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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:समाधितंत्र - श्लोक 26

From जैनकोष



मामपश्यन्नयं लोको न ये शत्रुर्न च प्रिय:।माम प्रपश्यन्नयं लोको न में शत्रुर्न च प्रिय:।।26।।मेरे परिचित और अपरिचित सब जीवों में शत्रुत्व व मित्रत्व का अभाव―यह लोक, जिसके प्रति अज्ञानी जनों की शत्रु या मित्र रूप में देखने की वासना रहती है, यह लोक क्या मुझे जानता है ? यह जो मैं ज्ञानस्वरूप मात्र अमूर्त आत्मतत्त्व हूँ, जिसका न देह से संबंध है न देश से संबंध है ऐसा यह मैं अमूर्त आत्मतत्त्व क्या इस लोक के द्वारा देख लिया गया हूँ या नहीं देखा गया हूँ। यदि ये मनुष्य मुझ आत्मा को देखने वाले हैं याने पहिचानने वाले हैं तो वे मेरे शत्रु और मित्र हो ही नहीं सकते, क्योंकि उन्होंने ज्ञानस्वरूप मुझ आत्मा को ज्ञानस्वरूप के रूप में ही देखा है। उनके उपयोग में रागद्वेष की तरंगें उठ ही नहीं सकती। फिर वे मेरे शत्रु कैसे और मित्र कैसे तथा यदि उन्होंने मुझे नहीं देखा है तो जिन्होंने देखा ही नहीं है वे मेरे कैसे शत्रु और कैसे मित्र होंगे।उन्मत्तवृत्ति―सारे विकार, समस्त अवगुण, सकल विडंबनाएं एक आत्मा के स्वरूप के अपरिचय में ही हैं। जैसे पागल अपनी धुन में लत्तों और कागजों को संचित करता फाड़ता रहता है, कुछ से कुछ करता है, समझदार लोग उसकी उन्मत्त चेष्टा को पहिचान सकते हैं। ऐसे ही ये अज्ञानीजन स्वरूप से अनभिज्ञ कहीं घर को अपना मानकर, समाज को अपना मानकर, देश को अपना समझकर उसके अनुकूल चेष्टा कर उतारू रहते हैं। इन चेष्टावों में, इन विकल्पों में इस ज्ञानानंदस्वभावी निज परमात्मा का कैसा घात हो रहा है इसकी इसे फिक्र नहीं हैं। कैसे फिक्र हो आखिर अपने आपको समझा भी नहीं और न यह जाना है कि मुझ पर कोर्इ विडंबना है। इस उन्मत्त चेष्टा को ये जग के वासी जग के रूचिया लोग कैसे जाने, वे तो प्रशंसा ही करेंगे।मायाद्वारा माया का मायावाद―यह सारा जगत् मायामय है। यहाँ जितने भी पुरूष हैं और अन्य–अन्य पर्यायें हैं वे सब मायास्वरूप हैं, परमार्थरूप नहीं हैं, ये मायामय पुरूष यहाँ एक दूसरे की प्रशंसा कर रहे हैं और फूले नहीं समाते हैं और वे अपने को कृतार्थ समझ लेते हैं। जैसे एक उक्ति है―‘उष्ट्राणं विवाहेषु गीतं गायंति गर्धभा:। परस्परं प्रशंसंति अहो रूपमहो ध्वनि:।’ ऊँटों का हो रहा था कहीं विवाह, सो अब विवाह के समय कोई गाने वाले भी तो चाहिए। सो बड़ी खोज करते-करते गीत गाने वाले मिले गधे। सो गधे लोग गीत गाते हैं―अहो, कितना सुंदर रूप है ऊँटों का ? अब ऊँटों का रूप कहीं सुंदर होता है ? गर्दन टेढ़ी, पीठ टेढ़ी, सब वक्र अंग है। जिनके मुख की आकृति भी प्राय: सब जानवरों से विचित्र है, लेकिन गधे लोग गा रहे हैं कि कितना सुंदर रूप है ? तो ऊँटों की ओर से क्या जवाब मिल रहा है कि ओह ! गधों का कितना सुंदर राग है ? गधों का राग किसी ने गाते सुना है  ? शायद कोई पशु, पक्षी, मनुष्य भी ऐसा नहीं गा सकते कि हवा बाहर निकाले तब भी राग और हवा भीतर ले तब भी राग। मनुष्य गाते समय सांस लेंगे तो उन्हें रूकना पड़ेगा, फिर गाना गायेंगे पर इन गधों को रूकने का काम नहीं है। हवा निकालेंगे तो आवाज, हवा भीतर खीचेंगे तो आवाज। तो जैसे गधे और ऊँट आपस में एक दूसरे की प्रशंसा करके परस्पर में राज़ी हो जाते हैं ऐसे ही ये जगत के प्राणी एक मोही दूसरे मोही की प्रशंसा करके परस्पर में राजी होते हैं, किंतु उन्हें यह नहीं मालूम कि यह राजी हो जाना अपने आपके प्रभु पर कितना बड़ा अन्याय है ?

