में विहार का निषेध ― आत्मद्रव्य के स्वभाव के वश से आत्मा के तो गुणों का प्रतिक्षण बढ़ते रहने की शीलता है, अत: आत्महितार्थी दर्शन ज्ञान चारित्रात्मक परिणामी होकर दर्शन ज्ञान चारित्र में ही विहार करता है। हे भव्य पुरुषों, बहुत जगह भटके, बहुत जगह रुले, अनेक विभावों में अनेक क्षेत्रों में, अनेक प्रसंगों में अपने को भटकाया है, अब उन सब घटनावों को त्यागकर एक निज ज्ञायक स्वरूप में ही विहार करो। अर्थात् अपने उपयोग को इस ज्ञायकस्वरूप के दर्शन में ही लगाओ। देखो अब किसी भी परद्रव्य में तू जरा भी मत विहार कर। मनाक् भी विहार मत कर। हिंदी में बोलते हैं ना, तनक मनक। वह मनक शब्द अत्यंत रंच बात को बताने वाला है। तू परद्रव्यों में मनाक् भी विहार मत कर। किन किन परद्रव्यों में? ये बाहर पड़े हुये खंभा, चौकी, मकान इन में विहार के मना करने की, बात नहीं कही जा रही है, वे तो अत्यंत पृथक् ही हैं, किंतु स्वक्षेत्र रूप से उपाधि बन बनकर चारों ओर से सर्व आत्मप्रदेशों में दौड़कर जो परद्रव्य आ रहे हैं अर्थात् जो ज्ञेयाकार बन रहे हैं उन परद्रव्यों में अपने आप में मौजूद हुए परद्रव्यों में तू विहार मत कर।

आत्मा द्वारा बाह्य पदार्थों में विहार की अशक्यता ― इन बाह्य पदार्थों में तो कोई जीव विहार कर ही नहीं सकता। अपना आत्मा किसी परद्रव्य के स्वरूप में प्रवेश कर जाय, विहार करने लगे ऐसा हो ही नहीं सकता, किंतु ज्ञेयाकार रूप से सर्व ओर दौड़ रहे इन परद्रव्यों में तू विहार मत कर। इस आत्मा के उपयोग में जो ये सर्व पदार्थ आ जाते हैं कोई बता सकता है कि इस ज्ञान में सामने से आता है कि पीछे से आता है कि ऊपर से आता है कि नीचे से आता है। कैमरे के फोटो में कुछ ऐसा मालूम होता है कि फोटो तो इस द्वार से आया है। ज्ञान में यह ज्ञेयाकार उस फोटो के मानिंद है, वह किस ओर से आया करता है? भले ही हम आँखों से देखते हैं और इन पदार्थों का ज्ञान करते हैं किंतु ये पदार्थ ये ज्ञेय आँख के द्वार से नहीं धंसते हैं किंतु ये समस्त ज्ञेय सर्व ओर से प्रवेश करते हैं। तो चारों ओर से धावा बोलने वाले इन समस्त परद्रव्यों में तू रंच भी विहार मत कर। अवश हो कर बड़ी ही जल्दी दौड़कर कोई घुस जाय तो उसे धावा बोलना कहते हैं।

विभावों में विहार का निषेध ― द्रूतगति से दौड़कर आने में संस्कृत में धाव धातु का प्रयोग होता है, सर्वत: एव प्रधावत्सु। आत्मा में सर्व ओर से धावा बोलने वाले परद्रव्यविषयक ज्ञेयाकारों में तू विहार न कर, किंतु इन ज्ञेयाकारों का आश्रयभूत जो एक स्वच्छ ज्ञान स्वभाव है तू ऊपर के जल से हटकर, इस भीतर के गंभीर जल में डुबकी लगाकर भीतर में अपने स्वच्छ ज्ञानस्वभाव के रस में मग्न हो। यहाँ बाहर बिहार मत करो, बाहर से मतलब शरीर से बाहर की बात नहीं कही जा रही है किंतु अपने ही ज्ञानसिंधु में ऊपर से तैरने वाले ज्ञेयाकारों को बाहर बताया जा रहा है और उन बाहर तैरने वाले ज्ञेयाकारों के स्वरूप से विविक्त, इसके आधारभूत, जिस पर ये तरंगें उठी हैं ऐसा भीतर में पड़ा हुआ निस्तरंग जो स्वच्छ ज्ञानस्वभाव है उस ज्ञानस्वभाव में विहार कर। उसका उपाय क्या है कि उसको ज्ञानरूप से ही अचलितपने के ढ़ंग से अवलंबित करो।

