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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:समाधितंत्र - श्लोक 34

From जैनकोष



आत्म-देहांतर-ज्ञानजनिताह्लाद-निवृत:।तपसा दुष्कृतं घोरं भुंजानोऽपि न खिद्यते।।34।।अज्ञानी और ज्ञानी की अंतर्वृत्ति–पूर्व श्लोक में यह बताया गया है कि जो प्राणी देह से भिन्न आत्मा को नहीं जानता है वह बड़ा घोर तप भी करे तिस पर भी निर्वाण को प्राप्त नहीं होता। उसकी ही प्रतिक्रिया में इस श्लोक में यह कहा जा रहा है कि आत्मा और देह के भेद का ज्ञान होने से जो सहज आल्हाद उत्पन्न होता है उससे जो रचा भरा पूरा है, ऐसा पुरूष तपस्या के द्वारा घोर दुष्कृत को भी भोग रहा हो तो भी रंच खेद को प्राप्त नहीं होता। अज्ञानी जीव तप करके भी निर्वाण को प्राप्त नहीं होता और ज्ञानी जीव तपस्या के बल से घोर दुष्कृत कर्मफल को भी भोग रहा हो तो भी रंच खेद को प्राप्त नहीं होता।ज्ञान का प्रभुत्व―भैया ! खेद है कहां? सुख, दुःख, आनंद सब कुछ इस ज्ञान की कला व विकला में भरा पड़ा हुआ है। जैसी कल्पना जीव की है वैसा ही जीव पर खेद अथवा सुख गुजरता है। किसने देह और आत्मा में भेद विज्ञान किया है, आत्मा तो आकाशवत् निर्लेप अमूर्त ज्ञानघन आनंदमय भावात्मकतत्त्व है और यह देह शरीर वर्गणावों का पिंड पौद्​गलिक भौतिक, देखने में आने वाला, छुवा जा सकने वाला ऐसा यह विनाशीक मायारूप है। इन दोनों में रंच भी समता नहीं है किंतु व्यामोह की ऐसी लीला है कि अत्यंत विषम भी है तो भी इनको यह व्यामोही एक कर डालता है। शास्त्र पढ़ लेने से ज्ञानी नहीं कहलाता, किंतु ज्ञानस्वरूप का ज्ञान हो जाने से ज्ञानी कहलाता है।मर्मबोधशून्य अक्षरविद्या से विडंबना―एक कथानक है। एक गुरु के पास कुछ शिष्य पढ़ते थे। उनमें एक शिष्य अपना पाठ खूब कंठस्थ कर लेता था। गुरूजी के एक लड़की थी, सो सोचा कि अपनी लड़की का इस शिष्य के साथ विवाह कर दें। सो उस शिष्य के साथ उसने अपनी लड़की का विवाह कर दिया। वह पढ़ तो बहुत गया था सो चार 6 माह बाद एक दिन ख्याल में आया एक श्लोक पढ़ा है कि ‘भार्या रूपवती शत्रु:।‘ रूपवती स्त्री हो तो वह शत्रु है। उसका मर्म तो कुछ और है, पर उसकी स्त्री रूपवती थी, सो उसने उस श्लोक से यह शिक्षा ली कि इसकी नाक काट दें, रूप न रहेगा तो फिर हमारी शत्रु न रहेगी। उसने स्त्री की नाक काट दिया। गुरु ने क्रुद्ध होकर उसे घर से निकाल दिया। सोचा कि यह तो बड़ा मूर्ख आदमी है। चला गया घर से। सोचा किस ओर चलना चाहिए तो फिर शास्त्र का एक श्लोकांश याद किया–‘महाजनो येन गत: स पंथा:।