सबका स्वतंत्र परिणमन―अज्ञानी जन कीर्ति को गाने वाले, प्रशंसा करने वाले अथवा मन के अनुकूल चलने वाले या इंद्रिय के विषयों में साधक होने वाले लोगों को प्रिय मानते हैं। मित्र जानते हैं, बंधु समझते हैं और जो मन के प्रतिकूल चल रहे हों, इंद्रिय के विषयों के साधनों में बाधक हो रहे हों उन्हें ये शत्रु मानते हैं। यह सब अज्ञान का स्वप्न है। वास्तव में कोई पुरूष न मेरे मन के अनुकूल चलता है और न प्रतिकूल चलता है। वह तो चलता है जैसी उसकी योग्यता है। जैसा उसका वातावरण है उसके अनुकूल उसका परिणमन हो रहा है। वह न तो मेरे प्रतिकूल है और न मेरे अनुकूल है। मैं इच्छावान हूँ सो जैसी इच्छा रखता हूँ उसके अनुकूल मुझे जो जंचा तो मैं अपनी ओर से कह सकूँगा कि यह अनुकूल परिणमन है अथवा मेरी इच्छा के विरूद्ध बना तो मैं ही अपनी ओर से कह सकूँगा कि मेरे प्रतिकूल परिणमन है। पदार्थ तो जैसे है वैसे हैं, जैसे परिणमते हैं सो परिणमते हैं।अपनी वेदना का इलाजरूप परिणमन--कालिदास के जमाने में एक राजा ने अपनी लड़की को ऐसा वर ढूँढ़ना चाहा कि जो हमारी लड़की से भी अधिक चतुर हो और शास्त्रार्थ में मेरी लड़की को हरा दे, जीत ले। पंडित लोग बड़े परेशान हो गए। पंडितों ने आपस में सलाह की कि कोई महाबुद्धू वर ढूंढ़े और चकमा देकर उसकी शादी करवा दें तो राजा को भी पता पड़ेगा और राजा की लड़की को भी पता पड़ेगा। सो ढूँढ़ा महाबुद्धू को। तो यह जो कालिदास जी बड़े कवि हुए हैं वे कुमार अवस्था में एक बार एक पेड़ पर चढ़े हुए शाखा के अग्र भाग पर बैठे हुए कुल्हाड़ी से शाखा को काट रहे थे। अब बतलावो कि वह शाखा कटेगी तो वह गिरेगा कि नहीं ? वह तो गिर ही जायेगा। तो जो पंडितों ने ऐसा हाल देखा तो सोचा कि इससे अधिक बुद्धू और कौन मिलेगा ? सो उसे पकड़कर चले, कहा कि तुम्हारी शादी राजपुत्री से करायेंगे, पर एक बात है कि तुम मौन रहना, बोलना कुछ नहीं। और तुम्हें कुछ बताना हो तो हाथ से इशारे करना। उसे मौनव्रत दिला दिया। अपनी अपनी समझ का भाव और प्रवर्तन―अब वे कुछ पंडित कालिदास के साथ पहुँचे सभा में, तो कहा-महाराज ये बहुत ऊँचे विद्वान आए हैं। राजा ने कहा ठीक, शास्त्रार्थ होने दो तो पंडितों ने कहा कि शास्त्रार्थ तो होगा, पर इस विद्वान का मौन व्रत है, इसलिए संकेत में शास्त्रार्थ कर लेंगे पर वचन बोलकर नहीं। अच्छा यों ही सही। तो कहा कि पहिले लड़की कोई प्रश्न रक्खें, तो लड़की ने एक अंगुलि उठायी। वह भी संकेत में शास्त्रार्थ करने लगी। तो लड़की का यह भाव था कि एक ब्रह्म है, भाव तो यह था और कालिदास ने यह जाना कि यह लड़की कह रही है कि