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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:समयसार - गाथा 7

From जैनकोष



ववहारेणुवदिस्सइ णाणिस्स चरित्त दंसणं णाणं ।

ण वि णाणं ण चरित्तं ण दंसण जाणगो सुद्धो ।।7।।

432-ज्ञानी (आत्मा) के चारित्र है, दर्शन है ज्ञान है — यह व्यवहार से उपदेश किया जाता है । निश्चय से तो न ज्ञान है न चारित्र है और न दर्शन है वह तो एक शुद्ध ज्ञायक मात्र है । आत्मा तो एक ज्ञायक शुद्ध है, परंतु व्यवहारनय से ऐसा कहा गया है कि आत्मा के ज्ञान है, दर्शन है, चारित्र है । ज्ञानदर्शन चारित्रादि गुणों की सब कल्पनाएं हैं । जैसे चौकी तीन हाथ लंबी चौड़ी है । इसमें इसकी लंबाई चौड़ाई लिखी तो नहीं है । चौकी तो चौकी ही है । लंबाई, चौड़ाई की तुम्हारी कल्पना ही है । चौकी जैसे तुम्हारी समझ में आये वैसे समझ लो । आत्मा तो एक अखंड द्रव्य है; उसमें ज्ञान-दर्शन-चारित्रादि की कल्पना व्यवहारनय से की गई है । वह तो एक ज्ञायक शुद्ध है । द्रव्य अखंडित ही सदा होता है । बहुप्रदेशी एकप्रदेशी आदि सभी अखंडित ही होते हैं । आत्मा के खंड हम समझने के लिये इस तरह करते हैं:—आत्मा के स्वभाव के अंश कर दिये कि इसमें ज्ञानदर्शन चारित्रादि गुण मौजूद हैं । आत्मा के देश के अंश कर दिये कि आत्मा में असंख्यात प्रदेश होते हैं । आत्मा में यह सब व्यवहारनय की अपेक्षा से है ।
433-मकान मेरा है धन मेरा है यह कौन-सा नय है?—अब यहाँ पर एक प्रश्न हो सकता है:—वर्तमान में हम लोग जो कार्य कर रहे हैं और कह रहे हैं कि मकान मेरा, धन मेरा, उसको कौनसा नय कहेंगे जब कि आत्मा के गुणों को बताना भी व्यवहारनय कहा जाता है? हम जो कार्य कर रहे हैं, इसे हम ‘उपचरित असद्भूत व्यवहारनय’ कहेंगे । जैसे भंगी कहते हैं कि हमारे 10 मकान हैं अपन लोग कहते हैं टट्टी का लोटा आदि इन सबको असद्भूतव्यवहारनय कहते हैं । मकान मेरा है यह किसी भी नय की बात नहीं है किंतु मूढ़ता की बात है, आत्मा से अत्यंत स्पष्ट भिन्न पदार्थों में संबंध की हठ करना है । हठी को कौन समझा सकता है हठी हठ छोड़े तो समझ सके । एक कथा है:—एक जाट था, उससे एक बनिये ने पूछा:—30 और 30 कितने होते हैं? जाट ने कहा, 30+30=50 होते हैं । बनिये ने कहा, नहीं 30+30=60 होते हैं । जाट बोला, वाह, 30+30=50 तो होते हैं, यदि साठ हों तो शर्त रख लो । यदि हम हार जाये तो पौने दो मन दूध देने वाली चारों भैंसें हम दे देंगे । अब हो गया निश्चय, यदि जाट हार जाये तो उसकी चारों भैंसे ले ली जायेगी । जाट महोदय अब घर पहुँचे । जाट ने सारी बातें अपनी स्त्री से बता दी । स्त्री बोली, तुम तो बड़े भोंदू निकले, 30+30 = 60 होते हैं । तुम्हारी तो चारों भैंसें गई । तुम 30+30 = 50 ही कह लेते, भैंसे देने को तो न कहते । अब तो बनिया पंचायत करा के चारों भैंसे ले ही लेगा । जाट बोला, वाह, तुम्हारे और उनके कहने से क्या होता है? जब अपने राम 30+30=60 कहेंगे, तभी तो 60 होंगे और हमारी भैंसें जावेगी । हम तो 30+30 = 50 ही मानते हैं । यह सब जबर्दस्ती का मामला है । इसी को असद्भूत व्यवहारनय कहते हैं ।
434-आत्मा में और जड़ पदार्थों में अत्यंताभाव—आचार्य, ऋषि सभी कहते हैं कि यह मकान तुम्हारा नहीं है । लेकिन मोही कहता है, यह मकान हमारा ही है सबको कहने भी दो, उनके कहने से यह मकान मेरा नहीं रहेगा, ऐसा नहीं है और जब हमारा ही है तो कैसे कह दें, यह मकान हमारा नहीं है । हम तो मानेंगे नहीं, इसी मकान में मरेंगे । जिनकी ऐसी सुविधा है कि अपनी आजीविका बिना कमाये हो ही जायेगी, तो उनको निश्चिंत होकर धर्मध्यान करना चाहिए । ऐसा कोई ही होगा, जिनकी धर्म ध्यान में रुचि है और आजीविका नहीं हो । अत: मोह छोड़ो धन, दौलत, मकान, स्त्री पुत्रादि से तादात्म्य प्रतीति बनाये रखना ही तो मोह है । जिस प्रकार बच्चा अपनी मां के पास अपनी फरियाद लेकर जाता है कि अमुक ने मुझे मारा है । इसी प्रकार यह जिनवाणी माता भी तुम्हारी माँ ही है । यह भी तुम्हारी फरियाद अवश्य सुनेगी यदि तुम नित्य एक घंटा शास्त्र सुनने आओ तो शास्त्र श्रवण से कभी न कभी जागृति अवश्य आ जायेगी । जिनको विवेक अंतर नहीं आता वे जिनवाणी की भक्ति करते ही नहीं । मकान मेरा है, इसमें कोई नय नहीं है यह ज्ञान की कोटि में नहीं आता है, अत: यह उपचारनय है इसी को दूसरे नाम से जबर्दस्ती कहते हैं । आचार्य ने बार-बार समझाया कि मकान तुम्हारा नहीं है । मोही जीव कहता है कि आपके शास्त्र में लिखने से क्या यह मकान मेरा नहीं रहेगा? इन गपोड़पंथों से तो पहिले ही हट लेना । देखो जब आत्मा में ज्ञान दर्शन चारित्र की बात भी व्यवहार है तो धन की ममता गपोड़पंथ ही तो हुआ। यह आत्मा ज्ञान दर्शन चारित्रादि गुणों से अशुद्ध नहीं है । यह तो दूसरों को समझाने के लिये बताया गया है ।
