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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:समाधितंत्र - श्लोक 1

From जैनकोष



येनात्माऽवुध्यतात्मैव परत्वेनैव चापरम्।अक्षयानंत बोधाय तस्मै सिद्धात्मने नम:।।1।।

जिसके द्वारा आत्मा-आत्मा ही जाना गया है और आत्मा को छोड़कर अन्य समस्त परद्रव्य और परभाव विभाव समस्त अनात्मतत्त्व पररूप से ही जाना गया है उस अक्षय अनंतबोध वाले आत्मा के लिए नमस्कार हो। ग्रंथनाम व ग्रंथ के रचयिता―यह समाधितंत्र नाम का ग्रंथ है, जिसमें समाधिभाव के तंत्र बताए गए हैं। यह आत्मा आकुलतावों और विकल्पों से हटकर अपने आपके सम, सरल, स्वरस में कैसे रसिक बनें, ऐसा उपाय इस ग्रंथ में बताया गया है। इस ग्रंथ के रचियता हैं पूज्य श्री देवनंदीजी जो पूज्यपाद स्वामी के नाम से प्रसिद्ध हैं। पूज्यपाद स्वामी के ज्ञान संबंधी कितनी योग्यता थी सो उनकी रचनावों के अध्ययन में जो आये वह ही समझ सकता है। ग्रंथरचियता का एक व्याकरण ग्रंथ―व्याकरण जैसा रूखा ग्रंथ पूज्यपाद स्वामी ने बनाया है जिसका नाम जिनेंद्र व्याकरण है। अन्य व्याकरण से इस व्याकरण का कोर्इ मिलान करे तो उस ही एक विषय को ले लो, विद्वान् पुरूष विनम्र होकर उनके चरणों में नम जायेंगे। जिसके एक दो उदाहरण ले लो―व्याकरण शब्द सिद्धि का ग्रंथ है और शब्दों की सिद्धि के अनेक नियम और सूत्र बनाये जाने पर भी कोई न कोई बात शेष रह ही जाती है। उस शेष रही हुई बात को जबकि अन्य वैयाकरणजन व्याकरण के रचियता उसे अपने नाम से लिखते हैं कि आचार्य की ऐसी ही मर्जी थी, जबकि जैनेंद्र व्याकरण में ऐसी समस्यावों का हल सिद्धिरनेकांतात् अथवा लोकव्यवहारात् यों सीधा किया गया है। वैयाकरण सिद्धांत कौमुदी के रचियता पाणिनि और जैनेंद्र व्याकरण के रचियता पूज्यपाद स्वामी इनका संप्रदाय भिन्न-भिन्न था तो भी ये कोई परस्पर में रिश्ते वाले थे, या मामा भानजे का ऐसा कुछ रिश्ता था। पूज्यपाद ने व्याकरण रचा, पाणिनि ने भी व्याकरण रचा, लेकिन पाणिनि ऋषि थोड़ा रचकर मृत्यु को प्राप्त हो गए। बाद में पूज्यपादाचार्य ने उसकी पूर्ति की थी, ऐसा सुना गया है। उनका आप मिलान कर सकते हैं। जैनेंद्र व्याकरणों में थोड़े शब्द हों और बहुत विशेषता को रखते हों, ऐसी रचना पूज्यपाद स्वामी ने की थी। जहाँ पाणिनि महाराज ने संज्ञावाचक एक-एक नाम में 4, शब्द रखे थे वहाँ जैनेंद्र व्याकरण में पूज्यपाद स्वामी ने एक-एक शब्द दिया है। कम बोलना, कम लिखना, इसमें बड़े पुरूष विभूति समझते हैं व्यर्थ के लोग ही बकवाद किया करते हैं, बहुत बोला करते हैं। उनकी रचनावों में जो सूत्र हैं उन सूत्रों में संधि भर कर देने से लाघव हो जाता है, इस बात की दृष्टि भी जैनेंद्र व्याकरण में अधिक रखी गयी है। रचियता की अन्य अनेक ग्रंथों की कृति व