मैं तेरी एक आँख फोड़ दूंगी। तो उसने जोर से दो अंगुलि उठा दीं, जिसका भाव था कि मैं तेरी दोनों आंखें फोड़ दूंगा। पंडितों ने उसका अर्थ लगाया कि यह कन्या कह रही है कि एक ब्रह्म है तो हमारे ये महापंडित जी यह बतला रहे हैं कि एक ब्रह्म ही नहीं है साथ में एक माया भी लगी है। तो इस विश्व में ब्रह्म और माया दो का विस्तार है। लो, लड़की हार गयी। पंडितों ने कहा दूसरा प्रश्न करो। सो लड़की ने पाँच अंगुलियां उठाकर दिखाई। लड़की का भाव था कि दुनिया पंचभूतमयी है। कालिदास ने समझा कि यह लड़की कहती है कि मैं तमाचा मार दूंगी, सो कालिदास ने मुक्का बांधकर उठाया। उसका भाव था कि मैं मुक्के से तेरी खबर लूंगा। पंडितों ने अर्थ लगाया कि लड़की कह रही है कि यह सारा विश्व पंचभूत तो है मगर वे सबके सब पदार्थ एक ब्रह्म द्वारा अधिष्ठित है। लो, लड़की हार गयी। विवाद हो गया। फिर आगे की कथा ऐसी अच्छी है कि कैसे कालिदास को बोध हुआ और कैसे वे पंडित बने। वहाँ प्रयोजन यह बताने का है कि सब अपने अपने भावों के अनुसार परिणम रहे हैं और अपनी योग्यतानुसार भाव समझ रहे हैं।तथ्य के अपरिज्ञान में विसंवाद―भैया ! समाज में गोष्ठियों में किसी भी जगह झगड़े क्यों हो जाते हैं ? कहने वाले कहते हैं किसी दृष्टि से और सुनने वाले सुनते हैं अपनी जुदा दृष्टि से। तो वहाँ विवाद होना संभव ही है। कोशिश यह होनी चाहिए कि हम कहने वाले के दृष्टिकोण को परख कर अपने आपका भी आशय उसी दृष्टि का बनाएं उसकी बात समझने के लिए तो उसका हृदय हम समझ सकते हैं। यदि वह कहता है अपनी दृष्टि से और हम सुनेंगे अपनी दृष्टि तो वहाँ विवाद हो जायगा। इस लोक में जो मेरे प्रति कुछ भी चेष्टा करते हैं उसको इस रूप में निहारें कि यह बेचारा अपने कषाय भाव के अनुसार अपनी वेदना शांत करने के लिए अपने मन, वचन, काय की चेष्टा कर रहा है, मुझको कुछ भी नहीं कह सकता, न कह रहा है। कोई नाम लेकर भी मुझे गालियां दे तो भी वह मुझे कुछ नहीं कह रहा है किंतु अपनी योग्यता के अनुसार केवल वह अपना परिणमन कर रहा है। यह तथ्य की बात है और पूर्ण सत्य है, पर हम इस तरह से नहीं निरखना चाहते दूसरों को, इस कारण व्यर्थ ही दुःखी हो रहे हैं।कल्पना का भयंकर हौवा―इस जीव ने कुछ तो दुःख का बोझ उठाया है आपत्ति के कारण और कुछ क्या, अधिकांश, दुःख का बोझ उठाते हैं अपने मनचलेपन के ऊधम से, व्यर्थ के भ्रम से। अपने 24 घंटे के जीवन में ही देख लो लोग किस किस बात पर दुःख मानते हैं और वे बातें सचमुच में आपत्तिरूप में है या व्यर्थ में इसकी कल्पना बनाकर एक हौवा खड़ा किया है। हौवा जानते हो किसे कहते