435-खुद को खुद की दृष्टि में उपोष्यता—परमात्मा यदि अपनी दृष्टि में बसा लिया तो समझो बड़ी कमाई की । यदि स्वभावदृष्टि पा ली तो समझो, सभी कुछ पा लिया । यदि स्वभावदृष्टि न पाई तो सब कुछ पा करके भी कुछ नहीं पाया । ऐसे बहुत ही कम बिरले धनी होते हैं, जिनको सुख प्राप्त होते हुए भी धर्मसाधन की बुद्धि जगे । कहा भी है:—दु:ख में सुमिरन सब कर, सुख में करे न कोय । जो सुख में सुमिरन करे, दु:ख काहे को होय । हां, यदि पुण्यानुबंधी पुण्य हो तो किसी की ताकत नहीं जो उसको धर्म से छुड़ा देवे । संसार से ज्ञान ही छुड़ाता है पुण्य और पाप संसार में घुमाते हैं । पुण्य ज्ञान के रहते कमजोरी से बनता है । अज्ञान के रहते कमजोरी से पाप बनता है । संसार से छुटकारा ज्ञान ही दिला सकता है पुण्य-पाप नहीं । यदि ज्ञानी चाहे कि हमारे पुण्य पापरूप परिणाम न बंधे तो उसके पुण्य बंधेगा इससे पुण्य ही की तो प्राप्ति होगी । जैसे—आप जब जीमने जाते हैं, वहाँ इन्कार करने पर भी जबरदस्ती पर विशिष्ट भोजन परोस ही देते हैं । यह न माँगने का फल है । यदि माँगते रहें तो शायद न भी मिले । ज्ञानी जीव यद्यपि पुण्य बंध नहीं चाहता है, लेकिन कमजोरी के कारण पुण्य का बंध होता ही है । पुण्य बंधे या पुण्य न बंधे इस प्रकार की इच्छा या रुचि नहीं करनी चाहिए । यदि सभी चीज का यथार्थ ज्ञान हो जावे तो मोह अज्ञान अपने आप ही दूर भाग जायेंगे । यथार्थ वस्तु का ज्ञान होने पर ही हमें अपना कर्तव्य मालूम पड़ेगा ।
436-संसार में सार कर्त्तव्य का विवेक—यह संसार है, इसमें कोई किसी का सगा साथी नहीं है । सबके परिणाम अपने आपमें है । जीव जैसे परिणाम बनायेगा, उसको वैसी गति मिलेगी । मनुष्य के सामने धन और ज्ञान दो ही समस्यायें हैं । ज्ञान में धनार्जन की अपेक्षा ज्यादह समय लगाना चाहिए । सम्यग्ज्ञान और सम्यग्दर्शन के होने पर ही वास्तविक धर्म होता है । कमाई में 24 घंटे लगे रहने पर भी सीमित धन की प्राप्ति होगी । जितना पुण्योदय में, उतना ही धन मिलेगा, चाहे 6 घंटा प्रयत्न करो या 24 घंटे । मनुष्य अपनी इज्जत को रखने के लिए ही धनार्जन में प्रयत्न करता है । सात्विक भोजन करने वाले, शुद्ध वेषभूषा वाले परोपकारी और लोकोपकारी जीव की धनी से कम इज्जत नहीं होती है, बल्कि अधिक ही होती है । धनार्जन में इज्जत मिलेगी, यह सोचना व्यर्थ है । ज्ञान की ओर अधिक और धन उपार्जन की ओर कम ध्यान देना चाहिये इसी से ज्ञान प्राप्ति होने पर स्वयमेव इज्जत बढ़ जायेगी ।
437-आत्मा का विस्तृत वर्णन—आत्मा एक अखंड पदार्थ है । वह क्षेत्र परिमाण में बहुप्रदेशी है इस बड़प्पन को समझने के लिये प्रदेश कल्पना अनिवार्य होती है । कहीं एक-एक प्रदेशमात्र आत्मा नहीं हो जाता और न प्रदेश की सत्ता पृथक्-पृथक् है । बहुप्रदेशी होकर भी अखंड एक सत् आत्मा है । आत्मा के प्रदेश में अनंत गुण हैं और वे ही अनंत गुण आत्मा के सर्व प्रदेशों में हैं । प्रदेश आत्मा से भिन्न नहीं और गुण प्रदेशों से पृथक् नहीं । यद्यपि प्रत्येक गुणों का स्वरूप जुदा-जुदा है अन्यथा सर्वगुण एक ही होता तब अनंत गुण की कल्पना असंभव थी, फिर भी गुण पृथक्-पृथक् नहीं रहते । वहाँ तो ऐसा भी है कि एक गुण का प्रभाव समस्त अनंत गुणों में है । जैसे ज्ञान सूक्ष्म भी है, अस्तित्वमय है आदि । इस प्रकार एक गुण अनेक प्रकार से देखा जाता वह त्रिकालवर्ती समस्त पर्यायरूप गुणांशों में वर्तता है । ऐसे अनंत विलासोंमय यह आत्मा पर्यायार्थिकनय से जाना जाता है । किंतु द्रव्यार्थिकनय से तो वह एक अखंड है ।
438-द्रव्य के तीन मुख्य लक्षण—द्रव्य का लक्षण ‘गुणपर्ययवद्द्रव्यम्’ कहा गया है जिसका स्पष्ट अर्थ है ‘समगुणपर्यायोद्रव्यम्’ है और ‘अभिव्यंजक’ लक्षण है ‘उत्पादव्ययध्रौव्ययुक्तं सत्’ ‘सद् द्रव्यलक्षणम्’। द्रव्य गुणों से भिन्न नहीं है । समस्त गुण ही एक शब्द में द्रव्य कहलाता है और एक द्रव्य ही विवक्षावश अनेक गुण कहलाते हैं । जिससे यह ध्वनित होता है कि आत्मा गुण के बराबर है और ये समस्त गुण आत्मा के बराबर हैं । द्रव्य गुणों के बराबर है और ये समस्त गुण द्रव्य के बराबर हैं । जैसे वृक्ष के शाखा फल-फूल पत्र आदि सबके नाम लेकर पूछो कि ये सब किसके बराबर? उत्तर—वृक्ष के बराबर । वृक्ष किसके बराबर? उत्तर—इन सबके बराबर । द्रव्य किसके बराबर? उत्तर—समस्त गुणों के बराबर । समस्त गुण किसके बराबर? उत्तर—द्रव्य के बराबर । देखिये समस्त प्रयास आचार्यों का समझाने