आत्महित के अर्थ सकलसंन्यास ― जैसा देखेगा तैसा ही पावेगा। अपने आप के सहज स्वभाव का अवलंबन दृढ़ता से करके अब तू ज्ञेय उपाधि के रूप से ज्ञेयरूप से चारों ओर से धायकर आये हुए इन परद्रव्यों में तू रंच भी विहार मत कर। एक दर्शनज्ञानचारित्रात्मक ही मोक्ष का पथ है। भला बतावो जो ज्ञान में आया हो परद्रव्यविषयक विकल्प तरंग, उनमें जब विहार करने का मना किया जा रहा है वहाँ तन, मन, वचन की चेष्टा रूप जो असहज प्रवृत्तियां है, बाह्य व्रत हो, बाह्य तप हो, बाह्य संयम हो, उनमें विहार करने का, रमने का तो विवेकी इच्छा नहीं करेगा। इस भव्य पुरुष ने सर्वोत्कृष्ट अनुपम आनंद का लाभ लिया है, किसी कीमत पर यह इसको छोड़ना ही नहीं चाहता। हजारों लाखों मनुष्य चरणों में गिर रहे हैं, पूजा कर रहे हैं, स्तुति गान गा रहे हैं, भक्ति कर रहे हैं, लेकिन यह भव्य ज्ञानी संत सर्वोत्कृष्ट सारभूत इस चिदानंदमय स्वरूप की दृष्टि का परित्याग नहीं करना चाहता और लोगों की प्रशंसा में हाँ में हाँ मिलाकर अपने को मस्त नहीं बनाना चाहता। उन सबसे यह विविक्त ही रहता है। पाया है कोई ऐसा अमूल्य निधान जिस के कारण यह जीव अपने में प्रसाद पाये हैं। किसी घटना में यह आकुल व्याकुल नहीं होता। हो गया ऐसा ठीक है। वह उस ही पदार्थ में हो गया।

परपरिणति से आत्महानि का अभाव – भैया ! यह बाह्य पदार्थ छिद जावो पर क्या यह निज आत्मतत्त्व उनके छिदने से छिद जाता है? नहीं। ये बाह्य पदार्थ छिद जायें, भिद जायें, टुकड़े- टुकड़े हो जायें तो क्या यह आत्मतत्त्व भी खंड-खंड हो जाता है? कोई इन बाह्य परिग्रहों को कहीं भी ले जावो, क्या उनके कहीं खोये जाने से यह आत्मा भी खोया जाता है? और खोये जाते तो परपदार्थ भी नहीं है, आप के पास कोई पदार्थ नहीं रहा तो उसे आप कहते हैं कि यह पदार्थ खो गया। अरे कहाँ खो गया? क्या उसकी सत्ता मिट गयी? क्या उसका कोई जाननहार नहीं रहा? अरे वो तो जहाँ होगा वहीं परिपूर्ण है। कहाँ खोया? ये बाह्य पदार्थ कहीं चले जावो, कोई ले जावो, तिस पर भी कोई परिग्रह मेरा कुछ नहीं है। मैं तो परिपूर्ण अनादि अनंत चिदानंदस्वरूप यह ज्यों का त्यों हूँ। ऐसे अपने ज्ञानानंद दर्शन, ज्ञान चारित्रात्मक आत्मतत्त्व में ही उपयोग करो।

आत्मवर्तना ― शुद्ध ज्ञान दर्शन स्वभाव वाले अर्थात् रागद्वेषादिक की जहाँ तरंग नहीं है ऐसा जानन और देखन का ही जिस का स्वभाव है ऐसे ज्ञानदर्शनस्वभावी निज आत्मतत्त्व को सहज स्वभाव के रूप में अपनाना, उसका ही ज्ञान करना तथा उसमें ही रमण करना यह है अभेदरत्नत्रय स्वरूप आत्मवृत्ति मोक्ष का मार्ग है। उस ही मोक्षपथ का अनुभव करो निर्विकल्प स्वरूप में ठहर करके अपने इस रत्नत्रयस्वरूप आत्मतत्त्व की भावना करो, उस ही में अपनी बर्तना बनावो। देखो अन्य विकल्पों में चाहे शुभ हो अथवा अशुभ हो, चाहे वे देखे सुने अनुभवे हों, भोगों की इच्छा रूप निदान बंध हो, अन्य किसी भी प्रकार के रागादिक भाव हों उनमें मत जावो अर्थात् उनमें परिणति मत करो। ऐसी हिम्मत तो बनाओ जो कि परिणमन इस समय हो रहा है वह भी मेरा स्वरूप नहीं है।