हैं ? क्या किसी ने हौवा देखा है ? कैसा होता है ? अरे ! उस मां को भी इसका पता न होगा कि वह हौवा कैसा होता है ? जो मां अपने बच्चे को हौवा से डरवाती है। क्या वह मां बता सकती है कि वह हौवा क्या खाया करता है ? अरे ! उस हौवा को क्या बताया जाय ? है कुछ नहीं पर कल्पना में एक हौवा बना रक्खा है। ऐसे ही हमारे जीवन में जो रात दिन संकट आते हैं वे संकट हौवा की तरह कल्पना में कुछ सोचने से आ जाते हैं। जैसे कोई गाने की कला जानता हो और दूसरा कोई बेसुरे राग से गाये तो उसके चित्त में बड़ा क्लेश पहुंचता है। कोई शुद्ध संस्कृत का पाठी हो और कोई मंदिर में आकर अशुद्ध संस्कृत या भक्तामर काव्य बोलने लगे तो उसको सुनकर ठेस पहुँचती है। खैर, यह तो गलत बात देखकर ठेस पहुंची पर किसी को तो सही बात देखकर भी ठेस पहुँचती है। चोरों को उजाला देखकर ठेस पहुँचती है। कोई साहूकार जग रहा हो तो उस पर उस चोर को रोष आता है, और कितनी ही बातें तो ऐसी जबरदस्त बना लेते हैं कि जिनको न सोचें तो क्या हर्ज था पर सोचे बिना रह नहीं सकते।पर का अन्य में अनधिकार―यह सारा जगत् मेरा कुछ नहीं कर रहा है, वह अपनी वेदना को शांत करने के लिए अपने अनुकूल अपना परिणमन कर रहा है। मेरे में परिणमन का कोई संबंध नहीं है। उसे मैं साधक बाधक जानवर अपनी ही ओर से अपनी ही कल्पना में शत्रु और मित्र बना लेता हूँ। किसे बनाएं मित्र ? गुजारा करना और बात है, चाहे वह घर का गुजारा हो, जीवन का गुजारा हो, धर्मपालन का गुजारा हो, जिस गुजारे में वह साधक मालूम पड़ता है भले ही उनसे कुछ नाता चलता है किंतु किसे बनाएं मित्र ? कौन कह सकता है कि हम तुम्हारे साथी रहेंगे ? रह जाय कोई साथी तो उसमें मेरा उदय कारण है। कौन कह सकता है कि घबड़ावो मत, हम तुम्हारे हैं, तुम्हारे मरने पर हम साथ चलेंगे। अरे ! जीवन में भी तो साथ रह सकने का कोई दावा नहीं कर सकता। भले ही जीवन तक साथी रह जाय, पर दावा नहीं कर सकता कि हम तुम्हारे जीवन भर के साथी ही हैं।वायदे की स्वप्न–अरे ! जिसने भांवर पड़ते समय स्त्री से वायदा किया था, साथ-साथ वचनों से दोनों बंध गए थे, मोह हट जाने पर वह वादा टूट जाता है, विरक्त हो जाता है, आत्मध्यान के पथ पर चलने लगता है। कौन निभा सकता है वायदे को ? यद्यपि विश्वास में ऐसा है कि हमारा अमुक आदमी से जीवन भर भी कोई मनमुटाव हो ही नहीं सकता। हम आपके साथ ही रहेंगे और संभव है प्राय: कि जीवनभर मनमुटाव न हो सके, किंतु दावा कुछ नहीं किया जा सकता। क्या से क्या परिणति हो ? श्री राम और सीता का एक दूसरे से क्या कम स्नेह था, पर राम क्या दावा कर सके कि सीता