में इसीलिये रहा कि जीव अपने स्वरूप से परिचित हो जावे । एक अखंड द्रव्य में गुणों का विचार व्यवहारनय से है । द्रव्यानुयोग की पद्धति में शुद्ध केवल एक को कहते हैं और अशुद्ध दो या अनेक के संबंध को कहते हैं । निश्चयनय की दृष्टि से देखा गया केवल अखंड आत्मा शुद्ध आत्मा है और उस अखंड आत्मा में गुणों की तर्कणा करके इस तरह से देखा गया ‘आत्मा के ज्ञान है, दर्शन है, चारित्र है’ आत्मा अशुद्ध आत्मा है । परंतु यह अशुद्धता याने अंश द्रव्य में नहीं है । द्रव्य अखंड है आत्मा अखंड है । इसका समझना अंश कल्पना के बिना नहीं हो सकता । यह व्यवहारनय द्वारा साध्य है । व्यवहारनय से आत्मा में भेद किया जाता है ।
439-द्रव्य के दो लक्षणों में साध्य साधकता—आत्मा गुणपर्यायवान् है । गुण में ध्रौव्य है पर्याय में उत्पाद व्यय है अत: आत्मा उत्पादव्यय ध्रौव्य युक्त है उत्पादव्यय से पर्याय समझ में आती है । अत: द्रव्य के इन दोनों लक्षणों में एक लक्षण को लक्ष्यरूप से देखा जावे और दूसरे लक्षण को उस लक्षण के लक्षणरूप से देख लिया जावे तथा जैसे गुण लक्ष्य है तो ध्रौव्य गुण का लक्षण है, पर्याय लक्ष्य है तो उत्पादव्यय पर्याय का लक्षण है । इसी तरह इनमें साध्य-साधक भाव व्यंज्य-व्यंजकभाव भी समझना । गुण साध्य है तो ध्रौव्य साधन है । गुण व्यंज्य है तो ध्रौव्य व्यन्जक है । इतनी ही बातें पर्याय व उत्पाद-व्यय में भी समझना । पर्याय साध्य है तो उत्पाद-व्यय साधन है । पर्याय व्यंज्य है तो उत्पाद-व्यय व्यंजक है । अब पूरे लक्षण में यह बात समझना—गुणपर्ययवत् लक्ष्य है तो उत्पादव्यय ध्रौव्ययुक्तं लक्षण है । गुणपर्ययवत् साध्य है तो उत्पाद-व्यय ध्रौव्ययुक्त साधन है । गुणपर्ययवत् व्यंज्य है तो उत्पादव्यय ध्रौव्ययुक्तं व्यंजक है इस तरह उत्पादव्यय ध्रौव्य से लक्षित निज गुण-पर्यायमय आत्मा है यह सब एक ही समय में है । गुण किसे कहते हैं? द्रव्याश्रया: निर्गुणा गुणा:—जो द्रव्य के आश्रय हैं और स्वयं गुण रहित हैं उन विशेषों को गुण कहते हैं ये सदाकाल रहते हैं । पर्याय किसे कहते हैं ? गुणों की हालत को पर्याय कहते हैं। गुण का कोई न कोई विकास रहता ही है । वह विकास पर्याय है । त्रिकालवर्ती पर्याय यद्यपि एक समय में नहीं है तथापि पर्याय वर्तमान की रहती ही है और प्रत्येक वर्तमान में वर्तमान पर्याय रहती ही है ।
440-द्रव्य में गुणों की गणना—जितनी प्रकार की हालतें हैं उतने ही गुण मानना चाहिये । जैसे एक पदार्थ में रस समझ में आया वह तो रस विशेष है पर्याय है । उसकी कारणभूत शक्ति रस गुण है । इसी प्रकार सब हालतों की शक्तियां समझ लेना चाहिये । जब शक्तियों का भेद करने बैठो तो जरा भी विशेषता की बात मालूम पड़े और उसकी वह शक्ति मान लो वैसे तो द्रव्य एक अखंड स्वभावी है किंतु भेद करके समझना है तो माने प्रकार भेद करते जावे । संकोच न करो, शक्ति में शक्ति गर्भित भी मत करो । जैसे श्रद्धा किसे कहते हैं अभी अच्छी तरह जानने को और ज्ञान किसे कहते हैं जानने को व चारित्र किसे कहते हैं? जाननहार ही बने रहने को । यद्यपि यहाँ सब एक-सा मालूम होता है, तथापि कुछ तो अंतर समझ में आता है सो तीन शक्तियां मान लो । जब अभेदरूप से समझना है तब द्रव्य में गुण है इतनी भी भेदपरक बात मत कहो ।
441-गुण की नित्यानित्यात्मकता—गुण तो आत्मा में सिद्ध हो गये । अब विवाद रहा, गुण नित्य है या अनित्य इसका। लोगों ने पर्याय को ही गुण मान रखा है, इसी कारण से इसमें अमुक गुण था, अमुक गुण नष्ट हो गया, अमुक गुण आ गया, ऐसा लोग कह देते हैं । गुण नित्य है या अनित्य इसी को यहाँ पर स्पष्ट करते हैं । द्रव्य में और गुण में अंतर बहुत थोड़ा ही है । द्रव्य में जो शक्तियाँ हैं, उसी को गुण कहते हैं । द्रव्य और गुण में भेद और अभेद विवक्षा से अंतर है । प्रत्येक समय में द्रव्य हालतें बदलता रहता है । अर्थात् द्रव्य में प्रतिसमय कुछ न कुछ परिवर्तन आता ही रहता है । द्रव्य हालत की दृष्टि से अनित्य और द्रव्य की अपेक्षा से नित्य है । इसी प्रकार आत्मा में प्रतिसमय हालतें बदलती रहने से आत्मा अनित्य है । द्रव्य दृष्टि से अर्थात् परिणमन होने पर भी वही बना रहने से आत्मा नित्य कहलाया । आत्मा को ही यदि अभेद दृष्टि से देखा जाये तो द्रव्य है और भेददृष्टि से देखने से आत्मा में गुण है । द्रव्य नित्य और अनित्यात्मक हुए । गुण भी नित्यात्मक और अनित्यात्मक । द्रव्य के मुकाबले में पर्याय को देखें तो द्रव्य एक है और पर्याय एक है । गुणों की ओर से देखो पर्याय अनेक हैं । जितने गुण होते हैं, उतनी ही परिणतियाँ होती हैं । भेद दृष्टि से एक समय में एक पर्याय होती है । गुण एक समय में अनेक होते हैं, भेददृष्टि से पर्याय भी अनेक ही होती हैं ।
