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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:समयसार - गाथा 45

From जैनकोष



अट्ठविहं पि य कम्मं सव्वं पुग्गलमयं जिणा विंति ।

जस्स फलं तं वुच्चइ दुक्खं ति विपच्चमाणस्स ।।45।।

56. कर्म की पुद्गलमयता―आठों ही प्रकार का जो कर्म है वह सब पुद्गलमय है ऐसा जिनेंद्रदेव जानते हैं । उस विपच्चमान पुद्गलकर्म का जो फल है वह दुःख ही है ऐसा आगम में कहा गया है । आठ प्रकार का जो कर्म है, वह पुद्गलमय है । यद्यपि कर्म दिखाई नहीं देता है, परंतु आत्मा में जो खराबियाँ उत्पन्न होती हैं वे आत्मा में उत्पन्न हुई हैं, यह अवश्य समझ में आता है । जब रागादिक भाव होते हैं वे अनुभव में आते हैं । अत: स्पष्ट है कि कोई परपदार्थ आत्मा में रागादि उत्पन्न करने में निमित्त कारण स्वरूप है । जिसके संबंध से राग होता है वह निमित्त आत्मा के स्वभाव से उल्टा होना चाहिए । जैसा चैतन्य स्वरूप मैं हूँ, वैसा चैतन्य स्वरूप पदार्थ राग उत्पन्न होने का कारण नहीं हो सकता है । कर्म पौद्गलिक है, अचेतन है, अत: वह राग के उत्पन्न होने में निमित्त कारण है ।

57. दुःख की कर्मफलरूपता―दुःख कर्म का फल है, अत: दुःख कर्म का अविनाभावी है, दुःख आत्मा का स्वभाव नहीं है । जैसे किसी का लड़का जुआरी है, उसकी माँ कहती है कि यह तो अमुक लड़के की आदत लग गई याने अमुक के लड़के ने हमारे लड़के को यह आदत सिखा दी है । इसका भाव यह है कि पर के लड़के को निमित्त पाकर यह लड़का जुआरी बना है । उसी प्रकार आत्मा में जो दुःख उत्पन्न हुआ है, वह कर्म का फल है । कर्म का बंध न हो तो फल अच्छा मिलेगा । अब इस मनुष्यभव को पाकर अपने जीवन को सुधारने का मौका मिला है अत: आत्मा को दुःख से निवृत्त करने का उपाय करना चाहिए । व्यर्थ के कषाय भावों में, अहंकार ममकारों में समय नहीं बिताना चाहिए । तेरे में ऐसी कौनसी चीज है―जिसका तू घमंड करता है? कर्म के उदय में आने पर कर्म का जो फल मिलता है, वह दुःख ही है । आत्मा में परिणति होती है, परंतु आत्मा का स्वभाव नहीं है । रागादि पुद्गल के निमित्त के कारण होते हैं । कर्म के उदय से उत्पन्न इन रागादिक को उत्पन्न करने वाला निमित्त पुद्गल ही है । पौद्गलिक शब्द के दो अर्थ हैं:―1-जो पुद्गल के निमित्त से हुआ हो, और 2-पुद᳭गल की ही परिणति हो । रागादि चैतन्य के परिणमन है, परंतु कर्म के निमित्त से राग, द्वेष, मोह उत्पन्न होते हैं । रागादि को न पुद्गल के ही कह सकते और न आत्मा के । रागादि कर्म का निमित्त पाकर आत्मा की विभाव पर्याय मानी जाती है । रागादि निमित्त रूप से पौद्गलिक हैं, उपादान रूप में नहीं हैं । आकुलता नाम दुःख का है । जीव के दुःखादिक में पुद्गल द्रव्य निमित्त पड़ता है । जैसे दर्पण है । दर्पण लाल चीज का निमित्त पाकर लाल हो गया । तो दर्पण की लालिमा दर्पण के निमित्त से तो नहीं बन गई । यदि रागादिक का निमित्त आत्मा है तो रागादि आत्मा से कभी नहीं छूटने चाहिएं । परंतु देखा जाता है कि रागादि का आत्मा से सर्वथा अभाव हो जाता है । अत: रागादि कर्म के निमित्त से ही हैं । रागादि पुद्गल कर्म के निमित्त से आत्मा के स्वभाव के विकार का नाम हैं । रागादि आत्मा में होते हैं, यह कष्ट है, आत्मा की विपत्ति है । रागादि को नष्ट करके संसार से छूट सकते हैं । अपना ध्यान, अपनी चिंता विशेष रहे । चैतन्य में रागादि होते हैं, फिर भी रागादि को चैतन्य का स्वभाव न मानो, किंतु पुद्गल का स्वभाव मानो ।

