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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:समाधितंत्र - श्लोक 3

From जैनकोष



श्रुतेन लिंगेन यथात्मशक्ति समाहितांत: करणेन सम्यक्।समीक्ष्य कैवल्य सुखस्पृहाणां विविक्तमात्मानमथाभिधास्ये।।3।।

रचनासंकल्प―इस ग्रंथ के रचियता पूज्यपाद स्वामी यहाँ यह संकल्प कर रहे हैं कि शास्त्र से, अनुमान से और अपनी शक्ति के अनुसार जैसा अंत:करण से समाधान किया है उस निर्णय से इस विविक्त आत्मा को भली प्रकार देख करके कैवल्य सुख की चाह करने वाले भक्त जीवों के लिए इस शुद्ध आत्मा को मैं कहूँगा। भैया ! ज्ञान करने के तीन प्रकार हैं―शास्त्र से ज्ञान करें, अनुमान से ज्ञान करें और अपने अनुभव से ज्ञान करें। जैसे जितना ज्ञान विद्यार्थी लोग पाते हैं उसमें भी ये तीन बातें पायी जाती हैं। एक तो पुस्तकों के आधार से अमेरिका, रूस, जापान आदि का सारा परिज्ञान जो उन्हें अच्छी तरह है वह है नक्शों के बल से और पुस्तकों के बल से। कभी देखा नहीं है कि अमेरिका कहां है और चौथी कक्षा, छठी कक्षा के लड़के चर्चा करते हैं कि अमेरिका इस जगह है। इतनी आबादी है, ऐसे लोग हैं, पर क्या उन्होंने देखा है ? पुस्तकों के आधार से, नक्शों के आधार से उन्हें यह ज्ञान होता है। यों ही धर्म का भी ज्ञान पुस्तकों के आधार से होता है। पहिले तो यह ही जानते हैं शास्त्र के द्वारा कि जीव है, यह कौन ? शरीर से निराला जीव है। लोकपरंपरा में तो अनेक लोग कहते हैं कि देह से न्यारा है जीव यह तो छोटे-छोटे लोग भी कहते हैं। वह सब श्रुत का ही आधार है। युक्ति विज्ञान वैभव―भैया ! अब आगे देखिये―आगम से जो अधिक विश्वास में निर्णय करा देने वाली चीज है वह है युक्ति। एक तो शास्त्र में लिखी बात है उससे जाना और उस ही चीज को फिर युक्ति से जाना, तो उसका ज्ञान और विशद हुआ कि नहीं ? साफ हो गया। पहिेले तो ऐसा ही समझते थे कि पुस्तकों में लिखा है इसलिए समझना चाहिए। पर कोई युक्ति ही मानों बैठ गयी तो अब युक्ति से जो ज्ञान होता है वह ज्ञान और ज्यादा निर्मल हो गया। जब युक्ति के ज्ञान के बाद फिर अपना अनुभव भी कहने लगे कि बिल्कुल यही बात है तो ज्ञान और निर्मल होता है। अनुभवज्ञान वैभव―भैया ! ऐसा हो इस आत्मा के बारे में पहिले तो शास्त्र द्वारा ज्ञान हुआ। जो आचार्य इसके रचियता हैं वे कह रहे हैं कि मुझे इस भिन्न आत्मा का ज्ञान जो सहज ज्ञायकस्वरूप है वह सबसे भिन्न है, उसका ज्ञान शास्त्र से हुआ है अर्थात् अनेक प्रकार के आगमों के अभ्यास से इसमें आत्मतत्त्व संबंधी बात पायी है, और फिर इतना ही नहीं, चिन्हों से भी हमने पहिचान ली कि यह भिन्न आत्मा चैतन्यस्वरूप है और आनंद का निधान है, युक्तियों से भी जाना, और इतना ही नहीं, अनुभव से भी पहिचाने। धर्म और धर्म की वृत्तियां करके जब यह अनुभव में आ गया कि पाप करने से दुःख होता, अज्ञान से क्लेश होता, किसी के बुरा विचारा तो आत्मा को क्लेश होता, जब अंतर की खोटी परिणति से क्लेश जगा इतना समझ लेते हैं और जब धर्म करते हैं, शुद्ध विचार रखते हैं तो वहाँ शांति नजर आती है। दूसरे जीव सुखी हों इस प्रकार जब सबके सुखी होने की भावना रखते हैं तो वहाँ आनंद प्रकट होता है। तो ऐसे अनुभव से भी इस आत्मा की बात पहिचानी गयी है।