442-द्रव्य में विरुद्ध धर्मों का अविरोध—गुण में नित्यत्व और अनित्यत्व दोनों ही है । गुण का गुणपना और गुण की शक्ति कभी नष्ट नहीं होती अत: गुण नित्य कहलाए । तदेवेदं यह वही है, ऐसा प्रत्यभिज्ञान होने से गुण नित्य कहलाते हैं । वही गुण आत्मा के अनादिकाल से चले आ रहे हैं अत: आत्मा के गुण नित्य हैं । जैसे एक मनुष्य मरकर देव हुआ । उस देव की आत्मा को यही कहेंगे यह वही आत्मा है, जो पहले मनुष्य शरीर का आत्मा था । इसी प्रकार का प्रत्यभिज्ञान द्रव्य और गुण में भी चलता है । ‘तद् एव इदम्’ यह वही है, इसे प्रत्यभिज्ञान कहते हैं । जैसा पहले देखा था, अब तक वैसा ही बना हुआ है, बीच में बदला नहीं इस रहस्य को प्रत्यभिज्ञान कहते हैं । जैसे आम का फल है, उसका रंग हरे से पीला हो गया । तो इसमें आम में रंग ही बदला है किंतु आम में प्रारंभ से ही रूपत्व शक्ति विद्यमान है । जैसे ज्ञान घट के आकाररूप ज्ञान से पट के ज्ञानरूप बदल गया । घटरूप जो हमारा ज्ञान था वह नष्ट होकर पट के ज्ञानरूप बदल गया लेकिन ज्ञान तो ज्ञान ही बना रहा । इसी प्रकार चौकी में जैसा हमारा ज्ञान है इसके पश्चात् वही ज्ञान पुस्तक में चला गया । अब पुस्तकरूप ज्ञान का विकास हो गया और चौकीरूप ज्ञान का विनाश हो गया । ज्ञान का सामान्यपना तो बना रहा । ज्ञान नष्ट नहीं हुआ । वही ज्ञान है, ऐसी प्रतीति होने से ज्ञान नित्य बना रहा और वह दूसरी पर्यायों के ज्ञान में बदलता रहा, इससे वह अनित्य है । वैसे तो ज्ञान का नित्यानित्यपना व्यवहारनय से बना है, निश्चयनय से नहीं । चीजों के ज्ञान में आत्मज्ञान सामान्य हुआ ।
443-ध्रौव्य व उत्पाद व्यय में परस्पर साध्य साधकता—जैसे बच्चे चीजों को देखते हैं । उनको ज्ञान होता है, लेकिन उसमें विकल्प नहीं उठते, यह चीज अमुक है । जो वास्तविक चीज है, वह आत्मा में निश्चयनय से आती है । खंड-खंड करके आत्मा में व्यवहारनय से आती है । जैसे अभी एक बच्चा है बच्चे से जवान हो गया, जवान से वृद्ध हो गया । उसकी अवस्था अवश्य बदलती रही है । उसका मनुष्यपना ज्यों का त्यों बना रहा । मनुष्यपना उसकी तीनों ही अवस्थाओं में समान है । अत: उसका मनुष्यपना नित्य रहा । मनुष्य की अवस्थाएं अनित्य कहलाई । जैसे आम हरे रंग से पीला हो गया । अर्थात् हरे रंग रूप पर्याय बदलकर पीले रंग रूप हो गई । लेकिन उसमे रूपपना दोनों ही अवस्थाओं में विद्यमान रहा । उसकी पर्याय बदल गई । एक चीज माननी ही पड़ेगी एक माने बिना बदलना नहीं बन सकता । जो एकपना है, उसी को नित्य कहते हैं । उसी को द्रव्य कहते हैं । भेद दृष्टि से उसी को गुण कहते हैं । आम में रूपत्व नित्य है और परिणमन अनित्य है । वस्तु स्वत: सिद्ध है और स्वत: परिणमनशील भी है । द्रव्य स्वत: सिद्ध होने से नित्य है, स्वत: परिणामी होने से अनित्य है । द्रव्य और गुण में इतना ही अंतर है कि भेद दृष्टि से देखने से गुण है और अभेद दृष्टि से देखने से द्रव्य है । भेद दृष्टि से द्रव्य में जो-जो चीजें ज्ञात होंगी उसी को गुण कहते हैं । गुणों की भी पर्याय होती है । गुण का बदलना गुणस्वरूप से नहीं पर्यायस्वरूप से है । आत्मा में जो ज्ञान-शक्ति है वह नित्य है । जैसे चौकी को छोड़कर पुस्तक को जानने वाले ज्ञान में उत्पत्ति-विनाश तो है परंतु दोनों में जो ज्ञान सामान्य है वह उत्पत्ति विनाश रहित ध्रुव है ।
444-द्रव्य और गुण की नित्यात्मकता और अनित्यात्मकता—शंका:—गुण निश्चय से नित्य होते हैं, पर्याय निश्चय से अनित्य होती हैं । क्योंकि गुण का संबंध ध्रुव से है । पर्याय का संबंध उत्पाद-व्यय से है । अत: द्रव्य और गुण को नित्यानित्यात्मक नहीं कहना चाहिए । उत्तर—तुम्हारा कहना ठीक है । लेकिन गुण की दशा का नाम पर्याय है । गुण को दशा की दृष्टि से देखने से गुण अनित्य हैं । गुण को शक्ति की दृष्टि से देखने से गुण नित्य हैं । इसी प्रकार द्रव्य को दशा की दृष्टि से देखने से द्रव्य अनित्य है । द्रव्य को शक्ति की अपेक्षा से देखने से द्रव्य नित्य है । अत: द्रव्य और गुण नित्यानित्यात्मक हैं । गुण का गुणपना नित्य है । गुण की दशा अनित्य है । इससे अपने को शिक्षा लेनी चाहिए कि हम आत्मा सदा रहेंगे । हमारी पर्याय बदलती रहेंगी । अपनी दशा को मैं ही बदलूंगा, अन्य की शक्ति में पर्याय नहीं बदल सकती । अपनी दशा को दुनिया में अन्य कोई नहीं कर सकता है, स्वयं ही अपनी दशा को कर सकते हैं ।