58. अज्ञानियों का पुद्गलविपाक से लगाव―शंकाकार ने जो कई प्रकार के आशय बताये हैं पर को आत्मा मानने के वे सबके सब पौद्गलिक हैं । उनमें से कुछ तो हैं पुद्गल के निमित्त से उत्पन्न होने वाले और कुछ स्वयं पुद᳭गल उपादान वाले, सो जो पुद᳭गल उपादान वाले हैं वे तो प्रकट भिन्न ही हैं और जो पुद᳭गल के निमित्त से उत्पन्न हुए हैं अर्थात् पुद्गल के उदय का फल है वह भी दुःखरूप है, और पुद्गल के निमित्त से जायमान होने के कारण पौद्गलिक हैं । आठों प्रकार के सारे ही कर्म पुद्गलमय बताये गए हैं जिनका कि उदय काल आता है तो उस समय दुःखरूप फल हुआ करते हैं । राग, द्वेष, मोह आदिक उत्पन्न करने वाले हैं ये 8 प्रकार के कर्म । वे सब पुद्गलमय हैं । उनका विपाककाल जब आता है तो फल मिलता क्या है? दुःख, जो कि आत्मा के स्वभाव से बिल्कुल विपरीत है । आत्मा का स्वभाव तो है अनंतसुख, परमशांति, उससे विलक्षण है यह दुःख । तो जितने भी ये भाव हैं वे सब आकुलतामय हैं, इस कारण यद्यपि वह आत्मा में संबंध है और अन्वयरूप से आत्मा में रहते हैं, आत्मा के परिणमन हैं, फिर भी वे आत्मस्वभाव नहीं हैं किंतु पुद्गल स्वभाव हैं । यहाँ अब शंकाकार यह पूछता है कि यदि अध्यवसान आदिक भाव पुद्गल स्वभाव हैं तो उन्हें जीवरूप से फिर क्यों कहा गया अनेक खंडों में । चार गतियाँ होती हैं आदिक वर्णन जीवों के बारे में फिर शास्त्रों में क्यों कहा गया है? उसका उत्तर देते हैं ।