‘ जिस रास्ते से बड़े पुरूष जायें वह रास्ता चलने योग्य है। उस समय एक सेठ का लड़का गुजर गया था। बड़े-बड़े लोग श्मशान घाट पर उसे लिए जा रहे थे। सो उनके ही पीछे यह थोड़ा सा कलेवा लेकर चल दिया। वे लोग तो अपनी क्रिया करके वापिस हो गये, वह मरघट में बैठ गया।मर्मबोधशून्य अक्षरविद्या के प्रयोग से आपत्ति―अब अक्षरभट्ट महाराज लगी थी भूख, सो खाना खाने की उसने सोची उसी समय एक श्लोकांश याद आया कि―‘बंधुभि: सह भोक्तव्यम्​।‘ भोजन बांधवों के साथ करना चाहिए। सोचा यहां बंधु कौन है ? फिर श्लोकांश याद किया। ‘राजद्वारे श्मशाने च यस्तिष्ठति स बांधव:।‘ कचेहरी में और मरघट में जो साथ दे वही बांधव है। सो मरघट में देखा कि यहां कौन बांधव है ? सो एक गधा चर रहा था, उसने सोचा कि यही मेरा बांधव है। सो उसके कान पकड़कर पास ले आया और आधा गधे को खिलाया आधा स्वयं खाया। चलो यह श्लोक भी पूरा हुआ। उसने फिर श्लोकांश याद किया ‘बंधु धर्मेण योजयेत् तो भाई को धर्म में लगाना चाहिए। सोचा कि यह गधा हमारा भाई है तो इसे धर्म में लगाना चाहिए। अब धर्म को ढूँढ़ा। फिर श्लोकांश याद आ गया ‘धर्मस्य त्वरिता गति:।‘ धर्म की बड़ी तीव्र गति होती है। वहां जा रहा था एक ऊँट, वह बड़ी तेज गति से चल रहा था, सोचा कि इसकी बड़ी तीव्र गति है, यही धर्म है। बंधु को इस धर्म में जोड़ना चाहिए। सो एक रस्सी से गधे को उस ऊँट के गले में बांधकर लटका दिया। अब वह गधा बड़े संकट में था, सो गधे वाले न दौड़कर इन की मरम्मत की व गधे को छुड़ाया तो शास्त्रज्ञान बहुत जाना पर उससे विद्या प्रकट नहीं हुई।खेदविलय का उपाय ज्ञानानुभव―ज्ञान प्रकट होता है ज्ञानस्वरूप निज अंतस्तत्त्व का अनुभव हो जाने से। ओह सबसे न्यारा यह ज्ञानमात्र यह नवाब साहब तो यह मैं खुद ही हूँ, जहां ऐसा बोध हुआ वहां उसे जो आनंद प्रकट होता है, उस आनंद को भोगनेवाला आत्मा बड़ी तपस्यावों को भी करे और उन तपस्यावों के द्वारा पूर्वबद्ध दुष्कृत क्लेशों में भी आए तो भी उसे रंच खेद नहीं होता है। संसार के प्राणी अपना खेद मिटाने के लिए किसी विषयभूत पदार्थ का संचय किया करते हैं किंतु यह उपाय तो इस प्रकार का है कि जैसे कोई घी डालकर अग्नि को बुझाना चाहता है। अग्नि जल रही हो कोई उसमें घी डाल कर बुझाने का यत्न करे तो वह आग बुझेगी या और बढ़ेगी ? वह तो बढ़ जायेगी। यों ही वेदना मिटाने के लिए राग बढ़ाने का यत्न करते हैं तो राग से उत्पन्न हुए क्लेश राग से मिटेंगे या बढ़ेंगे ? बढ़ेंगे। खून का दाग खून से ही कैसे मिट जायेगा ? नहीं मिट सकता। यों ही मोह और राग के परिणाम से वेदना हुई है, और उस वेदना को मिटाने के लिए राग और मोह का ही उपाय किया तो उससे शांति कहां मिल सकती है ?