योग्यता―पूज्यपाद स्वामी का रचित एक वैद्यक शास्त्र भी है। वीतराग ऋषि संतों की छटा देखो, जैनाचार्य द्वारा रचित उसका ढंग, उसका क्रम सब अपूर्व मिलेगा और साथ ही बड़ी विशेषता जैनाचार्यों की यह रही कि उन्होंने जो कुछ कहना था, सीधा सरल शब्दों में बताया है। शब्दों के आडंबर में उनकी रूचि नहीं थी। शब्दों के आडंबर के ज्ञाता तो बहुत ऊँचे रहे किंतु प्रयोग नहीं किया करते थे। कैसे जानें कि उनका शब्दशास्त्र महान् था ? तो जैसे अनेक रचनाएँ करने के बाद भी जो योग्य और शब्दशास्त्री होते हैं वे कोई छोटी रचनाएँ ऐसी भी कर देते हैं जिस में शब्दज्ञता की महिमा प्रकट हो। पूज्यपाद समंतभद्राचार्य का रचित एक जैन स्तोत्र है जिसमें किसी-किसी श्लोक में त व न ऐसे दो अक्षरों के सिवाय और कोई अक्षर नहीं। बड़े भारी श्लोक बना डाले। इतनी विद्वत्ता उनमें होते हुए भी दर्शनशास्त्र सिद्धांतशास्त्रों में सरल शब्दों का प्रयोग किया है। उनका लक्ष्य था जगत् के जीव अपने हित की बात को पहिचान लें, इतना ही तो प्रयोजन है शास्त्रों का। रचियता का एक सैद्धांतिक पारिभाषिक ग्रंथ―सर्वाथसिद्धि नाम का एक ग्रंथ है। पंडितजनों के द्वारा वह विदित ही है। सब परिभाषा और संक्षेप से प्रयोजन की बात कही जाना यह सब बड़ी ऊँची विद्वत्ता को प्रकट करती है। विद्वज्जन समझते ही हैं। उनकी रचनाएँ ऐसी बहुत सी हैं पर कोई जमाना था जबकि द्वेषवश आततायीजनों के द्वारा वह साहित्य जला दिया गया और अब भी जो साहित्य बचा वह भी साहित्य में अपना एक अलग स्थान रखता है। भले ही इस जैनधर्म के अनुयायी प्राय: करके व्यापारीजन हैं, उन्हें परवाह नहीं है कि क्या होना चाहिए, देश में विदेश में कहां क्या है ? नहीं है शिक्षा और साहित्य की अभिरूचि इस कारण से साहित्य शास्त्र बंद पड़े हुए हैं, किंतु कोई निष्पक्ष विद्वान् सर्वसाहित्यों को देखे तो यह कह सकता है कि जैन साहित्य के बिना संसार का साहित्य अधूरा है। साहित्यसंग्राहिका रूचि का परिणाम―पूर्व समय में यह परंपरा थी जैन समाज में कि जगह-जगह साहित्य का अधिक संग्रह रखना। वहाँ यह बात तब नहीं निरखी जाती थी कि हमारे यहाँ इनका पढ़ने वाला ही नहीं है, क्या करना है ? इसकी अपेक्षा नहीं रख करते थे पहिले, किंतु जैसे मंदिर का शौक है इसी प्रकार शास्त्रों के संग्रह की इतनी अधिक अभिरूचि थी कि जगह-जगह शास्त्रों के भंडार रहा करते थे। अपने वश भर किसी शास्त्र की कमी नहीं रखते थे। उसका ही फल आज यह है कि अनेक ग्रंथ जला दिए जाने पर भी बहुत से शास्त्र आज भी उपलब्ध हैं। मंगलाचरण में ज्ञान, मार्ग, भक्ति प्रकाश―पूज्यपाद स्वामी इस ग्रंथ के आरंभ में यह मंगलाचरण कर रहे हैं। मंगलाचरण क्या है ? इस मंगलाचरण के शब्दों में दृष्टि तो दो। भक्ति, ज्ञान, मार्ग सबका इसमें समावेश है। जिस पुरूष के द्वारा यह आत्मा