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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:समाधितंत्र - श्लोक 36

From जैनकोष



अविक्षिप्तं मनस्तत्त्वं विक्षिप्तं भ्रांतिरात्मन:।धारयेत्तदविक्षिप्तं विक्षिप्तं नाश्रयेत्तत:।।36।।तत्त्व और भ्रांति―मन का अविक्षिप्त रहना, रागादिक परिणति से परे रहना तथा देह और आत्मा को एक मानने के विपरीत आशय से रहित जो ज्ञान का होना है इस ही को मन कहा गया है। यहां मन शब्द से ज्ञान का अर्थ लेना। जो ज्ञान अविक्षिप्त है वह तो आत्मा का तत्त्व है और और जो विक्षिप्त मन है वह आत्मा की भ्रांति है।विक्षिप्त मन की प्रतिक्रिया―जब मन विक्षिप्त रहता है उस समय इस जीव को अंतर में आकुलता रहती है। जरा अपने जीवन की पहिली कृतियों को तो सोच लो, क्या क्या कृतियां कर डाली गयी हैं ? आज उनके फल में कुछ भी लाभ वाली बात सामने नहीं है। बचपन में कैसी-कैसी क्रीड़ावों और अज्ञान दशावों में खेलते रहे ? आज विदित होता है कि वह सब कोरी अज्ञान दशा थी। जवानी में सब विकारों में प्रमुख विकार एक काम होता है। उसकी चेष्टा में इस जीव से क्या से क्या बर्ताव किया? कितने ही मनुष्य तो बहुत परिवार के संकट आने से यह कहने भी लगते हैं कि यह सब विडंबना एक स्त्री परिग्रह के कारण हुई है। स्त्री परिग्रह के कारण नहीं, किंतु कामवासना के कारण हुई है। जिस मन में रागद्वेष बसे रहते हैं वह मन विक्षिप्त रहता है।ज्ञान के अविक्षेप की आवश्यकता―लोग चाहते हैं कि कम से कम जब प्रभु का भजन किया जा रहा हो, सामायिक में कुछ भक्ति की जा रही हो तो मन स्थिर रहे ऐसी भावना जगती है, परंतु शिकायत रहती है कि सामायिक में, जाप में मन स्थिर नहीं रहता। जब रागभरी वासनाएं बहुत बनी हुई हैं तो मन अविक्षिप्त कहां से हो? कोशिश यह होना चाहिए कि हम तात्विक भेदविज्ञान प्राप्त करें जिससे परपदार्थों की रूचि हटे और मैं अपने आप में अपने स्वरूप की प्राप्ति करूँ। वहां ज्ञान अविक्षिप्त रहेगा।विक्षेप का कारण विषय प्रीति―भैया ! इस जीव ने किया ही क्या ? सिवाय इंद्रिय विषय और मन का विषय भोगने के 6 कामों में यह मनुष्य अपना जीवन समाप्त कर देता है। स्पर्शन इंद्रिय का विषय भोगना, रसना इंद्रिय से स्वाद लेना, घ्राणेंद्रिय से सुगंध लेना, नेत्रेंद्रिय से रूप देखना, कर्णेंद्रिय से राग सुनना या अपने यश कीर्ति की नामवरी चाहना–इन 6 इच्छावों के कारण ही यह जीव विक्षिप्त बना है, उन्मत्त हो रहा है।मोहियों की उन्मत्तता―अहो, देखो मोहियों द्वारा कैसी पागल की भांति स्वरूप विरूद्ध चेष्टाएं की जा रही हैं ? सारा जहान प्राय: इसी में चतुराई समझता है कि अपने विषयों के साधन सही बनायें। उन्हें चतुरार्इ से भोगकर इनमें ही बड़प्पन समझा जा रहा है और इसी आधार पर लोग बड़ा माना करते हैं। अमुक सेठ साहब बहुत बड़े आदमी हैं। बड़े आदमी हैं इसका तात्पर्य इतना ही है कि वैभव है और इंद्रिय के विषयों के साधन भी बने हुए हैं, पर जिस बात के कारण लोग बड़ा समझते हैं वे सब बातें इस जीव की तुच्छता की हैं, भूल है। इसका स्वरूप तो प्रभुवत् अनंतज्ञान, अनंत दर्शन, अनंत शक्ति और अनंत आनंदस्वरूप है, किंतु विषयों आशा में इसने अपने उस अनंतस्वरूप को खो दिया है, विक्षिप्त बना हुआ है, पागल बना हुआ है। मोहियों की उन्मत्तचेष्टा- कोई किसी से प्रेमभरी बात करता, तो किसी से द्वेष भरी बात कहता, तो कोई कुछ भी बकता। आज जिससे प्रेम कर रहा है कल उससे द्वेष करने लगता, आज जिससे द्वेष किया जा रहा है कल उससे प्रेम करने लगता। यह सब क्या है? पगलों की चेष्टाएँ है। बाह्यपदार्थ जिनका स्वरूप मेरे में त्रिकाल प्रविष्ट नहीं हो सकता, जो मेरे से सर्वथा भिन्न है उसे रखे-रखे फिरता है, उसकी वृद्धि में कल्पनाएँ बनाए फिरता है। अरे आत्मन् सोचो तो सही अकेले ही तो तुम जन्मे हो और अकेले ही मरण को प्राप्त होगे और इस जन्ममरण के बीच के जो दिन हैं उनमें भी तू अकेले ही कल्पनाएँ करता रहता है, अकेले ही सुख भोगता है, अकेले ही दु:ख भोगता है। क्या है तेरे में लगा। किसके लिए तू इतना श्रम किये जा रहा है?