को कभी कष्ट में न रक्खूंगा ? अरे ! जरा सी धोबिन की बात सुनकर सीता को निकलवा दिया था, जंगल में छुड़वा दिया था। क्या कोई संभावना कर सकता है, कर सकता था उस समय कि ऐसी भी बात हो सकती है। इस सारे जहान के समस्त जीव अपने अपने कषाय भाव के अनुसार अपनी योग्यता से परिणमन किया करते हैं। मेरा कोई मित्र नहीं, कोई शत्रु नहीं, कोई प्रिय नहीं, कोई विरोधी नहीं। ये सब अपने आपके स्वरूप में अपना परिणमन करते हैं।ठलवाईगिरी का संकट―भैया ! यह बहुत बड़ा संकट है कि कोई मेरा विरोधी तो है नहीं, पर मैं अपनी कल्पना से दूसरों को विरोधी मान बैठता हूँ, यही सबसे बड़ा संकट है, अज्ञान अँधेरा है। कोई मेरा मित्र तो है नहीं, हो ही नहीं सकता। कोई अपने प्रदेशों से बाहर अपनी पर्याय फेंक कर मुझमें डाल न देगा। कोई खुश हो रहा है तो वह पूरा का पूरा अकेला अपने आपमें खुश हो रहा है, मेरे को खुश करता हुआ खुश नहीं हो रहा है। मैं खुश हो जाऊं यह मेरे घर के विपरीत मेरे परिणमन की बात है, क्योंकि वस्तु का स्वरूप बताता ही नहीं है कि कोई दूसरे पुरूष को किसी रूप परिणमा दे। ज्ञान और क्या है ? ऐसे ही स्वतंत्र स्वरूप की दृष्टि आ जाना ही तो ज्ञान है। प्रत्येक जीव अंतरंग में ऐसे सहज स्वभावरूप है, जिस स्वभाव की दृष्टि में सर्वजीव पूर्ण एक समान हैं। एक तो इस तत्त्व को दृष्टि में बनाये रहना और दूसरे फिर इस तत्त्व को दृष्टि में रखना कि सब जीव परिणमन भी करते हैं किंतु वे सब अपने उपादान के अनुसार अपना अपना परिणमन किया करते हैं। वे मेरा कुछ नहीं करते हैं। एक अपने विविक्त परिणमन को निरखना, इन दो तथ्यों को अपनी दृष्टि में बनाए रहना सर्वोत्कृष्ट वैभव है, जिस वैभव के बल से यह जीव सर्वसंकटों से उस काल में भी बाहर रहता है।शत्रुत्व व मित्रत्व के अभाव की दृष्टि―अब देखिए यह लोक यदि मुझे देख रहा है, मुझे समझ रहा है, इस ज्ञानात्मक आत्मतत्त्व को ज्ञानरूप में ही ज्ञान द्वारा जान रहा है तो वह स्वयं शांत हो गया, स्वयं ज्ञानस्वरूप हो गया। अब उसमें कोई तरंग ही नहीं उठ सकती। अब यहाँ कौन मेरा शत्रु है ? कौन मेरा मित्र है ? वे तो ज्ञाता रहकर अपने आनंद रस में रहकर तृप्त हो रहे हैं। यह जीव, कोई प्राणी मुझको नहीं जानता है। मैं अमूर्त ज्ञानमात्र आत्मतत्त्व हूँ। इस मुझको जो नहीं समझ रहा है वह मेरा शत्रु मित्र कैसे हो सकता है ? मुझे तो यह लक्ष्य में ही नहीं लेता है। तो दोनों ही प्रकार से पर के प्रति शत्रुता और मित्रता की कल्पना से रहित यह ज्ञानी संत आत्मा की आराधना कर रहा है।


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