ही जाना गया है और अन्य पदार्थ अन्य रूप से ही जाना गया उस अविनाशी अनंत ज्ञान वाले सिद्ध आत्मा को नमस्कार हो। इतने ही तो शब्द हैं। इसमें प्रथम पंक्ति में यह बता दिया गया है कि आत्मा को आत्मा ही जानना और पर को पर जानना, यही मुक्त होने का उपाय है। मोक्ष का उपाय बता दिया-निज को निज पर को पर जान, फिर दु:ख का नहीं लेश निदान। इसमें क्या है इसकी परिभाषा बहुत अंतर में ग्रहण करो। यह देह है, वह मैं आत्मा नहीं हूँ, इस देह के अंदर जो खटपट हो रही है वह मैं आत्मा नहीं हूँ। विकल्प, यहाँ वहाँ के ख्याल, राग, द्वेष, विरोध, मोह, काम, क्रोधादिक वे सब मैं आत्मा नहीं हूँ। मैं तो शाश्वत अहेतुक स्वरूपसत्ता मात्र चित्स्वभाव हूँ। इस स्वभाव को छोड़कर अन्य जितने भी तत्त्व हैं, पदार्थ हैं वे सब पररूप से जान गए। ऐसा भेदविज्ञान होना वह मोक्ष का मार्ग है। मोक्षस्वरूप―भैया ! मोक्ष है। किस स्वरूप ? अविनाशी अनंत ज्ञानरूप। यही मोक्षमार्ग है। मोक्ष नाम स्थान विशेष का नहीं है। भले ही मुक्त जीव लोक के अंत में बस रहे हैं। इस कारण उसे मोक्ष स्थान कहा जाता है, पर मोक्ष स्थान में पहुंचने के कारण वह भगवान् हो या निराकुल हो यह बात नहीं है किंतु अपने स्वरूप की विशुद्धता के कारण वह भगवान् है और निराकुल है। जिस स्थान पर प्रभु रहता है उस ही स्थान पर अनंत निगोद जीव रहते हैं। कोई-कोई तो यों कहते हैं कि यहाँ के निगोद से वहाँ के निगोद कुछ तो सुखी होंगे, उनके दु:खों में कुछ तो कमी होगी क्योंकि वे सिद्ध भगवान् के प्रदेशों में लोट रहे हैं। पर स्थान के कारण निराकुलता और प्रभुता नहीं होती है। जैसे यहाँ के निगोद दु:खी हैं उस ही प्रकार वहाँ के निगोद दु:खी हैं। कहीं ऐसा नहीं है कि यहाँ के निगोद जीव एक श्वास में 18 बार जन्ममरण करते हैं तो शायद वहाँ 9 बार ही करते हों। वहाँ उनके क्लेश में कुछ कमी हो ऐसा नहीं है। आत्मा का क्लेश परिणमन आत्मा की योग्यता और उपाधि के अनुसार हुआ करता है। मोक्ष की आत्मस्वरूपता―मोक्ष तो अविनाशी अनंत ज्ञानस्वरूप है। अनंत का अर्थ है असीम। अविनाशी असीम ज्ञानस्वरूप मोक्ष है। मोक्ष और मुक्ति कोई भिन्न-भिन्न चीजें नहीं हैं। मोक्ष में मुक्ति रहती है यह केवल औपचारिक कथन है। जीव स्वयं मोक्ष है, स्वयं मोक्षस्वरूप है और वह मोक्ष है अविनाशी असीम ज्ञानमात्र का प्रवर्तन चलना। ऐसा जो शुद्ध आत्मा है उस शुद्ध आत्मा का इस मंगलाचरण में नमस्कार है। मोक्ष और संसार की विरूद्धता―मोक्ष और संसार ये दोनों विरूद्ध अवस्थाएं हैं। यह जीव अनादिकाल से मोहमदिरा पिये हुए अपने सत्यस्वरूप को भूल रहा है। जब अपने सत्य सहजस्वरूप को भूल गया तो चूंकि आत्मा में ऐसी प्रकृति है कि किसी न किसी रूप अपने को अनुभव करेगा ही। तो जब स्वयं स्वयं के ध्यान में नहीं रहा तो परपदार्थ को आत्मरूप