59. देह देवालय में निज सनातन देव का दर्शन―आत्मा के संबंध में मोही जीव की नाना प्रकार की कल्पनाएं हुई । किन्हीं ने राग की संतान को आत्मा कहा, किसी ने सुख दु:ख को आत्मा जाना, किसी ने शुभ-अशुभ भाव में जीव की कल्पना की, कोई अज्ञानी शरीर को ही आत्मा मान बैठा, किन्हीं ने कर्म को आत्मा की संज्ञा दी, कोई जीव और कर्म के मिश्रण को आत्मा मानता है, परंतु ये सब पदार्थ आत्माएं नहीं हैं । आत्मा का वह लक्षण है, जो आत्मा में त्रैकालिक निर्विकल्प पाया जाता है, वह है चैतन्य । चैतन्य स्वभाव आत्मा है, ऐसा ज्ञानियों ने अनुभव किया । उस चैतन्य स्वभाव आत्मा को कहां खोजा जाये, यह योगींद्रों ने कहा कि यद्यपि वह आत्मा देह में बस रहा है, परंतु देह को छूता तक नहीं है । देह अपना देवालय है, जिसमें वह कारणपरमात्मा अभी निवास करता है । यह देह देवालय है, क्योंकि इसमें वह देव बसता है जिसे स्वभावदृष्टि से देखा जाये तो वही परमात्मा नजर आता है । स्वभावदृष्टि से देखा गया वह चित्स्वभाव आत्मा कारणपरमात्मा है । वह कारणपरमात्मा देह में बसता हुआ भी देह को न छूता है और न वह देह से अलग है याने देह से जुदे बाहर के आकाश में । जो समताभाव में स्थित हैं, ऐसे योगियों को परमात्मा दिखाई पड़ता है । परमात्मा के अवलोकन का बाधक अहंकार और ममकार है । अहंकार और ममकार का अभाव हो तो परमात्मतत्त्व अनुभव में आता है । एक गाँव में एक नकटा रहता था, उसे लोग नकटा ही कहते थे । एक दिन उस नकटे ने कहा कि इस नाक की नोक के ओट में परमात्मा नहीं दिखाई देता है, जब इस नोक को काट दिया जाता है, तो साक्षात् परमात्मा के दर्शन हो जाते हैं । जो उसको चिढ़ा रहा था, उसने कहा यदि ऐसी बात है तो मेरी भी नाक की नोक काट दो । नकटे ने दूसरे आदमी को भी छुरी लेकर नकटा कर डाला । फिर पूछा कि अब तुझे परमात्मा दिखाई देता है? उस नये नकटे ने कहा कि नहीं । फिर पूर्व नकटे ने उसे उल्टी पट्टी पढ़ाई कि अरे, तू तो नकटा होने के साथ पागल भी हो गया है और कहा कि अब यदि तेरे से कोई नकटा कहे तो तू उसे समझा दिया कर कि इस नाक की नोक की ओट में परमात्मा दिखाई देने में बाधा पड़ती है । इस प्रकार लोग नये नकटे को नकटा कहने लगे । जो उसे नकटा कहते उससे वह कह देता―भैय्या, इस नाक की नोक की ओट में परमात्मा दिखाई पड़ने में बाधा पड़ती है, परमात्मा दिख जाने की तृष्णा से लोग नाकें कटाने लगे । इस प्रकार उस नगर में सभी नकटे हो गये । एक दिन राजगृह में मीटिंग होनी थी, सभी लोग पहुंचे । सबको नकटे (नाक कटे) देखकर राजा को अपनी नाक की चोंच बहुत भद्दी मालूम पड़ने लगी । उसने पूछा कि भाइयों, आप लोगों की नाकें तो बहुत सुंदर हैं, मेरी नाक की चोंच बहुत भद्दी मालूम पड़ती है । सब लोग बोले कि राजन् इस नाक की नोक के हटने पर परमात्मा के दर्शन होते हैं, तो राजा ने कहा फिर तो मेरी भी नाक काट दो । मूल नकटा (जो सबसे पहले नकटा था) बोला कि राजन् मैं आपसे एकांत में कुछ पूछना चाहता हूँ । एकांत में कहा, आप इन झूठों के फेर में मत पड़ो, ये सब झूठ बोलते हैं, मैं भी झूठ बोलता हूँ । उसने सारी वास्तविक बात राजा से कह दी । अब इसका मर्म देखो नाक माने वास्तव में मान है । अर्थात् नाक के (मान के) कटे जाने पर, नष्ट होने पर परमात्मा के दर्शन हो जाते हैं । परमात्मा के दर्शन में बाधक अहंवृत्ति ही है । मैं विद्वान् हूँ, मैं श्रीमान हूँ मैं त्यागी हूँ, मैं मुनि हूँ, इस तरह की आत्मबुद्धि को मान कहते हैं । देह को अलग माने बिना आत्मबुद्धि कर ही नहीं सकते । शरीर ही आत्मा है, ऐसा जिसके दिमाग में जम जाये, वही शरीर को धनी, पंडित कहा करता है । पर जिसमें यह आत्म-बुद्धि खतम हो जाये और समताभाव जगे तो साक्षात् परमात्मा के दर्शन हो जाते हैं ।