आचार्यदेव की करूणा―आचार्यदेव को यह कहने की जरूरत क्यों पड़ी कि हमने आगम भी सीखा है और युक्तियों से भी ज्ञान किया है और अनुभव से भी पहिचाना है। यह कहने की आवश्यकता आचार्यदेव को इस लिए हुई कि वह ग्रंथ लिख रहे हैं दूसरे जीवों को। वे दूसरे जीव यह तो विश्वास कर लें कि यह जो कुछ कहेंगे वह प्रामाणिक बात कहेंगे। तो बतावो कि चित्त में यह बात बैठाने के लिए कि आत्मा के बारे में जो बात कही जायगी वह यथार्थ होगी। ये श्रोता कैसे जाने ? मेरे लिए यह आवश्यक हो गया है कि उन्हें यह बतायें कि हम अटपट बोलने वाले नहीं हैं किंतु शास्त्र का भी अभ्यास किया है, और युक्तियाँ भी अनेक इस आत्मा की खोज में सफल हुई हैं और अनुभव भी हमारा है, इससे जो कुछ कहूँगा वह परंपरा के अनुसार और यथार्थ कहूँगा। इस कारण तुम सब ध्यान पूर्वक इस आत्मा की बात सुनो। ऐसे ही इस ग्रंथ की प्रस्तावना में आचार्यदेव श्रोतावों के प्रति कह रहे हैं।

प्रस्तावना और समाधान―ग्रंथ इस श्लोक के बाद शुरू होगा। यह प्रस्तावना का तीसरा छंद है, अंत:करण में समाधान तब प्राप्त होता है जब वस्तुविषयक यथार्थ हल निकल आता है। किसी वस्तु के संबंध में जब तक उल्टा ज्ञान चलता है तो समाधान नहीं हो सकता। सही बात मालूम पड़े तो समाधान हो जायगा। यह आत्मा देह से न्यारा है, इतनी बात जानने के लिए वस्तुओं का समस्त स्वरूप जानना पड़ता है। यह ध्यान में आये कि यह मैं आत्मा ज्ञानमात्र हूँ और समस्त परभावों से भिन्न हूँ, जो मेरा सहजस्वरूप है उसका जन्म-मरण करने का स्वभाव नहीं है, इस ज्ञायक स्वरूप भगवान् आत्मा का कार्य तो केवल जाननहार रहना और अनंत आनंद में मग्न रहना है। इसके अतिरिक्त और जितनी भी बातें हैं वे सब विपत्ति हैं। दु:खों का कारण नहीं होता उनका कारण परउपाधि है। शास्त्रज्ञान व अनुभवज्ञान का मेल―भैया ! एक तो शास्त्र से जानकर अपने आत्मा की बात को अनुभव में उतारकर फिर शास्त्र की बात को प्रमाण करना, शास्त्र में जो लिखा है वह बिल्कुल ठीक है, इन दोनों बातों का परस्पर में सहयोग है। कभी हम शास्त्रों को पढ़कर जानकर अपनी आत्मा का विश्वास करते हैं और कभी आत्मा का अनुभव करके हम शास्त्र में लिखी हुई बातों का विश्वास करते हैं कि यह बात बिल्कुल ठीक है जैसा शास्त्र में लिखा है वैसा मेरे अनुभव में आया है इसलिए यह ठीक है और मेरे अनुभव में जो आया है वह शास्त्रों में भी मिल गया है इस कारण मेरा ज्ञान पक्का है, ऐसा विश्वास हो जाता है।