संतों के उपसर्ग में भी खेद का अभाव―भैया ! पूर्वकाल में हुए बड़े तपस्वियों का स्मरण करो। किसी मुनि को उसके बैरी ने कंडा भरे हुए घर में बंद करके कंडों में आग लगा दिया। अब सोचो इससे अधिक क्लेश और क्या कहा जा सकता है ? किंतु वह मुनि वहीं समाधिमरण करके बहुत उच्च देव हुआ। एक मुनि को किसी प्रेमी ने ही चूँकि उसे छोड़कर मुनि हुए थे, इस दुःख के मारे क्रोधवश उनकी चाम को चाकुवों से छीलकर नमक बुरक कर अपनी कषाय शांत की। लेकिन वह मुनि उस ही स्थिति में आनंदमग्न होकर निर्वाण को प्राप्त हुआ। वह बहुत बड़ा वैभववान है जिसे सबसे न्यारे आत्मतत्त्व का निर्णय हो जाय। यहां हम आप लोग अधर्म की खिचड़ी हैं, न तो पूरा मोह है और न पूरे विविक्त स्वरूप के निर्णय रखने वाले हैं, तो भले ही आश्चर्य मालूम पड़े, किंतु जिन्होंने निजस्वरूपास्तित्त्वमात्र अपने आत्मतत्त्व का दर्शन किया है उसको तो जैसे लकड़ी में आग लगा दी या दूसरे के सिर पर आग धर दी, इस ही प्रकार अपने सिर पर जलती हुई आग के ज्ञाता रहते हैं, उन्हें खेद नहीं होता है। यहीं अंदाज करलो, किसी में जब तक शामिल हैं, उसे अपनाते हैं तब तक उसके दुःख में दुःख माना करते हैं, और जैसे ही संबंध हट गया, फिर किस ही रूप परिणमन हो, खेद नहीं करते।विभावपरिवर्तन का एक प्रसिद्ध दृष्टांत―अंजना और पवनंजय का दृष्टांत तो बड़ा प्रसिद्ध हैं। हनुमान जी को पवनसुत कहते हैं। कहीं वे हवा के पुत्र न थे किंतु पवनकुमार अथवा पवनंजय राजपुत्र के पुत्र थे। जब सुना पवनंजय ने कि हमारे विवाह की चर्चा राजा महेंद्र की लड़की अंजना से हुई है, तीन दिन बाद शादी की तिथि थी, लेकिन अनुरागवश वह तीन दिन का वियोग पवनंजय को असह्य हो गया। सो अपने मित्र प्रह्लाद से एकांत वार्ता करके चले अंजना को देखने के लिए। सो गुप्त ही चले कि देखें आखिर अंजना कौन है? वे उसे छुपकर देखने लगे। वहां हाल क्या हो रहा था कि अंजना अपनी कुछ सखियों समेत बाग़ में घूम रही थी सो सखियां अंजना से जैसी चाहे बातें करें। अब तो तुम्हारी शादी होने वाली है, अजी उस राजपुत्र से हो रही है। यदि अमुक राजकुमार से शादी होती तो ठीक था, कोई सखी कहे–अजी क्या पवनंजय से सगाई हुई अमुक राजकुमार से शादी होती तो ठीक था। कोई सखी कुछ कहे, कोई कुछ कहे। पवनंजय सब सुन रहा था। छिपकर और अंजना लज्जा के मारे चुपचाप बैठी हुई थी। यहां पवनंजय ने क्या भ्रम किया कि हम इस अंजना को सुहाते नहीं हैं, सो उन्हें इतना गुस्सा आया कि सोचा इन सखियों का और अंजना का सिर उड़ा दें। देखो ठाढ़े बैठे में कैसी-कैसी विडंबनाओं के परिणाम हो जाया करते हैं ? पर प्रहलाद ने रोक दिया कि ऐ राजपुत्र ऐसा मत करो। फिर पवनंजय के मन में ऐसा आया कि शादी बंद करा दें। फिर सोचा कि यदि शादी ही बंद करा दी तो फिर इसका फल ही क्या चखाया ? अच्छा शादी हो जाय, फिर इससे बोलेंगे ही नहीं इसका परिहार कर देंगे। शादी के बाद 22 वर्ष तक अंजना का त्याग किए रहे पवनंजय।