60. परमपारिणामिक निज कारणसमयसार की उपासना―परमात्मा दो प्रकार से हैं―(1) कारणपरमात्मा और (2) कार्यपरमात्मा अरहंत-सिद्ध हैं । कार्यपरमात्मा किस बात विशेष के होने से बन गये? अरहंत सिद्ध में कोई नई बातें आ करके जम नहीं गई । उनके चैतन्यस्वभाव का विकास हो गया है । वह चैतन्यस्वभाव जिसका पूर्णत: विकास कार्यपरमात्मा कहलाता है, कारणपरमात्मा कहलाता है । चैतन्यस्वभाव ही कारणपरमात्मा है । चैतन्यस्वभाव जिसके न हो, ऐसा कोई जीव नहीं है । समस्त जीव कारणपरमात्मा हैं । कोई भी जीव ऐसा नहीं है, जो कारणपरमात्मा न हो । वह चैतन्यस्वभाव जिसे कारणपरमात्मा कहते हैं, वह सब आत्माओं में है । वह स्वभाव सब जीवों में है, परंतु अर्थ अनेकों के प्रच्छन्न है, अत्यंत प्रच्छन्न नहीं है, फिर भी बहुत कुछ अंशों में प्रच्छन्न है । जो चैतन्यस्वभाव थोड़ा प्रकट होते-होते जब पूर्ण प्रकट हो जाये वही कार्यपरमात्मा है । कारणपरमात्मा विशुद्ध परिणति का नाम नहीं है, पर विशुद्ध परिणति का नाम कार्यपरमात्मा है, उसका जो उपादान स्वभाव है वह कारणपरमात्मा है । स्वभावदृष्टि से प्रत्येक जीव कारणपरमात्मा है, अभव्य भी कारणपरमात्मा है । अभव्य के केवलज्ञानावरण होता है । यदि अभव्य के केवलज्ञान की योग्यता न हो तो केवलज्ञानावरण नहीं हो सकता है । अभव्य माने जिसके केवलज्ञान न हो सके । कारणपरमात्मा निश्चल है, अभेद्य है । कारणपरमात्मा, कारणसमयसार, पारिणामिक भाव, जीवत्व―ये सब कारणपरमात्मा के पर्यायवाची शब्द हैं । कारणपरमात्मा उस स्वभाव को कहते हैं कि जिसके अवलंबन से कार्यपरमात्मा बनते हैं । पूर्ण कार्यपरमात्मा अरहंत, सिद्ध हैं । कार्यपरमात्मा जिस स्वभाव के अवलंबन से बनते है? वह है कारणपरमात्मा ।

61. कारणपरमात्मा के प्रसंग में पारिणामिक भाव का विवरण―द्रव्यदृष्टि से भव्य और अभव्य दोनों समान हैं । शुद्धता की दृष्टि से उनके भेद कर लिए गये हैं । अनंत गुणों की अपेक्षा से सभी जीव समान हैं । द्रव्यों की जाति बनाने की यह पद्धति है कि तुम ऐसी बात बनाओ कि जो बात सबमें समान रूप से घट सके । जीव द्रव्य की दृष्टि से भव्य-अभव्य सभी समान है । अनंत गुण भव्य में हैं और वैसे ही अनंत गुण अभव्य में भी हैं । गुण विकास को प्राप्त हो, तब भी उसका नाम गुण ही है और गुण विकास को न प्राप्त हो, तब भी उसको गुण ही कहते हैं । यदि किसी द्रव्य में एक भी गुण कम या अधिक होता तो भी सात द्रव्य माने जाते । पारिणामिक भाव 4 हैं―1 शुद्ध जीवत्व, 2 दश प्राणरूप जीव, 3 भव्यत्व, 4 अभव्यत्व । इनमें से शुद्ध जीवत्व परमपारिणामिक भाव है और शेष के 3 अशुद्ध पारिणामिकभाव हैं । शुद्ध पारिणामिक भाव कारणपरमात्मा है । कारणपरमात्मा चैतन्यस्वभाव को कहते हैं । कार्यपरमात्मा बनने की योग्यता हो या न हो, सभी जीव कारणपरमात्मा हैं । कारणपरमात्मतत्त्व के आधार पर कार्यपरमात्मतत्त्व प्रकट होता है जहाँ फिर प्रतिसमय केवलज्ञान का विशुद्ध परिणमन होता रहता है । अत: जिसका आधार पाकर ज्ञानमय परिणति होती है उसे कारणपरमात्मा कहते हैं । यह देह देवालय है । परपदार्थ के अवलंबन से धर्मभाव उत्पन्न नहीं होता है । परपदार्थ के आश्रय से या तो पुण्य भाव होता है, या पाप भाव होता है । धर्म भाव तो स्व की दृष्टि बनाने से होता है । कार्यपरमात्मा अरहंत भगवान् की भक्ति करते यदि निज स्वभाव का अवलंबन हो जाये तो धर्मभाव होता है । यदि निज चित्स्वभाव का अवलंबन न हो तो भगवान् की भक्ति से पुण्य भाव प्रकट होता है । कोई गरीब, रोगी या असहाय धर्म नहीं कर सकता, यह बात नहीं है ।