से अंगीकार करने लगा। अंगीकार का मतलब है अपने अंगरूप बना लेना और स्वीकार का अर्थ हैं उसे पूर्णस्वरूप बना लेना। यों अनादिकाल से विपरीत अभिप्रायवश परपदार्थ को अपना हितकारी मानता आया है और अपना उपकारी जो ज्ञान उपयोग है उसे अहितकारी मानता आया है। क्या करें, जैसे पित्त ज्वर वाले को मीठा भी भोजन उसे कड़वा लगता है क्योंकि उसकी जिह्वा इस ही तरह की योग्यता वाली हुई है। इसी प्रकार अज्ञान ज्वर वाले को, मोहज्वर वाले को ज्ञान और वैराग्य जैसा मधुर आहार कटुक लगता है।

जीवों की मूलभावना―भैया ! यद्यपि संसार के समस्त जीव सुख चाहते हैं और दुःख से डरते हैं तथा जितने भी वे उपाय करते हैं वे सुख पाने के लिए और दुःख दूर करने के लिए करते हैं, किंतु वास्तविकता का पता न होने से वे अपने उद्यम में सफल नहीं होते हैं।

मर्म परिचय बिना ज्ञानियों की नकल में विडंबना―ललितपुर के पास की घटना है, गुरूजी सुनाते थे 4 बजाज ललितपुर कपड़ा लेने के लिए चले घोड़े लेकर। रास्ते में अँधेरा हुआ, रात हुई तो जंगल में ही ठहर गए। जाड़े के दिन थे, तो जाड़ा कैसे दूर करें इसके अर्थ उन पुरूषों ने उद्यम किया। उस उद्यम को पेड़ पर बैठे हुए बंदरों ने देख लिया। उन्होंने क्या किया था कि खेतों से जरौंटा आदि बीनकर एक जगह जमा किया था और फिर माचिस से आग लगाकर खूब हाथ पैर पसार कर तापा था। इस तरह से अपना जाड़ा मिटाया था। यह सब उद्यम पेड़ पर चढ़े हुए बंदरों ने देख लिया। बजाज तो अब चले गए। दूसरी रात आयी, ठंड बहुत थी। बंदरों ने सोचा कि हमारे ही जैसे हाथ पैर तो उनके भी थे जिन्होंने अपना जाड़ा मिटा लिया था। हम उनसे क्या कम हैं ? बल्कि एक पूछ ज्यादा ही तो है। सो ऐसा ही अपन काम करें जैसा उन्होंने किया था।

सब बंदर आसपास के खेतों में दौड़ गए और बाड़ी जरौंटा आदि बीनकर इकट्ठा कर दिया। फिर वे आपस में कहने लगे कि जाड़ा तो अभी मिटा ही नहीं। तो एक बंदर बोला कि अभी इसमें लाल चीज तो पड़ी ही नहीं है। जाड़ा कैसे मिट जायगा ? उन आदमियों ने तो कोई लाल-लाल चीज लाने के लिए सब तरफ दौड़ें। वहाँ जुगनू खूब उड़ रहीं थीं, सो उन्हें पकड़कर उन बाड़ियों में, जरौंटों में झोंक दिया। अब भी जाड़ा नहीं मिटा। फिर सलाह की कि वे इसमें फूँक रहे थे, अपन भी इसको फूँकें। वे सब बंदर उसको मुख से फूँकने लगे। इतना करने पर भी जब जाड़ा न मिटा तो उनमें से एक बोला कि अरे सारे काम तो कर लिए पर अभी एक आखिरी काम तो बाकी ही है। वे हाथ पैर फैलाकर बैठे थे, अपन भी ऐसा ही करें। वे सब हाथ पैर फैलाकर बैठ गए, मगर क्या जाड़ा मिटा लिया ? अरे जाड़ा मिटाने का जो साधन है आग उसका तो उन्हें ज्ञान ही न था। इसी से सारे उद्यम करके भी वे जाड़ा नहीं मिटा सके। सकलसंकटमोचनी बूटी ज्ञानदृष्टि―सच जानो भैया ! अपने ज्ञान का स्वरूप अपने ज्ञान में