445-शक्तियों का कार्य—गुण नित्य हैं, लेकिन वह स्वभाव से ही अपने आप परिणमन कर सकते हैं जैसे यह पिच्छी एक कमरे में रखी हुई है । कमरे में रखी-रखी पुरानी पड़ जाती है । पदार्थों का ऐसा ही स्वभाव है । उनके स्वभाव को कोई नहीं बदल सकता है, वह स्वयं ही बदल जाता है । द्रव्य बिना परिणमन के हो ही नहीं सकता है । मन में प्रत्येक समय कल्पना आती रहती है । जैसे शरीर पड़ा है । शरीर में रूप, रस, गंध, स्पर्शादि के बदलते रहने से वह भी काम करता रहता है । बिना परिणमन के कोई द्रव्य नहीं रह सकता है । परिणमन को पर्याय, दशा, हालत कहते हैं । गुणों की प्रतिसमय होने वाली सत्ता को पर्याय कहते हैं । गुणों की दशा का नाम ही पर्याय है । गुण नित्यानित्यात्मक है । कोई कहता है नित्य, कोई कहता है गुण अनित्य है । नित्य और अनित्य के बीच में ही गुण है । वस्तु को कोई नित्य या अनित्य या नित्यानित्यामक समझे, वह भी वस्तु को पूर्ण नहीं समझ पाता है ।
446-हमारे वैभव का सहज प्रचलन—हम आत्मा हैं। एक द्रव्य हैं । हममें (आत्मद्रव्य में) असंख्यात प्रदेश हैं । एक प्रदेश में अनंत शक्तियां हैं । एक शक्ति में असंख्यात अविभागप्रतिच्छेद होते हैं । द्रव्य अखंड नित्य है । गुण कल्पना भेदक है और गुणांश कल्पना अनित्य है । पर्याय का उत्पाद व्यय से संबंध है । गुण का ध्रुव से संबंध है । लेकिन इनको, गुण और पर्याय को अलग-अलग मत समझें । क्योंकि जब हम गुण को गुणत्व की दृष्टि से देखें तो गुण नित्य है गुण को पर्याय की दृष्टि से देखते हैं तो गुण अनित्य है । जैसे आम में रूप के बदलने से रूप अनित्य कहलाया और रूप में रूपत्व रहने से रूप नित्य कहलाया । इसी प्रकार द्रव्य और गुण नित्यानित्यात्मक है । ऐसा जानकर अपने में आत्मकल्याण की भावना जागृत करना चाहिए । यह निश्चय रखना चाहिए किं हम कभी नष्ट नहीं होंगे, हमारी पर्याय अवश्य बदल सकती है । हमें अपनी हालत सुधारने के लिये ध्यान देना चाहिए । हम कभी भी बुरी हालतों में न जायें, अच्छी हालतों में जाये ऐसी कोशिश करनी चाहिए । अच्छी हालत में जानें का उपाय मोह नाश करने से ही अच्छी पर्याय मिल सकती है । मोह करने से बुरी हालत की प्राप्ति होती है । अत: सबसे पहले मोह त्याग करना चाहिए । मोह दूर करने के लिए सम्यग्ज्ञान की प्राप्ति करना है । सम्यग्ज्ञान होने से ही मोह दूर हो सकता है । सम्यग्ज्ञान धर्म ग्रंथ पढ़ने से आता है । अत: अच्छी गति प्राप्त करने के लिये धर्म गुरुओं से धर्म ग्रंथों का अध्ययन करना चाहिए । तभी आत्मकल्याण की संभावना है । छठी गाथा में जो अखंड आत्मा का स्वरूप कहा था उस पर शिष्य ने तर्क किया कि आत्मा में ज्ञान दर्शन चारित्र है इससे आत्मा अशुद्ध हो गई। उसके उत्तर में बताया कि प्रदेश गुण गुणांश इन सबकी कल्पना व्यवहारनय से है ।
447-परमार्थ को समझने का उपाय व्यवहार—वस्तु जो अखंड है, वह एक पदार्थ है । उस पदार्थ को समझने के लिए गुण और पर्याय का सहारा लेना पड़ता है । पदार्थ को समझने के लिये सहारा व्यवहारनय से लिया जाता है । धर्म और धर्मी एक है, लेकिन उसको अलग-अलग समझाने से ही लोग समझते हैं । इसी कारण पदार्थ, पदार्थ का स्वभाव और पदार्थ के गुणों को अलग-अलग समझाना पड़ता है । व्यवहारदृष्टि से वे सब गुण समझ में आते हैं । ऐसी रीति के बाद अभेद अनुभव करने वाले जीव को पश्चात् इस मर्म का पता लग ही जाता है ।
448-निश्चय और व्यवहार का विषय—एक को देखना निश्चय है और दो या अनेक को देखना व्यवहारनय है । जैसे हमारे हाथ की दो अंगुली जुड़ी हैं । इन दो अंगुलियों का संयोग है । संयोग किस उंगली की चीज है? संयोग गुण न पहली उँगली में, न दूसरी में । यदि इनमें अलग-अलग संयोग गुण नहीं है तो दोनों उंगलियों में भी संयोग नहीं होना चाहिये । यदि संयोग के गुण अमुक उंगली में है तो उसके अविभागीप्रतिच्छेद या प्रदेश उस एक अंगुली के साथ रहने चाहिए । यह तो हमारी कल्पना मात्र है । द्रव्य की महिमा एक अखंड है । द्रव्य की एक समय में एक ही पर्याय रहती है । समझने के लिये वस्तु के अनेक गुण बताये जाते हैं । गुण की अनेक पर्यायें बताई जाती हैं । ये सब पर्यायें द्रव्य में दी हुई हैं अर्थात् निमग्न हैं । जैसे व्यवहार में चलता है, ये सगे भैया है । ये लगत के भैया है । सगे माने स्वक हैं, सगाई माने स्वकीयत्व होता है । हम व्यवहार में ही ऐसी कल्पना करते हैं । वस्तुत: अपना कोई नहीं है । व्यवहार में वस्तुत्व नहीं है । निश्चय में वास्तविकता है, सच्चाई है । जैसे यह पूरा पिंड दिखाई देता है । बता सकते हो इस पिंड में कितने द्रव्य हैं । इसमें अनंत द्रव्य हैं । शास्त्र सभा में इतने मनुष्य बैठे हैं, उनमें से किसी एक मनुष्य के शरीर में एक ही द्रव्य है क्या? ऐसा नहीं है । सारा शरीर अनंत परमाणुओं का समूह है । इस शरीर में अनंत द्रव्य हैं । शरीर में रहने वाला आत्मा एक अवश्य है । देखा जाये तो इस शरीर में अनंत आत्माएं भी हैं । जैसे इस शरीर में छोटे-छोटे अनेकों कीटाणु जर्म्स है । अनेकों निगोदिया जीव भरे पड़े हैं, इनकी आत्माएं भी इस मनुष्य शरीर पर ही अवलंबित है । आत्मा के साथ अनंत कार्मण वर्गणाएं है, तैजस वर्गणाएं भी अनंत हैं । यह मनुष्य इस प्रकार से अनंतानंत द्रव्य परमाणुओं का पुंज है । जो एक प्रधान आत्मा से युक्त है ।