62. कारणपरमात्मतत्त्व के आश्रय में धर्मविकास―वास्तव में चैतन्यस्वभाव के अवलंबन को धर्म कहते हैं । कारणपरमात्मा चैतन्यस्वभाव के अवलंबन का नाम नहीं है, किंतु चैतन्यस्वभाव का नाम है । चैतन्यस्वभाव का अवलंबन पर्याय है । जैसे यह अंगुली है । सीधी, गोल, टेढ़ी आदि अवस्थाओं से युक्त यह अंगुली है । परंतु सभी अवस्थाओं में रहने वाली अंगुली एक है । वह एक अंगुली अंगुली सामान्य कहलाती है । अंगुली सामान्य आंखों से नजर नहीं आती है । सब टेढ़ी, सीधी, गोल आदि सब अवस्थाओं में रहने वाली कोई एक अंगुली सामान्य है । इसी तरह आत्मा भी नाना पर्यायों को करने वाला कारणपरमात्मा है । वह एक, जो सभी पर्यायोंरूप परिणत हुआ, उस एक आत्मद्रव्य को स्वभाव दृष्टि बनाये तो जान सकते हैं । स्वभावदृष्टि से देखा गया आत्मा कारणपरमात्मा है । उस कारणपरमात्मा के अवलंबन से धर्म होता है । स्वभाव है कारणपरमात्मा, उसकी दृष्टि हो तो मोक्षमार्ग चलता है, और धर्म बनता है । यह नियम नहीं कि कारणपरमात्मा कार्यपरमात्मा बन कर ही रहे । अंतरात्मा, बहिरात्मा और परमात्मा का नाम कारणपरमात्मा नहीं है, किंतु कारणपरमात्मा की ये तीन (अंतरात्मा, बहिरात्मा और परमात्मा) पर्याय हैं । पारिणामिक भाव का नाम कारणपरमात्मा है । कारणपरमात्मा की दृष्टि होवे तो कार्यपरमात्मा बन सकते हैं । वह कारणपरमात्मा प्रत्येक जीव में मौजूद है । जो उसको जान ले या अनुभव कर ले वह कार्यपरमात्मा बन सकता है । उस स्वभाव की दृष्टि से धर्म प्रकट होता है । वह कारणपरमात्मा सबमें बस रहा है । जैसे दूध में घी सर्वत्र प्रत्येक अंश में व्याप्त है । दूध में घी कारण-घी है । दूध कहो और उसे कारण-घी भी कह सकतें हो । कारणपरमात्मा के दर्शन होने पर मिथ्यात्व खतम हो जाता है ।