अविक्षिप्त होने के लिये उलहनारूप शिक्षण- हे आत्मन् तेरे चित्त में प्यार करने की कल्पना उठती है तो तू इस प्यार को इतना क्यों नहीं फैला देता कि वह प्यार फिर प्यार ही न रहे। सब जीव तेरे ही स्वरूप के समान तो है। फिर उनमें यह छटनी करना कि यह मेरा है, यह पराया है, यह क्या पागलों जैसी चेष्टा नहीं है। तू जिसे पराया मानता है वही तेरे घर में उत्पन्न हो अथवा तेरा मित्र बन जाय तो अपना मानने लगेगा। जिसे तू अपना मानता है, कोई प्रतिकूल बात बन जाय तो उसे तू शत्रुवत् मानने लगेगा। सब जीव तेरे से अत्यंत भिन्न एक ही प्रकार से हैं पर अपने स्वभाव को भूलकर बाहर में नाना कल्पनाएँ मचा रहा है, विक्षिप्त हो गया है, अपने आपको भूल गया है, बाहरी व्यवस्थावों में बड़ा चतुर बन रहा है और अपनी सुध खोने में भी प्रथम नंबर पा रहा है।

बाह्यदृष्टि की व्यवस्था- कोई एक बहुत शान रखने वाले, व्यवस्था बनाने वाले बाबू साहब थे। तो शाम के समय अपने प्रधान निवास के कमरे को सजा रहे थे और नाम लिखते जा रहे थे कि इस जगह यह चीज रक्खी जायेगी। यहां जूते, यहां घड़ी, यहां छड़ी, यहां कमीज, कोट सब लिखते जा रहे थे और उस जगह उस चीज को रखते जा रहे थे। अब 9।। बज गये। व्यवस्था की धुन बराबर जारी है और उसी प्रसंग में पलंग पर लेट गये तो पलंग की पाटी पर ‘‘मैं’’ लिख दिया अर्थात् यहां मैं धरा हूं, यहां घड़ी धरी है, वहां छड़ी धरी है। अब सोने के बाद जब उठे तो उठकर सब व्यवस्था देखने लगे। ओह ठीक है। घड़ी की जगह घड़ी हैं, जूतों की जगह जूते हैं, कोट की जगह कोट है, ठीक है सब निरखता जा रहा था। अपनी चारपाई की पाटी को देखा तो वहां लिखा था मैं। सो खड़े होकर उस पलंग को टोकने लगा और सब कुछ तो मिल गया पर पलंग पर मैं नहीं मिला। पलंग के बीच के छेदों में भी देखा, लाठी से ठोक कर भी देखा कि कहीं मैं धँसा होऊं। बहुत ढूँढ़ा पर उसका मैं नहीं मिला।