जिस समय आए उस समय इसके संकट नहीं रहते। उपेक्षारूप धर्म में वह सामर्थ्य है। जरा करके ही देख लो। किसी से राग बढ़ा था, पहिले दुःखी हो रहा था, कोई घटना ऐसी हो गयी कि सोच लिया कि जाने दो। जो कुछ हो सो हो, क्या मतलब ? उपेक्षा की कि संकट उसके हल्के हो जाते हैं। यदि ज्ञानस्वरूप ज्ञान में आए। वहाँ परमउपेक्षा रहती है। उस स्थिति के आनंद को कौन बता सकता है ? उस ज्ञानस्वरूप के ज्ञान बिना शांति के लिए अन्य समस्त भी यत्न कर डालें, धर्म के नाम पर ही सही, बड़ा तप, बड़ा व्रत, बड़ा भेद, बड़ी चीजें भी कर डालें पर शांति आनंद और कर्मक्षय का साधन तो शरीर की चेष्टा नहीं है किंतु ज्ञानस्वरूप की दृष्टि बने यही हैं उन सब हितों का साधन। वह ही एक छोड़ दिया जाए, उसको ही ताख में धर दिया जाय और अनेक श्रम किए जायें तो उन श्रमों से सिद्धि नहीं होती है। उन्मुखता में समक्षगत की निकटता―यह समाधितंत्र ग्रंथ समता परिणाम उत्पन्न करने के लिए अद्​भुत प्रयोग बतायेगा। जिसके मंगलाचरण में इतनी छटा इतनी किरणों का दर्शन हो गया है उस ग्रंथ के आगे जो वर्णन चलेगा वह तो एक अपने-अपने घर की ऐसी बात कही जा रही है कि उसके अपनाने में विलंब न होना चाहिए। फिर भी नहीं अपना सकते। अपना नहीं सकते तो दृष्टि तो उस ओर होनी ही चाहिए। एक कहावत है―सांमर दूर समरिया नीरी। कोई समरिया का बनिया था, वह सांमर पर नमक लेने गया। वहाँ व्यापार करके जब लौटा तो समझो कोई, पाँच सात सौ मील का अंतर था समरिया में और सांमर में। लेकिन जिस समय सांमरनगर से मुँह फेरा और समरिया को चला तो वह कहता है कि अब सांमर दूर समरिया नीरी। जिस ओर मुख है, जिस ओर दृष्टि है वह नीरा है। शायद इस जगत् में यह चर्चा चल रही होगी कि भिंड दूर इटावा नीरा। प्रयोजन यह है कि जहाँ को मुख किया, जहाँ को चले वह निकट माना जाता है, क्योंकि गति का फल जो होगा उसको नैगमाय से, इस समय भी कह रहे हैं संसार से यदि मुख मोड़ लिया और मुक्ति की ओर मुख करके चल दिया तो चाहे वह अविरत सम्यक्त्व अवस्था भी हो तो भी उसका संसार दूर और मोक्ष नीरा है। भावनमस्कार―ऐसा मोक्ष का उपाय और मोक्ष का वर्णन करते हुए आचार्यदेव उस विशुद्ध सिद्ध आत्मस्वरूप को नमस्कार कर रहे हैं नमस्कार भी अनेक ढंगों से है। उन सब नमस्कारों में भाव नमस्कार सर्वोच्च नमस्कार है, अर्थात् हाथ भी न हिले सिर भी न हिले, बात भी न बोले किंतु सिद्धस्वरूप का अपने आपके ज्ञान में अनुभवात्मक परिणमन हो अथवा निज सिद्ध स्वरूप का अपने में ज्ञानानुभवरूप परिणमन हो वह सब नमस्कारों में प्रधान अभेदभाव नमस्कार है। उसकी दृष्टि रखते हुए नमस्कारात्मक विकल्प है तो वह मन, वचन, काय संबंधी क्रिया करें यह द्रव्य नमस्कार है उन सिद्ध आत्मावों को नमस्कार हो।



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