63. पदार्थों का स्वतंत्र-स्वतंत्र अस्तित्व―प्रत्येक द्रव्य अपने प्रदेश में, अपने गुण में और अपनी-अपनी पर्याय में स्थित है, यह द्रव्य का स्वभाव है । प्रत्येक जीव अखंड सत् है । प्रत्येक पुद्गल द्रव्य अखंड है । अखंडत्व द्रव्य का लक्षण है । जिसका खंड होवे, उसे पर्याय कहते हैं । प्रत्येक द्रव्य अपना-अपना प्रदेश, गुण पर्याय रखता है । पुद्गल का एक-एक परमाणु अखंड है । जीवद्रव्य भी अखंड है । धर्म-अधर्मद्रव्य तथा आकाश, काल द्रव्य अखंड हैं । अनंतानंत परमाणुओं की मिलकर एक पर्याय बनी है उसे समानजातीय द्रव्यपर्याय कहते हैं । जीव और शरीर मिल कर एक बने, उसे असमानजातीय द्रव्य पर्याय कहते हैं । जिन्हें अपने व्यवहार में जीव कहते हैं, वे सब असमान-जातीय द्रव्य पर्याय हैं । जो अखंड है वह द्रव्य है । प्रत्येक द्रव्य अपने गुणों में, अपने-अपने प्रदेश और अपनी-अपनी पर्यायों में बसता है । ये परमाणु भले ही मिले हों, परंतु एक परमाणु दूसरे परमाणु के प्रदेश, गुण, पर्याय में नहीं जाता है । यह द्रव्य इतना ही अखंड है, इससे बाहर नहीं है, ऐसी प्रतीति द्रव्य के विषय में जाये तो मोह बली जल जायेगा । संबंध दृष्टि से पदार्थों को निरखना यह सब मिथ्यात्व है । पदार्थों को भिन्न-भिन्न देखे, उसे सम्यक्त्व का चिह्न कहते हैं । योगियों को परमात्मा महान् आनंद को उत्पन्न करता हुआ दृष्ट होता है ।

64. आनंद की आत्माश्रयता―दुःख सुख के लिये जीव को श्रम नहीं करना पड़ता । परंतु मोही जीव दुःख-सुख में श्रम न समझकर आनंद में अत्यंत श्रम समझता है । इस आत्मा में विकल्प न होने से समताभाव जागृत होता है । समताभाव के जगने से परमानंद प्रकट होता है । समस्त विकल्पों की आहुति देने पर, छोड़ देने पर परमात्मतत्त्व प्रकट होता है । परपदार्थ में आत्मबुद्धि ही परमात्मा के दर्शन में बाधक है । यह कारणपरमात्मा प्रत्येक प्राणी के देह में बसा हुआ है । हे योगी ! कर्म में निबद्ध होकर भी यह परमात्मा सकल (शरीर सहित) नहीं होता है । देह में बसता हुआ भी यह आत्मा सकल नहीं है । ऐसे आत्मा को कारणपरमात्मा कहते हैं । जो कारणपरमात्मा ज्ञानमयता की दृष्टि से ध्याया जाता है, मैं ज्ञानमात्र हूँ, ऐसा ध्यान बने और विकल्प न उठें―केवल यह ज्ञान ही उसकी आत्मा में रह जाये तो उसे कारणपरमात्मा के दर्शन होते हैं । योगीजन इस कारणपरमात्मा का निरंतर ध्यान करते हैं । जिनके उपयोग में यही चैतन्यस्वभाव रह गया उसे आत्मा का आत्मा में लीन होना कहते हैं। भगवान् के स्वरूप में उपयोग हो तो वह आत्मा में लीन होना नहीं है । भगवान् में उपयोग लगना, कषाय अशुभोपयोगरूप विपत्तियों को दूर करने के लिए है । भगवान् की भक्ति करने से आत्मा आत्मस्थ नहीं कहलाता है । किंतु कारणपरमात्मा की अभेददृष्टि से आत्मा आत्मरूप होता है । जो चैतन्यस्वभाव है, उसका पूर्ण विकास ही कार्यपरमात्मा है । कारणपरमात्मा की दृष्टि बने रहना यही कार्यपरमात्मा को प्रकट करना है ।