मैं कहां गुम गया- अब वह बाबू बड़ा दु:खी हो गया। अरे मैंने अपना मैं खो दिया। झट अपने नौकर को बुलाया, अरे मनुवा बड़ा गजब हो गया। क्या हो गया बाबू जी? अरे मेरा मैं गुम गया। सो वह पागलों की जैसी बात सुनकर हँसने लगे। बाबू जी कहने लगे, अरे तू हँसता क्यों है, मेरा तो मैं गुम गया। तो नौकर कहता है बाबू जी परेशान न हो। आप आराम करो, आपके ‘‘मैं’’ का मैं जिम्मेदार हूं। आपका ‘‘मैं’’ जरूर मिल जायेगा। उसे शांति हुई, उसने सोचा कि इस नौकर ने कहीं देखा होगा, मिल जायेगा, पुराना नौकर है झूठ नहीं बोल सकता। सो पलंग पर लेट गया। थोड़ी देर बाद नौकर कहता है कि मालिक देखो आपका मैं मिल गया या नहीं। तो पलंग पर ही तो टटोलना था। ज्यों ही ऊपर हाथ फेरा तो कहता है कि ओ, यस, मेरा ‘‘मैं’’ मिल गया। तो जैसे वह अपने को ढूँढ़ने के लिए पागलभरी चेष्टाएँ कर रहा था, उसको मैं का पता न था, उससे भी अधिक पागल ये संसार के व्यामोही जीव हैं। वह कम से कम ‘‘मैं’’ को ढूँढ़ने की तलाश में तो था, पर ये जीव तो उस ‘मैं’ की तलाश में भी नहीं हैं।

मोह की प्रकृति आकुलता- भैया इस आत्मभ्रांति का फल क्या मिलता है कि परपदार्थों को ही आत्मसर्वस्व मानकर, अज्ञान अंधकार में रागद्वेष मोह से पीड़ित होकर विकल्पों में जुटे चले जा रहे हैं। यह विक्षिप्त मन आत्मा की भ्रांति है। अपना कर्तव्य है कि इस प्रीति की स्थिति से हटें और अविक्षिप्त ज्ञान का आश्रय करें। कोई सार मिलता हो मोह में तो किए जावो मोह, कुछ अधर्म नहीं है। शांति के लिए ही तो सब कुछ करना है। यदि मोह में वास्तविक शांति हो तो खुली घोषणा हो जायेगी कि खूब किए जावो मोह, किंतु मोह में शांति त्रिकाल नहीं हो सकती। चाहे अग्नि शीतल हो जाय, चाहे सूर्य पश्चिम में ऊग जाय, चाहे पत्थर पर कमल उगने लगें, चाहे बालू से तैल निकलने लगे, पर यह कभी नहीं हो सकता कि मोह परिणाम से शांति प्राप्त हो। मोह का स्वभाव ही ऐसा है कि वह आकुलता को उत्पन्न करता हुआ उदित होता है।

पुण्य के उदय में भी शांति का अभाव- इस लोक में लोग पुण्य की बहुत तारीफ करते हैं और पुण्यबंध की बड़ी आशा रखते हैं, पर जरा दृष्टि पसार कर तो देखो कि पुण्य के उदय में कष्ट आया करता है या आराम मिला करता है। देखो श्रीराम, सीता, श्रीकृष्ण, बलदेव, और भी अनेक उदाहरण है जिनके पुण्य का कोई ठिकाना न था। उस पुण्य में मिला क्या? तो सारे जीवन के चरित्र को देख लो- कोई न कोई खटपट, विडंबना, आपत्ति लगी ही रही। लो अब वन को जा रहे हैं, राज्य छोड़ दिया है, जंगल में भी अनेक घटनाएं गुजर रही हैं, लो सीताहरण हो गया है, अब उसमें विह्वल हो गए हैं, अब युद्ध हुआ है, अब पुन: सीता को फिर वन में छुड़़वा दिया है, फिर बड़ा युद्ध लव और कुश से हो रहा है, फिर सीता को घर ले आया गया तो अग्निकुंड का हुक्म सुना दिया। ओह ! सारा जीवन देखो विपत्तियों से बिछा हुआ ही तो मिला। किसी महापुरुष को देख लो- पुण्य के उदय जिनके हुआ है उनको कितनी बाधाएं और विडंबनाएं हुई हैं?