आत्मतत्त्व की परिपूर्णता ― देखो वह प्रभु पूर्ण है, यह मैं आत्मतत्त्व भी पूर्ण हूँ और इस मुझ पूर्ण से प्रतिसमय पूर्ण ही पूर्ण व्यक्त होता है। मेरी जो कुछ भी परिणति है वह अधूरी नहीं होती है। प्रतिसमय जो परिणमन है वह पूरा ही परिणमन है। आधा काम कुछ नहीं कहलाता है। जैसे एक द्रव्य आधा नहीं होता, एक प्रदेश भी आधा नहीं होता, एक समय भी आधा नहीं होता, इस ही प्रकार कोई भी एक परिणमन आधा नहीं होता। जो होता, है वह पूरा ही होता है। इस मुझ पूर्ण से पूर्ण ही प्रकट होता है। नया पूर्ण प्रकट होते ही पुराना पूर्ण का पूर्ण ही पूर्णरूप से विलीन हो जाता है और देखो इस मुझ आत्मतत्त्व से ये पूर्ण-पूर्ण सब निकल भागते है। तिस पर भी मैं सदा पूर्ण का पूर्ण ही रहता हूँ। ऐसे परिपूर्ण चिदानंदस्वरूप आत्मतत्त्व में ही तू विहार कराये चारों ओर से दौड़कर इस ज्ञान में जो ज्ञेयाकार बन जाते हैं उन ज्ञेयाकारों में विहार मत कर। देख तू ज्ञानस्वभावमात्र है, तू ज्ञेयाकार नहीं है। होता है तुझ में यह चित्रण, पर तेरा स्वरूप नहीं है, इस ज्ञान में ज्ञेयाकार आया, आश्रव हुआ। इस ज्ञान में ज्ञेयाकर न आने दो किंतु ज्ञानाकार ही रहने दो। आया है ज्ञेयाकार तो झड़ने दो, और तू ज्ञान संचेतन रूप से ही रह जा। यह आध्यात्मिक तत्त्व की व्यवस्था है। तू किन्हीं भी परद्रव्यों में विहार मत कर।

आत्मसेवा में ही आत्मानुभवन ― विशुद्ध ज्ञानदर्शन स्वभावी आत्मतत्त्व का श्रद्धान ज्ञान और आचरण होना ही मोक्ष का मार्ग है, यह बात पूर्णतया नियत है। मुक्ति का उपाय अन्य कुछ नहीं है। जो पुरुष उस ही मोक्षमार्ग में स्थिति करता है उसका ही सदैव ध्यान करता है उसको ही चेतता है और इस ही आत्मविलास में विहार करता है, ऐसे परम अनुराग के साथ किसी भी द्रव्यांतर को, किसी भी भावंतर को न छूता हुआ अपने में रमाता है वह नियम से अपने आत्मा का जो निज सहज स्वरूप है उसका अनुभवन कर लेता है।

ब्रह्म की विकासपरता ― जैसे एक कथानक कहा था ना कि मुनि और धोबी दोनों लड़ पड़े और धोबी का तहमद भी खुल गया था उस समय मुनि कहता है कि अरे कोई देवता नहीं है क्या, कोई देवता जानता नहीं है क्या कि यहाँ मुनि पर उपद्रव हो रहा है? तो देवतावों का उत्तर आया कि हम तो पहिले से तैयार खड़े हैं सहायता के लिए, पर हम नहीं समझ पा रहे हैं कि इन में मुनि कौन है और धोबी कौन है? इसी प्रकार अपने आप में बसा हुआ यह समयसार मानो कह रहा है कि हम तो आनंद को लिए ही तैयार खड़े हैं, तुम को आनंद देने वाले हम ही हैं, पर तू उल्टा चल रहा है सो तू इस आनंद को प्राप्त नहीं कर पा रहा है। यदि तू मेरी ओर अपना मुख कर ले तब फिर तुझे आनंद देने के लिए मेरा वश चलेगा। तू मेरी और मुख नहीं करता सो मेरा वश भी तुझे आनंद देने के लिए नहीं चल पाता। देख तू मेरी ओर मुख कर, तब तो तेरा विलास और विकास होगा ही। तू सदा के लिए आनंदमग्न होगा।