449-बेजोड़ बेतोड़ एवं जोड़ और तोड़—जोड़ और तोड़ को व्यवहार कहते हैं । द्रव्य को जोड़ तोड़ बिना समझा जाये तो यह निश्चय हुआ । आत्मा में गुणों का भेद करना याने आत्मा में तोड़ करना तथा रागादि का जोड़ करना व्यवहार है । अनंत दर्शन, अनंतज्ञान, अनंत चारित्र व अनंत शक्तियां हैं, यह भी व्यवहारनय की अपेक्षा से ही है । आत्मा में कर्म लगे हुए हैं, यह भी व्यवहार की अपेक्षा से ही कहा जाता है । यह जोड़ का व्यवहार है । जो द्रव्य की मुख्य चीज न हो उसे द्रव्य में बताना, उसे जोड़ कहते हैं । आत्मा में रागद्वेषादि भाव हैं, यह जोड़ है । आत्मा में ज्ञान है यह तोड़ कहलाता है । आत्मा तो एक अखंड द्रव्य है, उसमें ज्ञान की कल्पना करना तोड़ कहलाता है । आत्मा में केवलज्ञान है यह तोड़ कहलाता है । आत्मा में श्रद्धा अगुरुलघुत्वादि गुण हैं, यह तोड़ का व्यवहार कहलाया । द्रव्य के गुणों को बताना तोड़ कहलाता है । द्रव्य में पर्याय को बताना, यह तोड़ कहा जाता है । आत्मा में त्रैकालिक रहने वाली चीज को बताना भी तोड़ कहलाता है । क्योंकि आत्मा एक अखंड स्वभावमय है उसका भेद निश्चय को सहन नहीं । आत्मा शुद्ध है, एक है, अवक्तव्य (न कही जा सकने योग्य) है । वह जो है, सो है । यहाँ पर शंका नहीं करना आत्मा में ज्ञान दर्शन चारित्र और शक्ति है इनके होने से आत्मा में अशुद्धता आ गई । यह चीज निश्चय से नहीं आई है । वह अखंड आत्मा को समझाने का एक प्रकार है । आत्मा के साथ शरीर संलग्न है, अत: आत्मा अशुद्ध है व आत्मा में ज्ञान दर्शन, चारित्र तथा अनंत शक्ति है, यह अशुद्धता भी कारण स्वरूप आत्मा में नहीं होनी चाहिए । आत्मा तो एक अखंड द्रव्य है ।
450-लोक व्यवहार में भी निश्चय की उमंग—जैसे कहा जाये यह चद्दर किसकी है? कोई कहने लगता है कि हमारी है तो यह व्यवहार है । अमुक (कोई) कह देता है, यह तो कपड़े की है यह निश्चयनय है । यह समझाने के लिये मोटा दृष्टांत दिया है जैसे यह पुस्तक कागज की हैं । यह पुस्तक पदार्थ है क्या? नहीं, पुस्तक में अनंत द्रव्य है । अनेक चीजों का यह (पुस्तक) समूह है । तुमने द्रव्य के बारे में प्रश्न नहीं किया । प्रश्न ऐसा पूछना चाहिये था इसमें कितने द्रव्य हैं? तीन काल में भी एक परमाणु दूसरे परमाणु का नहीं हो सकता । यह सब माया याने पर्याय है । ब्रह्म कहते हैं आत्मा को । जो खालिस आत्मा इन सब पर्यायों में से गुजरता है, वह ब्रह्म है । एक परमाणु तो त्रैकालिक द्रव्य कहलाया । द्रव्य की पर्याय माया है । जैसे, लोग कहते हैं यह सब ईश्वर की लीला है । यह सब आत्मा की लीला है । इस नाटक को करने वाला मैं ब्रह्म हूँ जो सभी पर्यायों में रहता है । उस द्रव्य को जानने वाला सम्यग्दृष्टि इस भव को पार कर जाता है । जब तक कोई जीव माया को ही ब्रह्म मानता रहेगा तब तक उसे इस संसार शाला से छुट्टी नहीं मिलेगी । जब तक ब्रह्म के मर्म को नहीं जाना, तब तक पर्याय ही अच्छी लगती रहती है । पर्याय अच्छी लगने का फल संसार-परिभ्रमण है । जो पर्याय को पर्याय रूप में जानता है द्रव्यरूप से द्रव्य को जानता वह मोक्ष को प्राप्त हो सकता है । जिसने राग को जीत लिया है, वही कल्याण मार्ग पर अग्रसर है । मैं जो काम कर रहा हूँ, वही मैं हूँ यह प्रत्यय मिथ्यात्व है । राग मैं नहीं, द्वेष मैं नहीं, कषाय मैं नहीं, में चैतन्य स्वरूप आत्मा हूँ ऐसा माने तो राग होने पर भी सम्यग्दृष्टि राग से काफी दूर है ।