पवनंजय के विभावपरिवर्तन की द्वितीय प्रमुख घटना―यह रावण के पिता के समय की घटना है। तो रावण के पुरखों ने जिनका कि एकक्षत्र राज्य फैला हुआ था, सब राजावों की सेनाओं को बुलाया, तो वहां पवनंजय के पिता के पास भी संदेश आया था, तो पवनंजय ने निवेदन किया कि मेरे रहते हुए आप क्यों जायें ? चले पवनंजय, रात्रि को एक तालाब के पास अपना डेरा डाला, और क्या देखा कि चकवा चकवी वियोग के कारण चिल्ला रहे हैं, दुःखी हो रहे हैं। ओह ! सोचा कि ये रात्रि भर का वियोग नहीं सह सकते, और मैंने निरपराध अंजना का 22 वर्ष तक परित्याग किया। रात ही रात छिपकर पवनंजय अंजना से मिलने के लिए चला। छिपकर इसलिए चला कि लोग यह न समझें कि गए थे युद्ध के लिए और कायर बनकर लौटकर आ गए। तो पवनंजय पहुंचे अंजना के महल में। उससे मिलकर फिर प्रात:काल वहां से चल दिया। चलते समय अंजना ने कहा, कि ‘‘आप बहुत दिनों में तो आये हैं, और किसी को पता नहीं।’’ सारा लोक जानता है कि राजपुत्र अंजना का परित्याग किए हुए हैं, तो कम से कम माता-पिता से कहकर जावो कि आज अंजना के महल में आये हैं। लेकिन कैसे कहें ? उसे तो अपनी शान रखनी थी। कहा कि ‘यह अंगूठी लो, यही हमारी निशानी है।’

पवनंजय की अंतिम विचित्र घटना―अब चल दिया पवनंजय वापिस। अब यहां अंजना के गर्भ था। सास ने घर से अंजना को निकाल दिया। कहीं उसको शरण नहीं मिली। भटकते-भटकते एक जंगल में पहुंची। जंगल में गुफा में ही रहने लगी। वहां वह बहुत आराम से रही। गुफा के देव रक्षक थे। जब पवनंजय ने 6 माह बाद वापिस आकर देखा कि यहां अंजना नहीं तो कहा ‘‘हाय ! मैंने निरपराध अंजना को इतना कष्ट दिया है?’’ दुःख के मारे पवनंजय खाना पीना छोड़कर उस अंजना की तलाश करने लगा। और पवनंजय ने यह संकल्प कर लिया कि यदि अंजना न मिलेगी तो अग्नि में जलकर मर जाऊँगा। बड़े पुरूषों की बातें होती हैं। अंजना के गर्भ था और उस गर्भ के कारण ही सास ने उसे घर से निकाला था। अंजना ने एक गुफा में, निर्जन स्थान में हनुमान जी को जन्म दिया था। उस समय उनके देव रक्षक थे। बड़ी कथाएँ हैं। तो आप यह देखो कि पहिले अंजना के प्रति पवनंजय का क्या भाव था, पश्चात छोड़ने में देर न लगी। फिर देखो अंजना के बिछुड़ जाने पर पवनंजय ने अपना मरण तक कर लेने का भाव बनाया। कैसा भावों का परिवर्तन होता है ?

लोक में अटपट, बेकायदा संबंध―जिससे अपना चित्त हट जाता है फिर उसकी ओर दृष्टि नहीं रहती है। ज्ञानी पुरूष आत्मा और देह में अंतर ज्ञात कर रहा है। यह सच्चिदानंदस्वरूप शाश्वत अपरिणामी भावात्मक मैं आत्मतत्त्व हूँ, और यह देह पौद्​गलिक है। जिसने प्रकट न्यारा जाना अपने आपको उसको जो आल्हाद उत्पन्न होता है, बस वही निर्वाण का कारण है। कठिन काम बन जाय तो सदा को आराम रहता है। और छोटे-मोटे कामों से तत्काल तो कुछ साता मालूम होता है पर सदा को निश्चितता नहीं आती। ये सब थोथे छोटे काम हैं राग, स्नेह, मोह के। क्या हैं ? अट्ट सट्ट सारा मामला है। आज तुम्हारे घर में जो जीव आये हैं बजाय इसके कोई और जीव आ जाते तो ? आपको तो मोह की प्रकृति पड़ी है, सो कोई आये उसी में मोह करते। कहीं किसी का नाम तो नहीं खुदा है कि मेरे मोह का यह विषय है। जब यह देह भी मेरे साथ नहीं रह सकता है तो अन्य पदार्थों की चर्चा ही क्या है?