65. औपाधिक विकार स्वाभाविक तत्त्व नहीं―ये रागादिभाव होते हैं आत्मा में, परंतु कर्मोदय के निमित्त से होते हैं, अत: ये रागादि आत्मा का विकार हैं । स्वभाव वह कहलाता है, जो बिना किसी पर के निमित्त होता है और जो आत्मा के साथ त्रिकाल बना रहता है । रागादिक भाव पुद्गल के निमित्त से होते हैं, अत: इनको पुद्गल के स्वभाव कहा गया है । वस्तुत: रागादि किसी के स्वभाव नहीं हैं, न आत्मा के स्वभाव हैं, और न पुद्गल के ही । वस्तुत: रागादि पुद्गल के परिणमन नहीं हैं, अत: पुद्गल के स्वभाव नहीं हैं तथा रागादिक भाव आत्मा में त्रिकाल नहीं रहते, अत: आत्मा के स्वभाव भी नहीं हैं । तभी तो सांख्य लोग भ्रम करने भान की रागादि कहते हैं । कर्म को निमित्त पाकर ये रागादि आत्मा में होते हैं, ऐसा समझना चाहिए । अत: निमित्त की अपेक्षा से देखो तो रागादि पुद᳭गल का स्वभाव है और उपादान की अपेक्षा देखो तो आत्मा के स्वभाव के विकारभाव हैं । जैसे कोई खोटा कार्य करता है, उसे कोई कहता कि तुम्हारे कुल का यह काम नहीं है । जब उस व्यक्ति को गौख होता कि जो कार्य मैंने किया वह मेरे कुल के योग्य नहीं था, मुझे करना ही नहीं चाहिए था, इससे मेरे कुल में लांछन लगता है । इसी तरह आत्मा जिसका काम चैतन्यमात्र है रागादि बिल्कुल भी नहीं है । यदि वह राग-द्वेष मोह आदि अकृत्य कृत्य करे तो उसे ज्ञानी आचार्य समझाते कि अरे मूढ़ आत्मन् ! चेत, रागादि करना तेरे योग्य कार्य नहीं है । तब आत्मा को स्वयमेव गौख होता कि मेरा स्वभाव ज्ञाता-दृष्टा रहने का है । रागादि करना मेरा स्वभाव नहीं है । अत: इन रागादि को मैं फिर क्यों करता हूं?

66. रागादिभाव के स्वामित्व का विचार―प्रश्न―जिज्ञासु पूछता है कि आचार्यदेव फिर ये रागादि किसके स्वभाव हैं? उत्तर―ये रागादि पुद्गल के स्वभाव हैं । निमित्त दृष्टि से रागादि पुद᳭गल के मत्थे मढ़े गये । जैसे दर्पण है । दर्पण के सामने कोई खिलौना रख दिया गया तो दर्पण खिलौने को निमित्त पाकर खिलौना के आकार रूप दर्पण अपने में प्रतिबिंब बनाता है । यहाँ पूछा जा सकता है कि दर्पण में उत्पन्न हुआ प्रतिबिंबरूप दर्पण किसका स्वभाव है? यह प्रतिबिंब दर्पण का स्वभाव तो नहीं है । क्योंकि खिलौने का प्रतिबिंब दर्पण में पहले तो था नहीं । जब दर्पण के सामने खिलौना आया तो दर्पण खिलौनेरूप परिणम गया और जब खिलौना दर्पण के सामने से हटा दिया तो दर्पण में प्रतिबिंब भी हट जाता है, फिर प्रतिबिंब दर्पण का स्वभाव कैसे रहा? यदि खिलौने का प्रतिबिंब दर्पण का स्वभाव होता तो वह प्रतिबिंब दर्पण में त्रिकाल झलकना चाहिए था । यदि फोटो दर्पण का स्वभाव होता तो खिलौने का प्रतिबिंब खिलौना सामने आने से पहले भी आना चाहिए था, और खिलौना हटने पर भी खिलौना का प्रतिबिंब दर्पण में दिखाई देना चाहिए । जब खिलौने का प्रतिबिंब दर्पण का स्वभाव नहीं है, तो खिलौने का प्रतिबिंब खिलौने का ही स्वभाव होना चाहिए ? नहीं, खिलौने का प्रतिबिंब खिलौने का स्वभाव नहीं हो सकता । क्योंकि खिलौने की कोई चीजें खिलौने के बाहर दर्पण में नहीं जा सकती है, खिलौने की चीज खिलौने में ही रहती है । यदि प्रतिबिंब खिलौने का स्वभाव होता तो उसका प्रतिबिंब दर्पण में नहीं पड़ना चाहिए था । जैसे अपन लोग व्यवहार में कहते हैं कि यह किताब मेरी है, किंतु यह किताब मेरी तो नहीं है, कागज की है । उसी प्रकार यह प्रतिबिंब दर्पण का स्वभाव नहीं है । यदि प्रतिबिंब दर्पण का स्वभाव होता तो प्रतिबिंब दर्पण के साथ त्रिकाल रहता । प्रतिबिंब खिलौने का स्वभाव भी नहीं है । यदि प्रतिबिंब खिलौने का स्वभाव होता तो खिलौने से बाहर नहीं जाना चाहिए था । अत: प्रतिबिंब खिलौना और दर्पण का स्वभाव नहीं है । प्रतिबिंब खिलौने को निमित्त पाकर दर्पण के गुणों का विकाररूप परिणमन है । खिलौने को निमित्त पाकर दर्पण विभाव रूप परिणम गया । क्रीडनक दर्पणभाव वह फोटो है । ये रागादि पुद᳭गल स्वभाव हैं पुद्गल=कर्म, स्व=आत्मा और भाव=परिणमन । रागादि आत्मा के स्वभाव नहीं हैं, किंतु पुद᳭गल के स्वभाव हैं । कर्म को निमित्त पाकर आत्मा के भाव हैं । उपादान दृष्टि हो तो आत्मा के स्वभाव से रागादि हुए तथा निमित्त पर दृष्टि हो तो रागादि पुद्गल के स्वभाव हैं । वस्तुत: ये रागादि न पुद᳭गल के स्वभाव हैं और न आत्मा के ही स्वभाव हैं । रागादि तो भ्रम की अवस्था हैं ।