पुण्य से विपत्तियां- फूलों को देख लो। जंगल में बाड़ियों पर नीले फूल बहुत फूले रहते हैं, जिनमें गंध नहीं, जिनका आकार भी सुंदर नहीं उन फूलों को कौन तोड़ता? कोई छूता भी नहीं है, और गुलाब, बेला, चमेली, चंपा इन फूलों को तो जरा ज्यादा पुण्य का उदय है, सुंदर भी लगते हैं, सुगंधित भी हैं, सब मनुष्य चाहते हैं, तो क्या फल होता है? थोड़ा थोड़ा ही फूल पायें कि तोड लिए जाते हैं। जिनके पुण्य का उदय है उन्हें चैन नहीं मिलती और जिनके पाप का उदय है उन्हें चैन नहीं मिलती।

हितनिर्वाचन- यह सारा संसार क्लेश से भरा पूरा है। यहां किसी भी स्थिति का चुनाव मत करो कि मैं ऐसा बन जाऊं। हां आत्मश्रद्धान्, आत्मज्ञान और आत्मरमण की स्थिति में होने वाली जो शुद्ध ज्ञानदशा है उसका चुनाव करो। मुझे ऐसी ज्ञानस्थिति प्राप्त हो। यद्यपि है यह कठिन बात, किंतु बार बार इस ज्ञानस्वरूप की भावना करने से वह सुगम हो जाता है। अच्छा प्रश्न ही करते जावो? अब क्या बनना है, अब क्या करना है, अब क्या होगा? विद्या सीखेंगे, कलायें सीखेंगे, लखपति हो जायेंगे। फिर क्या होगा? इज्जत बढ़ जायगी। फिर क्या होगा? अरे ! उस इज्जत को संभालने के लिए रात दिन अशांत रहना पड़ेगा। वृद्ध हो जायेंगे, मरण हो जायगा। फिर क्या होगा? वह फिर अगले भव से संबंधित बात है। कौनसी वस्तु यहां चाहने योग्य है? खूब निर्णय कर लो। कोई अणुमात्र भी मेरे हित के लिए साधक नहीं है। मेरा ही शुद्धज्ञान स्पष्ट सम्यग्ज्ञान ही आकुलता को और विडंबना को काट सकने में समर्थ है।

मोही की करुणापात्रता- किसी पागल पुरुष को देखकर आपको कितनी दया आती है, हाय ! कितना संकट है, यह खुद अपनी सुध में नहीं है, उस पर बड़ी करुणा आती है ना, और जो स्वयं ऐसा पागल बनता है कि खुद की सुध नहीं है और परपदार्थों में अटपट छटनी कर डाली है, मोह बसा रक्खा है, ज्ञान का अवरोध कर दिया है ऐसी पगलाई पर भी तो कोई हंसने वाला तो होगा, करुणा करने वाला तो होगा? तत्त्वज्ञ पुरुष उस पर करुणा करता है।

बाहर में कहां शरण?- किसी बालक को कोई दूसरा कोई सताये, डराये। मानों दो वर्ष का बालक है तो मां की गोद में बैठकर निर्भय हो जायगा। कोई 6, 8 वर्ष का बालक है उसे कोई सतायेगा तो वह बाप की गोद में जाकर निर्भय हो जायगा। पर यह तो बतावो कि संसार के ये अशरण हम आप सब प्राणी जन्म, मरण, रोग, शोक, दु:ख, व्याधि, कल्पना, विकल्प, विडंबनाओं से ग्रस्त हैं, अब किसकी शरण में जायें कि निर्भय हो जायें? ढूंढ़ों शरण। न घर में शरण ठीक बैठती है, न परिवार की शरण ठीक बैठती। कहां चलें? बाजार में जायें तो किसकी दुकान पर बैठ जायें? अरे ! बिना स्वार्थ के मुझे अपनाले और मुझे शरण दे दे, ऐसा कोई न मिलेगा। सोचो तो सभी अपने मन में। अरे ! यहां कौन शरण देगा? यहां तो सभी अशरण, असहाय, दीन, वराक, जन्म, मरण के दु:ख भोग रहे हैं। यहां किसी की शरण में जाकर भीख मांगे? खुद ही खुद के लिए शरण हैं।