ममता के अभिशाप – भैया ! कुछ समय को चर्चा चलती है, पर ढाक के तीन पात हो जाते हैं। कोई कितना ही प्रस्ताव करे, मगर ढाक के पेड़ में एक छोटी डाली में जब पत्ते होंगे तीन ही होंगे। ऐसी ही प्रकृति इन मोहियों में पड़ गयी है कि तिकड़म में ही सदा रहेगा। जो अपने इस आत्मतत्त्व का सेवन करता है उसको ही मोक्ष की प्राप्ति होती है। अपने इस स्वयं के स्वरूप रूप मोक्षमार्ग को छोड़कर व्यवहारमार्ग में अपने आत्मा को स्वच्छंदतया छोड़कर इस द्रव्यलिंग में इस निर्ग्रंथ भेष में जो अपनी ममता को ढोते हैं वे तत्त्वज्ञान से शून्य हुए इस जगत में रुलते रहते हैं। अब तक भी वे अपने आप में ब से हुए समय के सार को नहीं देखते हैं ।

ज्ञाननेत्रपर ममता की फुली--- भैया! जगत के जीव बाह्य पदार्थ का करते कुछ नहीं हैं किंतु ममता को ही ढोते रहते हैं। किसी बाह्य चीज का इसमें बोझ नहीं आता है और न किसी बाह्य बातों को ढोते हैं, किंतु एक ममत्व को ही ढोते हैं। ऐसे पर्यायव्यामोही अज्ञानीजन समयसार को कुछ भी नहीं देख सकते हैं जो कि हमारी सर्वसिद्धि के लिए पर्याप्त है। स्वभाव की किरणों से जिस का वैभव सुशोभित है, नित्य उदित है, उद्योत रूप है। इसका कोई बाधक नहीं है। ऐसा जो अपने आप में स्वभाव है उस अखंड परिणामिक भाव को यह तत्त्वबोध से रहित पुरुष देख नहीं सकता है कि इस आत्मा की कैसी भी निम्न अवस्था हो जाय, फिर भी आत्मा के स्वभाव को कोई ठेस नहीं पहुंचा सकता है। यह जब भी है तब भी अपने स्वभाव में उसही समान है जैसा कि परमात्मा। उस स्वभाव के तत्त्वमर्म से अपरिचित पुरुष कितना भी बाह्य में क्रियाकांड और बाह्य व्रत तप करे किंतु अंतर की गुत्थी नहीं सुलझती है। वह अंतर में कारण परमात्मतत्त्व के दर्शन तो नहीं कर सकता।

त्याग का महत्त्व ― जो बाहरी बातों का त्याग करता है उनमें ममत्व नहीं रखता है उस के अंतर में कोई अपूर्व निधि प्रकट होती है। जैसे घर के 5-7 बालकों में से जो बालक सीधा है, न ऊधम करे, न चीज मांगे, न पैसा मांगे और बड़ी अच्छी प्रकार से रहे, खाने पीने की चीज भी कोई दे तो उसमें राग न करे, मना करे उसको माता पिता अधिक से अधिक क्या दे दूं ऐसा परिणाम रखते हैं और जो लड़-लड़ करके चीज मांगे उस से तो माता पिता चीज छुपाते हैं कि देख न ले। त्याग की महिमा सब जगह है चाहे बालक हो, चाहे कोई हो। यों ही सब कुछ धर्माचरण करके व्यवहार के विभावों को जो मना करता है, न प्रशंसा चाहिए, न प्रतिष्ठा चाहिए, न यश नाम चाहिए, सब को जो मना करता है उस के अंतर में जो अपूर्व निधि प्रकट होती है और बाहरी चीज मांग ले तो उसको अंदर की चीज नहीं मिलती है। 11 अंग 9 पूर्व का साधन हो जाने पर, सिद्धि हो जाने पर जब विद्यानुवाद नामक दशम पूर्व की साधना में आता है और अनेक विधाएँ सामने आती हैं और वे प्रार्थना करती हैं कि हम आप के सेविका है, आप आज्ञा करो नाथ! जो हुक्म दोगे उसको पूर्ण करेंगी। तब ये नवाब सब हर्ष के मारे फूले नहीं समाते, बस वहीं से पतन हो जाता है।

माया और परमार्थ का परस्पर विरुद्धत्व ― जो संसार के मायामय तत्त्वों में रुचि करता है उसे परमार्थ कहाँ से प्राप्त हो? मा और या तो विरोधी हैं। जो इंद्रजाल नहीं है वह या है। ऐसा यह अपने आप के तत्त्व का रुचिया इस अखंड नित्य उद्योतरूप अपने स्वभाव की प्रज्ञा से प्रागभाररूप इस समयसार को प्राप्त करता है और तत्त्वविमुख पुरुष द्रव्यलिंग में, निर्ग्रंथ भेष में अथवा गृहस्थभेष में एक ममता को ढोता रहता है। इस ही बात को कुंदकुंदाचार्यदेव अगली गाथा में स्पष्ट बताते हैं।


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