देह का निर्माण―सिद्धांत के अनुसार यह देह क्या है ? यह स्थूल शरीर है। स्थूल शरीर कहो या औदारिक शरीर कहो दोनों का एक अर्थ है। उदार मायने स्थूल, और स्थूल शरीर का जो परिणमन है उसका नाम है औदारिक। इस औदारिक शरीर की रचना आहारवर्गणा के परमाणुवों से हुई है। जब तक इस जीव ने उन आहारवर्गणावों के परमाणुवों को ग्रहण नहीं किया था तब तक ये परमाणु बहुत शुद्ध पवित्र थे। जैसे ही इस जीव ने उन परमाणुओं को ग्रहण किया तो हाड़, मांस, खून, वीर्य आदि नाना अपवित्र रूप परिणम गया।मूल में अपवित्र कौन ?―वस्तुत: अपवित्र कौन है ? इसका निर्णय करिये। लोक में बच्चों में यह रीति है कि किसी बालक का पैर विष्टा में छू जाय तो वह बालक अछूत हो गया, जब तक कि वह नहा न ले। यदि वह अछूत बालक किसी दूसरे को छू ले तो वह भी अछूत, और दूसरा तीसरे को छू ले तो वह भी अछूत, इसी तरह चौथे को, यही चलता जाता है। जरा यह तो मालूम करो कि जड़ में अछूत कौन था ? वह एक बालक। तो जरा अपवित्रता का भी ध्यान करो। सड़कों के पास की जो नालियां है उनसे कितनी बदबू आती है, छींट गिर जाय तो नहाते हैं। क्या उन नालियों में अपवित्र चीज मरे हुए कीड़ों का कलेवर है ? तो वह जो मृत मांस है उसकी जड़ क्या है? उन कीड़ों का जीवित शरीर, और मृत शरीर भी अपवित्र है। उसका मूल क्या है? क्यों बना यह ऐसा शरीर? यों कि इस मोही जीव ने उन परमाणुवों का स्पर्श कर डाला तो जिसके छूने से यह शरीर अछूत बना तो अछूत शरीर है या मोही जीव है ? मोही जीव ही अछूत हुआ। जीव तो अछूत नहीं है, पर मोह के संबंध से जीव अछूत बन गया। तो जीव अछूत हुआ या मोह ? मोह अछूत हुआ। तो अपवित्र कौन रहा मूल में ? ये गंदी नालियां अपवित्र नहीं है, इनको अपवित्र करने वाला मूल में तो मोह भाव है।व्यामोह की विचित्रता―फिर सोचिये नालियों का कारण शरीर। शरीर का कारण जीवित शरीर। जीवित शरीर का कारण मोही का संबंध और जीव के अपवित्र होने का कारण है मोह का संबंध। तो दुनिया में सबसे अपवित्र चीज क्या है? मोह। मोह से गंदा मल नहीं है, विष्टा नहीं है, कोई सड़ी गली चीज उतनी गंदी नहीं है जितना गंदा मोह परिणाम है। कोई मनुष्य विष्टा को देखकर ग्लानि करे, और थूक दे और मांस को देखकर ग्लानि न आए और खाते हुए भी ग्लानि न करे तो यह बतलावो कि सबसे अधिक ग्लानि की चीज, विष्टा से भी अपवित्र तो मांस है, मगर दृष्टि व्यामोह में ऐसी विचित्र हो जाती है कि सब अट्टसट्ट बर्ताव चलता है।ज्ञानप्रकाश―ज्ञानों में ज्ञान यह उत्कृष्ट ज्ञान है कि सबसे न्यारा, देह से भी जुदा ज्ञानमात्र निज अंतस्तत्त्व का ज्ञान बना रहना। धन, वैभव, हाथी, घोड़ा, मकान ये कुछ काम न आयेंगे किंतु ज्ञानमय आत्मा का अपने ज्ञानस्वरूप का ज्ञान हो जाय तो यह ज्ञान संसार के समस्त संकटों को दूर कर देता है। इस कारण सब बलपूर्वक यत्न करो और ज्ञानसंपादन का यत्न करो। हिम्मत ऐसी बनावो। जितना आ गया ठीक है, न रहेगा ठीक है। उसके आने जाने से मेरी आत्मा का सुधार बिगाड़ नहीं है, पर अविद्या और विद्या का वास होने से आत्मा का बिगाड़ और सुधार है। जैसे जिसको जिससे कोई सुख की आशा नहीं है तो उसके द्वारा बहुत मनाये जाने पर भी उसका आकर्षण नहीं होता। यों ही ज्ञानी संतों को किसी भी परपदार्थ से हित की आशा नहीं है। सो किसी भी पदार्थ के संग से, मनाए जाने से इनका उसकी ओर आकर्षण नहीं होता है। ज्ञान का चमत्कार एक अद्​भूत चमत्कार है। ज्ञान आये तो सारा धन वैभव काक बीट की तरह प्रतिभास होता है। अपनी चीज अपने को मानना क्यों कठिन हो रहा है? गुप्त भान करें, ज्ञानमय यत्न करें और ज्ञानप्रकाश पाकर सदा सुखी रहने का परिणमन पायें।


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