67. रागादि को पुद्गलस्वभाव जानकर अपना कर्तव्य―ये रागादि भाव पुद्गल के निमित्त से होने वाले आत्मा के परिणमन हैं । ऐसा जानकर रागादि भावों को आत्मा मत समझो । जो भी तुम पर परिणमन चल रहे हैं उन्हें तुम अपना मत समझो । पुद्गल के निमित्त से होने वाले रागादि को पुद्गल के स्वभाव मत समझो । यदि यह प्रतीति हो जाये कि रागादि मैं नहीं हूँ तो रागादि से तत्काल निवृत्ति हो जाये । जैसे कोई रास्ते पर दौड़ता जा रहा है । दौड़ते-दौड़ते उसे यह प्रतीति हो जाये कि जिस रास्ते पर मैं दौड़ रहा हूँ, वह रास्ता गलत है तो उसे उस रास्ते पर दौड़ने से तत्काल निवृत्ति हो जायेगी । यद्यपि वेग के कारण वह दस कदम आगे चल कर रूक सकेगा, परंतु उसे तत्काल पहले कदम पर ही उस रास्ते पर दौड़ने से अनिच्छा हो जायेगी तथा उसका उस ओर प्रयास भी नहीं रहेगा । इसी प्रकार रागादि मैं नहीं हूँ, यह प्रतीति आत्मा में जिस समय उत्पन्न हुई, उसी समय से रागादि से निवृत्ति हो जाती है । रागादि मैं नहीं हूँ, यह प्रतीति होने में पहले मैं चैतन्य मात्र आत्मा हूँ, यह प्रतीति होनी चाहिए । चैतन्यमात्र मैं हूँ यह प्रतीति होने पर रागादि मैं नहीं हूं, यह प्रतीति सच्ची है । चैतन्यमात्र आत्मा को आत्मा समझकर आत्मा की ओर दृष्टि होना चाहिए । कषायों को मिटाना यही कल्याण के लिए एक प्रयोजन है । सम्यक᳭श्रद्धा से कषाय मिटती हैं, अतएव आत्मतत्त्व के विषय में दृष्टि लगानी चाहिए और सम्यक्त्वभाव जानना चाहिये । अब यहाँ जिज्ञासु पूछता है कि राग-द्वेष मोहादिभाव पुद्गल के स्वभाव हैं तो इन्हें अनेक तंत्रों में अध्यवसानादिक जीव के क्यों बताये गये हैं? इसके समाधान में श्रीमत्कुंदकुंद देव कहते हैं―


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