451-जलतैं भिन्न कमल है—यद्यपि कमल का पोषण जल से होता है, फिर भी कमल जल से बिल्कुल भिन्न है । इसी प्रकार सम्यग्दृष्टि जीव भी घर में पैदा होता है । घर में उसकी आजीविका होती है, किंतु घर से वह बिल्कुल विरक्त (भिन्न) रहता है । शरीर का एक भी परमाणु तुम्हारे साथ नहीं जायेगा अत: इस शरीर को दूसरों की सेवा में लगाओ । इसी प्रकार मन को भी सन्मार्ग पर लगावो । किसी को अपना विरोधी मत समझो । जो दूसरों को अपना विरोधी समझता है, वह अपना विरोधी स्वयं है । जो तुम्हारा विरोधी है, लज्जा छोड़कर उसको मिलो । यह शरीर, मन, नश्वर धन वैभव और वचन सभी मिट जाते हैं । सभी जीवों की अपेक्षा तुम्हें ऐसी सुविधा है कि द्वादशांग वाणी को अंतर्मुहूर्त में बोल सकते हो यद्यपि यह बात आज नही, किंतु होती तो मनुष्य में ही है ना । इस सुर-मुनि दुर्लभ मनुष्यभव को प्राप्त करके हित-मित-प्रिय वचन बोलो । क्रोध को आत्मा से दूर कर अपने स्वभाव की परख करो । क्योंकि क्रोध ही विनाश की जड़ है । वचन-तीर को अविवेक से ही छोड़ने के बाद कई घन्टों तक अपनी आत्मा को रंज रहेगा । एक सेकिंड के लिये यदि वचन वश में नहीं किया दूसरे के हृदय में उपद्रव मच जायेगा इसके साथ तुम भी स्वयं दु:खी हो जावोगे । माया, मोह, मानादि तो सब पर्याय है । इन सब पर्याय-जंजाल से जो दूर है, वह संसार-सोपान से भी दूर है । अपने को पर्यायों से भिन्न समझकर इन सबसे दूर जो आत्मतत्त्व उसकी पहिचान करने वाला सम्यग्दृष्टि ही कल्याणमार्ग को प्राप्त कर सकता है ।
452-अखंड पदार्थ व अवबोधन के लिये व्यवहारनय से भेदीकरण—शुद्ध आत्मा एक अखंड ज्ञानस्वभावमात्र है जैसा है आत्मा वैसा ही पूरा लक्ष्य में लेने पर उसमें भेद नहीं प्रतीत होता है । वस्तुत: किसी पदार्थ में खंड ही नहीं है, भेद ही नहीं है । जैसे समझ में आता है कि आत्मा में ज्ञान है, दर्शन है, चारित्र है, आनंद है और इन सबका जो पिंड है सो आत्मा है, यह पद्धति व्यवहारनय की है । इसे यदि इस प्रकार कहा जाय कि आत्मा अखंड है एक ज्ञानमात्र है उसको समझने के लिए उसमें भेद किया जाता है कि जो जाने सो आत्मा, देखे सो आत्मा आनंद पाये सो आत्मा । तो यह पद्धति उत्तम विधि की पद्धति है, अर्थात् इस विधि में अखंड आत्मतत्त्व पर लक्ष्य होता है और व्यवहार विधि के कथन में भेदकथन में अखंड तत्त्व पर लक्ष्य नहीं जाता, उन गुणों को जोड़ दिया है और बताया है कि आत्मा क्या है? प्रयोजन यह है कि आत्मा ऐसा अखंड निर्विकल्प ज्ञानस्वभावरूप है कि उसमें दर्शन ज्ञान चारित्र वाला है आत्मा में गुण भरे हैं, इस प्रकार की भी अशुद्धता नहीं । अशुद्ध के मायने है अखंड न रहने देना, उसके खंड कर देना अथवा उसमें कुछ मिला देना, जोड़ से भी अशुद्ध बनता है और तोड़ से भी अशुद्ध बनता है । कहने में तो अच्छा लगेगा कि यह चौकी है उसे तोड़ दिया, खंड कर दिया । खंड करते-करते अंत में खंड होते-होते जब एक परमाणुमात्र रह जाय तो वह शुद्ध कहलाता है । तो देखो न तोड़-तोड़ करके वस्तु को शुद्ध बना डाला लेकिन वह चौकी वस्तु ही कहां थी जो तोड़ करके शुद्ध बनायी गई है वह तो अनंत परमाणुवों का समूह था । एक पदार्थ जो कुछ भी हो उसे तोड़ा नहीं जा सकता । कल्पना में तोड़ा जाता है सो यह उसकी अशुद्धता कहलायी और जोड़ा जाय तो वह प्रकट अशुद्धता है । तो यहाँ ज्ञानस्वभावरूप एक आत्मा के एकत्व की बात दिखाई जा रही है कि वह एकत्व एक शुद्ध ज्ञायकरूप है । जो आत्मा में स्वभाव है वह पूर्ण स्वभाव लक्ष्य में अखंडरूप से आये । वहाँ जो ज्ञात हुआ वह है आत्मा का स्वरूप । अब इस जगह देखो बंध की कथा कहाँ है? जब आत्मा के स्वभाव की ओर देखते हैं तो कहां है बंध, पर का संबंध । स्वभाव को निरखकर कहा जा रहा है । स्वभाव में यदि बंध होने लगे तो फिर कभी मुक्ति नहीं हो सकती ।
453-स्वभाव में अशुद्धता के अभाव की चर्चा—द्रव्य और स्वभाव इन दो शब्दों के द्वारा आप दो तरह के विषय पर पहुँच जायेंगे । द्रव्य के साथ तो बंध है, पर स्वभाव के साथ बंध नहीं है । यद्यपि स्वभाव द्रव्य से कहीं पृथक् नहीं पड़ा हैं फिर भी इस कथन में तथ्य है । जैसे पानी तो गर्म हो जाता है अग्नि का संबंध होने से, पर पानी का स्वभाव गर्म नहीं होता । इन दो बातों में तथ्य है ना । इसी प्रकार समझिये कि आत्मद्रव्य के साथ तो कर्मबंध हो जाता है, विकार संबंध हो जायगा, पर स्वभाव में विकार का संबंध नहीं है और यही प्रमाण दिया जा रहा है कि बंध के कारण से यह ज्ञायक स्वभाव आत्मतत्त्व अशुद्ध हो जाय यह तो बात बड़ी दूर की है, पर यह तो दर्शन, ज्ञान चारित्रवान होने से अशुद्ध है, ऐसी भी अशुद्धता नहीं है । केवल उस अखंड ज्ञानमात्र आत्मतत्त्व को जो कोई पुरुष नहीं समझ रहा उसको समझाने के लिए आचार्य महाराज उसमें उपदेश दे-देकर नामकरण कर-करके संज्ञा नाम ले-लेकर भेद उत्पन्न करके व्यवहार मात्र से समझाते हैं कि आत्मा में दर्शन, ज्ञान और चारित्र है । यों तो बहुत-सी बातें कहते । अंगुली में रूप है अरे रूपात्मक ही तो अंगुली है । अंगुली में रूप कहना यह उपदेश देकर भेद उत्पन्न कराकर ही तो कहा गया । घड़े में चना है यह बात व्यवहार में योग्य है कहना पर अग्नि में गर्मी बसी यह वो एक समझाने भर की बात है । अग्नि अगर होती, गर्मी आकर उसमें बसा करती तो यह कथन ठीक था कि अग्नि में गर्मी बसी है । अरे गर्मी स्वरूप ही तो अग्नि है । तो यह आत्मा वस्तुत: कैसा अखंड ज्ञानमात्र है यह दृष्टि में आये तो उसे राग-द्वेष मोह अहंकार उत्पन्न नहीं होते । वही आत्मा धन्य है जिसने सबसे निराले ज्ञानमात्र अपने आपको लख लिया है अपने आपका स्वरूप एकदम एक दृष्टि में एक झलक में परिपूर्ण आ जाता है । जैसे किसी दर्पण में वस्तु की छाया धीर-धीरे क्रम से नहीं आती, वह तो एक दम तुरंत आती है इसी प्रकार आत्मस्वरूप से परिचित ज्ञानी पुरुष जब ही उपयोग देते हैं तब ही वह परिपूर्ण अखंड ज्ञायकस्वभाव उनके ज्ञान में आ जाता है ।