परमार्थभूत त्याग से शांति- भैया ! कितनी ही वेदनाएं हों, कितनी ही विपत्तियां बिछी हों, जहां आकिन्चन्य स्वभाव ज्ञायकस्वभाव मात्र सबसे विविक्त अपने उस परिपूर्ण अंतस्तत्त्व को, प्रभु को निरखा कि सारे संकट शांत हो जायेंगे। हां ऐसी स्थिति उसे ही मिल सकेगी जो किसी भी यश की, पर के संयोग की वान्छा न रखता हो। त्याग के बिना शांति नहीं हो सकती, और त्याग भी अंतर में हो ज्ञानात्मक। चाहे छोड़ नहीं दिया है घर, किंतु भीतर में तो देखो कि सब कुछ छोड़े हुए ही हैं। किसी भी परपदार्थ से यह जीव चिपका नहीं है, सब स्वतंत्र है, जुदे हैं। बस ऐसी दृढ़ समझ में आ जाय कि सब स्वतंत्र हैं, जुदे हैं, इस ही समझ में त्याग भरा हुआ है इस वास्तविक त्यागभाव के बिना ही यह मन विक्षिप्त हो रहा है, उन्मत्त हो रहा है, बेहोश हो रहा है। खुद अपराधी होकर भी किसी दूसरे को पुकारना, और भगवान् को भी पुकारना अथवा लोक में किसी की शरण गहना, यह सब निर्जन वन में रोने की तरह है। निर्जन वन में दु:खी पुरुष की चिल्लाहट को सुनने वाला कौन है? इसी प्रकार इस दु:खी संसारी प्राणी की वेदना की चिल्लाहट को सुनने वाला कौन है?

प्राणी का अनाथपना- एक बार एक राजा जंगल में गया तो वहां देखा कि एक साधु जी जिन पर कपड़े भी नहीं हैं, खाने पीने का साधन भी नहीं है, बस आसन मारकर आंखें मीचे हुए बैठे हैं। वह साधु कुछ छोटी उम्र का था, जो सतेज शांत बैठा हुआ था। राजा बैठ गया। थोड़ी देर बाद जब साधु ने आंखें खोली तो राजा दया करके कहता है कि तुम कौन हो, क्यों इतना दु:ख भोग रहे हो? कोई भी नहीं है यहां। निर्जन स्थान में तुम पड़े हुए हो, आप कौन हैं? तो मुनि धीरे से कहता है राजन् मैं अनाथ हूं। ओह ! मत घबड़ावो। मैं तुम्हारा नाथ हो गया हूं आज से। चलो घर मौज से रहो। साधु ने पूछा, तुम कौन हो? शंका मत करो। मैं एक बड़ा राजा हूं, इतना परिवार है, इतना देश है, इतनी संपदा है। तुम्हें तकलीफ न होगी। तुम अब अनाथ बनकर न रहोगे, तुम मुझे बहुत सलौने लग रहे हो। वह मुनि कहता है इसमें क्या है, मैं भी तो ऐसा ही था। अब राजा की दृष्टि फिरी और पूछा तो महाराज आप कौन हैं? मुनि बोला कि ‘‘अमुक नगर के राजा का पुत्र हूं।’’ अरे ! वह तो मुझसे भी बड़ा राजा है। इतने बड़े राजा के आप पुत्र हैं, फिर आप अपने को अनाथ क्यों कह रहे हैं? मुनि कहता है, सुनो ‘‘राजन् मेरे सिर में बड़े वेग से दर्द हुआ, उस दर्द में बहुतों ने सेवाएं कीं, डाक्टर बुलाए, औषधियां लाये पर उस समय मेरे सिर के दर्द को एक अंश भी बांटने के लिए कोई समर्थ न था। तब से मुझे यह श्रद्धा हुई है कि मैं तो अनाथ हूं।’’

शरणभूत अविक्षिप्त ज्ञातृत्वभाव के आदर की प्रेरणा- सो चलो भैया ! अब सबके सब, अपने ही शरीर में बसे हुए अपने को खोज लो कि हम सब अनाथ है कि नहीं। आपका कोई दूसरा नाथ भी है क्या? आपकी स्त्रीयां आपकी नाथ होगी क्या? अरे ! जिस क्षण आयु पूर्ण होती है सबके बीमारी से तुरंत चले जाते हैं। जब किसी तीव्र पाप का उदय होता है तो भी ज्यादा प्रीति करने वाले परिजन भी उसका साथ छोड़ देते हैं। ध्यानांतर बीमारी के क्यों थोड़ी देर के समागम को मस्त होते जा रहे हो? यह शरीर को दूर करें, अपने ज्ञान को विक्षिप्त बनाएं। स्थिरता, अतिशय शायद कोई पुरुष उत्तम अभिप्राय इन सबको धारण करें, इस ही उपाय से एक फिट दूर सभी निकट होगी, अन्यथा इस जीव का दूसरा कोई शरण से रहे हैं।


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