अनुकूल अनुभव की श्रेष्ठता―मोटे रूप में किसे विश्वास नहीं है कि यह आत्मा देह से भिन्न है। सब लोग जानते हैं और कुछ ऐसा देखा भी करते हैं कि मरने के बाद यह देह यहाँ ही रह जाता है और आत्मा और कहीं चली जाती है। इस कारण सबको यह विश्वास है कि शरीर से आत्मा जुदी चीज है। समयसार में ऐसा संकल्प करते हुए कुंदकुंदाचार्य देव ने चार बातें कही हैं। आगम से, युक्ति से, गुरूवों की भक्ति के प्रसाद से और अनुभव से विविक्त आत्मा को कहेंगे। प्रथम परिज्ञान होता है शास्त्रों से उसका बोध आत्मा में स्पष्ट बैठता हुआ नहीं हो पाता है। एक विश्वास इस आधार पर जान लिया जाता है कि शास्त्र में इस प्रकार कहा गया है और वह ठीक है, प्रमाणभूत है, शास्त्र की बात झूठ नहीं हो सकती- इस विश्वास के आधार पर ज्ञान होता है और इससे विशेष परिज्ञान होता है। उस शास्त्र के साथ-साथ युक्ति का भी समावेश हो, शास्त्र से न मानकर युक्ति चलाए तो वह ज्ञान ठीक नहीं है। शास्त्र का विश्वास रखते हुए फिर उसकी युक्ति भी चलावे और उस युक्ति से जो बात जानने में आ जाय वह और प्रमाण होती है, और शास्त्र से भी जाना, युक्ति से भी जाना और गुरु सेवा के प्रसाद में, गुरूवों के वचन भी प्राप्त हुए, उनकी प्रसन्नता भी भक्त पर हुई, और वहाँ जो बात सुनने में मिले उससे जो ज्ञान होता है वह और दृढ़ और निर्मल होता है। शास्त्र से भी जाना, युक्ति से भी जाना और गुरूवों की उपदेश परंपरा से भी जाना, लेकिन अनुभव में न उतरे तो यह जानकर भी हमारा काम नहीं बना। वह अपने अनुभव में भी उतरना चाहिए।

अनुभव की स्पष्टता का एक व्यावहारिक उदाहरण―जैसे श्रवणबेलगोला में बाहुबली स्वामी की प्रतिमा है, उसे उस विस्तार से भी जान लिया कि ऐसी प्रतिमा है और चित्र देख करके युक्ति से भी जान लिया कि यह खास कैमरे से उतारा गया फोटो है। इतना विशालकाय, इतना पूरा होना चाहिए, इतने प्रमाण के हाथ होना चाहिए, यह जान भी लिया और जो उस बात के गुरु हैं याने जो देख आए हैं वे कहेंगे कि हमने देखा है, ऐसी मूर्ति है। जो चित्रों में आया है, जो पुस्तकों में लिखा है वह बिल्कुल सही बात है, तो उनसे भी जान लिया पर अभी तक अनुभव में बात नहीं उतरी। जब तक उस प्रतिमा का साक्षात् दर्शन नहीं कर लिया जाता तब तक उस रूप से जानने पर भी चित्त में ऐसा फिट नहीं बैठता―ओह ! यह है वह आज। वही पुरूष जब दर्शन करने जाता है, दर्शन कर लेता है तो उसे वे पुरानी तीन बातें दृढ़ता से याद आ जाती है। ओह ! यही है वह प्रतिमा जो पुस्तक में लिखा था, जो युक्ति से भी जाना था और देखने वालों के मुख से समझा था।