454-वस्तुस्वरूप की अखंडता—वस्तु की स्वरूप महिमा को सुनकर ऐसा जचेगा कि फिर है क्या? पदार्थ है और उसकी प्रतिसमय की परिणतियां हैं । ये गुण कहाँ से बीच में आ गए? ये भेद कहां से आ गए? चूंकि पदार्थ उत्पादव्ययध्रौव्यात्मक हैं सो ध्रौव्य से तो आया पदार्थ स्वयं और उत्पादव्यय से आयी परिणतियां अब उसमें गुण टटोलना, गुण देखना यह एक है भेददृष्टि । वहाँ है गुण, कहाँ है खंड, अखंड ज्ञानस्वरूप है । अब देखिये कि परिणति का कथन करने से वस्तु की अखंडता को उतना धक्का नहीं लगा जितना कि गुणों का वर्णन करने से आत्मा की अखंडता को धक्का लगा यद्यपि पर्याय कथन कहने पर भेद कथन हो गया, खंड कथन हो गया, पर वह तो वस्तु के स्वरूप में ही पड़ा हुआ है । उत्पादव्यय को छोड़ कर पदार्थ अन्यत्र कहाँ जाय । पदार्थ के 6 साधारण गुणों में वस्तु स्वयं सत् है । अपने स्वरूप से है, पर के स्वरूप से नहीं, निरंतर परिणमता है, अपने में ही परिणमता है दूसरे में नहीं, अपने स्वयं के प्रदेश वाला है और किसी न किसी ज्ञान के द्वारा प्रमेय है। अस्तित्व, वस्तुत्व, द्रव्यत्व, अगुरुलघुत्व, प्रदेशवत्व और प्रमेयत्व इन छ: साधारण गुणों के कथन से पदार्थ के गुणों का भेद करने की झाँकी कहाँ आयी? पदार्थ की शक्तियाँ भेद समझाने के लिए की जाती हैं, वस्तुत: स्वरूप अखंड है, निश्चय से प्रत्येक द्रव्य ने अपने ही द्रव्य में अनंत पर्यायें पा रखी हैं । पर्याय में होकर भी पर्याय का भेद द्रव्य में नहीं पड़ा है । द्रव्य शाश्वत त्रिकाल हैं । अब अपने आत्मतत्त्व को ही देखो - जिस मुझ आत्मतत्त्व ने अनंत परिणतियों को विलीन कर दिया, अब वहाँ जो अनुभवन हो रहा है विचित्र और अलौकिक हो रहा है । उस अभेद एकस्वभाव का अनुभव करते हुए जीव के उपयोग में न दर्शन है न ज्ञान है न चारित्र है किंतु वह एक ज्ञान-स्वरूपमात्र शुद्ध तत्त्व है । ऐसे इस विशुद्ध ज्ञानस्वभाव तत्त्व का परिचय इस जीव को नहीं हुआ और परिचय हुआ तो राग-द्वेष विकार कर्तृत्व, भोक्तृत्व विषय सुख दुःख इनका परिचय हुआ । सो ये भाव मिथ्या हैं और अखंड आत्मतत्त्व की अखंड किसी भी पदार्थ की शक्तिभेद करके समझाना वह भी एक व्यवहार उपचार का प्रयोग है । चूंकि ऐसा भेद कथन करके इस भव्य जीव को निर्विकल्प ज्ञायकस्वरूप में पहुँचने का यत्न हुआ है । परमार्थ से तो एक अखंड ज्ञायकस्वरूपमात्र आत्मतत्त्व है । इस पर शंकाकार कहता है कि जब परमार्थ एक अखंड ही है, उस आत्मा में दर्शन ज्ञान चारित्र आदिक बताना व्यवहार है तो फिर इसका प्रयोग क्यों करते? परमार्थ से एक का ही वर्णन करना चाहिये । इस प्रश्न के उत्तर में वह सब विधि आ जायगी जो विधि तीर्थ प्रवृत्ति का कारण है । धर्ममार्ग, शांतिमार्ग, मोक्षमार्ग, कल्याणलाभ लेने का साधन है ।
455-सम्यग्ज्ञान ही संसार के क्लेशों को मिटाने में समर्थ है—सम्यग्ज्ञान ही समस्त कर्मों को ईंधन की तरह जला देता है । धनार्जन करते समय थोड़ी सावधानी की आवश्यकता है । लो, वहीं संवर निर्जरा हो लेगी । ठीक समझ आने पर भी जो ठीक मार्ग में नहीं लगते हैं, वे ठीक मार्ग पर नहीं हैं । यथार्थता रहे तो धन कमाते हुए भी धर्म की यथासंभव रक्षा की जा सकती है । द्रव्यदृष्टि और स्वभाव-दृष्टि को जानने पर सब कुछ मिल जाता है । जिसको वह भाव प्राप्त है उसका कल्याणमार्ग निश्चित है । अपने स्वभाव की यदि परख है, तो धन अपने से न्यारा तो था ही, जरा कुछ और दूर हो जाता है । सम्यग्दृष्टि को किसी भी हानि पर क्षोभ नहीं होता । स्वभावदृष्टि प्राप्त कर लेने पर विकल्प दृष्टि स्वयमेव कल्लर में पड़ी हुई अग्नि के समान शांत हो जाती है, सम्यग्दृष्टि का कलेवा स्वभावदृष्टि है । स्वभावदृष्टि पा लेने पर सदा का क्लेश मिट जाता है । स्वभाव अखंड है—आत्मा में ज्ञान दर्शनादि गुणों को व्यवहारनय की अपेक्षा कहा है ।
शंका—आत्मा में ज्ञानादि गुणों के कहने की कोई आवश्यकता नहीं है । एक ही परमार्थ कहना चाहिये । इसके उत्तर स्वरूप गाथा कही जाती है —


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