आत्मानुभव की स्पष्टता―इसी प्रकार इस आत्मा के संबंध में शास्त्रों में लिखा है कि आत्मा शुद्ध चिदानंदस्वरूप है, देह से न्यारा है, अमूर्त ज्ञानानंद स्वामी है, और युक्तियों से भी जाना। चूंकि मरने पर देह यहीं रह जाता है, जीव चला जाता है, तो आत्मा इस देह से न्यारा है, बड़े-बड़े ऋषिसंत ज्ञानी पुरूषों की सेवा करके भी उनसे सुना है और उनकी मुद्रा से उनकी प्रकृति से पहिचानने में आया है। इतनी बात होने पर भी जब तक निर्विकल्प समाधि के ज्ञान में ज्ञानस्वरूप का ज्ञान होकर अनुभव में बात नहीं आती तब तक यह बात कुछ ऊपरी ऊपरी ढंग जैसी लगा करती है। हां है और जिस समय बाह्यपदार्थों का विकल्प तोड़कर किसी अन्य पदार्थ की कोई चिंता न रखकर केवल अपने ज्ञानस्वरूप को ही ज्ञान में लेकर उसका अनुभवन होता है तो यह बात बिल्कुल दृढ़ निश्चित हो जाती है कि ओह यह है वह आत्मा जो अमूर्त ज्ञानस्वरूप है। यह है वह आत्मा जिसके संबंध में भी इसी प्रकार का स्वरूप लिखा है, जिसको हमने युक्तियों से भी बहुत बार जाना था। जिसके संबंध में गुरूवों के प्रसाद से हमें एक शिक्षा प्राप्त हुई थी, यह है वह ज्ञायक ज्ञानस्वरूप आत्मा, ऐसा दृढ़ निर्णय हो जाता है। प्रामाणिकता का प्रमाण―सो आचार्यदेव कह रहे हैं कि शास्त्र से, युक्ति से और अंत:करण के समाधान से भली प्रकार इस आत्मस्वरूप का निश्चय करके उन भव्य जीवों को मैं आत्मस्वरूप की बात ही कहूँगा। कोई कोई लोग तो अज्ञानवश अपनी शान की बात कहा करते हैं। जैसे दुकान में ग्राहकों से किसी चीज के बारे में खूब प्रशंसा करके बोला करते हैं―यह असली माल है और अब दाम और भी तेज हुए जाते हैं, हम बहुत सस्ता दे रहे हैं, बहुत मजबूत है, हम एक ही बात कहते हैं, इसमें मुनाफा नहीं ले रहे हैं, अनेक बातें कहते हैं। तो यहाँ अज्ञान से और मोह से अपनी बड़ाई की बात की जा सकती है, किंतु ज्ञानीपुरूष अज्ञानियों पर दया करके अपनी बड़ाई की बात किया करते हैं। भाव से नहीं, किंतु अज्ञानी जीवों पर दया करके कि यह विश्वास हो जाय कि जो भी आत्मा की बात कहेंगे वह बहुत प्रामाणिक बात कहेंगे। ताकि इन्हें यह पता हो जाय कि इस वक्ता ने बहुत आगमों का अध्ययन किया, युक्ति से भी पहिचाना और गुरूवों की सेवा भी की, उसके प्रसाद में भी ज्ञान पाया और अनुभव भी इसे विशेष है, यह बात श्रोतावों के चित्त में बैठे तो श्रोताजन उस उपदेश को निर्बाधरूप से ग्रहण कर लेंगे। इतनी दया करने के वास्ते ज्ञानीजन भी बता रहे हैं कि हमने शास्त्र से जाना, युक्ति से जाना, अनुभव से जाना। उस ज्ञात और अनुभूत आत्मा की बात मैं तुम्हें कहूँगा।

विविक्त आत्मा का अभिधान―यहां कहने का शब्द दिया है अभिधान करना। एक कहना होता है शब्द से और एक खुद की बात को धारण करते हुए कहना होता है। एक कहना होता है ऐसा कि दूसरे लोग करें, हमें करने की जरूरत नहीं है और एक कहना होता है ऐसा कि वही काम तुम्हें करना है और हमें भी करना है, तो इस आत्मतत्त्व की बात तुम्हें भी करना है और हमें भी करना है। ऐसी सूचना देने वाला शब्द है अभिधास्ये। तो यह मैं शास्त्र से, अनुमान से और अपनी शक्ति के अनुसार जो अंत:करण में इस तत्त्व के संबंध में समाधान पाया है, सावधानी प्राप्त की है उससे भली प्रकार निर्णय करके उस कैवल्य आनंद की इच्छा रखने वाले भव्य जीवों को, इस विविक्त शुद्ध आत्मा को अपनी शक्ति के अनुसार कहूँगा, ऐसा संकल्प करके अब आचार्यदेव इस श्लोक को कहते हैं।


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